महावीरप्रसाद द्विवेदी का जन्म सन् 1864 में ग्राम दौलतपुर, िाला रायबरेली ;उ.प्र.द्ध में हुआ। परिवार की आथ्िार्क स्िथति अच्छी न होने के कारण स्वूफली श्िाक्षा पूरी कर उन्होंने रेलवे में नौकरी कर ली। बाद में उस नौकरी से इस्तीप़्ाफा देकर सन् 1903 में प्रसि( ¯हदी मासिक पत्रिाका सरस्वती का संपादन शुरू किया और सन् 1920 तक उसके संपादन से जुड़े रहे। सन् 1938 में उनका देहांत हो गया। महावीरप्रसाद द्विवेदी केवल एक व्यक्ित नहीं थे वे एक संस्था थे जिससे परिचित होना ¯हदी साहित्य के गौरवशाली अध्याय से परिचित होना है। वे ¯हदी के पहले व्यवस्िथतसंपादक, भाषावैज्ञानिक, इतिहासकार, पुरातत्ववेत्ता, अथर्शास्त्राी, समाजशास्त्राी, वैज्ञानिक ¯चतन एवं लेखन के स्थापक, समालोचकऔर अनुवादक थे। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैंμरसज्ञ रंजन,महावीरप्रसादसाहित्य - सीकर, साहित्य - संदभर्, अद्भुत आलाप ;निबंध् संग्रहद्ध। संपिाशास्त्रा उनकी अथर्शास्त्रा से संबंध्ित पुस्तक द्विवेदीहै। महिला मोद महिला उपयोगी पुस्तक है तो आध्यात्िमकी दशर्न की। द्विवेदी काव्य माला में उनकी कविताएँ हंै। उनका संपूणर् साहित्य महावीरप्रसाद द्विवेदी रचनावली के पंद्रह खंडों में प्रकाश्िात है। महावीरप्रसाद द्विवेदी के बारे में समझा जाता रहा है कि उन्होंने ¯हदी गद्य की भाषा का परिष्कार किया और लेखकों की सुविध के लिए व्याकरण और वतर्नी के नियम स्िथर किए। कविता की भाषा के रूप में भी ब्रज भाषा के बदले खड़ी बोली को प्रतिष्िठत किया। युग निमार्ता महावीरप्रसाद द्विवेदी ने स्वाध्ीनता की चेतना विकसित करने के लिए स्वदेशी ¯चतन को व्यापक बनाया। उन्होंने सरस्वती के माध्यम से पत्राकारिता का श्रेष्ठ स्वरूप सामने रखा। ¯हदी मंे पहली बार समालोचना को स्थापित करने का श्रेय भी उनको जाता है। उन्होंने भारतीय पुरातत्व एवं इतिहास पर खोजपरक कायर् किए। वुफल मिलाकर उनके कायो± का मूल्यांकन व्यापक ¯हदी नवजागरण के संदभर् में ही संभव है। विद्वता एवं बहुज्ञता के साथ सरसता उनके लेखन की प्रमुख विशेषता है। उनके लेखन में व्यंग्य की छटा देखते ही बनती है। बड़े शोक की बात है, आजकल भी ऐसे लोग विद्यमान हैं जो स्ित्रायों को पढ़ाना उनके और गृह - सुख के नाश का कारण समझते हैं। और, लोग भी ऐसे - वैसे नहीं, सुश्िाक्ष्िात लोगμऐसे लोग जिन्होंने बड़े - बड़े स्वूफलों और शायद काॅलिजों में भी श्िाक्षा पाइर् है, जो धमर्μशास्त्रा औरसंस्कृत के गं्रथ साहित्य से परिचय रखते हैं, और जिनका पेशा वुफश्िाक्ष्िातों को सुश्िाक्ष्िात करना,वुफमागर्गामियों को सुमागर्गामी बनाना और अधामिर्कों को धमर्तत्त्व समझाना है। उनकी दलीलें सुन लीजिएμ 1.पुराने संस्कृत - कवियों के नाटकों में वुफलीन स्ित्रायों से अपढ़ों की भाषा में बातें कराइर् गइर् हैं। इससे प्रमाण्िात है कि इस देश में स्ित्रायों को पढ़ाने की चाल न थी। होती तो इतिहास - पुराणादि में उनको पढ़ाने की नियमब( प्रणाली शरूर लिखी मिलती। 2.स्ित्रायों को पढ़ाने से अनथर् होते हैं। शवुंफतला इतना कम पढ़ी थी कि गँवारों की भाषा में मुश्िकल से एक छोटा - सा श्लोक वह लिख सकी थी। तिस पर भी उसकी इस इतनी कम श्िाक्षा ने भी अनथर् कर डाला। शवुंफतला ने जो कटु वाक्य दुष्यंत को कहे, वह इस पढ़ाइर् का ही दुष्परिणाम था। 3.जिस भाषा में शवुंफतला ने श्लोक रचा था वह अपढ़ों की भाषा थी। अतएव नागरिकों की भाषा की बात तो दूर रही, अपढ़ गँवारों की भी भाषा पढ़ाना स्ित्रायों को बरबाद करना है। इस तरह की दलीलों का सबसे अिाक प्रभावशाली उत्तर उपेक्षा ही है। तथापि हम दो - चार बातें लिखे देते हैं।नाटकों में स्ित्रायों का प्राकृत बोलना उनके अपढ़ होने का प्रमाण नहीं। अिाक से अिाकइतना ही कहा जा सकता है कि वे संस्कृत न बोल सकती थीं। संस्कृत न बोल सकना नअपढ़ होने का सबूत है और न गँवार होने का। अच्छा तो उत्तररामचरित में )ष्िायों कीवेदांतवादिनी पत्िनयाँ कौन - सी भाषा बोलती थीं? उनकी संस्कृत क्या कोइर् गँवारी संस्कृत थी? भवभूति और कालिदास आदि के नाटक जिस शमाने के हैं उस शमाने में श्िाक्ष्िातों का समस्तसमुदाय संस्कृत ही बोलता था, इसका प्रमाण पहले कोइर् दे ले तब प्राकृत बोलने वाली स्ित्रायों को अपढ़ बताने का साहस करे। इसका क्या सबूत कि उस शमाने में बोलचाल की भाषाप्राकृत न थी? सबूत तो प्राकृत के चलन के ही मिलते हैं। प्राकृत यदि उस समय की प्रचलित भाषा न होती तो बौ(ों तथा जैनों के हशारों ग्रंथ उसमें क्यों लिखे जाते, और भगवान शाक्यमुनि तथा उनके चेले प्राकृत ही में क्यों धमोर्पदेश देते? बौ(ों के त्रिापिटक ग्रंथ की रचनाप्राकृत में किए जाने का एकमात्रा कारण यही है कि उस शमाने में प्राकृत ही सवर्साधारण कीभाषा थी। अतएव प्राकृत बोलना और लिखना अपढ़ और अश्िाक्ष्िात होने का चिÉ नहीं। जिनपंडितों ने गाथा - सप्तशती, सेतुबंध - महाकाव्य और वुफमारपालचरित आदि गं्रथ प्राकृत में बनाए हैं, वे यदि अपढ़ और गँवार थे तो ¯हदी के प्रसि( से भी प्रसि( अखबार का संपादक इस शमाने में अपढ़ और गँवार कहा जा सकता हैऋ क्योंकि वह अपने शमाने की प्रचलित भाषामें अखबार लिखता है। ¯हदी, बाँग्ला आदि भाषाएँ आजकल की प्राकृत हैं, शौरसेनी, मागधी,महाराष्ट्री और पाली आदि भाषाएँ उस शमाने की थीं। प्राकृत पढ़कर भी उस शमाने में लोग उसी तरह सभ्य, श्िाक्ष्िात और पंडित हो सकते थे जिस तरह कि ¯हदी, बाँग्ला, मराठी आदिभाषाएँ पढ़कर इस शमाने में हम हो सकते हैं। पिफर प्राकृत बोलना अपढ़ होने का सबूत है, यह बात वैफसे मानी जा सकती है? जिस समय आचायो± ने नाट्यशास्त्रा - संबंधी नियम बनाए थे उस समय सवर्साधारण कीभाषा संस्कृत न थी। चुने हुए लोग ही संस्कृत बोलते या बोल सकते थे। इसी से उन्होंने उनकीभाषा संस्कृत और दूसरे लोगों तथा स्ित्रायों की भाषा प्राकृत रखने का नियम कर दिया। पुराने शमाने में स्ित्रायों के लिए कोइर् विश्वविद्यालय न था। पिफर नियमब( प्रणाली का उल्लेख आदि पुराणों में न मिले तो क्या आश्चयर्। और, उल्लेख उसका कहीं रहा हो, पर नष्ट हो गया हो तो? पुराने शमाने में विमान उड़ते थे। बताइए उनके बनाने की विद्या सिखाने वाला कोइर् शास्त्रा! बड़े - बड़े जहाशों पर सवार होकर लोग द्वीपांतरों को जाते थे। दिखाइए, जहाश बनाने की नियमब( प्रणाली के दशर्क ग्रंथ! पुराणादि में विमानों और जहाशों द्वारा की गइर् यात्राओं के हवाले देखकर उनका अस्ितत्व तो हम बड़े गवर् से स्वीकार करते हैं, परंतु पुराने ग्रंथों में अनेक प्रगल्भ पंडिताओं के नामोल्लेख देखकर भी वुफछ लोग भारत की तत्कालीन स्ित्रायों को मूखर्, अपढ़ और गँवार बताते हैं! इसतवर्फशास्त्राज्ञता और इस न्यायशीलता की बलिहारी! वेदों को प्रायः सभी ¯हदू इर्श्वर - कृत मानते हैं। सो इर्श्वर तो वेद - मंत्रों की रचना अथवा उनका दशर्न विश्ववरा आदि स्ित्रायों से करावे और हम उन्हें ककहरा पढ़ाना भी पाप समझें। शीला और विज्जा आदि कौन थीं? वे स्त्राी थीं या नहीं? बड़े - बड़े पुरुष - कवियों से आदृत हुइर् हैं या नहीं? शाग्र्धर - प(ति में उनकी कविता के नमूने हैं या नहीं? बौ( - गं्रथ त्रिापिटक के अंतगर्त थेरीगाथा में जिन सैकड़ों स्ित्रायों की पद्य - रचना उ(ृत है वे क्या अपढ़ थीं? जिस भारत में वुफमारिकाओं को चित्रा बनाने, नाचने, गाने, बजाने, पूफल चुनने, हार गूँथने, पैर मलने तक की कला सीखने की आज्ञा थी उनको लिखने - पढ़ने की आज्ञा न थी। कौन विज्ञ ऐसी बात मुख से निकालेगा? और, कोइर् निकाले भी तो मानेगा कौन? अत्रिा की पत्नी पत्नी - धमर् पर व्याख्यान देते समय घंटों पांडित्य प्रकट करे, गागीर् बड़े - बड़े ब्रह्मवादियों को हरा दे, मंडन मिश्र की सहधमर्चारिणी शंकराचायर् के छक्के छुड़ा दे! गशब! इससे अिाक भयंकर बात और क्या हो सकेगी! यह सब पापी पढ़ने का अपराध 107 है। न वे पढ़तीं, न वे पूजनीय पुरुषों का मुकाबला करतीं। यह सारा दुराचार स्ित्रायों को पढ़ाने ही का वुफपफल है। समझे। स्ित्रायों के लिए पढ़ना कालवूफट और पुरुषों के लिए पीयूष का घँूट! ऐसी ही दलीलों और दृष्टांतों के आधार पर वुफछ लोग स्ित्रायों को अपढ़ रखकर भारतवषर् का गौरव बढ़ाना चाहते हैं। मान लीजिए कि पुराने शमाने में भारत की एक भी स्त्राी पढ़ी - लिखी न थी। न सही। उस समय स्ित्रायों को पढ़ाने की शरूरत न समझी गइर् होगी। पर अब तो है। अतएव पढ़ाना चाहिए। हमने सैकड़ों पुराने नियमों, आदेशों और प्रणालियों को तोड़ दिया है या नहीं? तो, चलिए, स्ित्रायों को अपढ़ रखने की इस पुरानी चाल को भी तोड़ दें। हमारी प्राथर्ना तो यह है कि स्त्राी - श्िाक्षा के विपक्ष्िायों को क्षणभर के लिए भी इस कल्पना को अपने मन में स्थान न देना चाहिए कि पुराने शमाने में यहाँ की सारी स्ित्रायाँ अपढ़ थीं अथवा उन्हें पढ़ने की आज्ञा न थी। जो लोग पुराणों में पढ़ी - लिखी स्ित्रायों के हवाले माँगते हैं उन्हें श्रीमद्भागवत, दशमस्वंफध,के उत्तरा(र् का त्रोपनवाँ अध्याय पढ़ना चाहिए। उसमें रुक्िमणी - हरण की कथा है। रुक्िमणीने जो एक लंबा - चैड़ा पत्रा एकांत में लिखकर, एक ब्राह्मण के हाथ, श्रीकृष्ण को भेजा थावह तो प्राकृत में न था। उसके प्राकृत में होने का उल्लेख भागवत में तो नहीं। उसमें रुक्िमणी ने जो पांडित्य दिखाया है वह उसके अपढ़ और अल्पज्ञ होने अथवा गँवारपन का सूचक नहीं। पुराने ढंग के पक्के सनातन - धमार्वलंबियांे की दृष्िट में तो नाटकों की अपेक्षा भागवत कामहत्त्व बहुत ही अिाक होना चाहिए। इस दशा में यदि उनमें से कोइर् यह कहे कि सभी प्राक्कालीन स्ित्रायाँ अपढ़ होती थीं तो उसकी बात पर विश्वास करने की शरूरत नहीं। भागवत की बात यदि पुराणकार या कवि की कल्पना मानी जाए तो नाटकों की बात उससे भी गइर् - बीती समझी जानी चाहिए। स्ित्रायों का किया हुआ अनथर् यदि पढ़ाने ही का परिणाम है तो पुरफषों का किया हुआ अनथर् भी उनकी विद्या और श्िाक्षा ही का परिणाम समझना चाहिए। बम के गोले पेंफकना, नरहत्या करना, डाके डालना, चोरियाँ करना, घूस लेनाμये सब यदि पढ़ने - लिखने ही का परिणाम हो तो सारे काॅलिज, स्वूफल और पाठशालाएँ बंद हो जानी चाहिए। परंतु विक्ष्िाप्तों, बातव्यथ्िातों और ग्रहग्रस्तों के सिवा ऐसी दलीलें पेश करने वाले बहुत ही कम मिलेंगे। शवुफंतला ने दुष्यंत को कटु वाक्य कहकर कौन - सी अस्वाभाविकता दिखाइर्? क्या वह यह कहती किμफ्आयर् पुत्रा, शाबाश! बड़ा अच्छा काम किया जो मेरे साथ गांधवर् - विवाह करके मुकर गए। नीति, न्याय, सदाचार और धमर् की आप प्रत्यक्ष मूतिर् हैं!य् पत्नी पर घोर से घोर अत्याचार करके जो उससे ऐसी आशा रखते हैं वे मनुष्य - स्वभाव का ¯कचित् भी ज्ञान नहीं रखते। सीता से अिाक साध्वी स्त्राी नहीं सुनी गइर्। जिस कवि ने, शवुंफतला नाटक में, अपमानित हुइर् शवुंफतला से दुष्यंत के विषय में दुवार्क्य कहाया है उसी ने परित्यक्त होने पर सीता से रामचंद्र के विषय में क्या कहाया है, सुनिएμ वाच्यस्त्वया मद्वचनात् स राजाμवÉौ विशु(ामति यत्समक्षम्। मां लोकवाद श्रवणादहासीः श्रुतस्य त¯त्क्व सदृशं वुफलस्य? लक्ष्मण! शरा उस राजा से कह देना कि मैंने तो तुम्हारी आँख के सामने ही आग में वूफदकर अपनी विशु(ता साबित कर दी थी। तिस पर भी, लोगों के मुख से निकला मिथ्यावाद सुनकर ही तुमने मुझे छोड़ दिया। क्या यह बात तुम्हारे वुफल के अनुरूप है? अथवाक्या यह तुम्हारी विद्वता या महत्ता को शोभा देनेवाली है? सीता का यह संदेश कटु नहीं तो क्या मीठा है? ‘राजा’ मात्रा कहकर उनके पास अपना संदेसा भेजा। यह उक्ित न किसी गँवार स्त्राी कीऋ ¯कतु महाब्रह्मज्ञानी राजा जनक की लड़की और मन्वादि महष्िार्यों के धमर्शास्त्रों का ज्ञान रखने वाली रानी कीμ नृपस्य वणार्श्रमपालनं यत् स एव धमोर् मनुना प्रणीतः सीता की धमर्शास्त्राज्ञता का यह प्रमाण, वहीं, आगे चलकर, वुफछ ही दूर पर, कवि ने दिया है। सीता - परित्याग के कारण वाल्मीकि के समान शांत, नीतिज्ञ और क्षमाशील तपस्वी तक नेμफ्अस्त्येव मन्युभर्रताग्रजे मेय्μकहकर रामचंद्र पर क्रोध प्रकट किया है। अतएव, शवुंफतला की तरह, अपने परित्याग को अन्याय समझने वाली सीता का रामचंद्र के विषय में, कटुवाक्य कहना सवर्था स्वाभाविक है। न यह पढ़ने - लिखने का परिणाम है न गँवारपन का, न अवुफलीनता का। पढ़ने - लिखने में स्वयं कोइर् बात ऐसी नहीं जिससे अनथर् हो सके। अनथर् का बीज उसमें हरगिश नहीं। अनथर् पुरुषों से भी होते हैं। अपढ़ों और पढ़े - लिखांे, दोनों से। अनथर्, दुराचार और पापाचार के कारण और ही होते हैं और वे व्यक्ित - विशेष का चाल - चलन देखकर जाने भी जा सकते हैं। अतएव स्ित्रायों को अवश्य पढ़ाना चाहिए। जो लोग यह कहते हैं कि पुराने शमाने में यहाँ स्ित्रायाँ न पढ़ती थीं अथवा उन्हें पढ़ने की मुमानियत थी वे या तो इतिहास से अभ्िाज्ञता नहीं रखते या जान - बूझकर लोगों को धोखा देते हैं। समाज की दृष्िट में ऐसे लोग दंडनीय हैं। क्योंकि स्ित्रायों को निरक्षर रखने का उपदेश देना समाज का अपकार और अपराध करना हैμसमाज की उन्नति में बाधा डालना है। ‘श्िाक्षा’ बहुत व्यापक शब्द है। उसमें सीखने योग्य अनेक विषयों का समावेश हो सकता है। पढ़ना - लिखना भी उसी के अंतगर्त है। इस देश की वतर्मान श्िाक्षा - प्रणाली अच्छी नहीं। इस कारण यदि कोइर् स्ित्रायों को पढ़ाना अनथर्कारी समझे तो उसे उस प्रणाली का संशोधन 109 करना या कराना चाहिए, खुद पढ़ने - लिखने को दोष न देना चाहिए। लड़कों ही की श्िाक्षा - प्रणाली कौन - सी बड़ी अच्छी है। प्रणाली बुरी होने के कारण क्या किसी ने यह राय दी है कि सारे स्वूफल और काॅलिज बंद कर दिए जाएँ? आप खुशी से लड़कियों और स्ित्रायों की श्िाक्षा की प्रणाली का संशोधन कीजिए। उन्हें क्या पढ़ाना चाहिए, कितना पढ़ाना चाहिए, किस तरह की श्िाक्षा देना चाहिए और कहाँ पर देना चाहिएμघर में या स्वूफल मेंμइन सब बातों पर बहस कीजिए, विचार कीजिए, जी में आवे सो कीजिएऋ पर परमेश्वर के लिए यह न कहिए कि स्वयं पढ़ने - लिखने में कोइर् दोष हैμवह अनथर्कर है, वह अभ्िामान का उत्पादक है, वह गृह - सुख का नाश करने वाला है। ऐसा कहना सोलहों आने मिथ्या है। 1.वुफछ पुरातन पंथी लोग स्ित्रायों की श्िाक्षा के विरोधी थे। द्विवेदी जी ने क्या - क्या तवर्फ देकर स्त्राी - श्िाक्षा का समथर्न किया? 2.‘स्ित्रायों को पढ़ाने से अनथर् होते हैं’μवुफतवर्फवादियों की इस दलील का खंडन द्विवेदी जी ने वैफसे किया है, अपने शब्दों में लिख्िाए। 3.द्विवेदी जी ने स्त्राी - श्िाक्षा विरोधी वुफतको± का खंडन करने के लिए व्यंग्य का सहारा लिया है - जैसे ‘यह सब पापी पढ़ने का अपराध है। न वे पढ़तीं, न वे पूजनीय पुुरफषों का मुकाबला करतीं।’ आप ऐसे अन्य अंशों को निबंध में से छाँटकर समझिए और लिख्िाए। 4.पुराने समय में स्ित्रायों द्वारा प्रावृफत भाषा में बोलना क्या उनके अपढ़ होने का सबूत हैμपाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए। 5.परंपरा के उन्हीं पक्षों को स्वीकार किया जाना चाहिए जो स्त्राी - पुरफष समानता को बढ़ाते हों - तवर्फ सहितउत्तर दीजिए। 6.तब की श्िाक्षा प्रणाली और अब की श्िाक्षा प्रणाली में क्या अंतर है? स्पष्ट करें। रचना और अभ्िाव्यक्ित 7.महावीरप्रसाद द्विवेदी का निबंध उनकी दूरगामी और खुली सोच का परिचायक है, वैफसे? 8.द्विवेदी जी की भाषा - शैली पर एक अनुच्छेद लिख्िाए। भाषा - अध्ययन 9. निम्नलिख्िात अनेकाथीर् शब्दों को ऐसे वाक्यों में प्रयुक्त कीजिए जिनमंे उनके एकाध्िक अथर् स्पष्ट होंμ चाल, दल, पत्रा, हरा, पर, पफल, वुफल पाठेतर सवि्रफयता ऽ अपनी दादी, नानी और माँ से बातचीत कीजिए और ;स्त्राी - श्िाक्षा संबंध्ीद्ध उस समय की स्िथतियों का पता लगाइए और अपनी स्िथतियों से तुलना करते हुए निबंध् लिख्िाए। चाहें तो उसके साथ तसवीरें भी चिपकाइए। ऽ लड़कियों की श्िाक्षा के प्रति परिवार और समाज में जागरूकता आएμइसके लिए आप क्या - क्या करेंगे? ऽ स्त्राी - श्िाक्षा पर एक पोस्टर तैयार कीजिए। ऽ स्त्राी - श्िाक्षा पर एक नुक्कड़ नाटक तैयार कर उसे प्रस्तुत कीजिए। शब्द - संपदा विद्यमान - उपस्िथत वुफमागर्गामी - बुरी राह पर चलने वाले सुमागर्गामी - अच्छी राह पर चलने वाले अधमिर्क - ध्मर् से संबंध् न रखने वाला ध्मर्तत्त्व - ध्मर् का सार दलीलें - तवर्फ अनथर् - बुरा, अथर्हीन अपढ़ों - अनपढ़ों उपेक्षा - ध्यान न देना प्रावृफत - एक प्राचीन भाषा वेदांतवादिनी - वेदांत दशर्न पर बोलने वाली दशर्क गं्रथ - जानकारी देने वाली या दिखाने वाली पुस्तवेंफ तत्कालीन - उस समय का तवर्फशास्त्राज्ञता - तवर्फशास्त्रा को जानना न्यायशीलता - न्याय के अनुसार आचरण करना वुफतवर्फ - अनुचित तवर्फ खंडन - दूसरे के मत का युक्ितपूवर्क निराकरण प्रगल्भ - प्रतिभावान नामोल्लेख - नाम का उल्लेख करना आदृत - आदर या सम्मान पाया, सम्मानित विज्ञ - समझदार, विद्वान ब्रह्मवादी - वेद पढ़ने - पढ़ाने वाला दुराचार - ¯नदनीय आचरण सहध्मर्चारिणी - पत्नी कालवूफट - शहर पीयूष - अमत दृष्टांत - उदाहरण, मिसाल अल्पज्ञ - थोड़ा जानने वाला प्राक्कालीन - पुरानी व्यभ्िाचार - पाप विक्ष्िाप्त - पागल बात व्यथ्िात - बातों से दुखी होने वाले ग्रह ग्रस्त - पाप ग्रह से प्रभावित ¯कचित् - थोड़ा दुर् - ¯नदा करने वाला वाक्य या बातवाक्य परित्यक्त - पूरे तौर पर छोड़ा हुआ मिथ्यावाद - झूठी बात कलंकारोपण - दोष मढ़ना, दोषी ठहराना ृ111 निभर्त्सर्ना - तिरस्कार, ¯नदा नीतिज्ञ - नीति जानने वाला हरगिश - किसी हालत में मुमानियत - रोक, मनाही अभ्िाज्ञता - जानकारी, ज्ञान अपकार - अहित यह भी जानें भवभूति - संस्कृत के प्रधन नाटककार हंै। इनके तीन प्रसि( ग्रंथ वीररचित, उत्तररामचरित और मालतीमाधव हैं। भवभूति करुणरस के प्रमुख लेखक थे। विश्ववरा - अत्रिागोत्रा की स्त्राी। ये )ग्वेद के पाँचवें मंडल 28वें सूक्त की एक में से छठी )व्फ की )ष्िा थीं। शीला - कौरिडन्य मुनि की पत्नी का नाम। थेरीगाथा - बौ( भ्िाक्षुण्िायों की पद्य रचना इसमें संकलित है। अनुसूया - अत्रिा मुनि की पत्नी और दक्ष प्रजापति की कन्या। गागीर् - वैदिक समय की एक पंडिता )ष्िापुत्राी। इनके पिता का नाम गगर् मुनि था। मिथ्िाला के जनकराज की सभा में इन्होंने पंडितों के सामने याज्ञवल्क्य के साथ वेदांत शास्त्रा विषय पर शास्त्राथर् किया था। गाथा सप्तशती - प्राकृत भाषा का ग्रंथ जिसे हाल द्वारा रचित माना जाता है। वुफमारपाल चरित्रा - एक ऐतिहासिक गं्रथ है जिसे 12वीं शताब्दी के अंत में अज्ञातनामा कवि ने अनहल के राजा वुफमारपाल के लिए लिखा था। इसमें ब्रह्मा से लेकर राजा वुफमारपाल तक बौ( राजाओं की वंशावली का वणर्न है। त्रिापिटक ग्रंथ - गौतम बु( ने भ्िाक्षु - भ्िाक्षुण्िायों को अपने सारे उपदेश मौख्िाक दिए थे। उन उपदेशों को उनके श्िाष्यों ने वंफठस्थ कर लिया था और बाद में उन्हें त्रिापिटक के रूप में लेखब( किया गया। वे तीन त्रिापिटक हैंμसुत या सूत्रा पिटक, विनय पिटक और अभ्िाध्मर् पिटक। शाक्य मुनि - शक्यवंशीय होने के कारण गौतम बु( को शाक्य मुनि भी कहा जाता है। नाट्यशास्त्रा - भरतमुनि रचित काव्यशास्त्रा संबंध्ी संस्कृत के इस ग्रंथ मंे मुख्यतः रूपक ;नाटकद्ध का शास्त्राीय विवेचन किया गया है। इसकी रचना 300 इर्सा पूवर् मानी जाती है। कालिदास - संस्कृत के महान कवियों में कालिदास की गणना की जाती है। उन्होंने वुफमारसंभव, रघुवंश ;महाकाव्यद्ध, ट्टतु संहार, मेघदूत ;खंडकाव्यद्ध, विक्रमोवर्शीय, मालविकाग्िनमित्रा और अभ्िाज्ञान शावुंफतलम् ;नाटकद्ध की रचना की। आजादी के आंदोलन से सवि्रफय रूप से जुड़ी पंडिता रमाबाइर् ने स्ित्रायों की श्िाक्षा एवं उनके शोषण के विरु( जो आवाश उठाइर् उसकी एक झलक यहाँ प्रस्तुत है। आप ऐसे अन्य लोगों के योगदान के बारे में पढि़ए और मित्रों से चचार् कीजिएμ 113

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