चित्रा 2.4 - कांशीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में गैंडा और हिरन जीवों के व्यापार पर रोक लगाने आदि पर प्रबल जोर दिया गया है। तत्पश्चात् वेंफद्रीय सरकार व कइर् राज्य सरकारों ने राष्ट्रीय उद्यान और वन्य जीव पशुविहार ;ेंदबजनंतलद्ध स्थापित किए जिनके बारे में आप पहले पढ़ चुके हैं। वेंफद्रीय सरकार ने कइर् परियोजनाओं की भी घोषणा की जिनका उद्देश्य गंभीर खतरे में पड़े वुफछ विशेष वन प्राण्िायों को रक्षण प्रदान करना था। इन प्राण्िायों में बाघ, एक सींग वाला गैंडा, कश्मीरी हिरण अथवा हंगुल ;ींदहनसद्ध, तीन प्रकार के मगरमच्छ - स्वच्छ जल मगरमच्छ, लवणीय जल मगरमच्छ और घडि़याल, एश्िायाइर् शेर, और अन्य प्राणी शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, वुफछ समय पहले भारतीय हाथी, काला हिरण, चिंकारा, भारतीय गोडावन ;इनेजंतकद्ध और हिम तेंदुओं आदि के श्िाकार और व्यापार पर संपूणर् अथवा आंश्िाक प्रतिबंध लगाकर कानूनी रक्षण दिया है। बाघ परियोजना जाति है। 1973 में अिाकारियों ने पाया कि देश में 20वीं शताब्दी के आरंभ में बाघों की संख्या अनुमानित संख्या 55ए000 से घटकर मात्रा 1ए827 रह गइर् है। बाघों को मारकर उनको व्यापार के लिए चोरी करना, आवासीय स्थलों का सिवुफड़ना, भोजन के लिए आवश्यक जंगली उपजातियों की आवास उपलब्ध करवाते हैं, अतः ये देश ही श्िाकार, चोरी और गैर - कानूनी व्यापार करने वालों के मुख्य निशाने पर हैं। ‘प्रोजेक्ट टाइर्गर’ विश्व की बेहतरीन वन्य जीव परियोजनाओं में से एक है और इसकी शुरुआत 1973 में हुइर्। शुरू में इसमें बहुत सपफलता प्राप्त हुइर् क्योंकि बाघों की संख्या बढ़कर 1985 में 4ए002 और 1989 में 4ए334 हो गइर् थी। परंतु 1993 में इनकी संख्या घटकर 3ए600 तक पहुँच गइर्। भारत में 32137.14 वगर् किमी. पर पैफले हुए 39 बाघ रिशवर् ;ज्पहमत तमेमतअमेद्ध हैं।ऽ बाघ संरक्षण मात्रा एक संकटग्रस्त जाति को बचाने का प्रयास नहीं है, अपितु इसका उद्देश्य बहुत बड़े आकार के जैवजाति को भी बचाना है। उत्तराखण्ड में काॅरबेट राष्ट्रीय उद्यान, पश्िचम बंगाल में सुंदरबन राष्ट्रीय उद्यान, मध्य प्रदेश में बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान, राजस्थान में सरिस्का वन्य जीव पशुविहार ;ेंदबजनंतलद्ध, असम में मानस बाघ रिशवर् ;तमेमतअमद्ध और केरल में पेरियार बाघ रिशवर् ;तमेमतअमद्ध आजकल संरक्षण परियोजनाएँ जैव विविधताओं पर वेंफदि्रत होती हैं न कि इसके विभ्िान्न घटकों पर। संरक्षण के विभ्िान्न तरीकों की गहनता से खोज की जा रही है। संरक्षण नियोजन में कीटों को भी महत्त्व मिल रहा है। वन्य जीव अिानियम 1980 और 1986 के तहत् सैकड़ों तितलियों, पतंगों, भृगों और एक ड्रैगनफ्रलाइर् को भी संरक्ष्िात जातियों में शामिल किया गया है। 1991 में पौधों की भी 6 जातियाँ पहली बार इस सूची में रखी गइर्।

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