इफ्ऱ़़़पफन के बारे में वुफछ जान लेना इसलिए शरूरी है कि इफ्रपफन टोपी का पहला दोस्त था। इसइफ्ऱ़़़पफन वफो टोपी ने सदा इफ्रपफन कहा। इफ्रपफन ने इसका बुरा माना। परंतु वह इफ्रपफन पुकारने पर बोलता रहा। इसी बोलते रहने में उसकी बड़ाइर् थी। यह नामों वफा चक्कर भी अजीब होता है। उदर्ू और ¯हदी एक ही भाषा, हिंदवी के दो नाम हैं। परंतु आप खुद देख लीजिए कि नाम बदल जाने से वैफसे - वैफसे घपले हो रहे हैं। नाम वृफष्ण हो तो उसे अवतार कहते हैं और मुहम्मद हो तो पैगंबर। नामों के चक्कर में पड़कर लोग यह भूल गए कि दोनांे ही दूध देने वाले जानवर चराया करते थे।दोनों ही पशुपति, गोबरधन और ब्रज - वुफमार थे। इसीलिए तो कहता हूँ कि टोपी के बिना इफ्ऱ ़पफन औरइफ्ऱपफन के बिना टोपी न केवल यह कि अधूरे हैं बल्िक बेमानी हैं। इसलिए इफ्ऱ़पफन के घर चलना़शरूरी है। यह देखना शरूरी है कि उसकी आत्मा के आँगन में वैफसी हवाएँ चल रही हैं और परंपराओं1 के पेड़ पर वैफसे पफल आ रहे हैं। ;2द्ध इफ्ऱ़पफन की कहानी भी बहुत लंबी है। परंतु हम लोग टोपी की कहानी कह - सुन रहे हैं। इसीलिए मैं इफ्ऱ़पफन की पूरी कहानी नहीं सुनाउफँगा बल्िक केवल उतनी ही सुनाउफँगा जितनी टोपी की कहानी के लिए शरूरी है।मैंने इसे शरूरी जाना कि इफ्ऱ प़्ाफन के बारे में आपको वुफछ बता दूँ क्योंकि इफ्ऱ प़्ाफन आपको इस कहानी में जगह - जगह दिखाइर् देगा। न टोपी इफ्ऱ़़़पफन की परछाइर् है और न इफ्रपफन टोपी की। ये दोनों दो आशाद व्यक्ित हैं। इन दोनों व्यक्ितयों का डेवलपमेंट2 एक - दूसरे से आशाद तौर पर हुआ। इन दोनांे को दो तरह की घरेलू परंपराएँ मिलीं। इन दोनों ने जीवन के बारे में अलग - अलग सोचा। पिफरभी इफ्ऱ प़्ाफन टोपी की कहानी का एक अटूट3 हिस्सा है। यह बात बहुत महत्त्वपूणर् है कि इफ्ऱ प़्ाफन टोपी की कहानी का एक अटूट हिस्सा है। 1.प्रथा/प्रणाली जो बहुत दिनों से चली आ रही हो 2.विकास 3.न टूटने वाला/मशबूत मैं ¯हदू - मुस्िलम भाइर् - भाइर् की बात नहीं कर रहा हूँ। मैं यह बेववूफपफी क्यों करूँ! क्या मैं रोश़अपने बड़े या छोटे भाइर् से यह कहता हूँ कि हम दोनों भाइर् - भाइर् हैं? यदि मैं नहीं कहता तो क्या आप कहते है? ¯हदू - मुसलमान अगर भाइर् - भाइर् हैं तो कहने की शरूरत नहीं। यदि नहीं हैं तो कहने से क्या प़्ाफवर्फ पडे़गा। मुझे कोइर् चुनाव तो लड़ना नहीं है।़मैं तो एक कथाकार हूँ और एक कथा सुना रहा हूँ। मैं टोपी और इफ्ऱपफन की बात कर रहा हूँ।ये इस कहानी के दो चरित्रा हैं। एक का नाम बलभद्र नारायण शुक्ला है और दूसरे का नाम सÕयदजरगाम मुरतुशा। एक को टोपी कहा गया और दूसरे को इफ्ऱ़पफन। इफ्ऱ़़़पफन के दादा और परदादा बहुत प्रसि( मौलवी थे। काप्िाफरों के देश में पैदा हुए। काप्िाफरों के देश में मरे। परंतु वसीयत4 करके मरे कि लाश करबला5 ले जाइर् जाए। उनकी आत्मा ने इस देशमें एक साँस तक न ली। उस खानदान में जो पहला ¯हदुस्तानी बच्चा पैदा हुआ वह बढ़कर इफ्ऱ पफऩका बाप हुआ।जब इफ्ऱ ़पफन के पिता सÕयद मुरतुजा हुसैन मरे तो उन्होंने यह वसीयत नहीं की कि उनकी लाश करबला ले जाइर् जाए। वह एक ¯हदुस्तानी कबि्रस्तान में दप़्ाफन किए गए। ़़इफ्ऱपफन की परदादी भी बड़ी नमाजी6 बीबी थीं। करबला, नजपफ, खुरासान, काजमैन और जाने कहाँ की यात्रा कर आइर् थीं। परंतु जब कोइर् घर से जाने लगता तो वह दरवाशे पर पानी का एक घड़ा शरूर रखवातीं और माश का सदका7 भी शरूर उतरवातीं।इफ्ऱ़पफन की दादी भी नमाश - रोशे की पाबंद थीं परंतु जब इकलौते बेटे को चेचक8 निकली तो वह चारपाइर् के पास एक टाँग पर खड़ी हुईं और बोलीं, फ्माता मोरे बच्चे को माप़्ाफ करद्यो।य् पूरब की रहने वाली थीं। नौ या दस बरस की थीं जब ब्याह कर लखनउफ आईं, परंतु जब तक ¯शदा रहीं पूरबी9 बोलती रहीं। लखनउफ की उदूर् ससुराली थी। वह तो मायके की भाषा को गले लगाए रहीं क्योंकि इस भाषा के सिवा इधर - उधर कोइर् ऐसा नहीं था जो उनके दिल की बात समझता। जब बेटे की शादी के दिन आए तो गाने - बजाने के लिए उनका दिल पफड़का परंतु मौलवी के घर गाना - बजानाभला वैफसे हो सकता था! बेचारी दिल मसोसकर रह गईं। हाँ इफ्ऱ ़पफन की छठी10... पर उन्होंने जी भरकर जश्न11 मना लिया।बात यह थी कि इफ्ऱ पफन अपने दादा के मरने के बाद पैदा हुआ था। मदो± और औरतों के इस़प़़़्ाफवर्फ को ध्यान में रखना शरूरी है क्योंकि इस बात को ध्यान में रखे बगैर इफ्रपफन की आत्मा का नाक - नक्शा12 समझ में नहीं आ सकता। 4.लंबी यात्रा पर जाने से पूवर् या अपनी मृत्यु के बाद अपनी संपिा के प्रबंध, उपभोग आदि के विषय में लिख्िात इच्छा जो दजर् कर दी गइर् हो 5.इस्लाम का एक पवित्रा स्थान 6.नियमित रूप से नमाश पढ़ने वाला 7.एक टोटका 8.एक संव्रफामक रोग जिसमें बुखार के साथ पूरे शरीर पर दाने निकल आते हैं, शीतला 9.पूरब की तरप़्ाफ बोली जाने वाली भाषा 10.जन्म के छठे दिन का स्नान/पूजन/उत्सव 11.उत्सव/खुशी का जलसा 12.रूप - रंग इफ्ऱ़पफन की दादी किसी मौलवी की बेटी नहीं थीं बल्िक एक शमींदार की बेटी थीं। दूध - घी खाती हुइर् आइर् थीं परंतु लखनउफ आकर वह उस दही के लिए तरस गईं जो घी पिलाइर् हुइर् काली हाँडियों में असामियों के यहाँ से आया करता था। बस मायके जातीं तो लपड़ - शपड़ जी भर के खा लेतीं। लखनउफ आते ही उन्हें पिफर मौलविन बन जाना पड़ता। अपने मियाँ से उन्हें यही तो एक श्िाकायत थी कि वक्त देखें न मौका, बस मौलवी ही बने रहते हैं। ससुराल में उनकी आत्मा सदा बेचैन रही। जब मरने लगीं तो बेटे ने पूछा कि लाश करबला जाएगी या नजप़्ाफ, तो बिगड़ गईं। बोलीं, फ्ए बेटा जउन तूँ से हमरी लाश ना सँभाली जाए त हमरे घर भेज दिहो।य् मौत सिर पर थी इसलिए उन्हें यह याद नहीं रह गया कि अब घर कहाँ है। घरवाले कराची में हैं और घर कस्टोडियन13 का हो चुका है। मरते वक्त किसी को ऐसी छोटी - छोटी बातें भला वैफसे याद रह सकती हैं। उस वक्त तो मनुष्य अपने सबसे श्यादा खूबसूरत सपने देखता है ;यह कथाकारका खयाल है, क्योंकि वह अभी तक मरा नहीं है!द्ध इफ्ऱ पफन की दादी को भी अपना घर याद आया।़उस घर का नाम कच्ची हवेली था। कच्ची इसलिए कि वह मि‘ी की बनी थी। उन्हें दसहरी आम का वह बीजू पेड़14 याद आया जो उन्होंने अपने हाथ से लगाया था और जो उन्हीं की तरह बूढ़ा हो चुका था। ऐसी ही छोटी - छोटी और मीठी - मीठी बेशुमार15 चीशें याद आईं। वह इन चीशों को छोड़कर भला करबला या नजपफ वैफसे जा सकती थीं!़वह बनारस के ‘पफातमैन’ में दप़्ाफन की गईं क्योंकि मुरतुशा हुसैन की पोस्िंटग उन दिनों वहीं थी।़इफ्ऱपफन स्वूफल गया हुआ था। नौकर ने आकर खबर दी कि बीबी का देहांत हो गया। इफ्ऱ़पफन की़दादी बीबी कही जाती थीं।इफ्ऱपफन तब चैथे में पढ़ता था और टोपी से उसकी मुलाकात हो चुकी थी।़इफ्ऱपफन को अपनी दादी से बड़ा प्यार था। प्यार तो उसे अपने अब्बू, अपनी अम्मी, अपनी़बाजी16 और छोटी बहन नुशहत से भी था परंतु दादी से वह शरा श्यादा प्यार किया करता था। अम्मी तो कभी - कभार डाँट मार लिया करती थीं। बाजी का भी यही हाल था। अब्बू भी कभी - कभार घर को कचहरी17 समझकर पैफसला सुनाने लगते थे। नुशहत को जब मौका मिलता उसकी कापियों पर तसवीरें बनाने लगती थीं। बस एक दादी थी जिन्होंने कभी उसका दिल नहीं दुखाया। वह रात को भी उसे बहराम डावूफ, अनार परी, बारह बुजर्, अमीर हमशा, गुलबकावली, हातिमताइर्, पंच पुफल्ला रानी की कहानियाँ सुनाया करती थीं। फ्सोता है संसार जागता है पाक18 परवरदिगार। आँखों की देखी नहीं कहती। कानों की सुनी कहती हूँ कि एक मुलुक19 में एक बादशाह रहा....य् 13.जिस संपिा पर किसी का मालिकाना हक न हो उसका संरक्षण करने वाला विभाग 14.आम की गुठली से उगाया गया आम का पेड़ 15.बहुत सारी 16.बड़ी बहन 17.न्यायालय 18.पवित्रा 19.देश दादी की भाषा पर वह कभी नहीं मुसकराया। उसे तो अच्छी - भली लगती थी। परंतु अब्बू नहीं बोलने देते थे। और जब वह दादी से इसकी श्िाकायत करता तो वह हँस पड़तीं, फ्अ मोरा का है बेटा! अनपढ़ गँवारन की बोली तूँ काहे को बोले लग्यो। तँू अपने अब्बा ही की बोली बोलौ।य् बात खत्म हो जाती और कहानी शुरू हो जातीμ फ्त उफ बादशा का किहिस कि तुरंते ऐक ठो हिरन मार लिआवा...।य्यही बोली टोपी के दिल में उतर गइर् थी। इफ्ऱपफन की दादी उसे अपनी माँ की पाटीर् की दिखाइऱ्दीं। अपनी दादी से तो उसे नप़्ाफरत थी, नप़्ाफरत। जाने वैफसी भाषा बोलती थीं। इफ्ऱ प़्ाफन के अब्बू और उसकी भाषा एक थी। वह जब इफ्ऱप़्ाफन के घर जाता तो उसकी दादी ही के पास बैठने की कोश्िाश करता। इफ्ऱप़्ाफन की अम्मी और बाजी से वह बातचीत करने की कभी कोश्िाश ही न करता। वे दोनों अलबत्ता20 उसकी बोली पर हँसने के लिए उसे छेड़तीं परंतु जब बात बढ़ने लगती तो दादी बीच - बचाव करवा देतींμ फ्तैं काहे को जाथै उन सभन के पास मुँह पिटावे को झाड़ मारे। चल इिार आ...य् वह डाँटकरूकहतीं। परंतु हर शब्द शक्कर का ख्िालौना बन जाता। अमावट21 बन जाता। तिलवा22 बन जाता...और वह चुपचाप उनके पास चला जाता। फ्तोरी अम्माँ का कर रहीं...य् दादी हमेशा यहीं से बात शुरू करतीं। पहले तो वह चकरा जाता कि यह अम्माँ क्या होता है। पिफर वह समझ गया कि माता जी वफो कहते हैं। यह शब्द उसे अच्छा लगा। अम्माँ। वह इस शब्द को गुड़ की डली की तरह चुभलाता रहा। अम्माँ। अब्बू। बाजी। पिफर एक दिन गशब हो गया। डाॅक्टर भृगु नारायण शुक्ला नीले तेल वाले के घर में भी बीसवीं सदी प्रवेश कर चुकी थी। यानी खाना मेश - वुफरसी पर होता था। लगती तो थालियाँ ही थीं परंतु चैके पर नहीं। उस दिन ऐसा हुआ कि बैंगन का भुरता उसे शरा श्यादा अच्छा लगा। रामदुलारी खाना परोस रही थी। टोपी ने कहाμ फ्अम्मी, शरा बैगन का भुरता।य् अम्मी! मेश पर जितने हाथ थे रफक गए। जितनी आँखें थीं वो टोपी के चेहरे पर जम गईं। अम्मी! यह शब्द इस घर में वैफसे आया। अम्मी! परंपराओं की दीवार डोलने लगी।फ्ये लफ्ऱश23 तुमने कहाँ सीखा?य् सुभद्रादेवी ने सवाल किया। 20.बल्िक 21.पके आम के रस को सुखाकर बनाइर् गइर् मोटी परत 22.तिल का लंÂ/तिल से बने व्यंजन 23.शब्द टोपी शुक्ला 37 फ्लफ्ऱ श?य् टोपी ने आँखंे नचाईं। फ्लफ्ऱ श का होता है माँ?य् फ्ये अम्मी कहना तुमको किसने सिखाया है?य् दादी गरशीं।फ्इर् हम इफ्ऱ पफन से सीखा है।य़्फ्उसका पूरा नाम क्या है?य् फ्इर् हम ना जानते।य् फ्तैं कउनो मियाँ के लइका से दोस्ती कर लिहले बाय का रे?य् रामदुलारी की आत्मा गनगना गइर्। फ्बहू, तुमसे कितनी बार कहूँ कि मेरे सामने गँवारों की यह शबान न बोला करो।य् सुभद्रादेवी रामदुलारी पर बरस पड़ीं। लड़ाइर् का मोरचा बदल गया। दूसरी लड़ाइर् के दिन थे। इसलिए जब डाॅक्टर भृगु नारायण नीले तेल वाले को यह पता चला कि टोपी ने कलेक्टर साहब के लड़के से दोस्ती गाँठ ली है तो वह अपना गुस्सा पी गए और तीसरे ही दिन कपड़े और शक्कर के परमिट ले आए। परंतु उस दिन टोपी की बड़ी दुगर्ति24 बनी। सुभद्रादेवी तो उसी वक्त खाने की मेश से उठ गईं और रामदुलारी ने टोपी को पिफर बहुत मारा।फ्तैं पिफर जÕयबे ओकरा घरे?य् फ्हाँ।य् फ्अरे तोहरा हाँ मंे लुकारा आगे माटी मिलउफ।य़्...रामदुलारी मारते - मारते थक गइर्। परंतु टोपी ने यह नहीं कहा कि वह इफ्ऱपफन के घर नहीं जाएगा। मुन्नी बाबू और भैरव उसकी वुफटाइर्25 का तमाशा देखते रहे। फ्हम एक दिन एको रहीम कबाबची26 की दुकान पर कबाबो खाते देखा रहा।य् मुन्नी बाबू ने टुकड़ा लगाया। कबाब! फ्राम राम राम!य् रामदुलारी घ्िान्ना के दो कदम पीछे हट गईं। टोपी मुन्नी की तरपफ देखने लगा।़क्योंकि असलियत यह थी कि टोपी ने मुन्नी बाबू को कबाब खाते देख लिया था और मुन्नी बाबू ने उसे एक इकन्नी रिश्वत की दी थी। टोपी को यह मालूम था परंतु वह चुगलखोर नहीं था। उसनेअब तक मुन्नी बाबू की कोइर् बात इफ्ऱ़पफन के सिवा किसी और को नहीं बताइर् थी। फ्तूँ हम्में कबाब खाते देखे रह्यो?य् फ्ना देखा रहा ओह दिन?य् मुन्नी बाबू ने कहा। 24.बुरी हालत 25.पिटाइर् 26.कबाब बनाने वाला फ्तो तुमने उसी दिन क्यों नहीं बताया?य् सुभद्रादेवी ने सवाल किया। फ्इ झुऋा है दादी!य् टोपी ने कहा। उस दिन टोपी बहुत उदास रहा। वह अभी इतना बड़ा नहीं हुआ था कि झूठ और सच के किस्से में पड़ताμऔर सच्ची बात तो यह है कि वह इतना बड़ा कभी नहीं हो सका। उस दिन तो वह इतना पिट गया था कि उसका सारा बदन दुख रहा था। वह बस लगातार एक ही बात सोचता रहा कि अगर एक दिन के वास्ते वह मुन्नी बाबू से बड़ा हो जाता तो समझ लेता उनसे। परंतु मुन्नी बाबू से बड़ा हो जाना उसके बस में तो था नहीं। वह मुन्नी बाबू से छोटा पैदा हुआ था और उनसे छोटा ही रहा।दूसरे दिन वह जब स्वूफल में इफ्ऱ ़़पफन से मिला तो उसने उसे सारी बातंे बता दीं। दोनों जुगराप्िाफया27 ़का घंटा छोड़कर सरक गए। पंचम की दूकान से इफ्ऱ पफन ने केले खरीदे। बात यह है कि टोपी पफल के अलावा और किसी चीश को हाथ नहीं लगाता था।फ्अÕयसा ना हो सकता का की हम लोग दादी बदल लें,य् टोपी ने कहा। फ्तोहरी दादी हमरे घर आ जाएँ अउर हमरी तोहरे घर चली जाएँ। हमरी दादी त बोलियो तूँहीं लोगन को बो - ल - थीं।य्फ्यह नहीं हो सकता।य् इफ्ऱपफन ने कहा, फ्अब्बू यह बात नहीं मानंेगे। और मुझे कहानी कौऩसुनाएगा? तुम्हारी दादी को बारह बुजर् की कहानी आती है?य् फ्तूँ हम्मे एक ठो दादियो ना दे सकत्यो?य् टोपी ने खुद अपने दिल के टूटने की आवाश सुनी।फ्जो मेरी दादी हैं वह मेरे अब्बू की अम्माँ भी तो हैं।य् इफ्ऱ ़पफन ने कहा। यह बात टोपी की समझ में आ गइर्। फ्तुम्हारी दादी मेरी दादी की तरह बूढ़ी होंगी?य् फ्हाँ।य् फ्तो प्िाफकर न करो।य् इफ्ऱ़ पफन ने कहा, फ्मेरी दादी कहती हैं कि बूढ़े लोग मर जाते हैं।य़्फ्हमरी दादी ना मरिहे।य् फ्मरेगी वैफसे नहीं? क्या मेरी दादी झूठी हैं?य्ठीक उसी वक्त नौकर आया और पता चला कि इफ्ऱपफन की दादी मर गईं।़इफ्ऱपफन चला गया। टोपी अकेला रह गया। वह मुँह लटकाए हुए जिमनेिायम में चला गया। बूढ़ा़चपरासी एक तरपफ बैठा बीड़ी पी रहा था। वह एक कोने में बैठकर रोने लगा।़शाम को वह इफ्ऱ पफन के घर गया तो वहाँ सन्नाटा था। घर भरा हुआ था। रोश जितने लोग हुआ़करते थे उससे श्यादा ही लोग थे। परंतु एक दादी के न होने से टोपी के लिए घर खाली हो चुका था। जबकि उसे दादी का नाम तक नहीं मालूम था। उसने दादी के हशार कहने के बाद भी उनके हाथ की कोइर् चीश नहीं खाइर् थी। प्रेम इन बातों का पाबंद नहीं होता। टोपी और दादी में एक ऐसा 27.भूगोल शास्त्रा टोपी शुक्ला 39 ही संबंध हो चुका था। इफ्ऱपफन के दादा जीवित होते तो वह भी इस संबंध को बिलवुफल उसी तरह़न समझ पाते जैसे टोपी के घरवाले न समझ पाए थे। दोनों अलग - अलग अधूरे थे। एक ने दूसरे को पूरा कर दिया था। दोनों प्यासे थे। एक ने दूसरे की प्यास बुझा दी थी। दोनों अपने घरों में अजनबीऔर भरे घर में अकेले थे। दोनों ने एक - दूसरे का अकेलापन मिटा दिया था। एक बहत्तर बरस की थी और दूसरा आठ साल का।फ्तोरी दादी की जगह हमरी दादी मर गइर् होतीं त ठीक भया होता।य् टोपी ने इफ्ऱपफन को पुरसा़28 दिया। इफ्ऱपफन ने कोइर् जवाब नहीं दिया। उसे इस बात का जवाब आता ही नहीं था। दोनों दोस्त चुपचाप़रोने लगे। ;3द्ध टोपी ने दस अक्तूबर सन् पैंतालीस को कसम खाइर् कि अब वह किसी ऐसे लड़के से दोस्ती नहीं करेगा जिसका बाप ऐसी नौकरी करता हो जिसमें बदली होती रहती है।दस अक्तूबर सन् पैंतालीस का यूँ तो कोइर् महत्त्व नहीं परंतु टोपी के आत्म - इतिहास में इसतारीख का बहुत महत्त्व है, क्योंकि इसी तारीख को इफ्ऱ पफन के पिता बदली पर मुरादाबाद चले गए।़इफ्ऱप़् हुआ था, इसलिए टोपी और अकेलााफन की दादी के मरने के थोड़े ही दिनों बाद यह तबादला29हो गया क्योंकि दूसरे कलेक्टर ठावुफर हरिनाम ¯सह के तीन लड़कों में से कोइर् उसका दोस्त न बन सका। डब्बू बहुत छोटा था। बीलू बहुत बड़ा था। गुंÂ था तो बराबर का परंतु केवल अंगे्रशी बोलता था। और यह बात भी थी कि उन तीनों को इसका एहसास30 था कि वे कलेक्टर के बेटे हैं। किसी ने टोपी को मुँह नहीं लगाया। माली और चपरासी टोपी को पहचानते थे। इसलिए वह बँगले में चला गया। बीलू, गुंÂ और डब्बू उस समय िकेट खेल रहे थे। डब्बू ने हिट किया। गेंद सीधी टोपी के मुँह पर आइर्। उसने घबराकर हाथ उठाया। गेंद उसके हाथों में आ गइर्। फ्हाउश दैट!य् हेड माली अंपायर था। उसने उँगली उठा दी। वह बेचारा केवल यह समझ सका कि जब ‘हाउज दैट’ का शोर हो तो उसे उँगली उठा देनी चाहिए। फ्हू आर यू?य् डब्बू ने सवाल किया। फ्बलभद्दर नरायन।य् टोपी ने जवाब दिया। फ्हू इश योर प़्ाफादर?य् यह सवाल गुंÂ ने किया। 28.सांत्वना देना 29.बदली/स्थानांतरण 30.अनुभूति फ्भृगु नरायण।य् फ्ऐं।य् बीलू ने अंपायर को आवाश दी, फ्इर् भ्िारगू नरायण कौन ऐ? एनी आॅपफ अवऱचपरासीश?य् फ्नाहीं साहब।य् अंपायर ने कहा, फ्सहर के मसहूर दागदर हैं।य् फ्यू मीन डाॅक्टर?य् डब्बू ने सवाल किया। फ्यस सर!य् हेड माली को इतनी अंग्रेशी आ गइर् थी। फ्बट ही लुक्स सो क्लम्शी।य् बीलू बोला। फ्ए!य् टोपी अकड़ गया। फ्तनी जबनिया सँभाल के बोलो। एक लप्पड़ में नाचे लगिहो।य् फ्ओह यू...य् बीलू ने हाथ चला दिया। टोपी लुढ़क गया। पिफर वह गालियाँ बकता हुआ उठा। परंतु हेड माली बीच में आ गया और डब्बू ने अपने अलसेश्िायन को शुशकार31 दिया। पेट में सात सुइयाँ भुकीं तो टोपी के होश ठिकाने आए। और पिफर उसने कलेक्टर साहब के बँगले का रफख नहीं किया। परंतु प्रश्न यह खड़ा हो गया कि पिफर आख्िार वह करे क्या? घर मंे ले - देकर बूढ़ी नौकरानी सीता थी जो उसका दुख - ददर् समझती थी। तो वह उसी के पल्लू में चला गया और सीता की छाया में जाने के बाद उसकी आत्मा भी छोटी हो गइर्। सीता को घर के सभी छोटे - बड़े डाँट लिया करते थे। टोपी को भी घर के सभी छोटे - बड़े डाँट लिया करते थे। इसलिए दोनों एक - दूसरे से प्यार करने लगे। फ्टेक मत किया करो बाबू!य् एक रात जब मुन्नी बाबू और भैरव का दाज32 करने पर वह बहुत पिटा तो सीता ने उसे अपनी कोठरी में ले जाकर समझाना शुरू किया। बात यह हुइर् कि जाड़ों के दिन थे। मुन्नी बाबू के लिए कोट का नया कपड़ा आया। भैरव के लिए भी नया कोट बना। टोपी को मुन्नी बाबू का कोट मिला। कोट बिलवुफल नया था। मुन्नी बाबू को पसंद नहीं आया था। पिफर भी बना तो था उन्हीं के लिए। था तो उतरन। टोपी ने वह कोट उसी वक्त दूसरी नौकरानी केतकी के बेटे को दे दिया। वह खुश हो गया। नौकरानी के बच्चे को दे दी जाने वाली चीश वापस तो ली नहीं जा सकती थी, इसलिए तय हुआ कि टोपी जाड़ा खाए। फ्हम जाड़ा - ओड़ा ना खाएँगे। भात खाएँगे।य् टोपी ने कहा। फ्तुम जूते खाओगे।य् सुभद्रादेवी बोलीं। फ्आपको इहो ना मालूम की जूता खाया ना जात पहिना जात है।य् फ्दादी से बदतमीशी करते हो।य् मुन्नी बाबू ने बिगड़कर कहा। फ्त का हम इनकी पूजा करें।य् पिफर क्या था! दादी ने आसमान सिर पर उठा लिया। रामदुलारी ने उसे पीटना शुरू किया.31.वुफत्ते को किसी के पीछे लगाने के लिए निकाली जाने वाली आवाश 32.;मूल शब्द दाँजद्ध बराबरी फ्तूँ दसवाँ में पहुँच गइल बाड़।य् सीता ने कहा, फ्तूँहें दादी से टरार्व33 के त ना न चाही। किनांे उफ तोहार दादी बाडि़न।य् सीता ने तो बड़ी आसानी से कह दिया कि वह दसवें में पहुँच गया है, परंतु यह बात इतनी आसान नहीं थी। दसवें में पहुँचने के लिए उसे बड़े पापड़ बेलने पड़े। दो साल तो वह पेफल ही हुआ।़नवें में तो वह सन् उनचास ही में पहुँच गया था, परंतु दसवें में वह सन् बावन में पहुँच सका। जब वह पहली बार प़़्ोफल हुआ तो मुन्नी बाबू इंटरमीडिएट में पफस्टर् आए और भैरव छठे में। सारे घर ने उसे शबान की नोक पर रख लिया। वह बहुत रोया। बात यह नहीं थी कि वह गाउदी34 था। वह काप़्ाफी तेश था परंतु उसे कोइर् पढ़ने ही नहीं देता था। वह जब पढ़ने बैठता मुन्नी बाबू को कोइर् काम निकल आता या रामदुलारी को कोइर् ऐसी चीश मँगवानी पड़ जाती जो नौकरों से नहीं मँगवाइर् जा सकती थीμयह सब वुफछ न होता तो पता चलता कि भैरव ने उसकी कापियों के हवाइर् जहाश उड़ा डाले हैं। दूसरे साल उसे टाइप़्ाफाइड हो गया। तीसरे साल वह थडर् डिवीशन में पास हो गया। यह थडर् डिवीशन कलंक के टीके की तरह उसके माथे से चिपक गया। परंतु हमें उसकी मुश्िकलों को भी ध्यान में रखना चाहिए। सन् उनचास में वह अपने साथ्िायों के साथ था। वह प़्ोफल हो गया। साथी आगे निकल गए। वह रह गया। सन् पचास मंे उसे उसी दजेर् में उन लड़कों के साथ बैठना पड़ा जो पिछले साल आठवें में थे। पीछे वालों के साथ एक ही दजेर् में बैठना कोइर् आसान काम नहीं है। उसके दोस्त दसवें में थे। वह उन्हीं से मिलता, उन्हीं के साथ खेलता। अपने साथ हो जाने वालों में से किसी के साथ उसकी दोस्ती न हो सकी। वह जब भी क्लास में बैठता उसे अपना बैठना अजीब लगता। उस पर सितम35 यह हुआ कि कमशोर लड़कांे को मास्टर जी समझाते तो उसकी मिसाल देतेμ फ्क्या मतलब है साम अवतार ;या मुहम्मद अली?द्ध बलभद्र की तरह इसी दजेर् में टिके रहना चाहते हो क्या?य् यह सुनकर सारा दजार् हँस पड़ता। हँसने वाले वे होते जो पिछले साल आठवें में थे। वह किसी - न - किसी तरह इस साल को झेल गया। परंतु जब सन् इक्यावन में भी उसे नवें दजेर् में ही बैठना पड़ा तो वह बिलवुफल गीली मि‘ी का लौंदा36 हो गया, क्योंकि अब तो दसवें में भी 33.शबान लड़ाना/बड़बड़ करना 34.भोंदू/बु(ू 35.अत्याचार 36.गीली मि‘ी का पिंड कोइर् उसका दोस्त नहीं रह गया था। आठवें वाले दसवें में थे। सातवें वाले उसके साथ! उनके बीच में वह अच्छा - खासा बूढ़ा दिखाइर् देता था। वह अपने भरे - पूरे घर ही की तरह अपने स्वूफल में भी अकेला हो गया था। मास्टरों ने उसका नोटिस लेना बिलवुफल ही छोड़ दिया था। कोइर् सवाल किया जाता और जवाब देने के लिए वह भी हाथ उठाता तो कोइर् मास्टर उससे जवाब ना पूछता। परंतु जब उसका हाथ उठता ही रहा तो एक दिन अंग्रेशी - साहित्य के मास्टर साहब ने कहाμ फ्तीन बरस से यही किताब पढ़ रहे हो, तुम्हें तो सारे जवाब शबानी याद हो गए होंगे! इन लड़कों को अगले साल हाइर् स्वूफल का इम्तहान देना है। तुमसे पारसाल पूछ लूँगा।य् टोपी इतना शमार्या कि उसके काले रंग पर लाली दौड़ गइर्। और जब तमाम बच्चे ख्िालख्िालाकर हँस पड़े तो वह बिलवुफल मर गया। जब वह पहली बार नवें में आया था तो वह भी इन्हीं बच्चों की तरह बिलवुफल बच्चा था। पिफर उसी दिन अबदुल वहीद ने रिसेश में वह तीर मारा कि टोपी बिलवुफल बिलबिला उठा। वहीद क्लास का सबसे तेश लड़का था। माॅनीटर भी था। और सबसे बड़ी बात यह है कि वह लाल तेल वाले डाॅक्टर शरपुफद्दीन का बेटा था।़उसने कहा, फ्बलभद्दर! अबे तो हम लोगन37 में का घुसता है। एड्थ वालन से दोस्ती कर। हम लोग तो निकल जाएँगे, बाकी तुहें त उन्हीं सभन के साथ रहे को हुइहै।य् यह बात टोपी के दिल के आर - पार हो गइर् और उसने कसम खाइर् कि टाइप़्ाफाइड हो या टाइप़्ाफाइड का बाप, उसे पास होना है। परंतु बीच में चुनाव आ गए। डाॅक्टर भृगु नारायण नीले तेल वाले खड़े हो गए। अब जिस घर में कोइर् चुनाव के लिए खड़ा हो गया हो उसमें कोइर् पढ़ - लिख वैफसे सकता है! वह तो जब डाॅक्टर साहब की शमानत शब्त हो गइर् तब घर में शरा सन्नाटा हुआ और टोपी ने देखा कि इम्तहान सिर पर खड़ा है। वह पढ़ाइर् में जुट गया। परंतु ऐसे वातावरण में क्या कोइर् पढ़ सकता था? इसलिए उसका पास ही हो जाना बहुत था। फ्वाह!य् दादी बोलीं, फ्भगवान नशरे - बद38 से बचाए। रफ्ऱतार अच्छी है। तीसरे बरस तीसरे दजेर् में पास तो हो गए।...य् 37.लोग 38.बुरी नशर बोध - प्रश्न1.इफ्ऱ पफन टोपी शुक्ला की कहानी का महत्त्वपूणर् हिस्सा किस तरह से है?़2.इफ्ऱ पफन की दादी अपने पीहर क्यों जाना चाहती थीं?़3.इफ्ऱ पफन की दादी अपने बेटे की शादी में गाने - बजाने की इच्छा पूरी क्यों नहीं कर पाईं?़4.‘अम्मी’ शब्द पर टोपी के घरवालों की क्या प्रतिवि्रफया हुइर्? 5.दस अक्तूबर सन् पैंतालीस का दिन टोपी के जीवन में क्या महत्त्व रखता है? 6.टोपी ने इफ्ऱपफन से दादी बदलने की बात क्यों कही?़7.पूरे घर में इफ्ऱ ़पफन को अपनी दादी से ही विशेष स्नेह क्यों था? 8.इफ्ऱ पफन की दादी के देहांत के बाद टोपी को उसका घर खाली - सा क्यों लगा?़9.टोपी और इफ्ऱ़पफन की दादी अलग - अलग मजहब और जाति के थे पर एक अनजान अटूट रिश्ते से बँधे थे। इस कथन के आलोक में अपने विचार लिख्िाए। 10.टोपी नवीं कक्षा में दो बार पेफल हो गया। बताइएμ़;कद्ध शहीन होने के बावजूद भी कक्षा में दो बार प़्ोफल होने के क्या कारण थे? ;खद्ध एक ही कक्षा में दो - दो बार बैठने से टोपी को किन भावात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ा? ;गद्ध टोपी की भावात्मक परेशानियों को मद्देनशर रखते हुए श्िाक्षा व्यवस्था में आवश्यक बदलाव सुझाइए? 11.इफ्ऱ ़पफन की दादी के मायके का घर कस्टोडियन में क्यों चला गया?

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