यतींद्र मिश्र का जन्म सन् 1977 में अयोध्या ;उत्तर प्रदेशद्ध में हुआ। उन्होंने लखनउफ विश्वविद्यालय, लखनउफ से ¯हदी में एम.ए. किया। वे आजकल स्वतंत्रा लेखन के साथ अ(र्वाष्िार्क सहित पत्रिाका का संपादन कर रहे हैं। सन् 1999 मंे साहित्य और कलाओं के संव(र्न औरअनुशीलन के लिए एक सांस्कृतिक न्यास ‘विमला देवी पफाउंडेशन’ का संचालन भी कर रहे हैं। यतींद्र मिश्र के तीन काव्य - संग्रह प्रकाश्िात हुए हैंμयदा - कदा, अयोध्या तथा अन्य कविताएँ, ड्योढ़ी पर आलाप। इसके अलावा शास्त्राीय गायिका गिरिजा देवी के जीवन और संगीत साध्ना पर एक पुस्तक गिरिजा लिखी। रीतिकाल के अंतिम प्रतिनिध्ि कवि द्विजदेव की ग्रंथावली ;2000द्ध का सह - संपादन किया। वुँफवर नारायण पर वेंफदि्रत दो पुस्तकों के अलावा स्िपक मैके के लिए विरासत - 2001 के कायर्क्रम के लिए रूपंकर कलाओं पर वेंफदि्रत थाती का संपादन भी किया। युवा रचनाकार यतींद्र मिश्र को भारत भूषण अग्रवाल कविता सम्मान, हेमंत स्मृतिकविता पुरस्कार, ट्टतुराज सम्मान आदि कइर् पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। कविता, संगीत व अन्य ललित कलाओं केसाथ - साथ समाज और संस्कृति के विविध् क्षेत्रों में भी उनकी गहरी रुचि है। यतींद्र मिश्र 115 सन् 1916 से 1922 के आसपास की काशी। पंचगंगा घाट स्िथत बालाजी मंदिर की ड्योढ़ी। ड्योढ़ी का नौबतखाना और नौबतखाने से निकलने वाली मंगलध्वनि। अमीरुद्दीन अभी सिप़्ार्फ छः साल का है और बड़ा भाइर् शम्सुद्दीन नौ साल का। अमीरुद्दीन को पता नहीं है कि राग किस चिडि़या को कहते हैं। और ये लोग हैं मामूजान वगैरह जो बात - बात पर भीमपलासी और मुलतानी कहते रहते हैं। क्या वािाब मतलब हो सकता है इन ही महत्ता है इस समय डुमराँव की जिसके कारण शहनाइर् जैसा वाद्य बजता है। पिफर अमीरुद्दीन जो हम सबके पि्रय हैं, अपने उस्ताद बिस्िमल्ला खाँ साहब हैं। उनका जन्म - स्थान भी डुमराँव ही है। इनके परदादा उस्ताद सलार हुसैन खाँ डुमराँव निवासी थे। बिस्िमल्ला खाँ उस्ताद पैगंबरबख्श खाँ और मिऋन के छोटे साहबजादे हैं। अमीरुद्दीन की उम्र अभी 14 साल है। मसलन बिस्िमल्ला खाँ की उम्र अभी 14 साल है। वही काशी है। वही पुराना बालाजी का मंदिर जहाँ बिस्िमल्ला खाँ को नौबतखाने रियाश के लिए जाना पड़ता है। मगर एक रास्ता है बालाजी मंदिर तक जाने का। यह रास्ता रसूलनबाइर् और बतूलनबाइर् के यहाँ से होकर जाता है। इस रास्ते से अमीरुद्दीन को जाना अच्छा लगता है। इस रास्ते न जाने कितने तरह के बोल - बनाव कभी ठुमरी, कभी टप्पे, कभी दादरा के मापर्फत ड्योढ़ी तक पहँुचते रहते हैं। रसूलन और बतूलन जब गाती हंै तब अमीरुद्दीन को खुशी मिलती है। अपने ढेरों साक्षात्कारों में बिस्िमल्ला खाँ साहब ने स्वीकार किया है कि उन्हें अपने जीवन के आरंभ्िाक दिनों में संगीत के प्रति आसक्ित इन्हीं गायिका बहिनों को सुनकर मिली है। एक प्रकार से उनकी अबोध् उम्र में अनुभव की स्लेट पर संगीत प्रेरणा की वणर्माला रसूलनबाइर् और बतूलनबाइर् ने उकेरी है। वैदिक इतिहास में शहनाइर् का कोइर् उल्लेख नहीं मिलता। इसे संगीत शास्त्रांतगर्त ‘सुष्िार - वाद्यों’ में गिना जाता है। अरब देश में पूँफककर बजाए जाने वाले वाद्य जिसमें नाड़ी ;नरकट या रीडद्ध होती है, को ‘नय’ बोलते हैं। शहनाइर् को ‘शाहेनय’ अथार्त् ‘सुष्िार वाद्यों117में शाह’ की उपाध्ि दी गइर् है। सोलहवीं शताब्दी के उत्तरा(र् में तानसेन के द्वारा रची बंदिश,जो संगीत राग कल्पद्रुम से प्राप्त होती है, में शहनाइर्, मुरली, वंशी, शृंगी एवं मुरछंग आदि का वणर्न आया है। अवध्ी पारंपरिक लोकगीतों एवं चैती में शहनाइर् का उल्लेख बार - बार मिलता है। मंगल का परिवेश प्रतिष्िठत करने वाला यह वाद्य इन जगहों पर मांगलिक विध्ि - विधनों के अवसर पर ही प्रयुक्त हुआ है। दक्ष्िाण भारत के मंगल वाद्य ‘नागस्वरम्’ की तरह शहनाइर्, प्रभाती की मंगलध्वनि का संपूरक है। शहनाइर् के इसी मंगलध्वनि के नायक बिस्िमल्ला खाँ साहब अस्सी बरस से सुर माँग रहे हैं। सच्चे सुर की नेमत। अस्सी बरस की पाँचों वक्त वाली नमाश इसी सुर को पाने की प्राथर्ना में खचर् हो जाती है। लाखों सशदे, इसी एक सच्चे सुर की इबादत में खुदा के आगे झुकते हैं। वे नमाश के बाद सशदे में गिड़गिड़ाते हैंμ‘मेरे मालिक एक सुर बख्श दे। सुर में वह तासीर पैदा कर कि आँखों से सच्चे मोती की तरह अनगढ़ आँसू निकल आएँ।’ उनको यकीन है, कभी खुदा यूँ ही उन पर मेहरबान होगा और अपनी झोली से सुर का पफल निकालकर उनकी ओर उछालेगा, पिफर कहेगा, ले जा अमीरुद्दीन इसको खा ले और कर ले अपनी मुराद पूरी। अपने उफहापोहों से बचने के लिए हम स्वयं किसी शरण, किसी गुप़्ाफा को खोजते हैं जहाँ अपनी दु¯श्चताओं, दुबर्लताओं को छोड़ सवेंफ और वहाँ से पिफर अपने लिए एक नया तिलिस्म गढ़ सवेंफ। हिरन अपनी ही महक से परेशान पूरे जंगल में उस वरदान को खोजता है जिसकी गमक उसी में समाइर् है। अस्सी बरस से बिस्िमल्ला खाँ यही सोचते आए हैं कि सातों सुरों को बरतने की तमीश उन्हें सलीके से अभी तक क्यों नहीं आइर्। बिस्िमल्ला खाँ और शहनाइर् के साथ जिस एक मुस्िलम पवर् का नाम जुड़ा हुआ है, वह मुहरर्म है। मुहरर्म का महीना वह होता है जिसमें श्िाया मुसलमान हशरत इमाम हुसैन एवं उनके वुफछ वंशजों के प्रति अशादारी ;शोक मनानाद्ध मनाते हैं। पूरे दस दिनों का शोक। वे बताते हैं कि उनके खानदान का कोइर् व्यक्ित मुहरर्म के दिनों में न तो शहनाइर् बजाता है, न ही किसी संगीत के कायर्क्रम में श्िारकत ही करता है। आठवीं तारीख उनके लिए खासमहत्त्व की है। इस दिन खाँ साहब खड़े होकर शहनाइर् बजाते हैं व दालमंडी में पफातमान के करीब आठ किलोमीटर की दूरी तक पैदल रोते हुए, नौहा बजाते जाते हैं। इस दिन कोइर् राग नहीं बजता। राग - रागिनियों की अदायगी का निषेध् है इस दिन। उनकी आँखें इमाम हुसैन और उनके परिवार के लोगों की शहादत मंे नम रहती हैं। अशादारी होती है। हशारों आँखें नम। हशार बरस की परंपरा पुनजीर्वित। मुहरर्म संपन्न होता है। एक बड़े कलाकार का सहज मानवीय रूप ऐसे अवसर पर आसानी से दिख जाता है। मुहरर्म के गमशदा माहौल से अलग, कभी - कभी सुवूफन के क्षणों में वे अपनी जवानी के दिनों को118 याद करते हैं। वे अपने रियाश को कम, उन दिनों के अपने जुनून को अध्िक याद करते हैं। अपने अब्बाजान और उस्ताद को कम, पक्का महाल की वुफलसुम हलवाइन की कचैड़ी वाली दुकान व गीताबाली और सुलोचना को ज्यादा याद करते हैं। वैफसे सुलोचना उनकी पसंदीदा हीरोइन रही थीं, बड़ी रहस्यमय मुस्कराहट के साथ गालों पर चमक आ जाती है। खाँ साहब की अनुभवी आँखें और जल्दी ही ख्िास्स से हँस देने की इर्श्वरीयकृपा आज भी बदस्तूर कायम है। इसी बालसुलभ हँसी में कइर् यादें बंद हैं। वे जब उनका िाक्र करते हैं तब पिफर उसी नैसगिर्क आनंद में आँखें चमक उठती हैं। अमीरुद्दीन तब सिप़्ार्फ चार साल का रहा होगा। छुपकर नाना को शहनाइर् बजाते हुए सुनता था, रियाश के बाद जब अपनी जगह से उठकर चले जाएँ तब जाकर ढेरों छोटी - बड़ी शहनाइयों की भीड़ से अपने नाना वाली शहनाइर् ढूँढ़ता और एक - एक शहनाइर् को पेंफक कर खारिश करता जाता, सोचताμ‘लगता है मीठी वाली शहनाइर् दादा कहीं और रखते हैं।’ जब मामू अलीबख्श खाँ ;जो उस्ताद भी थेद्ध शहनाइर् बजाते हुए सम पर आएँ, तब ध्ड़ से एक पत्थर शमीन पर मारता था। सम पर आने की तमीश उन्हें बचपन में ही आ गइर् थी, मगर बच्चे को यह नहीं मालूम था कि दाद वाह करके दी जाती है, सिर हिलाकर दी जाती है, पत्थर पटक कर नहीं। और बचपन के समय प्ि़ाफल्मों के बुखार के बारे में तो पूछना ही क्या? उस समय थडर् क्लास के लिए छः पैसे का टिकट मिलता था। अमीरुद्दीन दो पैसे मामू से, दो पैसे मौसी से और दो पैसे नानी से लेता था पिफर घंटों लाइन में लगकर टिकट हासिल करता था। इध्र सुलोचना की नयी प्ि़ाफल्म सिनेमाहाल में आइर् और उध्र अमीरुद्दीन अपनी कमाइर् लेकर चला प्िाफल्म देखने जो बालाजी मंदिर पर रोश शहनाइर् बजाने से उसे मिलती थी। एक़अठन्नी मेहनताना। उस पर यह शौक शबरदस्त कि सुलोचना की कोइर् नयी प्िाफल्म न छूटे़और वुफलसुम की देशी घी वाली दुकान। वहाँ की संगीतमय कचैड़ी। संगीतमय कचैड़ी इस तरह क्यांेकि वुफलसुम जब कलकलाते घी मंे कचैड़ी डालती थी, उस समय छन्न से उठने वाली आवाश में उन्हें सारे आरोह - अवरोह दिख जाते थे। राम जाने, कितनों ने ऐसी कचैड़ी खाइर् हांेगी। मगर इतना तय है कि अपने खाँ साहब रियाशी और स्वादी दोनों रहे हैं और इस बात मेें कोइर् शक नहीं कि दादा की मीठी शहनाइर् उनके हाथ लग चुकी है। काशी में संगीत आयोजन की एक प्राचीन एवं अद्भुत परंपरा है। यह आयोजन पिछले कइर् बरसों से संकटमोचन मंदिर में होता आया है। यह मंदिर शहर के दक्ष्िाण में लंका पर स्िथत है व हनुमान जयंती के अवसर पर यहाँ पाँच दिनों तक शास्त्राीय एवं उपशास्त्राीय गायन - वादन की उत्वृफष्ट सभा होती है। इसमें बिस्िमल्ला खाँ अवश्य रहते हैं। अपने मजहब के प्रति अत्यध्िक समपिर्त उस्ताद बिस्िमल्ला खाँ की श्र(ा काशी विश्वनाथ जी के प्रति भी अपार है। वे जब भी काशी से बाहर रहते हैं तब विश्वनाथ व बालाजी मंदिर की दिशा की ओर मुँह करके बैठते हैं, थोड़ी देर ही सही, मगर उसी ओर शहनाइर् का प्याला घुमा दिया जाता है और भीतर की आस्था रीड के माध्यम से बजती है। खाँ साहब की एक रीड 15 से 20 मिनट के अंदर गीली हो जाती है तब वे दूसरी रीड का इस्तेमाल कर लिया करते हैं। अक्सर कहते हैंμ‘क्या करें मियाँ, इर् काशी छोड़कर कहाँ जाएँं, गंगा मइया यहाँ, बाबा विश्वनाथ यहाँ, बालाजी का मंदिर यहाँ, यहाँ हमारे खानदान की कइर् पुश्तों ने शहनाइर् बजाइर् है, हमारे नाना तो वहीं बालाजी मंदिर में बड़े प्रतिष्िठत शहनाइर्वाश रह चुके हैं। अब हम क्या करें, मरते दम तक न यह शहनाइर् छूटेगी न काशी। जिस शमीन ने हमें तालीम दी, जहाँ से अदब पाइर्, वो कहाँ और मिलेगी? शहनाइर् और काशी से बढ़कर कोइर् जन्नत नहीं इस ध्रती पर हमारे लिए।’काशी संस्कृति की पाठशाला है। शास्त्रों में आनंदकानन के नाम से प्रतिष्िठत। काशी में कलाधर हनुमान व नृत्य - विश्वनाथ हैं। काशी में बिस्िमल्ला खाँ हैं। काशी में हशारों सालों का इतिहास है जिसमें पंडित वंफठे महाराज हैं, विद्याध्री हैं, बड़े रामदास जी हैं, मौजुद्दीन खाँ हैंव इन रसिकों से उपकृत होने वाला अपार जन - समूह है। यह एक अलग काशी है जिसकी अलग तहशीब है, अपनी बोली और अपने विश्िाष्ट लोग हैं। इनके अपने उत्सव हैं, अपना गम। अपना सेहरा - बन्ना और अपना नौहा। आप यहाँ संगीत को भक्ित से, भक्ित को किसी भी ध्मर् के कलाकार से, कजरी को चैती से, विश्वनाथ को विशालाक्षी से, बिस्िमल्ला खाँ को गंगाद्वार से अलग करके नहीं देख सकते। अकसर समारोहों एवं उत्सवों में दुनिया कहती है ये बिस्िमल्ला खाँ हैं। बिस्िमल्ला खाँ का मतलबμबिस्िमल्ला खाँ की शहनाइर्। शहनाइर् का तात्पयर् - बिस्िमल्ला खाँ का हाथ। हाथ से आशय इतना भर कि बिस्िमल्ला खाँ की पूँफक और शहनाइर् की जादुइर् आवाश का असर हमारे सिर चढ़कर बोलने लगता है। शहनाइर् में सरगम भरा है। खाँ साहब को ताल मालूम है, राग मालूम है। ऐसा नहीं कि बेताले जाएँगे। शहनाइर् में सात सुर लेकर निकल पड़े। शहनाइर् में परवरदिगार, गंगा मइया, उस्ताद की नसीहत लेकर उतर पड़े। दुनिया कहतीμसुबहान अल्लाह, तिस पर बिस्िमल्ला खाँ कहते हैंμअलहमदुलिल्लाह। छोटी - छोटी उपज से मिलकर एक बड़ा आकार बनता है। शहनाइर् का करतब शुरू होने लगता है। बिस्िमल्ला खाँ का संसार सुरीला होना शुरू हुआ। पूँफक में अजान की तासीर उतरती चली आइर्। देखते - देखते शहनाइर् डेढ़ सतक के साज से दो सतक का साज बन, साजों की कतार में सरताज हो गइर्। अमीरुद्दीन की शहनाइर् गूँज उठी। उस पफकीर की दुआ लगी जिसने अमीरुद्दीन से कहा थाμफ्बजा, बजा।य् किसी दिन एक श्िाष्या ने डरते - डरते खाँ साहब को टोका, फ्बाबा! आप यह क्या करते हैं, इतनी प्रतिष्ठा है आपकी। अब तो आपको भारतरत्न भी मिल चुका है, यह पफटी तहमद न पहना करें। अच्छा नहीं लगता, जब भी कोइर् आता है आप इसी पफटी तहमद में सबसे मिलते हैं।य् खाँ साहब मुसकराए। लाड़ से भरकर बोले, फ्ध्त्! पगली इर् भारतरत्न हमको शहनइर्या पे मिला है, लुंगिया पे नाहीं। तुम लोगों की तरह बनाव सिंगार देखते रहते, तो उमर ही बीत जाती, हो चुकती शहनाइर्।य् तब क्या खाक रियाश हो पाता। ठीक है बिटिया, आगे से नहीं पहनेंगे, मगर इतना बताए देते हैं कि मालिक से यही दुआ है, फ्पफटा सुर न बख्शें। लुंगिया का क्या है, आज पफटी है, तो कल सी जाएगी।य् सन् 2000 की बात है। पक्का महाल ;काशी विश्वनाथ से लगा हुआ अध्िकतम इलाकाद्ध से मलाइर् बरप़्ाफ बेचने वाले जा चुके हैं। खाँ साहब को इसकी कमी खलती है। अब देशी घी में वह बात कहाँ और कहाँ वह कचैड़ी - जलेबी। खाँ साहब को बड़ी श्िाद्दत से कमी खलती है। अब संगतियों के लिए गायकों के मन में कोइर् आदर नहीं रहा। खाँ साहब अपफसोस जताते हैं। अब घंटों रियाश को कौन पूछता है? हैरान हैं बिस्िमल्ला खाँ। कहाँ वह कजली, चैती और अदब का जमाना? सचमुच हैरान करती है काशीμपक्का महाल से 121 जैसे मलाइर् बरपफ गया, संगीत, साहित्य और अदब़की बहुत सारी परंपराएँ लुप्त हो गईं। एक सच्चे सुर साध्क और सामाजिक की भाँति बिस्िमल्ला खाँ साहब को इन सबकी कमी खलती है। काशी में जिस तरह बाबा विश्वनाथ और बिस्िमला खाँ एक - दूसरे के पूरक रहे हैं, उसी तरह मुहरर्म - ताजिया और होली - अबीर,गुलाल की गंगा - जमुनी संस्कृति भी एक दूसरे के पूरक रहे हैं। अभी जल्दी ही बहुत वुफछ इतिहास बन चुका है। अभी आगे बहुत वुफछ इतिहास बन जाएगा। पिफर भी वुफछ बचा है जो सिपर्फ काशी में है। काशी आज भी संगीत के स्वर पर जगती और उसी की थापों पर सोती़है। काशी में मरण भी मंगल माना गया है। काशी आनंदकानन है। सबसे बड़ी बात है कि काशी के पास उस्ताद बिस्िमल्ला खाँ जैसा लय और सुर की तमीज सिखाने वाला नायाब हीरा रहा है जो हमेशा से दो कौमों को एक होने व आपस में भाइर्चारे के साथ रहने की प्रेरणा देता रहा।भारतरत्न से लेकर इस देश के ढेरों विश्वविद्यालयों की मानद उपाध्ियों से अलंकृत व संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार एवं पद्मविभूषण जैसे सम्मानों से नहीं, बल्िक अपनी अजेय संगीतयात्रा के लिए बिस्िमल्ला खाँ साहब भविष्य में हमेशा संगीत के नायक बने रहेंगे। नब्बे वषर् की भरी - पूरी आयु में 21 अगस्त 2006 को संगीत रसिकों की हादिर्क सभा से विदा हुए खाँ साहब की सबसे बड़ी देन हमें यही है कि पूरे अस्सी बरस उन्होंने संगीत को संपूणर्ता व एकाध्िकार से सीखने की जिजीविषा को अपने भीतर जिंदा रखा। 1.शहनाइर् की दुनिया में डुमराँव को क्यों याद किया जाता है? 2.बिस्िमल्ला खाँ को शहनाइर् की मंगलध्वनि का नायक क्यों कहा गया है? 3.सुष्िार - वाद्यों से क्या अभ्िाप्राय है? शहनाइर् को ‘सुष्िार वाद्यों में शाह’ की उपाध्ि क्यों दी गइर् होगी? 4.आशय स्पष्ट कीजिएμ ;कद्ध ‘पफटा सुर न बख्शें। लुंगिया का क्या है, आज पफटी है, तो कल सी जाएगी।’ ;खद्ध ‘मेरे मालिक सुर बख्श दे। सुर में वह तासीर पैदा कर कि आँखों से सच्चे मोती की तरह अनगढ़ आँसू निकल आएँ।’ 5.काशी में हो रहे कौन - से परिवतर्न बिस्िमल्ला खाँ को व्यथ्िात करते थे? 6.पाठ में आए किन प्रसंगों के आधर पर आप कह सकते हैं किμ ;कद्ध बिस्िमल्ला खाँ मिली - जुली संस्कृति के प्रतीक थे। ;खद्ध वे वास्तविक अथो± में एक सच्चे इनसान थे। 7. बिस्िमल्ला खाँ के जीवन से जुड़ी उन घटनाओं और व्यक्ितयों का उल्लेख करें जिन्होंने उनकी संगीत साधना को समृ( किया? रचना और अभ्िाव्यक्ित 8.बिस्िमल्ला खाँ के व्यक्ितत्व की कौन - कौन सी विशेषताओं ने आपको प्रभावित किया? 9.मुहरर्म से बिस्िमल्ला खाँ के जुड़ाव को अपने शब्दों में लिख्िाए। 10.बिस्िमल्ला खाँ कला के अनन्य उपासक थे, तवर्फ सहित उत्तर दीजिए। भाषाμअध्ययन 11.निम्नलिख्िात मिश्र वाक्यों के उपवाक्य छाँटकर भेद भी लिख्िाएμ ;कद्ध यह शरूर है कि शहनाइर् और डुमराँव एक - दूसरे के लिए उपयोगी हैं। ;खद्ध रीड अंदर से पोली होती है जिसके सहारे शहनाइर् को पूँफका जाता है। ;गद्ध रीड नरकट से बनाइर् जाती है जो डुमराँव में मुख्यतः सोन नदी के किनारों पर पाइर् जाती है। ;घद्ध उनको यकीन है, कभी खुदा यूँ ही उन पर मेहरबान होगा। ;घद्ध हिरन अपनी ही महक से परेशान पूरे जंगल में उस वरदान को खोजता है जिसकी गमक उसी में समाइर् है। ;चद्ध खाँ साहब की सबसे बड़ी देन हमें यही है कि पूरे अस्सी बरस उन्होंने संगीत को संपूणर्ता व एकािाकार से सीखने की जिजीविषा को अपने भीतर जिंदा रखा। 12.निम्नलिख्िात वाक्यों को मिश्रित वाक्यों में बदलिएμ ;कद्ध इसी बालसुलभ हँसी में कइर् यादें बंद हैं। ;खद्ध काशी में संगीत आयोजन की एक प्राचीन एवं अद्भुत परंपरा है। ;गद्ध ध्त्! पगली इर् भारतरत्न हमको शहनइर्या पे मिला है, लुंगिया पे नाहीं। ;घद्ध काशी का नायाब हीरा हमेशा से दो कौमों को एक होकर आपस में भाइर्चारे के साथ रहने की प्रेरणा देता रहा। पाठेतर सवि्रफयता ऽ कल्पना कीजिए कि आपके विद्यालय मंे किसी प्रसि( संगीतकार के शहनाइर् वादन का कायर्क्रम आयोजित किया जा रहा है। इस कायर्क्रम की सूचना देते हुए बुलेटिन बोडर् के लिए नोटिस बनाइए। 123 ऽ आप अपने मनपसंद संगीतकार के बारे में एक अनुच्छेद लिख्िाए। ऽ हमारे साहित्य, कला, संगीत और नृत्य को समृ( करने में काशी ;आज के वाराणसीद्ध के योगदान पर चचार् कीजिए। ऽ काशी का नाम आते ही हमारी आँखों के सामने काशी की बहुत - सी चीशें उभरने लगती हैं, वे कौन - कौन सी हैं? शब्द - संपदा ड्योढ़ी - दहलीश नौबतखाना - प्रवेश द्वार के उफपर मंगल ध्वनि बजाने का स्थान रियाश - अभ्यास मापर्फत़ - द्वाराशृंगी - सींग का बना वाद्ययंत्रा मुरछंग - ्रएक पकार का लोक वाद्ययंत्रा नेमत - इर्श्वर की देन, सुख, ध्न दौलत सशदा - माथा टेकना इबादत - उपासना तासीर - गुण, प्रभाव, असर श्रुति - शब्दध्वनि उफहापोह - उलझन, अनिश्िचतता तिलिस्म - जादू गमक - खुशबू, सुगंध् अशादारी - मातम करना, दुख मनाना बदस्तूर - कायदे से, तरीके से नैसगिर्क - स्वाभाविक, प्रावृफतिक दाद - शाबासी तालीम - श्िाक्षा अदब - कायदा, साहित्य अलहमदुलिल्लाह - तमाम तारीप़्ाफ इर्श्वर के लिए जिजीविषा - जीने की इच्छा श्िारकत - शामिल होना यह भी जानें सम μ ताल का एक अंग, संगीत में वह स्थान जहाँ लय की समाप्ित और ताल का आरंभ होता है। श्रुति μ एक स्वर से दूसरे स्वर पर जाते समय का अत्यंत सूक्ष्म स्वरांश वाद्ययंत्रा μ हमारे देश में वाद्य यंत्रों की मुख्य चार श्रेण्िायाँ मानी जाती हैंμ तत - विततμ तार वाले वाद्यμवीणा, सितार, सारंगी, सरोद सुष्िार μ पूँफक कर बजाए जाने वाले वाद्यμबाँसुरी, शहनाइर्, नागस्वरम्, बीन 125

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