सपनों के - से दिन मेरे साथ खेलने वाले सभी बच्चों का हाल एक - सा होता। नंगे पाँव, पफटी - मैली सी कच्छी और टूटे बटनों वाले कइर् जगह से पफटे वुफतेर् और बिखरे बाल। जब लकड़ी के ढेर पर चढ़कर खेलते नीचे को भागते तो गिरकर कइर् तो जाने कहाँ - कहाँ चोट खा लेते और पहले ही पफटे - पुराने वुफतेर् तार - तार हो जाते। धूल भरे, कइर् जगह से छिले पाँव, ¯पडलियाँ या लहू के उफपर जमी रेत - मि‘ी से लथपथ घुटने लेकर जाते तो सभी की माँ - बहनें उन पर तरस खाने की जगह और पिटाइर् करतीं। कइयों के बाप बड़े गुस्सैल थे। पीटने लगते तो यह ध्यान भी न रखते कि छोटे बच्चे के नाक - मुँह से लहू बहने लगा है या उसके कहाँ चोट लगी है। परंतु इतनी बुरी पिटाइर् होने पर भी दूसरे दिन पिफर खेलने चले आते। ;यह बात तब ठीक से समझ आइर् जब स्वूफल अध्यापक बनने के लिए एक ट्रे¯नग1 करने गया और वहाँ बाल - मनोविज्ञान का विषय पढ़ा। ऐसी बातों के बारे में तभी जान पाया कि बच्चों को खेलना क्यों इतना अच्छा लगता है कि बुरी तरह पिटाइर् होने पर भी पिफर खेलने चले आते हैं।द्ध मेरे साथ खेलने वाले अध्िकतर साथी हमारे जैसे ही परिवारों के हुआ करते। सारे मुहल्ले में बहुत परिवार तो, हमारी तरह आसपास के गाँवों से ही आकर बसे थे। दो - तीन घर, साथ की उजड़ी - सी गली में रहने वाले लोगों के थे। हमारी सभी की आदतें भी वुफछ मिलती - जुलती थीं। उनमें से अिाक तो स्वूफल जाते ही न थे, जो कभी गए भी, पढ़ाइर् में रुचि न होने के कारण किसी दिन बस्ता तालाब में पेंफक आए और पिफर स्वूफल गए ही नहीं, न ही माँ - बाप ने शबरदस्ती भेजा। यहाँ तक कि परचूनिये, आढ़तीये भी अपने बच्चों को स्वूफल भेजना शरूरी न समझते। कभी किसी स्वूफल अध्यापक से बात होती तो कहतेμमास्टर जी हमने इसे क्या तहसीलदार लगवाना है। थोड़ा बड़ा हो जाए तो पंडत घनश्याम दास से लंडे2 पढ़वाकर दुकान पर बहियाँ3 लिखने लगा लेंगे। पंडत छह - आठ महीने में लंडे और मुनीमी का सभी काम सिखा देगा। वहाँ तो अभी तक अलिपफ - बे जीम - च भी सीख नहीं पाया। 1.प्रश्िाक्षण 2.हिसाब - किताब लिखने की पंजाबी प्राचीन लिपि 3.खाता ;दुकान के हिसाब - किताब का ब्यौरा जिसमें लिखा जाएद्ध हमारे आध्े से अध्िक साथी राजस्थान या हरियाणा से आकर मंडी में व्यापार या दुकानदारी करने आए परिवारों से थे। जब बहुत छोटे थे तो उनकी बोली कम समझ पाते। उनके वुफछ शब्द सुनकर हमें हँसी आने लगती। परंतु खेलते तो सभी एक - दूसरे की बात खूब अच्छी तरह समझ लेते। पता भी नहीं चला कि लोकोक्ित अनुसार ‘एह खेडण4 दे दिन चार’ वैफसे, कब बीत गए। ;हममें से कोइर् भी ऐसा न था जो स्वूफल के कमरे में बैठकर पढ़ने को ‘वैफद’ न समझता हो।द्ध वुफछ अपने माँ - बाप के साथ जैसा भी था, काम कराने लगे। बचपन में घास अध्िक हरी और पूफलों की सुगंध् अध्िक मनमोहक लगती है। यह शब्द शायद आध्ी शती पहले किसी पुस्तक में पढ़े थे, परंतु आज तक याद हैं। याद रहने का कारण यही है कि यह वाक्य बचपन की भावनाओं, सोच - समझ के अनुवूफल होगा। परंतु स्वूफल के अंदर जाने से रास्ते के दोनों ओर जो अलियार के बड़े ढंग से कटे - छाँटे झाड़ उगे थे ;जिन्हें हम डंडियाँ कहा करतेद्धउनके नीम के पत्तों जैसे पत्तों की महक आज तक भी आँख मूँदकर महसूस कर सकता हूँ। उन दिनों स्वूफल की छोटी क्यारियों में पूफल भी कइर् तरह के उगाए जाते थे जिनमें गुलाब, गेंदा और मोतिया की दूध् - सी सपेफद कलियाँ भी हुआ करतीं। ये कलियाँ इतनी सुंदर और खुशबूदार होती थीं़कि हम चंदू चपड़ासी5 से आँख बचाकर कभी - कभार एक - दो तोड़ लिया करते। उनकी बहुत तेश सुगंध् आज भी महसूस कर पाता हूँ, परंतु यह याद नहीं कि उन्हें तोड़कर, वुफछ देर सूँघकर पिफर क्या किया करते। ;शायद जेब में डाल लेते, माँ उसे धेने के समय निकालकर बाहर पेंफक देती या हम ही, स्वूफल से बाहर आते उन्हें बकरी के मेमनों की भाँति ‘चर’ जाया करतेद्ध। जब अगली श्रेणी में दाख्िाल होते तो एक ओर तो वुफछ बड़े, सयाने होने के एहसास से उत्साहित भी होते, परंतु दूसरी ओर नयी, पुरानी कापियों - किताबों से जाने वैफसी बास आती कि उन्हीं मास्टरों के डर से काँपने लगते जो पिछली श्रेणी में पढ़ा चुके होते। तब स्वूफल में, शुरू साल में एक - डेढ़ महीना पढ़ाइर् हुआ करती, पिफर डेढ़ - दो महीने की छु‘ियाँ शुरू हो जाया करतीं। अब तक जो बात अच्छी तरह याद है वह छु‘ियों के पहले और आख्िारी दिनों का प़्ाफवर्फ था। पहले दो - तीन सप्ताह तो खूब खेल - वूफद हुआ करती। हर साल ही माँ के साथ ननिहाल चले जाते। वहाँ नानी खूब दूध् - दही, मक्खन ख्िालाती, बहुत प्यार करती। छोटा सा पिछड़ा गाँव था परंतु तालाब हमारी मंडी के तालाब जितना ही बड़ा था। दोपहर तक तो उस तालाब में नहाते पिफर नानी से जो जी में आता माँगकर खाने लगते। नानी हमारे बोलने के ढंग या कम खाने के कारण बहुत खुश होती। अपने पोतों को हमारी तरह बोलने और खाने - पीने को कहती। जिस साल ननिहाल न जा पाते, उस साल भी अपने घर से थोड़ा बाहर तालाब पर चले जाते। कपड़े उतार पानी में वूफद जाते और वुफछ समय बाद, भागते हुए एक रेतीले टीले पर जाकर, रेत के उफपर लेटने लगते। गीले शरीर 4.खेलने के 5.चपरासी को गरम रेत से खूब लथपथ कर उसी तरह भागते, किसी उँफची जगह से तालाब में छलाँग लगा देते। रेत को गंदले पानी से सापफ कर पिफर टीले की ओर भाग जाते। याद नहीं कि ऐसा, पाँच - दस बाऱकरते या पंद्रह - बीस बार। कइर् बार तालाब में वूफदकर ऐसे हाथ - पाँव हिलाने लगते जैसे बहुत अच्छे तैराक हों। परंतु एक - दो को छोड़, मेरे किसी साथी को तैरना नहीं आता था। वुफछ तो हाथ - पाँव हिलाते हुए गहरे पानी में चले जाते तो दूसरे उन्हें बाहर आने के लिए किसी भैंस के सींग या दुम पकड़कर बाहर आने की सलाह देते। उन्हें ढाँढ़स बँधते। वूफदते समय मुँह में गंदला पानी भर जाता तो बुरी तरह खाँसते। कइर् बार ऐसा लगता कि साँस रुकने लगी है परंतु हाय - हाय करते किसी न किसी तरह तालाब के किनारे पहुँच जाते। पिफर छु‘ियाँ बीतने लगतीं तो दिन गिनने लगते। प्रत्येक दिन डर बढ़ता चला जाता। खेल - वूफद और तालाब में नहाना भी भूलने लगता। मास्टरों ने जो छु‘ियों में करने के लिए काम दिया होता उसका हिसाब लगाने लगते। जैसे हिसाब के मास्टर जी दो सौ से कम सवाल कभी न बताते। मन में हिसाब लगाते कि यदि दस सवाल रोश निकाले तो बीस दिन मेे पूरे हो जाएँगे। जब ऐसा सोचना श्ुारू करते तो छु‘ियों का एक महीना बाकी हुआ करता। एक - एक दिन गिनते दस दिन खेल - वूफद में और बीत जाते। स्वूफल की पिटाइर्6 का डर और बढ़ने लगता। परंतु डर भुलाने के लिए सोचते कि दस की क्या बात, सवाल तो पंद्रह भी आसानी से रोश निकाले जा सकते हैं। जब ऐसा हिसाब लगाने लगते तो छु‘ियाँ कम होते - होते जैसे भागने लगतीं। दिन बहुत छोटे लगने लगते। ऐसा महसूस होता जैसे सूरज भागकर दोपहरी में ही छिप जाता हो। जैसे - जैसे दिन ‘छोटे’ होने लगते स्वूफल का भय बढ़ने लगता। हमारे कितने ही सहपाठी ऐसे भी होते जो छु‘ियों का काम करने की बजाय मास्टरों की पिटाइर् अध्िक ‘सस्ता सौदा’ समझते। हम जो पिटाइर् से बहुत डरा करते, उन ‘बहादुरों’ की भाँति ही सोचने लगते। ऐसे समय हमारा सबसे बड़ा ‘नेता’ ओमा हुआ करता। हम सभी उसके बारे में सोचते कि हमारे में उस जैसा कौन था। कभी भी उस जैसा दूसरा लड़का नहीं ढूँढ़ पाते थे। उसकी बातें, गालियाँ, मार - पिटाइर् का ढंग तो अलग था ही, उसकी शक्ल - सूरत भी सबसे अलग थी। हाँड़ी जितना बड़ा सिर, उसके ठिगने चार बालिश्त के शरीर पर ऐसा लगता जैसे बिल्ली के बच्चे के माथे पर तरबूज रखा हो। इतने बडे़ सिर में नारियल - की - सी आँखों वाला बंदरिया के बच्चे जैसा चेहरा और भी अजीब लगता। लड़ाइर् वह हाथ - पाँव नहीं, सिर से किया करता। जब साँड़ की भाँति पुँफकारता, सिर झुकाकर किसी के पेट या छाती में मार देता तो उससे दुगुने - तिगुने शरीर वाले लड़के भी पीड़ा से चिल्लाने लगते। हमें डर लगता कि किसी की छाती की पसली ही न तोड़ डाले। उसके सिर की टक्कर का नाम हमने ‘रेल - बम्बा’ रखा हुआ थाμरेल के ;कोयले से चलने वालेद्ध इंजन की भाँति बड़ा और भयंकर ही तो था। 6.आजकल स्वूफलों में विद्याथ्िार्यों को पीटना मना है संचयन हमारा स्वूफल बहुत छोटा थाμकेवल छोटे - छोटे नौ कमरे थे जो अंगे्रशी के अक्षर एच ;भ्द्ध की भाँति बने थे। दाईं ओर पहला कमरा हेडमास्टर श्री मदनमोहन शमार् जी का था जिसके दरवाशे के आगे हमेशा चिक लटकी रहती। स्वूफल की प्रेयर ;प्राथर्नाद्ध के समय वह बाहर आते और सीध्ी कतारों में कद के अनुसार खड़े लड़कों को देख उनका गोरा चेहरा ख्िाल उठता। सारे अध्यापक, लड़कों की तरह ही कतार बाँध्कर उनके पीछे खड़े होते। केवल मास्टर प्रीतम चंद ‘पीटी’ लड़कों की कतारों के पीछे खड़े - खड़े यह देखते थे कि कौन सा लड़का कतार में ठीक नहीं खड़ा। उनकी घुड़की तथा ठुंों के भय से हम सभी कतार के पहले और आख्िारी लड़के का ध्यान रखते, सीधेे कतार में बने रहने का प्रयत्न करते। सीध्ी कतार के साथ - साथ हमें यह ध्यान भी रखना होता था कि आगे पीछे खड़े लड़कों के बीच की दूरी भी एक सी हो। सभी लड़के उस ‘पीटी’ से बहुत डरते थे क्योंकि उन जितना सख्त अध्यापक परंतु हेडमास्टर शमार् जी उसके बिलवुफल उलट स्वभाव के थे। वह पाँचवीं और आठवीं श्रेणी को अंग्रेशी स्वयं पढ़ाया करते थे। हमारे में से किसी को भी याद न था कि पाँचवीं श्रेणी में कभी भी उन्हें, किसी गलती के कारण किसी की ‘चमड़ी उध्ेड़ते’ देखा या सुना हो। ;चमड़ी उध्ेड़ना हमारे लिए बिलवुफल ऐसा शब्द था जैसे हमारे ‘सरकारी मिडिल स्वूफल’ का नाम।द्ध अिाक से अिाक वह गुस्से में बहुत जल्दी - जल्दी आँखें झपकते, अपने लंबे हाथ की उल्टी उँगलियों से एक ‘चपत’ हमारी गाल पर मार देते तो मेरे जैसे सबसे कमशोर शरीर वाले भी सिर झुकाकर मुुँह नीचा किए हँस देते। वह चपत तो जैसे हमें भाइर् भीखे की नमकीन पापड़ी जैसी मशेदार लगती जो तब पैसे की शायद दो आ जाया करतीं। परंतु तब भी स्वूफल हमारे लिए ऐसी जगह न थी जहाँ खुशी से भागे जाएँ। पहली कच्ची पफड़पफड़ाती झंडियों के साथ खाकी वदिर्यों तथा गले में दोरंगे रूमाल लटकाए अभ्यास किया करते। हम कोइर् गलती न करते तो वह अपनी चमकीली आँखें हलके से झपकाते कहतेμशाबाश। वैल बिगिन अगेनμवन, टू, थ्री, थ्री, टू, वन! उनकी एक शाबाश ऐसे लगने लगती जैसे हमने किसी पफौज़के सभी तमगे जीत लिए हों। कभी यही एक शाबाश, सभी मास्टरों की ओर से, हमारी सभी कापियों पर साल भर की लिखी ‘गुंों’ ;गुड का बहुवचनद्ध से अध्िक मूल्यवान लगने लगती। कभी ऐसा भी लगता कि कइर् साल की सख्त मेहनत से प्राप्त की पढ़ाइर् से भी पीटी साहिब के डिसिप्िलन में रहकर प्राप्त की ‘गुडविल’ बहुत बड़ी थी। परंतु यह भी एहसास रहता कि जैसे गुरुद्वारे का भाइर् जी कथा करते समय बताया करता कि सतिगुर7 के भय से ही प्रेम जागता है, ऐसे ही पीटी साहब के प्रति हमारी प्रेम की भावना जग जाती। ;यह ऐसा भी है कि आपको रोश पफटकारने वाला कोइर् ‘अपना’ यदि साल भर के बाद एक बार ‘शाबाश’ कह दे तो यह चमत्कार - सा लगने लगता हैμहमारी दशा भी वुफछ ऐसी हुआ करती।द्ध हर वषर् अगली श्रेणी मंे प्रवेश करते समय मुझे पुरानी पुस्तवेंफ मिला करतीं। हमारे हेडमास्टर शमार् जी एक लड़के को उसके घर जाकर पढ़ाया करते थे। वे धनाढ्य लोग थे। उनका लड़का मुझसे एक - दो साल बड़ा होने के कारण मेरे से एक श्रेणी आगे रहा। हर साल अप्रैल में जब पढ़ाइर् का नया साल आरंभ होता तो शमार् जी उसकी एक साल पुरानी पुस्तवेंफ ले आते। हमारे घर में किसी को भी पढ़ाइर् में दिलचस्पी न थी। यदि नयी किताबें लानी पड़तीं ;जो तब एक - दो रुपये में आ जाया करतींद्ध तो शायद इसी बहाने पढ़ाइर् तीसरी - चैथी श्रेणी में ही छूट जाती। कोइर् सात साल स्वूफल में रहा तो एक कारण पुरानी किताबें मिल जाना भी था। कापियों, पैंसिलों, होल्डर या स्याही - दवात में भी मुश्िकल से एक - दो रुपये साल भर में खचर् हुआ करते। परंतु उस शमाने में एक रुपया भी बहुत बड़ी ‘रकम’ हुआ करती थी। एक रुपये में एक सेर घी आया करता और दो रुपये की एक मन ;चालीस सेरद्ध गंदम। इसी कारण, खाते - पीते घरों के लड़के ही स्वूफल जाया करते। हमारे दो परिवारों में मैं पहला लड़का था जो स्वूफल जाने लगा था। परंतु किसी भी नयी श्रेणी में जाने का ऐसा चाव कभी भी महसूस नहीं हुआ जिसका िाव्रफ वुफछ लड़के किया करते। अजीब बात थी कि मुझे नयी कापियांे और पुरानी पुस्तकों में से ऐसी गंध आने लगती कि मन बहुत उदास होने लगता था। इसका ठीक - ठीक कारण तो कभी समझ में नहीं आया परंतु जितनी भी मनोविज्ञान की जानकारी है, इस अरुचि का कारण यही समझ में आया कि आगे की श्रेणी की वुफछ मुश्िकल पढ़ाइर् और नए मास्टरों की मार - पीट का भय ही कहीं भीतर जमकर 7.सतगुरु बैठ गया था। सभी तो नए न होते थे परंतु दो - तीन हर साल ही वह होते जोकि छोटी श्रेणी में नहीं पढ़ाते थे। वुफछ ऐसी भी भावना थी कि अिाक अध्यापक एक साल में ऐसी अपेक्षा करने लगते कि जैसे हम ‘हरपफनमौला8’ हो गए हों। यदि उनकी आशाओं पर पूरे नहीं हो पाते तो वुफछ तो जैसे ‘चमड़ी उधेड़ देने को तैयार रहते’, इन्हीं वुफछ कारणों से केवल किताबों - कापियों की गंध से ही नहीं, बाहर के बड़े गेट से दस - पंद्रह गज दूर स्वूफल के कमरों तक रास्ते के दोनों ओर जो अलिआर के झाड़ उगे थे उनकी गंध भी मन उदास कर दिया करती। परंतु स्वूफल एक - दो कारणों से अच्छा भी लगने लगा था। मास्टर प्रीतमचंद जब हम स्काउटों को परेड करवाते तो लेफ्रट - राइट की आवाश या मुँह में ली िसल से माचर् कराया करते। पिफर राइट टनर् या लेफ्रट टनर् या अबाउफट टनर् कहने पर छोटे - छोटे बूटों की एडि़यों पर दाएँ - बाएँ या एकदम पीछे मुड़कर बूटांें की ठक - ठक करते अकड़कर चलते तो लगता जैसे हम विद्याथीर् नहीं, बहुत महत्त्वपूणर् ‘आदमी’ होंμप़फौजी जवान। दूसरे विश्व - यु( का समय था, परंतु हमारी नाभा रियासत का राजा अंग्रेशों ने 1923 में गिरफ्ऱ तार कर लिया था और तमिलनाडु में कोडाएकेनाल मंे ही, जंग शुरू होने से पहले उसका देहांत हो गया था। उस राजा का बेटा, कहते थे अभी विलायत में पढ़ रहा था। इसलिए हमारे देसी रियासत में भी अंग्रेश की ही चलती थी पिफर भी राजा के न रहते, अंग्रेश हमारी रियासत के गाँवों से ‘जबरन9’ भरती नहीं कर पाया था। लोगों को प़्ाफौज में भरती करने के लिए जब वुफछ अपफसर आते तो उनके साथ वुफछ नौटंकी वाले भी हुआ करते। वे रात को खुले मैदान में शामियाने लगाकर लोगों को पफा़जैके सुख - आराम, बहादुरी के दृश्य दिखाकर आकष्िार्त किया करते। उनका एक गाना अभी भी याद है। वुफछ मसखरे, अजीब सी वदिर्याँ पहने और अच्छे, बड़े पफौजी बूट पहने गाया करतेμ ़भरती हो जा रेंरगरूट भरती हो जा रे..अठे10 मिले सैं टूटे लीतर11 उठै12 मिलैंदे बूट, भरती हो जा रे, हो जा रे रंगरूट। अठे पहन सै पफटे पुराणे उठै मिलेंगे सूट 8.पारंगत/विद्वान/हर पफन ;विद्याद्ध में माहिर 9.बलपूवर्क/शबरदस्ती 10.यहाँ 11.टूटे हुए पुराने खस्ताहाल जूते 12.वहाँ भरती हो जा रे, हो जा रे रंगरूट इन्हीं बातों से आकष्िार्त हो वुफछ नौजवान भरती के लिए तैयार हो जाया करते। कभी - कभी हमें भी महसूस होता कि हम भी प़फौजी जवानों से कम नहीं। धोबी की धुली वदीर् और पालिश किए बूट और जुराबों को पहने जब हम स्काउटिंग की परेड करते तो लगता हम प़फौजी ही हैं। मास्टर प्रीतमचंद को स्वूफल के समय में कभी भी हमने मुसकराते या हँसते न देखा था। उनका ठिगना कद, दुबला - पतला परंतु गठीला शरीर, माता के दागों से भरा चेहरा और बाज - सी तेश आँखें, खाकी वदीर्, चमड़े के चैड़े पंजों वाले बूटμसभी वुफछ ही भयभीत करने वाला हुआ करता। उनके बूटों की उँफची एडि़यों के नीचे भी खुरियाँ लगी रहतीं, जैसे ताँगे के घोड़े के पैरों में लगी रहती हैं। अगले हिस्से में, पंजों के नीचे मोटे सिरों वाले कील ठुके होते। यदि वह सख्त जगह पर भी चलते तो खुरियों और कीलों के निशान वहाँ भी दिखाइर् देते। हम ध्यान से देखते, इतने बड़े और भारी - भारी बूट पहनने के बावजूद उनके टखनों में कहीं मोच तक नहीं आती थी। ;उनको देखकर हम यदि घरवालों से बूटों की माँग करते तो माँ - बाप यही कहते कि टखने टेढ़े हो जाएँगे, सारी उमर सीधे न चल पाओगे।द्ध मास्टर प्रीतमचंद से हमारा डरना तो स्वाभाविक था, परंतु हम उनसे नपफरत भी करते थे। कारण ़तो उसका मारपीट था। हम सभी को ;जो मेरी उमर के हैंद्ध वह दिन नहीं भूल पाया जिस दिन वह हमें चैथी श्रेणी में पफारसी पढ़ाने लगे थे। हमें उदूर् का तो तीसरी श्रेणी तक अच्छा अभ्यास हो ़गया था परंतु प़्ाफारसी तो अंग्रेशी से भी मुश्िकल थी। अभी हमें पढ़ते एक सप्ताह भी न हुआ होगा कि प्रीतमचंद ने हमें एक शब्द - रूप याद करने को कहा और आदेश दिया कि कल इसी घंटी में शबानी सुनेंगे। हम सभी घर लौटकर, रात देर तक उसी शब्द - रूप को बार - बार याद करते रहे परंतु केवल दो - तीन ही लड़के थे जिन्हें आधी या वुफछ अिाक शब्द - रूप याद हो पाया। दूसरे दिन बारी - बारी सबको सुनाने के लिए कहा तो एक भी लड़का न सुना पाया। तभी मास्टर जी गुरार्एμसभी कान पकड़ो। हमने झुककर टाँगों के पीछे से बाँहें निकालकर कान पकड़े तो वह गुस्से से चीखेμपीठ उँफची करो। पीठ उँफची करके कान पकड़ने से, तीन - चार मिनट मंें ही टाँगों में जलन होने लगती थी। मेरे जैसे कमशोर तो टाँगांे के थकने से कान पकड़े हुए ही गिर पड़ते। जब तक मेरी और हरबंस की बारी आइर् तब तक हेडमास्टर शमार् जी अपने दफ्ऱ तर में आ चुके थे। जब हमें सजा दी जा रही थी तो उसके वुफछ 13.निलंबित 14.श्िाक्षा विभाग उस दिन के बाद यह पता होते हुए भी कि पीटी प्रीतमचंद को जब तक नाभा से डायरेक्टर ‘बहाल’ नहीं करेंगे तब तक वह स्वूफल में कदम नहीं रख सकते, जब भी प़्ाफारसी की घंटी बजती तो हमारी छाती धव्फ - धव्फ करती पफटने को आती। परंतु जब तक शमार् जी स्वयं या मास्टर नौहरिया राम जी कमरे में प़्ाफारसी पढ़ाने न आ जाते, हमारे चेहरे मुझार्ए रहते। पिफर कइर् सप्ताह तक पीटी मास्टर स्वूफल नहीं आए। पता चला कि बाशार में एक दुकान के उफपर उन्होंने जो छोटी - छोटी ख्िाड़कियों वाला चैबारा किराए पर ले रखा था, वहीं आराम से रह रहे थे। वुफछ सातवीं - आठवीं के विद्याथीर् हमें बताया करते कि उन्हें मुअत्तल होने की रत्ती भर भी ¯चता नहीं थी। पहले की तरह ही आराम से ¯पजरे में रखे दो तोतों को दिन में कइर् बार, भ्िागोकर रखे बादामों की गिरियों का छिलका उतारकर उन्हें ख्िालाते उनसे बातें करते रहते हैं। उनके वे तोते हमने भी कइर् बार देखे थे। ;हम उन बड़े लड़कों के साथ उनके चैबारे में गए थे जो लड़के पीटी साहब के आदेश पर उनके घर का काम करने जाया करतेद्ध परंतु हमारे लिए यह चमत्कार ही था कि जो प्रीतमचंद बिल्ला मार - मारकर हमारी चमड़ी तक उधेड़ देते वह अपने तोतों से मीठी - मीठी बातें वैफसे कर लेते थे? क्या तोतों को उनकी दहकती, भूरी आँखों से भय न लगता था। हमारी समझ में ऐसी बातें तब नहीं आ पाती थीं, बस एक तरह इन्हें अलौकिक ही मानते थे। बोध् - प्रश्न 1.कोइर् भी भाषा आपसी व्यवहार में बाध नहीं बनतीμपाठ के किस अंश से यह सि( होता है? 2.पीटी साहब की ‘शाबाश’ पफौज के तमगों - सी क्यों लगती थी? स्पष्ट कीजिए।़3.नयी श्रेणी में जाने और नयी कापियों और पुरानी किताबों से आती विशेष गंध् से लेखक का बालमन क्यों उदास हो उठता था? 4.स्काउट परेड करते समय लेखक अपने को महत्त्वपूणर् ‘आदमी’ प़्ाफौजी जवान क्यों समझने लगता था? 5.हेडमास्टर शमार् जी ने पीटी साहब को क्यों मुअत्तल कर दिया? 6.लेखक के अनुसार उन्हें स्वूफल खुशी से भागे जाने की जगह न लगने पर भी कब और क्यों उन्हें स्वूफल जाना अच्छा लगने लगा? 7.लेखक अपने छात्रा जीवन में स्वूफल से छु‘ियों में मिले काम को पूरा करने के लिए क्या - क्या योजनाएँ बनाया करता था और उसे पूरा न कर पाने की स्िथति में किसकी भाँति ‘बहादुर’ बनने की कल्पना किया करता था? 8.पाठ में वण्िार्त घटनाओं के आधर पर पीटी सर की चारित्रिाक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। 9.विद्याथ्िार्यों को अनुशासन में रखने के लिए पाठ में अपनाइर् गइर् युक्ितयों और वतर्मान में स्वीवृफत मान्यताओं के संबंध् में अपने विचार प्रकट कीजिए। 10.बचपन की यादें मन को गुदगुदाने वाली होती हैं विशेषकर स्वूफली दिनों की। अपने अब तक के स्वूफली जीवन की ख‘ी - मीठी यादों को लिख्िाए। 11.प्रायः अभ्िाभावक बच्चों को खेल - वूफद में श्यादा रुचि लेने पर रोकते हैं और समय बरबाद न करने की नसीहत देते हैं। बताइएμ ;कद्ध खेल आपके लिए क्यों शरूरी हैं? ;खद्ध आप कौन से ऐसे नियम - कायदों को अपनाएँगे जिससे अभ्िाभावकों को आपके खेल पर आपिा न हो?

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SanchayanBhag2-002

सपनों के-से दिन

मेरे साथ खेलने वाले सभी बच्चों का हाल एक-सा होता। नंगे पाँव, फटी-मैली सी कच्छी और टूटे बटनों वाले कई जगह से फटे कुर्ते और बिखरे बाल। जब लकड़ी के ढेर पर चढ़कर खेलते नीचे को भागते तो गिरकर कई तो जाने कहाँ-कहाँ चोट खा लेते और पहले ही फटे-पुराने कुर्ते तार-तार हो जाते। धूल भरे, कई जगह से छिले पाँव, पिडलियाँ या लहू के ऊपर जमी रेत-मिट्टी से लथपथ घुटने लेकर जाते तो सभी की माँ-बहनें उन पर तरस खाने की जगह और पिटाई करतीं। कइयों के बाप बड़े गुस्सैल थे। पीटने लगते तो यह ध्यान भी न रखते कि छोटे बच्चे के नाक-मुँह से लहू बहने लगा है या उसके कहाँ चोट लगी है। परंतु इतनी बुरी पिटाई होने पर भी दूसरे दिन फिर खेलने चले आते। (यह बात तब ठीक से समझ आई जब स्कूल अध्यापक बनने के लिए एक ट्रेनिग1 करने गया और वहाँ बाल-मनोविज्ञान का विषय पढ़ा। ऐसी बातों के बारे में तभी जान पाया कि बच्चों को खेलना क्यों इतना अच्छा लगता है कि बुरी तरह पिटाई होने पर भी फिर खेलने चले आते हैं।)

मेरे साथ खेलने वाले अधिकतर साथी हमारे जैसे ही परिवारों के हुआ करते। सारे मुहल्ले में बहुत परिवार तो, हमारी तरह आसपास के गाँवों से ही आकर बसे थे। दो-तीन घर, साथ की उजड़ी-सी गली में रहने वाले लोगों के थे। हमारी सभी की आदतें भी कुछ मिलती-जुलती थीं। उनमें से अधिक तो स्कूल जाते ही न थे, जो कभी गए भी, पढ़ाई में रुचि न होने के कारण किसी दिन बस्ता तालाब में फेंक आए और फिर स्कूल गए ही नहीं, न ही माँ-बाप ने ज़बरदस्ती भेजा। यहाँ तक कि परचूनिये, आढ़तीये भी अपने बच्चों को स्कूल भेजना ज़रूरी न समझते। कभी किसी स्कूल अध्यापक से बात होती तो कहते–मास्टर जी हमने इसे क्या तहसीलदार लगवाना है। थोड़ा बड़ा हो जाए तो पंडत घनश्याम दास से लंडे2 पढ़वाकर दुकान पर बहियाँ3 लिखने लगा लेंगे। पंडत छह-आठ महीने में लंडे और मुनीमी का सभी काम सिखा देगा। वहाँ तो अभी तक अलिफ-बे जीम-च भी सीख नहीं पाया।

1. प्रशिक्षण 2. हिसाब-किताब लिखने की पंजाबी प्राचीन लिपि 3. खाता (दुकान के हिसाब-किताब का ब्यौरा जिसमें लिखा जाए)

हमारे आधे से अधिक साथी राजस्थान या हरियाणा से आकर मंडी में व्यापार या दुकानदारी करने आए परिवारों से थे। जब बहुत छोटे थे तो उनकी बोली कम समझ पाते। उनके कुछ शब्द सुनकर हमें हँसी आने लगती। परंतु खेलते तो सभी एक-दूसरे की बात खूब अच्छी तरह समझ लेते।

पता भी नहीं चला कि लोकोक्ति अनुसार ‘एह खेडण4 दे दिन चार’ कैसे, कब बीत गए। (हममें से कोई भी ऐसा न था जो स्कूल के कमरे में बैठकर पढ़ने को ‘कैद’ न समझता हो।) कुछ अपने माँ-बाप के साथ जैसा भी था, काम कराने लगे।

बचपन में घास अधिक हरी और फूलों की सुगंध अधिक मनमोहक लगती है। यह शब्द शायद आधी शती पहले किसी पुस्तक में पढ़े थे, परंतु आज तक याद हैं। याद रहने का कारण यही है कि यह वाक्य बचपन की भावनाओं, सोच-समझ के अनुकूल होगा। परंतु स्कूल के अंदर जाने से रास्ते के दोनों ओर जो अलियार के बड़े ढंग से कटे-छाँटे झाड़ उगे थे (जिन्हें हम डंडियाँ कहा करते) उनके नीम के पत्तों जैसे पत्तों की महक आज तक भी आँख मूँदकर महसूस कर सकता हूँ। उन दिनों स्कूल की छोटी क्यारियों में फूल भी कई तरह के उगाए जाते थे जिनमें गुलाब, गेंदा और मोतिया की दूध-सी सफ़ेद कलियाँ भी हुआ करतीं। ये कलियाँ इतनी सुंदर और खुशबूदार होती थीं कि हम चंदू चपड़ासी5 से आँख बचाकर कभी-कभार एक-दो तोड़ लिया करते। उनकी बहुत तेज़ सुगंध आज भी महसूस कर पाता हूँ, परंतु यह याद नहीं कि उन्हें तोड़कर, कुछ देर सूँघकर फिर क्या किया करते। (शायद जेब में डाल लेते, माँ उसे धोने के समय निकालकर बाहर फेंक देती या हम ही, स्कूल से बाहर आते उन्हें बकरी के मेमनों की भाँति ‘चर’ जाया करते)।

जब अगली श्रेणी में दाखिल होते तो एक ओर तो कुछ बड़े, सयाने होने के एहसास से उत्साहित भी होते, परंतु दूसरी ओर नयी, पुरानी कापियों-किताबों से जाने कैसी बास आती कि उन्हीं मास्टरों के डर से काँपने लगते जो पिछली श्रेणी में पढ़ा चुके होते।

तब स्कूल में, शुरू साल में एक-डेढ़ महीना पढ़ाई हुआ करती, फिर डेढ़-दो महीने की छुिट्टयाँ शुरू हो जाया करतीं। अब तक जो बात अच्छी तरह याद है वह छुिट्टयों के पहले और आखिरी दिनों का फ़र्क था। पहले दो-तीन सप्ताह तो खूब खेल-कूद हुआ करती। हर साल ही माँ के साथ ननिहाल चले जाते। वहाँ नानी खूब दूध-दही, मक्खन खिलाती, बहुत प्यार करती। छोटा सा पिछड़ा गाँव था परंतु तालाब हमारी मंडी के तालाब जितना ही बड़ा था। दोपहर तक तो उस तालाब में नहाते फिर नानी से जो जी में आता माँगकर खाने लगते। नानी हमारे बोलने के ढंग या कम खाने के कारण बहुत खुश होती। अपने पोतों को हमारी तरह बोलने और खाने-पीने को कहती। जिस साल ननिहाल न जा पाते, उस साल भी अपने घर से थोड़ा बाहर तालाब पर चले जाते। कपड़े उतार पानी में कूद जाते और कुछ समय बाद, भागते हुए एक रेतीले टीले पर जाकर, रेत के ऊपर लेटने लगते। गीले शरीर को गरम रेत से खूब लथपथ कर उसी तरह भागते, किसी ऊँची जगह से तालाब में छलाँग लगा देते। रेत को गंदले पानी से साफ़ कर फिर टीले की ओर भाग जाते। याद नहीं कि ऐसा, पाँच-दस बार करते या पंद्रह-बीस बार। कई बार तालाब में कूदकर ऐसे हाथ-पाँव हिलाने लगते जैसे बहुत अच्छे तैराक हों। परंतु एक-दो को छोड़, मेरे किसी साथी को तैरना नहीं आता था। कुछ तो हाथ-पाँव हिलाते हुए गहरे पानी में चले जाते तो दूसरे उन्हें बाहर आने के लिए किसी भैंस के सींग या दुम पकड़कर बाहर आने की सलाह देते। उन्हें ढाँढ़स बँधाते। कूदते समय मुँह में गंदला पानी भर जाता तो बुरी तरह खाँसते। कई बार ऐसा लगता कि साँस रुकने लगी है परंतु हाय-हाय करते किसी न किसी तरह तालाब के किनारे पहुँच जाते।

4. खेलने के 5. चपरासी

फिर छुिट्टयाँ बीतने लगतीं तो दिन गिनने लगते। प्रत्येक दिन डर बढ़ता चला जाता। खेल-कूद और तालाब में नहाना भी भूलने लगता। मास्टरों ने जो छुिट्टयों में करने के लिए काम दिया होता उसका हिसाब लगाने लगते। जैसे हिसाब के मास्टर जी दो सौ से कम सवाल कभी न बताते। मन में हिसाब लगाते कि यदि दस सवाल रोज़ निकाले तो बीस दिन मेे पूरे हो जाएँगे। जब ऐसा सोचना शुरू करते तो छुिट्टयों का एक महीना बाकी हुआ करता। एक-एक दिन गिनते दस दिन खेल-कूद में और बीत जाते। स्कूल की पिटाई6 का डर और बढ़ने लगता। परंतु डर भुलाने के लिए सोचते कि दस की क्या बात, सवाल तो पंद्रह भी आसानी से रोज़ निकाले जा सकते हैं। जब ऐसा हिसाब लगाने लगते तो छुिट्टयाँ कम होते-होते जैसे भागने लगतीं। दिन बहुत छोटे लगने लगते। ऐसा महसूस होता जैसे सूरज भागकर दोपहरी में ही छिप जाता हो। जैसे-जैसे दिन ‘छोटे’ होने लगते स्कूल का भय बढ़ने लगता। हमारे कितने ही सहपाठी ऐसे भी होते जो छुिट्टयों का काम करने की बजाय मास्टरों की पिटाई अधिक ‘सस्ता सौदा’ समझते। हम जो पिटाई से बहुत डरा करते, उन ‘बहादुरों’ की भाँति ही सोचने लगते। ऐसे समय हमारा सबसे बड़ा ‘नेता’ ओमा हुआ करता।

हम सभी उसके बारे में सोचते कि हमारे में उस जैसा कौन था। कभी भी उस जैसा दूसरा लड़का नहीं ढूँढ़ पाते थे। उसकी बातें, गालियाँ, मार-पिटाई का ढंग तो अलग था ही, उसकी शक्ल-सूरत भी सबसे अलग थी। हाँड़ी जितना बड़ा सिर, उसके ठिगने चार बालिश्त के शरीर पर ऐसा लगता जैसे बिल्ली के बच्चे के माथे पर तरबूज रखा हो। इतने बड़े सिर में नारियल-की-सी आँखों वाला बंदरिया के बच्चे जैसा चेहरा और भी अजीब लगता। लड़ाई वह हाथ-पाँव नहीं, सिर से किया करता। जब साँड़ की भाँति फुँकारता, सिर झुकाकर किसी के पेट या छाती में मार देता तो उससे दुगुने-तिगुने शरीर वाले लड़के भी पीड़ा से चिल्लाने लगते। हमें डर लगता कि किसी की छाती की पसली ही न तोड़ डाले। उसके सिर की टक्कर का नाम हमने ‘रेल-बम्बा’ रखा हुआ था–रेल के (कोयले से चलने वाले) इंजन की भाँति बड़ा और भयंकर ही तो था।

6. आजकल स्कूलों में विद्यार्थियों को पीटना मना है

हमारा स्कूल बहुत छोटा था–केवल छोटे-छोटे नौ कमरे थे जो अंग्रेज़ी के अक्षर एच (H) की भाँति बने थे। दाईं ओर पहला कमरा हेडमास्टर श्री मदनमोहन शर्मा जी का था जिसके दरवाज़े के आगे हमेशा चिक लटकी रहती। स्कूल की प्रेयर (प्रार्थना) के समय वह बाहर आते और सीधी कतारों में कद के अनुसार खड़े लड़कों को देख उनका गोरा चेहरा खिल उठता। सारे अध्यापक, लड़कों की तरह ही कतार बाँधकर उनके पीछे खड़े होते। केवल मास्टर प्रीतम चंद ‘पीटी’ लड़कों की कतारों के पीछे खड़े-खड़े यह देखते थे कि कौन सा लड़का कतार में ठीक नहीं खड़ा। उनकी घुड़की तथा ठुड्डों के भय से हम सभी कतार के पहले और आखिरी लड़के का ध्यान रखते, सीधेे कतार में बने रहने का प्रयत्न करते। सीधी कतार के साथ-साथ हमें यह ध्यान भी रखना होता था कि आगे पीछे खड़े लड़कों के बीच की दूरी भी एक सी हो। सभी लड़के उस ‘पीटी’ से बहुत डरते थे क्योंकि उन जितना सख्त अध्यापक न कभी किसी ने देखा, न सुना था। यदि कोई लड़का अपना सिर भी इधर-उधर हिला लेता या पाँव से दूसरी पिंडली खुजलाने लगता तो वह उसकी ओर बाघ की तरह झपट पड़ते और ‘खाल खींचने’ के मुहावरे को प्रत्यक्ष करके दिखा देते।

परंतु हेडमास्टर शर्मा जी उसके बिलकुल उलट स्वभाव के थे। वह पाँचवीं और आठवीं श्रेणी को अंग्रेज़ी स्वयं पढ़ाया करते थे। हमारे में से किसी को भी याद न था कि पाँचवीं श्रेणी में कभी भी उन्हें, किसी गलती के कारण किसी की ‘चमड़ी उधेड़ते’ देखा या सुना हो। (चमड़ी उधेड़ना हमारे लिए बिलकुल ऐसा शब्द था जैसे हमारे ‘सरकारी मिडिल स्कूल’ का नाम।) अधिक से अधिक वह गुस्से में बहुत जल्दी-जल्दी आँखें झपकते, अपने लंबे हाथ की उल्टी उँगलियों से एक ‘चपत’ हमारी गाल पर मार देते तो मेरे जैसे सबसे कमज़ोर शरीर वाले भी सिर झुकाकर मुुँह नीचा किए हँस देते। वह चपत तो जैसे हमें भाई भीखे की नमकीन पापड़ी जैसी मज़ेदार लगती जो तब पैसे की शायद दो आ जाया करतीं।

परंतु तब भी स्कूल हमारे लिए ऐसी जगह न थी जहाँ खुशी से भागे जाएँ। पहली कच्ची श्रेणी से लेकर चौथी श्रेणी तक, केवल पाँच-सात लड़कों को छोड़ हम सभी रोते चिल्लाते ही स्कूल जाया करते।

परंतु कभी-कभी ऐसी सभी स्थितियों के रहते स्कूल अच्छा भी लगने लगता। जब स्काउटिंग का अभ्यास करवाते समय पीटी साहब नीली-पीली झंडियाँ हाथों में पकड़ाकर वन टू थ्री कहते, झंडियाँ ऊपर-नीचे, दाएँ-बाएँ करवाते तो हवा में लहराती और फड़फड़ाती झंडियों के साथ खाकी वर्दियों तथा गले में दोरंगे रूमाल लटकाए अभ्यास किया करते। हम कोई गलती न करते तो वह अपनी चमकीली आँखें हलके से झपकाते कहते–शाबाश। वैल बिगिन अगेन-वन, टू, थ्री, थ्री, टू, वन! उनकी एक शाबाश ऐसे लगने लगती जैसे हमने किसी फ़ौज के सभी तमगे जीत लिए हों। कभी यही एक शाबाश, सभी मास्टरों की ओर से, हमारी सभी कापियों पर साल भर की लिखी ‘गुड्डों’ (गुड का बहुवचन) से अधिक मूल्यवान लगने लगती। कभी ऐसा भी लगता कि कई साल की सख्त मेहनत से प्राप्त की पढ़ाई से भी पीटी साहिब के डिसिप्लिन में रहकर प्राप्त की ‘गुडविल’ बहुत बड़ी थी। परंतु यह भी एहसास रहता कि जैसे गुरुद्वारे का भाई जी कथा करते समय बताया करता कि सतिगुर7 के भय से ही प्रेम जागता है, ऐसे ही पीटी साहब के प्रति हमारी प्रेम की भावना जग जाती। (यह ऐसा भी है कि आपको रोज़ फटकारने वाला कोई ‘अपना’ यदि साल भर के बाद एक बार ‘शाबाश’ कह दे तो यह चमत्कार-सा लगने लगता है–हमारी दशा भी कुछ ऐसी हुआ करती।)

हर वर्ष अगली श्रेणी में प्रवेश करते समय मुझे पुरानी पुस्तकें मिला करतीं। हमारे हेडमास्टर शर्मा जी एक लड़के को उसके घर जाकर पढ़ाया करते थे। वे धनाढ्य लोग थे। उनका लड़का मुझसे एक-दो साल बड़ा होने के कारण मेरे से एक श्रेणी आगे रहा। हर साल अप्रैल में जब पढ़ाई का नया साल आरंभ होता तो शर्मा जी उसकी एक साल पुरानी पुस्तकें ले आते। हमारे घर में किसी को भी पढ़ाई में दिलचस्पी न थी। यदि नयी किताबें लानी पड़तीं (जो तब एक-दो रुपये में आ जाया करतीं) तो शायद इसी बहाने पढ़ाई तीसरी-चौथी श्रेणी में ही छूट जाती। कोई सात साल स्कूल में रहा तो एक कारण पुरानी किताबें मिल जाना भी था। कापियों, पैंसिलों, होल्डर या स्याही-दवात में भी मुश्किल से एक-दो रुपये साल भर में खर्च हुआ करते। परंतु उस ज़माने में एक रुपया भी बहुत बड़ी ‘रकम’ हुआ करती थी। एक रुपये में एक सेर घी आया करता और दो रुपये की एक मन (चालीस सेर) गंदम। इसी कारण, खाते-पीते घरों के लड़के ही स्कूल जाया करते। हमारे दो परिवारों में मैं पहला लड़का था जो स्कूल जाने लगा था।

परंतु किसी भी नयी श्रेणी में जाने का ऐसा चाव कभी भी महसूस नहीं हुआ जिसका जि़क्र कुछ लड़के किया करते। अजीब बात थी कि मुझे नयी कापियाें और पुरानी पुस्तकों में से ऐसी गंध आने लगती कि मन बहुत उदास होने लगता था। इसका ठीक-ठीक कारण तो कभी समझ में नहीं आया परंतु जितनी भी मनोविज्ञान की जानकारी है, इस अरुचि का कारण यही समझ में आया कि आगे की श्रेणी की कुछ मुश्किल पढ़ाई और नए मास्टरों की मार-पीट का भय ही कहीं भीतर जमकर बैठ गया था। सभी तो नए न होते थे परंतु दो-तीन हर साल ही वह होते जोकि छोटी श्रेणी में नहीं पढ़ाते थे। कुछ ऐसी भी भावना थी कि अधिक अध्यापक एक साल में ऐसी अपेक्षा करने लगते कि जैसे हम ‘हरफनमौला8’ हो गए हों। यदि उनकी आशाओं पर पूरे नहीं हो पाते तो कुछ तो जैसे ‘चमड़ी उधेड़ देने को तैयार रहते’, इन्हीं कुछ कारणों से केवल किताबों-कापियों की गंध से ही नहीं, बाहर के बड़े गेट से दस-पंद्रह गज दूर स्कूल के कमरों तक रास्ते के दोनों ओर जो अलिआर के झाड़ उगे थे उनकी गंध भी मन उदास कर दिया करती।

7. सतगुरु

परंतु स्कूल एक-दो कारणों से अच्छा भी लगने लगा था। मास्टर प्रीतमचंद जब हम स्काउटों को परेड करवाते तो लेफ्ट-राइट की आवाज़ या मुँह में ली ह्विसल सले से मार्च कराया करते। फिर राइट टर्न या लेफ्ट टर्न या अबाऊट टर्न कहने पर छोटे-छोटे बूटों की एड़ियों पर दाएँ-बाएँ या एकदम पीछे मुड़कर बूटाेंं की ठक-ठक करते अकड़कर चलते तो लगता जैसे हम विद्यार्थी नहीं, बहुत महत्त्वपूर्ण ‘आदमी’ हों–फ़ौजी जवान।

दूसरे विश्व-युद्ध का समय था, परंतु हमारी नाभा रियासत का राजा अंग्रेज़ों ने 1923 में गिरफ़्तार कर लिया था और तमिलनाडु में कोडाएकेनाल में ही, जंग शुरू होने से पहले उसका देहांत हो गया था। उस राजा का बेटा, कहते थे अभी विलायत में पढ़ रहा था। इसलिए हमारे देसी रियासत में भी अंग्रेज़ की ही चलती थी फिर भी राजा के न रहते, अंग्रेज़ हमारी रियासत के गाँवों से ‘जबरन9’ भरती नहीं कर पाया था। लोगों को फ़ौज़ में भरती करने के लिए जब कुछ अफसर आते तो उनके साथ कुछ नौटंकी वाले भी हुआ करते। वे रात को खुले मैदान में शामियाने लगाकर लोगों को फ़ौज के सुख-आराम, बहादुरी के दृश्य दिखाकर आकर्षित किया करते। उनका एक गाना अभी भी याद है। कुछ मसखरे, अजीब सी वर्दियाँ पहने और अच्छे, बड़े फ़ौजी बूट पहने गाया करते–

भरती हो जा रे रंगरूट

भरती हो जा रे...

अठे10 मिले सैं टूटे लीतर11

उठै12 मिलैंदे बूट,

भरती हो जा रे,

हो जा रे रंगरूट।

अठे पहन सै फटे पुराणे

उठै मिलेंगे सूट 

भरती हो जा रे,

हो जा रे रंगरूट

8. पारंगत/विद्वान/हर फन (विद्या) में माहिर 9. बलपूर्वक/ज़बरदस्ती 10. यहाँ 11. टूटे हुए पुराने खस्ताहाल जूते 12. वहाँ

इन्हीं बातों से आकर्षित हो कुछ नौजवान भरती के लिए तैयार हो जाया करते।

कभी-कभी हमें भी महसूस होता कि हम भी फ़ौजी जवानों से कम नहीं। धोबी की धुली वर्दी और पालिश किए बूट और जुराबों को पहने जब हम स्काउटिंग की परेड करते तो लगता हम फ़ौजी ही हैं।

मास्टर प्रीतमचंद को स्कूल के समय में कभी भी हमने मुसकराते या हँसते न देखा था। उनका ठिगना कद, दुबला-पतला परंतु गठीला शरीर, माता के दागों से भरा चेहरा और बाज-सी तेज़ आँखें, खाकी वर्दी, चमड़े के चौड़े पंजों वाले बूट–सभी कुछ ही भयभीत करने वाला हुआ करता। उनके बूटों की ऊँची एड़ियों के नीचे भी खुरियाँ लगी रहतीं, जैसे ताँगे के घोड़े के पैरों में लगी रहती हैं। अगले हिस्से में, पंजों के नीचे मोटे सिरों वाले कील ठुके होते। यदि वह सख्त जगह पर भी चलते तो खुरियों और कीलों के निशान वहाँ भी दिखाई देते। हम ध्यान से देखते, इतने बड़े और भारी-भारी बूट पहनने के बावजूद उनके टखनों में कहीं मोच तक नहीं आती थी। (उनको देखकर हम यदि घरवालों से बूटों की माँग करते तो माँ-बाप यही कहते कि टखने टेढ़े हो जाएँगे, सारी उमर सीधे न चल पाओगे।)

मास्टर प्रीतमचंद से हमारा डरना तो स्वाभाविक था, परंतु हम उनसे नफ़रत भी करते थे। कारण तो उसका मारपीट था। हम सभी को (जो मेरी उमर के हैं) वह दिन नहीं भूल पाया जिस दिन वह हमें चौथी श्रेणी में फारसी पढ़ाने लगे थे। हमें उर्दू का तो तीसरी श्रेणी तक अच्छा अभ्यास हो गया था परंतु फ़ारसी तो अंग्रेज़ी से भी मुश्किल थी। अभी हमें पढ़ते एक सप्ताह भी न हुआ होगा कि प्रीतमचंद ने हमें एक शब्द-रूप याद करने को कहा और आदेश दिया कि कल इसी घंटी में ज़बानी सुनेंगे। हम सभी घर लौटकर, रात देर तक उसी शब्द-रूप को बार-बार याद करते रहे परंतु केवल दो-तीन ही लड़के थे जिन्हें आधी या कुछ अधिक शब्द-रूप याद हो पाया। दूसरे दिन बारी-बारी सबको सुनाने के लिए कहा तो एक भी लड़का न सुना पाया। तभी मास्टर जी गुर्राए–सभी कान पकड़ो।

हमने झुककर टाँगों के पीछे से बाँहें निकालकर कान पकड़े तो वह गुस्से से चीखे-पीठ ऊँची करो।

पीठ ऊँची करके कान पकड़ने से, तीन-चार मिनट मेंं ही टाँगों में जलन होने लगती थी। मेरे जैसे कमज़ोर तो टाँगाें के थकने से कान पकड़े हुए ही गिर पड़ते। जब तक मेरी और हरबंस की बारी आई तब तक हेडमास्टर शर्मा जी अपने दफ़्तर में आ चुके थे। जब हमें सजा दी जा रही थी तो उसके कुछ समय पहले शर्मा जी, स्कूल की पूरब की ओर बने सरकारी हस्पताल मेंं डाक्टर कपलाश से मिलने गए थे। वह दफ़्तर के सामने की ओर चले आए। आते ही जो कुछ उन्होंने देखा वह सहन नहीं कर पाए। शायद यह पहला अवसर था कि वह पीटी प्रीतमचंद की उस बर्बरता को सहन न कर पाए। बहुत उत्तेजित हो गए थे।

-ह्वाट आर यू डूईंग, इज इट दा वे टू पनिश दा स्टूडेंट्स आफ फोर्थ क्लास? स्टाप इट ऐट वन्स।

हमें तब अंग्रेज़ी नहीं आती थी, क्याेंकि उस समय पाँचवीं श्रेणी से अंग्रेज़ी पढ़ानी शुरू की जाती थी। परंतु हमारे स्कूल के सातवीं-आठवीं श्रेणी के लड़कों ने बताया था कि शर्मा जी ने कहा था–क्या करते हैं? क्या चौथी श्रेणी को सजा देने का यह ढंग है? इसे फौरन बंद करो।

शर्मा जी गुस्से से काँपते बरामदे से ही अपने दफ़्तर में चले गए थे।

फिर जब प्रीतमचंद कई दिन स्कूल नहीं आए तो यह बात सभी मास्टरों की ज़ुबान पर थी कि हेडमास्टर शर्मा जी ने उन्हें मुअत्तल13 करके अपनी ओर से आदेश लिखकर, मंजूरी के लिए हमारी रियासत की राजधानी, नाभा भेज दिया है। वहाँ हरजीलाल नाम के ‘महकमाए-तालीम14’ के डायरेक्टर थे जिनसे ऐसे आदेश की मंजूरी आवश्यक थी।

उस दिन के बाद यह पता होते हुए भी कि पीटी प्रीतमचंद को जब तक नाभा से डायरेक्टर ‘बहाल’ नहीं करेंगे तब तक वह स्कूल में कदम नहीं रख सकते, जब भी फ़ारसी की घंटी बजती तो हमारी छाती धक्-धक् करती फटने को आती। परंतु जब तक शर्मा जी स्वयं या मास्टर नौहरिया राम जी कमरे में फ़ारसी पढ़ाने न आ जाते, हमारे चेहरे मुर्झाए रहते।

13. निलंबित 14. शिक्षा विभाग

फिर कई सप्ताह तक पीटी मास्टर स्कूल नहीं आए। पता चला कि बाज़ार में एक दुकान के ऊपर उन्होंने जो छोटी-छोटी खिड़कियों वाला चौबारा किराए पर ले रखा था, वहीं आराम से रह रहे थे। कुछ सातवीं-आठवीं के विद्यार्थी हमें बताया करते कि उन्हें मुअत्तल होने की रत्ती भर भी चिंता नहीं थी। पहले की तरह ही आराम से पिंजरे में रखे दो तोतों को दिन में कई बार, भिगोकर रखे बादामों की गिरियों का छिलका उतारकर उन्हें खिलाते उनसे बातें करते रहते हैं। उनके वे तोते हमने भी कई बार देखे थे। (हम उन बड़े लड़कों के साथ उनके चौबारे में गए थे जो लड़के पीटी साहब के आदेश पर उनके घर का काम करने जाया करते) परंतु हमारे लिए यह चमत्कार ही था कि जो प्रीतमचंद बिल्ला मार-मारकर हमारी चमड़ी तक उधेड़ देते वह अपने तोतों से मीठी-मीठी बातें कैसे कर लेते थे? क्या तोतों को उनकी दहकती, भूरी आँखों से भय न लगता था।

हमारी समझ में ऐसी बातें तब नहीं आ पाती थीं, बस एक तरह इन्हें अलौकिक ही मानते थे।


बोध-प्रश्न

  1. कोई भी भाषा आपसी व्यवहार में बाधा नहीं बनती–पाठ के किस अंश से यह सिद्ध होता है?
  2. पीटी साहब की ‘शाबाश’ फ़ौज के तमगों-सी क्यों लगती थी? स्पष्ट कीजिए।
  3. नयी श्रेणी में जाने और नयी कापियों और पुरानी किताबों से आती विशेष गंध से लेखक का बालमन क्यों उदास हो उठता था?
  4. स्काउट परेड करते समय लेखक अपने को महत्त्वपूर्ण ‘आदमी’ फ़ौजी जवान क्यों समझने लगता था?
  5. हेडमास्टर शर्मा जी ने पीटी साहब को क्यों मुअत्तल कर दिया?
  6. लेखक के अनुसार उन्हें स्कूल खुशी से भागे जाने की जगह न लगने पर भी कब और क्यों उन्हें स्कूल जाना अच्छा लगने लगा?
  7. लेखक अपने छात्र जीवन में स्कूल से छुिट्टयों में मिले काम को पूरा करने के लिए क्या-क्या योजनाएँ बनाया करता था और उसे पूरा न कर पाने की स्थिति में किसकी भाँति ‘बहादुर’ बनने की कल्पना किया करता था?
  8. पाठ में वर्णित घटनाओं के आधार पर पीटी सर की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
  9. विद्यार्थियों को अनुशासन में रखने के लिए पाठ में अपनाई गई युक्तियों और वर्तमान में स्वीकृत मान्यताओं के संबंध में अपने विचार प्रकट कीजिए।
  10. बचपन की यादें मन को गुदगुदाने वाली होती हैं विशेषकर स्कूली दिनों की। अपने अब तक के स्कूली जीवन की खट्टी-मीठी यादों को लिखिए।
  11. प्रायः अभिभावक बच्चों को खेल-कूद में ज़्यादा रुचि लेने पर रोकते हैं और समय बरबाद न करने की नसीहत देते हैं। बताइए-

    (क) खेल आपके लिए क्यों ज़रूरी हैं?

    (ख) आप कौन से ऐसे नियम-कायदों को अपनाएँगे जिससे अभिभावकों को आपके खेल पर आपत्ति न हो?

हरिहर काका




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