Chapter 1 क्या आप उन वस्तओं का नाम बता सकते हैं जो गाँवों और शहरों को रूपांतरण प्रक्रिया प्रकृति, प्रौद्योगिकी और संस्थाओं में हमारे जीवन को आराम पहुँचाते हैं? ऐसी वस्तुओं की एक सूची के परस्पर अंतर्संबंध में निहित है। मानव प्रौद्योगिकी द्वारा तैयार करें और इनको बनाने में प्रयोग होने वाले पदार्थों का नाम प्रकृति के साथ क्रिया करते हैं और अपने आर्थिक बताएँ। विकास की गति को तेज करने के लिए संस्थाओं का निर्माण करते हैं। हमारे पर्यावरण में उपलब्ध प्रत्येक वस्तु जो हमारी क्या आप भी अन्य बहुत से लोगों की तरह संसाधनों आवश्कताओं को पूरा करने में प्रयुक्त की जा सकती है। को प्राकृतिक उपहार समझते हैं? ऐसा नहीं है। संसाधन और जिसको बनाने के लिए प्रौद्योगिकी उपलब्ध है, जो । मानवीय क्रियाओं का परिणाम है। मानव स्वयं संसाधनों आर्थिक रूप से संभाव्य और सांस्कृतिक रूप से मान्य है, का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं। वे पर्यावरण में पाए जाने वाले एक 'संसाधन' है। हमारे पर्यावरण में उपलब्ध वस्तुओं पदार्थों को संसाधनों में परिवर्तित करते हैं तथा उन्हें प्रयोग करते हैं। इन संसाधनों का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया जा सकता है। (क) उत्पत्ति के आधार पर - जैव और अजैव (ख) समाप्यता के आधार पर - नवीकरण योग्य और अनवीकरण योग्य (ग) स्वामित्व के आधार पर - व्यक्तिगत, सामुदायिक, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय (घ) विकास के स्तर के आधार पर - संभावी, विकसित चित्र 1.1 - प्रकृति, प्रौद्योगिक और संस्थाओं के मध्य अंतर्संबंध भंडार और संचित कोष चित्र 1.2 - संसाधनों का वर्गीकरण 2015-16(19/01/2015) सामुदायिक स्वामित्व वाले संसाधन - ये संसाधन प्रत्येक संवर्ग से कम से कम दो संसाधनों की पहचान करें। समुदाय के सभी सदस्यों को उपलब्ध होते हैं। गाँव की शामिलात भूमि (चारण भूमि, श्मशान भूमि, तालाब संसाधनों के प्रकार इत्यादि) और नगरीय क्षेत्रों के सार्वजनिक पार्क, पिकनिक उत्पत्ति के आधार पर स्थल और खेल के मैदान, वहाँ रहने वाले सभी लोगों के जैव संसाधन - इन संसाधनों की प्राप्ति जीवमंडल से लिए उपलब्ध है। होती है और इनमें जीवन व्याप्त है, जैसे - मनुष्य, राष्ट्रीय संसाधन - तकनीकी तौर पर देश में पाये जाने वनस्पतिजात, प्राणिजात, मत्स्य जीवन, पशुधन आदि। वाले सारे संसाधन राष्ट्रीय हैं। देश की सरकार को अजैव संसाधन _ वे सारे संसाधन जो निर्जीव वस्तओं कानूनी अधिकार है कि वह व्यक्तिगत संसाधनों को भी से बने हैं, अजैव संसाधन कहलाते हैं। उदाहरणार्थ, चट्टानें आम जनता के हित में अधिग्रहित कर सकती है। आपने और धातुएँ। देखा होगा कि सड़कें, नहरें और रेल लाइनें व्यक्तिगत स्वामित्व वाले खेतों में बनी हुई हैं। शहरी विकास समाप्यता के आधार पर प्राधिकरणों को सरकार ने भूमि अधिग्रहण का अधिकार नवीकरण योग्य संसाधन - वे संसाधन जिन्हें भौतिक, दिया हुआ है। सारे खनिज पदार्थ, जल संसाधन, वन, रासायनिक या यांत्रिक प्रक्रियाओं द्वारा नवीकृत या पुनः वन्य जीवन, राजनीतिक सीमाओं के अंदर सारी भूमि उत्पन्न किया जा सकता है, उन्हें नवीकरण योग्य अथवा और 12 समद्री मील (22.2 किमी.) तक महासागरीय पुनः पूर्ति योग्य संसाधन कहा जाता है। उदाहरणार्थ, सौर क्षेत्र (भू-भागीय समुद्र) व इसमें पाए जाने वाले संसाधन तथा पवन ऊर्जा, जल, वन व वन्य जीवन। इन संसाधनों राष्ट्र की संपदा हैं। को सतत् अथवा प्रवाह संसाधनों में विभाजित किया गया। अंतर्राष्ट्रीय संसाधन - कुछ अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ संसाधनों है (चित्र 1.2)। को नियंत्रित करती हैं। तट रेखा से 200 समुद्री मील की अनवीकरण योग्य संसाधन - इन संसाधनों का विकास दरी (अपवर्जक आर्थिक क्षेत्र) से परे खुले महासागरीय एक लंबे भू-वैज्ञानिक अंतराल में होता है। खनिज और संसाधनों पर किसी देश का अधिकार नहीं है। इन जीवाश्म ईंधन इस प्रकार के संसाधनों के उदाहरण हैं। संसाधनों को अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की सहमति के बिना इनके बनने में लाखों वर्ष लग जाते हैं। इनमें से कुछ उपयोग नहीं किया जा सकता। संसाधन जैसे धातुएँ पुनः चक्रीय हैं और कुछ संसाधन जैसे जीवाश्म ईंधन अचक्रीय हैं व एक बार के प्रयोग के साथ ही खत्म हो जाते हैं। क्या आप जानते हैं कि भारत के पास अपवर्जक आर्थिक क्षेत्र से दूर हिन्द महासागर की तलहटी से मैंगनीज़ ग्रंथियों का खनन स्वामित्व के आधार पर करने का अधिकार है। कुछ अन्य अंतर्राष्ट्रीय संसाधनों की व्यक्तिगत संसाधन - संसाधन निजी व्यक्तियों के स्वामित्व पहचान करें। में भी होते हैं। बहुत से किसानों के पास सरकार द्वारा आवंटित भूमि होती है जिसके बदले में वे सरकार को विकास के स्तर के आधार पर लगान चुकाते हैं। गाँव में बहुत से लोग भूमि के स्वामी संभावी संसाधन - यह वे संसाधन हैं जो किसी प्रदेश भी होते हैं और बहुत से लोग भूमिहीन होते हैं। शहरों में में विद्यमान होते हैं परंतु इनका उपयोग नहीं किया गया लोग भूखंड, घरों व अन्य जायदाद के मालिक होते हैं। है। उदाहरण के तौर पर भारत के पश्चिमी भाग, बाग, चारागाह, तालाब और कुओं का जल आदि संसाधनों विशेषकर राजस्थान और गुजरात में पवन और सौर ऊर्जा के निजी स्वामित्व के कुछ उदाहरण हैं। अपने परिवार संसाधनों की अपार संभावना है, परंतु इनका सही ढंग से के संसाधनों की एक सूची तैयार कीजिए। विकास नहीं हुआ है। 2 समकालीन भारत-2 2015-16(19/01/2015) विकसित संसाधन - वे संसाधन जिनका सर्वेक्षण • संसाधनों के अंधाधुंध शोषण से वैश्विक पारिस्थितिकी किया जा चुका है और उनके उपयोग की गुणवत्ता और संकट पैदा हो गया है जैसे भूमंडलीय तापन, मात्रा निर्धारित की जा चुकी है, विकसित संसाधन कहलाते ओजोन परत अवक्षय, पर्यावरण प्रदूषण और भूमि हैं। संसाधनों का विकास प्रौद्योगिकी और उनकी संभाव्यता निम्नीकरण आदि हैं। के स्तर पर निर्भर करता है। भंडार - पर्यावरण में उपलब्ध वे पदार्थ जो मानव की कल्पना करें कि तेल संसाधन खत्म होने पर इनका आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकते हैं परंतु उपयुक्त हमारी जीवन शैली पर क्या प्रभाव होगा? प्रौद्योगिकी के अभाव में उसकी पहुँच से बाहर हैं, भंडार 2. घरेलू और कृषि संबंधित अपशिष्ट को पुनः चक्रण करने में शामिल हैं। उदाहरण के लिए, जल दो ज्वलनशील के बारे में लोगों के विचार जानने के लिए अपने मोहल्ले गैसों, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का यौगिक है तथा यह अथवा गाँव में एक सर्वेक्षण करें। लोगों से प्रश्न पूछे कि- (अ) उनके द्वारा उपयोग में लाए जाने वाले संसाधनों के ऊर्जा का मुख्य स्रोत बन सकता है। परंतु इस उद्देश्य से, बारे में वे क्या सोचते हैं? इनका प्रयोग करने के लिए हमारे पास आवश्यक तकनीकी (ब) अपशिष्ट और उसके उपयोग के बारे में उनका ज्ञान नहीं है। क्या विचार है? (स) अपने परिणामों का समुच्चित चित्र (collage) संचित कोष - यह संसाधन भंडार का ही हिस्सा है, तैयार करें। जिन्हें उपलब्ध तकनीकी ज्ञान की सहायता से प्रयोग में लाया जा सकता है, परंतु इनका उपयोग अभी आरंभ नहीं मानव जीवन की गुणवत्ता और विश्व शांति बनाए हुआ है। इनका उपयोग भविष्य में आवश्यकता पूर्ति के रखने के लिए संसाधनों का समाज में न्यायसंगत बँटवारा लिए किया जा सकता है। नदियों के जल को विद्युत पैदा आवश्यक हो गया है। यदि कुछ ही व्यक्तियों तथा देशों करने में प्रयुक्त किया जा सकता है, परंतु वर्तमान समय द्वारा संसाधनों का वर्तमान दोहन जारी रहता है, तो हमारी में इसका उपयोग सीमित पैमाने पर ही हो रहा है। इस पृथ्वी का भविष्य खतरे में पड़ सकता है। प्रकार बाँधों में जल, वन आदि संचित कोष हैं जिनका । इसलिए, हर तरह के जीवन का अस्तित्व बनाए उपयोग भविष्य में किया जा सकता है। रखने के लिए संसाधनों के उपयोग की योजना बनाना अति आवश्यक है। सतत् अस्तित्व सही अर्थ में सतत् । पोषणीय विकास का ही एक हिस्सा है। अपने आसपास के क्षेत्र में पाए जाने वाले भंडार और संचित कोष संसाधनों की एक सूची तैयार कीजिए। सतत् पोषणीय विकास संसाधनों का विकास सतत् पोषणीय आर्थिक विकास का अर्थ है कि विकास संसाधन जिस प्रकार, मनुष्य के जीवन यापन के लिए। पर्यावरण को बिना नुकसान पहुँचाए हो और वर्तमान विकास अति आवश्यक हैं, उसी प्रकार जीवन की गुणवत्ता बनाए की प्रक्रिया भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकता की अवहेलना न करे। रखने के लिए भी महत्त्वपूर्ण हैं। ऐसा विश्वास किया जाता था कि संसाधन प्रकृति की देन है। परिणामस्वरूप, मानव ने इनका अंधाधुंध उपयोग किया है, जिससे रियो डी जेनेरो पृथ्वी सम्मेलन, 1992 निम्नलिखित मुख्य समस्याएँ पैदा हो गई हैं। जून, 1992 में 100 से भी अधिक राष्ट्राध्यक्ष ब्राजील के • कुछ व्यक्तियों के लालचवश संसाधनों का ह्रास । शहर रियो डी जेनेरो में प्रथम अंतर्राष्ट्रीय पृथ्वी सम्मेलन में • संसाधन समाज के कुछ ही लोगों के हाथ में आ गए एकत्रित हुए। सम्मेलन का आयोजन विश्व स्तर पर उभरते हैं, जिससे समाज दो हिस्सों संसाधन संपन्न एवं पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक-आर्थिक विकास की संसाधनहीन अर्थात् अमीर और गरीब में बँट गया। समस्याओं का हल ढूँढने के लिए किया गया था। इस संसाधन एवं विकास 2015-16(19/01/2015) सम्मेलन में एकत्रित नेताओं ने भूमंडलीय जलवायु परिवर्तन और जैविक विविधता पर एक घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर अपने राज्य में पाए जाने वाले संसाधनों की सूची तैयार करें किया। रियो सम्मेलन में भूमंडलीय वन सिद्धांतों (Forest और जिन महत्त्वपूर्ण संसाधनों की आपके राज्य में कमी है, Principles) पर सहमति जताई और 21वीं शताब्दी में उनकी पहचान करें। सतत् पोषणीय विकास के लिए एजेंडा 21 को स्वीकृति प्रदान की। भारत में संसाधन नियोजन एजेंडा 21 संसाधन नियोजन एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें निम्नलिखित यह एक घोषणा है जिसे 1992 में ब्राजील के शहर रियो डी सोपान हैं - (क) देश के विभिन्न प्रदेशों में संसाधनों जेनेरो में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण और विकास सम्मेलन (UNCED) के तत्वाधान में राष्ट्राध्यक्षों द्वारा स्वीकृत किया की पहचान कर उनकी तालिका बनाना। इस कार्य में गया था। इसका उद्देश्य भूमंडलीय सतत् पोषणीय विकास क्षेत्रीय सर्वेक्षण, मानचित्र बनाना और संसाधनों का गुणात्मक हासिल करना है। यह एक कार्यसूची है जिसका उद्देश्य । एवं मात्रात्मक अनुमान लगाना व मापन करना है। समान हितों, पारस्परिक आवश्यकताओं एवं सम्मिलित (ख) संसाधन विकास योजनाएँ लागू करने के लिए जिम्मेदारियों के अनुसार विश्व सहयोग के द्वारा पर्यावरणीय उपयुक्त प्रौद्योगिकी, कौशल और संस्थागत नियोजन ढाँचा क्षति, गरीबी और रोगों से निपटना है। एजेंडा 21 का मुख्य तैयार करना। (ग) संसाधन विकास योजनाओं और राष्ट्रीय उद्देश्य यह है कि प्रत्येक स्थानीय निकाय अपना स्थानीय एजेंडा 21 तैयार करे। विकास योजना में समन्वय स्थापित करना। स्वाधीनता के बाद भारत में संसाधन नियोजन के उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्रथम पंचवर्षीय योजना से ही संसाधन नियोजन प्रयास किए गए। संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए नियोजन एक सर्वमान्य रणनीति है। इसलिए भारत जैसे देश में जहाँ संसाधनों की उपलब्धता में बहुत अधिक विविधता है, समुदाय भागीदारी की सहायता से समुदाय / ग्राम पंचायत / वार्ड स्तरीय समुदायों द्वारा आपके आसपास के क्षेत्र में कौन यह और भी महत्त्वपूर्ण है। यहाँ ऐसे प्रदेश भी हैं जहाँ । से संसाधन विकसित किए जा रहे हैं? एक तरह के संसाधनों की प्रचुरता है, परंतु दूसरे तरह। के संसाधनों की कमी है। कुछ ऐसे प्रदेश भी हैं जो किसी क्षेत्र के विकास के लिए संसाधनों की उपलब्धता संसाधनों की उपलब्धता के संदर्भ में आत्मनिर्भर हैं। एक आवश्यक शर्त है। परंतु प्रौद्योगिकी और संस्थाओं में और कुछ ऐसे भी प्रदेश हैं जहाँ महत्त्वपूर्ण संसाधनों तदनरूपी परिवर्तनों के अभाव में मात्र संसाधनों की की अत्यधिक कमी है। उदाहरणार्थ, झारखंड, मध्यप्रदेश उपलब्धता से ही विकास संभव नहीं है। देश में बहुत से और छत्तीसगढ़ आदि प्रांतों में खनिजों और कोयले के क्षेत्र हैं जो संसाधन समृद्ध होते हुए भी आर्थिक रूप से प्रचुर भंडार हैं। अरुणाचल प्रदेश में जल संसाधन प्रचुर पिछड़े प्रदेशों की गिनती में आते हैं। इसके विपरीत कुछ मात्रा में पाए जाते हैं, परंतु मूल विकास की कमी है। ऐसे प्रदेश भी हैं जो संसाधनों की कमी होते हुए भी राजस्थान में पवन और सौर ऊर्जा संसाधनों की बहुतायत आर्थिक रूप से विकसित हैं। है, लेकिन जल संसाधनों की कमी है। लद्दाख का क्या आप संसाधन संपन्न परंतु आर्थिक रूप से पिछड़े शीत मरुस्थल देश के अन्य भागों से अलग-थलग । और संसाधन विहीन परंतु आर्थिक रूप से विकसित पड़ता है। यह प्रदेश सांस्कृतिक विरासत का धनी है । प्रदेशों के नाम बता सकते हैं? ऐसी परिस्थिति होने के परंतु यहाँ जल, आधारभूत अवसंरचना तथा कुछ कारण बताएँ। महत्त्वपूर्ण खनिजों की कमी है। इसलिए राष्ट्रीय, प्रातीय, प्रादेशिक और स्थानीय स्तर पर संतुलित उपनिवेशन का इतिहास हमें बताता है कि उपनिवेशों संसाधन नियोजन की आवश्यकता है। में संसाधन संपन्न प्रदेश, विदेशी आक्रमणकारियों के 4 समकालीन भारत-2 2015-16(19/01/2015) लिए मुख्य आकर्षण रहे हैं। उपनिवेशकारी देशों ने बेहतर । संरक्षण की वकालत की। यह रिपोर्ट बाद में हमारा सांझा प्रौद्योगिकी के सहारे उपनिवेशों के संसाधनों का शोषण भविष्य (Our Common Future) शीर्षक से पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुई। इस संदर्भ में एक और महत्त्वपूर्ण किया तथा उन पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। अतः योगदान रियो डी जेनेरो, ब्राजील में 1992 में आयोजित पृथ्वी संसाधन किसी प्रदेश के विकास में तभी योगदान दे सम्मेलन द्वारा किया गया। सकते हैं, जब वहाँ उपयुक्त प्रौद्योगिकी विकास और संस्थागत परिवर्तन किए जाएँ। उपनिवेशन के विभिन्न चरणों में भारत ने इन सबका अनुभव किया है। अतः भू-संसाधन भारत में विकास सामान्यतः तथा संसाधन विकास लोगों हम भूमि पर रहते हैं, इसी पर अनेकों आर्थिक क्रियाकलाप के मुख्यतः संसाधनों की उपलब्धता पर ही आधारित नहीं करते हैं और विभिन्न रूपों में इसका उपयोग करते हैं। था बल्कि इसमें प्रौद्योगिकी, मानव संसाधन की गुणवत्ता अतः भमि एक बहत महत्त्वपर्ण प्राकतिक संसाधन है। और ऐतिहासिक अनुभव का भी योगदान रहा है। प्राकृतिक वनस्पति, वन्य जीवन, मानव जीवन, आर्थिक संसाधनों का संरक्षण - संसाधन किसी भी तरह के क्रियाएँ, परिवहन तथा संचार व्यवस्थाएँ भूमि पर ही विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। परंतु संसाधनों आधारित हैं। परंतु भूमि एक सीमित संसाधन है, इसलिए का विवेकहीन उपभोग और अति उपयोग के कारण कई उपलब्ध भूमि का विभिन्न उद्देश्यों के लिए उपयोग सामाजिक-आर्थिक और पर्यावरणीय समस्याएँ पैदा हो सावधानी और योजनाबद्ध तरीके से होना चाहिए। सकती हैं। इन समस्याओं से बचाव के लिए विभिन्न भारत में भूमि पर विभिन्न प्रकार की भू-आकृतियाँ स्तरों पर संसाधनों का संरक्षण आवश्यक है। भूतकाल से जैसे पर्वत, पठार, मैदान और दीप पाए जाते हैं। लगभग ही संसाधनों का संरक्षण बहुत से नेताओं और चिंतकों के 43 प्रतिशत भ-क्षेत्र मैदान हैं जो कषि और उद्योग के लिए चिंता का विषय रहा है। उदाहरणार्थ, गांधी जी ने विकास के लिए सुविधाजनक हैं। पर्वत परे भू-क्षेत्र के संसाधनों के संरक्षण पर अपनी चिंता इन शब्दों में व्यक्त 30 प्रतिशत भाग पर विस्तृत हैं। वे कुछ बारहमासी की है - हमारे पास हर व्यक्ति की आवश्यकता पूर्ति नदियों के प्रवाह को सनिश्चित करते है, पर्यटन विकास के लिए बहुत कुछ है, लेकिन किसी के लालच की के लिए अनकल परिस्थितियाँ प्रदान करता है और संतुष्टि के लिए नहीं। अर्थात् हमारे पास पेट भरने । पारिस्थितिकी के लिए महत्त्वपूर्ण है। देश के क्षेत्रफल के लिए बहुत है लेकिन पेटी भरने के लिए नहीं। लिए नहा का लगभग 27 प्रतिशत हिस्सा पठारी क्षेत्र है। इस क्षेत्र उनके अनुसार विश्व स्तर पर संसाधन ह्रास के लिए * में खनिजों, जीवाश्म ईंधन और वनों का अपार संचय लालची और स्वार्थी व्यक्ति तथा आधुनिक प्रौद्योगिकी की। | कोष है। शोषणात्मक प्रवृत्ति जिम्मेदार है। वे अत्यधिक उत्पादन के विरुद्ध थे और इसके स्थान पर अधिक बड़े जनसमुदाय द्वारा उत्पादन के पक्षधर थे। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यवस्थित तरीके से संसाधन संरक्षण की वकालत 1968 में क्लब ऑफ रोम ने की। तत्पश्चात् 1974 में शुमेसर ने अपनी पुस्तक स्माल इज ब्यूटीफुल में इस विषय पर गांधी जी के दर्शन की एक बार फिर से पुनरावृत्ति की है। 1987 में ब्रुन्टलैंड आयोग रिपोर्ट द्वारा वैश्विक स्तर पर संसाधन संरक्षण में मूलाधार योगदान किया गया। इस रिपोर्ट ने सतत् पोषणीय विकास (Sustainable Development) की संकल्पना प्रस्तुत की और संसाधन चित्र 1.3 - मुख्य भू आकृतियों के अंतर्गत क्षेत्र संसाधन एवं विकास 2015-16(19/01/2015) चित्र 1.4 भू-उपयोग (ब) वर्तमान परती भूमि के अतिरिक्त अन्य परती भू-संसाधनों का उपयोग निम्नलिखित उद्देश्यों से किया जाता है । भूमि या पुरातन परती (जहाँ 1 से 5 कृषि वर्ष से खेती न की गई हो) 1. वन 2. कृषि के लिए अनुपलब्ध भूमि 5. शुद्ध (निवल) बोया गया क्षेत्र (अ) बंजर तथा कृषि अयोग्य भूमि । एक कृषि वर्ष में एक बार से अधिक बोए गए क्षेत्र (ब) गैर-कृषि प्रयोजनों में लगाई गई भूमि - जैसे को शुद्ध (निवल) बोए गए क्षेत्र में जोड़ दिया जाए। इमारतें, सड़क, उद्योग इत्यादि।। तो वह सकल कृषित क्षेत्र कहलाता है। 3. परती भूमि के अतिरिक्त अन्य कृषि अयोग्य भूमि (अ) स्थायी चरागाहें तथा अन्य गोचर भूमि ' भारत में भू-उपयोग प्रारूप (ब) विविध वृक्षों, वृक्ष फसलों, तथा उपवनों के भू-उपयोग को निर्धारित करने वाले तत्त्वों में भौतिक अधीन भूमि (जो शुद्ध बोए गए क्षेत्र में कारक जैसे भू-आकृति, जलवायु और मृदा के प्रकार शामिल नहीं है) तथा मानवीय कारक जैसे जनसंख्या घनत्व, प्रौद्योगिक (स) कृषि योग्य बंजर भूमि जहाँ पाँच से अधिक क्षमता, संस्कृति और परंपराएँ इत्यादि शामिल हैं। वर्षों से खेती न की गई हो। भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 32.8 लाख वर्ग 4. परती भूमि किमी. है। परंतु इसके 93 प्रतिशत भाग के ही भू-उपयोग (अ) वर्तमान परती (जहाँ एक कृषि वर्ष या उससे आँकड़े उपलब्ध हैं क्योंकि पूर्वोत्तर प्रांतों में असम को कम समय से खेती न की गई हो)। | छोड़कर अन्य प्रांतों के सूचित क्षेत्र के बारे में जानकारी समकालीन भारत-2 6 2015-16(19/01/2015) उपलब्ध नहीं है। इसके अलावा जम्मू और कश्मीर में बस्तियाँ, सड़कें, रेल लाइन, उद्योग इत्यादि आते हैं। लंबे पाकिस्तान और चीन अधिकृत क्षेत्रों के भूमि उपयोग का समय तक लगातार भूमि संरक्षण और प्रबंधन की अवहेलना सर्वेक्षण भी नहीं हुआ है। करने एवं लगातार भू-उपयोग के कारण भू-संसाधनों का निम्नीकरण हो रहा है। इसके कारण समाज और पर्यावरण पर गंभीर आपदा आ सकती है। भू-उपयोग के दो वृत्त चित्रों 14 की तुलना करके पता लगाएँ कि 1960-61 और 2008-09 के बीच शुद्ध (निवल) बोये भूमि निम्नीकरण और संरक्षण उपाय गये क्षेत्र और वनों के अंतर्गत भूमि में बहुत सीमित परिवर्तन ही क्यों आया है? भूमि एक ऐसा संसाधन है जिसका उपयोग हमारे पूर्वज करते आए हैं तथा भावी पीढ़ी भी इसी भूमि का उपयोग स्थायी चरागाहों के अंतर्गत भी भूमि कम हुई है। करेगी। हम भोजन, मकान और कपड़े की अपनी मूल पशुधन की इतनी बड़ी संख्या के लिए चारा उपलब्ध आवश्यकताओं का 95 प्रतिशत भाग भूमि से प्राप्त करते कराने में कैसे समर्थ होंगे? और इसके क्या परिणाम हैं। मानव कार्यकलापों के कारण न केवल भूमि का होंगे? वर्तमान परती भूमि के अतिरिक्त अन्य परती भूमि निम्नीकरण हो रहा है बल्कि भूमि को नुकसान पहुँचाने अनुपजाऊ हैं और इन पर फसलें उगाने के लिए कृषि वाली प्राकृतिक ताकतों को भी बल मिला है। लागत बहुत ज्यादा है। अतः इस भूमि में दो या तीन वर्षों इस समय भारत में लगभग 13 करोड़ हेक्टेयर भूमि में इनको एक या दो बार बोया जाता है और यदि इसे निम्नीकृत है। इसमें से लगभग 28 प्रतिशत भूमि निम्नीकृत शुद्ध (निवल) बोये गए क्षेत्र में शामिल कर लिया जाता वनों के अंतर्गत है, 56 प्रतिशत क्षेत्र जल अपरदित है। है तब भी भारत के कुल सूचित क्षेत्र के लगभग 54 और शेष क्षेत्र लवणीय और क्षारीय है। कुछ मानव प्रतिशत हिस्से पर ही खेती हो सकती है। क्रियाओं जैसे वनोन्मूलन, अति पशुचारण, खनन ने भी शुद्ध (निवल) बोये गए क्षेत्र का प्रतिशत भी विभिन्न भूमि के निम्नीकरण में मुख्य भूमिका निभाई है। राज्यों में भिन्न-भिन्न है। पंजाब और हरियाणा में 80 प्रतिशत भूमि पर खेती होती है, परंतु अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मणिपुर और अंडमान निकोबार द्वीप समूह में 10 प्रतिशत से भी कम क्षेत्र बोया जाता है। इन राज्यों में शुद्ध ( निवल) बोये गए क्षेत्र के कम अनुपात के लिए उत्तरदायी कारणों को ज्ञात कीजिए। हमारे देश में राष्ट्रीय वन नीति (1952) द्वारा निर्धारित वनों के अंतर्गत 33 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र वांछित हैं। जिसकी तुलना में वन के अंतर्गत क्षेत्र काफी कम है। वन नीति द्वारा निर्धारित यह सीमा पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक है। वन क्षेत्रों के आस पास रहने वाले लाखों लोगों की आजीविका इस पर निर्भर करती है। भू-उपयोग का एक भाग बंजर भूमि और दूसरा गैर-कृषि प्रयोजनों में लगाई गई भूमि कहलाता है। बंजर भूमि में पहाड़ी चट्टानें, सूखी और मरुस्थलीय भूमि शामिल हैं। गैर-कृषि प्रयोजनों में लगाई भूमि में चित्र 1.5 संसाधन एवं विकास 2015-16(19/01/2015) खनन के उपरांत खदानों वाले स्थानों को गहरी खाइयों और मलबे के साथ खुला छोड़ दिया जाता है। ऊपरी संस्तर की मृदा खनन के कारण झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और उप-मृदा अपक्षयित चट्टानें उड़ीसा जैसे राज्यों में वनोन्मूलन भूमि निम्नीकरण का बालू, गाद (सिल्ट) व मृत्तिका कारण बना है। गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में अति पशुचारण भूमि निम्नीकरण का मुख्य कारण है। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में अधःस्तरीय अपक्षयित आधारी अधिक सिंचाई भूमि निम्नीकरण के लिए उत्तरदायी है। चट्टानें अति सिंचन से उत्पन्न जलाक्रांतता भी भूमि निम्नीकरण के लिए उत्तरदायी है जिससे मृदा में लवणीयता और क्षारीयता बढ़ जाती है। खनिज प्रक्रियाएँ जैसे सीमेंट उद्योग में चूना पत्थर को पीसना और मृदा बर्तन उद्योग में चूने (खड़िया मृदा) और सेलखड़ी के प्रयोग से बहुत अधिक मात्रा में वायुमंडल में धूल विसर्जित होती है। जब अपक्षय रहित आधारी इसकी परत भूमि पर जम जाती है तो मृदा की जल चट्टानें सोखने की प्रक्रिया अवरुद्ध हो जाती है। पिछले कुछ वर्षों से देश के विभिन्न भागों में औद्योगिक जल निकास से बाहर आने वाला अपशिष्ट पदार्थ भूमि और जल प्रदूषण चित्र 16 - मृदा परिच्छेदिका का मुख्य स्रोत है। जल की क्रिया, पवन, हिमनदी और अपघटन क्रियाएँ भूमि निम्नीकरण की समस्याओं को सुलझाने के कई आदि मृदा बनने की प्रक्रिया में योगदान देती हैं। मृदा में तरीके हैं। वनारोपण और चरागाहों का उचित प्रबंधन इसमें होने वाले रासायनिक और जैविक परिवर्तन भी महत्त्वपूर्ण कुछ हद तक मदद कर सकते हैं। पेड़ों की रक्षक मेखला हैं। मृदा जैव (ह्यूमस) और अजैव दोनों प्रकार के पदार्थों (shelter belt), पशुचारण नियंत्रण और रेतीले टीलों को काँटेदार झाड़ियाँ लगाकर स्थिर बनाने की प्रक्रिया से भी से बनती है। (चित्र 1.6) | मृदा बनने की प्रक्रिया को निर्धारित करने वाले भूमि कटाव की रोकथाम की जा सकती है। बंजर भूमि के उचित प्रबंधन, खनन नियंत्रण और औद्योगिक जल तत्त्वों, उनके रंग, गहराई, गठन, आयु, व रासायनिक और को परिष्करण के पश्चात् विसर्जित करके जल और भूमि भौतिक गुणों के आधार पर भारत की मृदाओं को निम्नलिखित प्रकारों में बाँटा जा सकता है। प्रदूषण को कम किया जा सकता है। मृदाओं का वर्गीकरण मृदा संसाधन भारत में अनेक प्रकार के उच्चावच, भू-आकृतियाँ, मिट्टी अथवा मृदा सबसे महत्त्वपूर्ण नवीकरण योग्य प्राकृतिक । जलवायु और वनस्पतियाँ पाई जाती हैं। इस कारण अनेक संसाधन है। यह पौधों के विकास का माध्यम है जो पृथ्वी । प्रकार की मृदाएँ विकसित हुई हैं। पर विभिन्न प्रकार के जीवों का पोषण करती है। मृदा एक जीवंत तंत्र है। कुछ सेंटीमीटर गहरी मृदा बनने में जलोढ़ मृदा लाखों वर्ष लग जाते हैं। मृदा बनने की प्रक्रिया में यह मृदा विस्तृत रूप से फैली हुई है और यह देश की उच्चावच, जनक शैल अथवा संस्तर शैल, जलवायु, महत्त्वपूर्ण मृदा है। वास्तव में संपूर्ण उत्तरी मैदान जलोढ़ वनस्पति और अन्य जैव पदार्थ और समय मुख्य कारक मृदा से बना है। यह मृदाएँ हिमालय की तीन महत्त्वपूर्ण हैं। प्रकृति के अनेकों तत्त्व जैसे तापमान परिवर्तन, बहते नदी तंत्रों सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा लाए गए 8 समकालीन भारत-2 2015-16(19/01/2015) भारत - मृदा के मुख्य प्रकार संसाधन एवं विकास 2015-16(19/01/2015) निक्षेपों से बनी हैं। एक सँकरे गलियारे के द्वारा ये मृदाएँ उचित समझी जाती है और काली कपास मृदा के नाम राजस्थान और गुजरात तक फैली हैं। पूर्वी तटीय मैदान, से भी जाना जाता है। यह माना जाता है कि जलवायु और विशेषकर महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों जनक शैलों ने काली मृदा के बनने में महत्त्वपूर्ण योगदान के डेल्टे भी जलोढ़ मृदा से बने हैं। दिया है। इस प्रकार की मृदाएँ दक्कन पठार (बेसाल्ट) क्षेत्र के उत्तर पश्चिमी भागों में पाई जाती हैं और लावा जनक शैलों से बनी है। ये मृदाएँ महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के पठार पर पाई जाती हैं और दक्षिण पूर्वी दिशा में गोदावरी और कृष्णा नदियों की घाटियों तक फैली हैं। चित्र 17 - जलोढ़ मृदा जलोढ़ मृदा में रेत, सिल्ट और मृत्तिका के विभिन्न अनुपात पाए जाते हैं। जैसे हम नदी के मुहाने से घाटी में ऊपर की ओर जाते हैं मृदा के कणों का आकार बढ़ता चला जाता है। नदी घाटी के ऊपरी भाग में, जैसे ढाल भंग के समीप मोटे कण वाली मृदाएँ पाई जाती हैं। ऐसी मृदाएँ पर्वतों की तलहटी पर बने मैदानों जैसे द्वार, ‘चो' क्षेत्र और तराई में आमतौर पर पाई जाती हैं। कणों के आकार या घटकों के अलावा मृदाओं की चित्र 1.8- काली मृदा पहचान उनकी आयु से भी होती है। आयु के आधार पर जलोढ़ मृदाएँ दो प्रकार की हैं - पुराना जलोढ़ (बांगर) काली मृदा बहुत महीन कणों अर्थात् मृत्तिका से और नया जलोढ़ (खादर)। बांगर मृदा में 'कंकर' बनी है। इसकी नमी धारण करने की क्षमता बहुत होती ग्रंथियों की मात्रा ज्यादा होती है। खादर मृदा में बांगर मृदा है। इसके अलावा ये मृदाएँ कैल्शियम कार्बोनेट, की तुलना में ज्यादा महीन कण पाए जाते हैं। | मैगनीशियम, पोटाश और चूने जैसे पौष्टिक तत्त्वों से । | जलोढ़ मृदाएँ बहुत उपजाऊ होती हैं। अधिकतर परिपूर्ण होती हैं। परंतु इनमें फास्फोरस की मात्रा कम जलोढ़ मृदाएँ पोटाश, फास्फोरस और चूनायुक्त होती हैं होती है। गर्म और शुष्क मौसम में इन मृदाओं में गहरी जो इनको गन्ने, चावल, गेहूँ और अन्य अनाजों और दरारें पड़ जाती हैं जिससे इनमें अच्छी तरह वायु दलहन फसलों की खेती के लिए उपयुक्त बनाती है। मिश्रण हो जाता है। गीली होने पर ये मृदाएँ चिपचिपी अधिक उपजाऊपन के कारण जलोढ़ मृदा वाले क्षेत्रों में हो जाती है और इन को जोतना मुश्किल होता है। गहन कृषि की जाती है और यहाँ जनसंख्या घनत्व भी इसलिए, इसकी जुताई मानसून प्रारंभ होने की पहली अधिक है। सूखे क्षेत्रों की मृदाएँ अधिक क्षारीय होती हैं। बौछार से ही शुरू कर दी जाती है। इन मृदाओं का सही उपचार और सिंचाई करके इनकी लाल और पीली मृदा पैदावार बढ़ाई जा सकती है। लाल मृदा दक्कन पठार के पूर्वी और दक्षिणी हिस्सों में काली मृदा रवेदार आग्नेय चट्टानों पर कम वर्षा वाले भागों में इन मृदाओं का रंग काला है और इन्हे ‘रेगर' मृदाएँ भी विकसित हुई है। लाल और पीली मृदाएँ ओडिशा, कहा जाता है। काली मृदा कपास की खेती के लिए छत्तीसगढ़, मध्य गंगा मैदान के दक्षिणी छोर पर और 10 समकालीन भारत-2 2015-16(19/01/2015) पश्चिमी घाट में पहाड़ी पद पर पाई जाती है। इन मृदाओं क्षेत्रों में नमक की मात्रा इतनी अधिक है कि झीलों से का लाल रंग रवेदार आग्नेय और रूपांतरित चट्टानों में जल वाष्पीकृत करके खाने का नमक भी बनाया जाता लौह धातु के प्रसार के कारण होता है। इनका पीला रंग है। शुष्क जलवायु और उच्च तापमान के कारण इनमें जलयोजन के कारण होता है। जलवाष्पन दर अधिक है और मृदाओं में ह्यूमस और नमी की मात्रा कम होती है। मृदा की सतह के नीचे लेटराइट मृदा कैल्शियम की मात्रा बढ़ती चली जाती है और नीचे की लेटराइट शब्द ग्रीक भाषा के शब्द लेटर (Later) से परतों में चने के कंकर की सतह पाई जाती है। इसके लिया गया है जिसका अर्थ है ईंट। लेटराइट मृदा उच्च । टराइट मृदा उच्च कारण मृदा में जल अंतः स्यंदन (infiltration) तापमान और अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में विकसित होती अवरुद्ध हो जाता है। इस मदा को सही तरीके से है। यह भारी वर्षा से अत्यधिक निक्षालन (leaching) सिंचित करके कषि योग्य बनाया जा सकता है, जैसा का परिणाम है। इस मृदा में ह्यूमस की मात्रा कम पाई कि पश्चिमी राजस्थान में हो रहा है। जाती है क्योंकि अत्यधिक तापमान के कारण जैविक पदार्थों को अपघटित करने वाले बैक्टीरिया नष्ट हो जाते हैं। लेटराइट मृदा पर अधिक मात्रा में खाद और रासायनिक चित्र 1.10 - मरुस्थली मृदा वन मृदा ये मृदाएँ आमतौर पर पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में पाई चित्र 1.9 - लेटराइट मृदा जाती हैं जहाँ पर्याप्त वर्षा-वन उपलब्ध हैं। इन मृदाओं के उर्वरक डाल कर ही खेती की जा सकती है। ये मदाएँ गठन में पर्वतीय पर्यावरण के अनुसार बदलाव आता है। मुख्य तौर पर कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश नदी घाटियों में ये मृदाएँ दोमट और सिल्टदार होती है। और ओडिशा तथा असम के पहाडी क्षेत्र में पाई जाती है। परंतु ऊपरी ढालों पर इनका गठन मोटे कणों का होता है। मदा संरक्षण की उचित तकनीक अपना कर इन मदाओं हिमालय के हिमाच्छादित क्षेत्रों में इन मृदाओं का बहुत पर कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में चाय और कॉफी अपरदन होता है और ये अधिसिलिक (acidic) तथा उगाई जाती हैं। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल की ह्यूमस रहित होती हैं। नदी घाटियों के निचले क्षेत्रों, लाल लेटराइट मदाएँ काज की फसल के लिए अधिक विशेषकर नदी सोपानों और जलोढ़ पंखों, आदि में ये उपयुक्त हैं। मृदाएँ उपजाऊ होती हैं। मरुस्थली मृदा मृदा अपरदन और संरक्षण मरुस्थली मृदाओं का रंग लाल और भूरा होता है। ये मृदा के कटाव और उसके बहाव की प्रक्रिया को मृदा मृदाएँ आम तौर पर रेतीली और लवणीय होती हैं। कुछ अपरदन कहा जाता है। मृदा के बनने और अपरदन की संसाधन एवं विकास 11 2015-16(19/01/2015) क्रियाएँ आमतौर पर साथ-साथ चलती है और दोनों में संतुलन होता है। परंतु मानवीय क्रियाओं जैसे वनोन्मूलन, अति पशुचारण, निर्माण और खनन इत्यादि से कई बार चित्र 1.12 - अवनालिका अपरदन ढाल पर ऊपर से नीचे की ओर हल चलाने से वाहिकाएँ बन जाती हैं, जिसके अंदर से बहता पानी चित्र 111 - मृदा अपरदन आसानी से मृदा का कटाव करता है। यह संतुलन भंग हो जाता है तथा प्राकृतिक तत्त्व जैसे । ढाल वाली भूमि पर समोच्च रेखाओं के समानांतर पवन, हिमनदी और जल मृदा अपरदन करते हैं। बहता हल चलाने से ढाल के साथ जल बहाव की गति घटती जल मृत्तिकायुक्त मृदाओं को काटते हुए गहरी वाहिकाएँ है। इसे समोच्च जुताई (contour ploughing) कहा बनाता है, जिन्हे अवनलिकाएँ कहते हैं। ऐसी भूमि जाता है। ढाल वाली भूमि पर सोपान बनाए जा सकते हैं। जोतने योग्य नहीं रहती और इसे उत्खात भूमि (bad सोपान कृषि अपरदन को नियंत्रित करती है। पश्चिमी land) कहते हैं। चंबल बेसिन में ऐसी भूमि को खड्ड और मध्य हिमालय में सोपान अथवा सीढ़ीदार कृषि (ravine) भूमि कहा जाता है। कई बार जल विस्तृत काफी विकसित है। बड़े खेतों को पट्टियों में बाँटा जाता क्षेत्र को ढके हुए ढाल के साथ नीचे की ओर बहता है। फसलों के बीच में घास की पट्टियाँ उगाई जाती हैं। है। ऐसी स्थिति में इस क्षेत्र की ऊपरी मृदा घुलकर जल ये पवनों द्वारा जनित बल को कमजोर करती हैं। इस के साथ बह जाती है। इसे चादर अपरदन (Sheet तरीके को पट्टी कृषि (strip farming) कहते हैं। erosion) कहा जाता है। पवन द्वारा मैदान अथवा ढालू पेड़ों को कतारों में लगाकर रक्षक (shelter belt) क्षेत्र से मृदा को उड़ा ले जाने की प्रक्रिया को पवन मेखला बनाना भी पवनों की गति कम करता है। इन अपरदन कहा जाता है। कृषि के गलत तरीकों से भी रक्षक पट्टियों का पश्चिम भारत में रेत के टीलों के मृदा अपरदन होता है। गलत ढंग से हल चलाने जैसे स्थायीकरण में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। भारत के पर्यावरण की दशा • सुखोमाजरी गाँव और झबुआ जिले ने यह कर दिखाया है कि भूमि निम्नीकरण प्रक्रिया को पलटा जा सकता है। सुखोमाजरी में वृक्ष घनत्व 1976 में 13 प्रति हेक्टेयर था जो कि 1992 में बढ़कर 1272 प्रति हेक्टेयर हो गया। • पर्यावरण के पुनर्जनन से अधिक संसाधन उपलब्धता, कृषि और पशुपालन में सुधार के परिणामस्वरूप आमदनी बढ़ती है और समाज में आर्थिक समृद्धि आती है। सुखोमाजरी में 1979 से 1984 के बीच परिवारों की औसत वार्षिक आमदनी 10,000 से 15,000 रुपये थी। समकालीन भारत-2 12 2015-16(19/01/2015) • पर्यावरण की पुनस्थापना के लिए लोगों द्वारा इसका प्रबंधन आवश्यक है। मध्य प्रदेश सरकार ने लोगों को स्वयं फैसला लेने का अधिकार दिया है और वे प्रदेश की 29 लाख हेक्टेयर भूमि भारत का लगभग एक प्रतिशत क्षेत्रफल को जल विभाजक प्रबंधन द्वारा हरा-भरा बना रहे हैं। स्रोत - सिटिजंस फिफ्थ रिपोर्ट, सेंटर फॉर साइंस एंड इनवायरनमेंट (सी एस ई) नई दिल्ली। अभ्यास अभ्यास अभ्यास अभ्यास अभ्यास 1. बहुवैकल्पिक प्रश्न (i) लौह अयस्क किस प्रकार का संसाधन है? (क) नवीकरण योग्य (ग) जैव (ख) प्रवाह (घ) अनवीकरण योग्य (ii) ज्वारीय ऊर्जा निम्नलिखित में से किस प्रकार का संसाधन है? (क) पुनः पूर्ति योग्य (ग) मानवकृत (ख) अजैव । (घ) अचक्रीय (iii) पंजाब में भूमि निम्नीकरण का निम्नलिखित में से मुख्य कारण क्या है? (क) गहन खेती (ग) वनोन्मूलन (ख) अधिक सिंचाई (घ) अति पशुचारण (iv) निम्नलिखित में से किस प्रांत में सीढ़ीदार (सोपानी) खेती की जाती है? (क) पंजाब (ग) हरियाणा (ख) उत्तर प्रदेश के मैदान (घ) उत्तराखण्ड संसाधन एवं विकास 13 2015-16(19/01/2015) (v) इनमें से किस राज्य में काली मृदा पाई जाती है? | (क) जम्मू और कश्मीर । (ग) गुजरात (ख) राजस्थान (घ) झारखंड 2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए। (i) तीन राज्यों के नाम बताएँ जहाँ काली मृदा पाई जाती है। इस पर मुख्य रूप से कौन सी फसल उगाई जाती है? (ii) पूर्वी तट के नदी डेल्टाओं पर किस प्रकार की मृदा पाई जाती है? इस प्रकार की मृदा की तीन मुख्य विशेषताएँ क्या हैं? (iii) पहाड़ी क्षेत्रों में मृदा अपरदन की रोकथाम के लिए क्या कदम उठाने चाहिए? (iv) जैव और अजैव संसाधन क्या होते हैं? कुछ उदाहरण दें। 3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 120 शब्दों में दीजिए। (i) भारत में भूमि उपयोग प्रारूप का वर्णन करें। वर्ष 1960-61 से वन के अंतर्गत क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण वृद्धि नहीं हुई, इसका क्या कारण है? (ii) प्रौद्योगिक और आर्थिक विकास के कारण संसाधनों का अधिक उपभोग कैसे हुआ है? परियोजना/क्रियाकलाप 1. अपने आस पास के क्षेत्रों में संसाधनों के उपभोग और संरक्षण को दर्शाते हुए एक परियोजना तैयार करें। 2. आपके विद्यालय में उपयोग किए जा रहे संसाधनों के संरक्षण विषय पर अपनी कक्षा में एक चर्चा आयोजित करें। 3. वर्ग पहेली को सुलझाएँ; ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज छिपे उत्तरों को ढूँढे। नोट : पहेली के उत्तर अंग्रेजी के शब्दों में हैं। । F. < S F GS F O B R O M SUA PJ @G AF F O R E S T A T 10 N PN REC P R S L D M I LN s N A T 9 x U o v A I 0 L A O DEI DR JU JL DB NBD T G H MINERALS A MW B V JK MED CRU PF M HR L_A TER ITEM VA Z TV A B Z 0 E N M F T I S D L R C C G_N_Ns_Z I 0 P _A X T Y J_H K J G K DI DCS L SE GEW 3 = ० | 14 समकालीन भारत-2 2015-16(19/01/2015) (i) भूमि, जल, वनस्पति और खनिजों के रूप में प्राकृतिक सम्पदा (ii) अनवीकरण योग्य संसाधन का एक प्रकार (iii) उच्च नमी रखाव क्षमता वाली मृदा (iv) मानसून जलवायु में अत्यधिक निक्षालित मृदाएँ (v) मृदा अपरदन की रोकथाम के लिए बृहत् स्तर पर पेड़ लगाना (vi) भारत के विशाल मैदान इन मृदाओं से बने हैं। संसाधन एवं विकास 15 2015-16(19/01/2015)

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