मन्नू भंडारी का जन्म सन् 1931 में गाँव भानपुरा, िाला मंदसौर ;मध्य प्रदेशद्ध में हुआ परंतु उनकी इंटर तक की श्िाक्षा - दीक्षा हुइर् राजस्थान के अजमेर शहर में। बाद में उन्होंने ¯हदी में एम.ए. किया। दिल्ली के मिरांडा हाउस काॅलिज में अध्यापन कायर् से अवकाश प्राप्ित के बाद आजकल दिल्ली में ही रहकर स्वतंत्रा लेखन कर रही हैं।स्वातंत्रयोत्तर ¯हदी कथा साहित्य की प्रमुख हस्ताक्षर मन्नू भंडारी की प्रमुख रचनाएँ हैंμएक प्लेट सैलाब, मैं हार गइर्, यही सच है, त्रिाशंवुफ ;कहानी - संग्रहद्धऋ आपका बंटी, महाभोज ;उपन्यासद्ध। इसके अलावा उन्होंने प्ि़ाफल्म एवं टेलीविशन धारावाहिकों के लिए पटकथाएँ भी लिखी हैं। उनकी साहित्ियक उपलब्िध्यों के लिए ¯हदी अकादमी के श्िाखर सम्मान सहित उन्हंे अनेक पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं जिनमें भारतीय भाषापरिषद्, कोलकाता, राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, उत्तर प्रदेश ¯हदी संस्थान के पुरस्कार शामिल हैं। मन्नू भंडारी की कहानियाँ हों या उपन्यास उनमें भाषा और श्िाल्प की सादगी तथा प्रामाण्िाक अनुभूति मिलती है। उनकी रचनाओं में स्त्राी - मन से जुड़ी अनुभूतियों की अभ्िाव्यक्ित भी देखी जा सकती है। मन्नू भंडारी 92 जन्मी तो मध्य प्रदेश के भानपुरा गाँव में थी, लेकिन मेरी यादों का सिलसिला शुरू होता है अजमेर के ब्रह्मपुरी मोहल्ले के उस दो - मंिाला मकान से, जिसकी उफपरी मंिाल में पिताजी का साम्राज्य था, जहाँ वे निहायत अव्यवस्िथत ढंग से पैफली - बिखरी पुस्तकों - पत्रिाकाओं और अखबारों के बीच या तो वुफछ पढ़ते रहते थे या पिफर ‘डिक्टेशन’ देते रहते थे। नीचे हम सब भाइर् - बहिनों के साथ रहती थीं हमारी बेपढ़ी - लिखी व्यक्ितत्वविहीन माँ...सवेरे से शाम तक हम सबकी इच्छाओं और पिता जी की आज्ञाओं का पालन करने के लिए सदैव तत्पर। अजमेर से पहले पिता जी इंदौर में थे जहाँ उनकी बड़ी प्रतिष्ठा थी, सम्मान था, नाम था। कांग्रेस के साथ - साथ वे समाज - सुधार के कामों से भी जुड़े हुए थे। श्िाक्षा के वे केवल उपदेश ही नहीं देते थे, बल्िक उन दिनों आठ - आठ, दस - दस विद्याथ्िार्यों को अपने घर रखकर पढ़ाया है जिनमें से कइर् तो बाद में उफँचे - उँफचे ओहदों पर पहुँचे। ये उनकी खुशहाली के दिन थे और उन दिनांे उनकी दरियादिली के चचेर् भी कम नहीं थे। एक ओर वे बेहद कोमल और संवेदनशील व्यक्ित थे तो दूसरी ओर बेहद व्रफोधी और अहंवादी। पर यह सब तो मैंने केवल सुना। देखा, तब तो इन गुणों के भग्नावशेषों को ढोते पिता थे। एक बहुत बड़े आथ्िार्क झटके के कारण वे इंदौर से अजमेर आ गए थे, जहाँ उन्होंने अपने अकेले के बल - बूते और हौसले से अंग्रेशी - ¯हदी शब्दकोश ;विषयवारद्ध के अधूरे काम को आगे बढ़ाना शुरू किया जो अपनी तरह का पहला और अकेला शब्दकोश था। इसने उन्हें यश और प्रतिष्ठा तो बहुत दी, पर अथर् नहीं और शायद गिरती आथ्िार्क स्िथति ने ही उनके व्यक्ितत्व के सारे सकारात्मक पहलुुओं को निचोड़ना शुरू कर दिया। सिवुफड़ती आथ्िार्क स्िथति के कारण और अिाक विस्पफारित उनका अहं उन्हें इस बात तक की अनुमति नहीं देता था कि वे कम - से - कम अपने बच्चों को तो अपनी आथ्िार्क विवशताओं का भागीदार बनाएँ। नवाबी आदतें, अधूरी महत्वाकांक्षाएँ, हमेशा शीषर् पर रहने के बाद हाश्िाए पर सरकते चले जाने की यातना व्रफोध बनकर हमेशा माँ को वँफपाती - थरथराती रहती थीं। अपनों के हाथों विश्वासघात की जाने वैफसी गहरी चोटें होेंगी वे जिन्होंने आँख मूँदकर सबका विश्वास करने वाले पिता को बाद के दिनों में इतना शक्की बना दिया था कि जब - तब हम लोग भी उसकी चपेट में आते ही रहते। पर यह पितृ - गाथा मैं इसलिए नहीं गा रही कि मुझे उनका गौरव - गान करना है, बल्िक मैं तो यह देखना चाहती हूँ कि उनके व्यक्ितत्व की कौन - सी खूबी और खामियाँ मेरे व्यक्ितत्व के ताने - बाने में गुँथी हुइर् हैं या कि अनजाने - अनचाहे किए उनके व्यवहार ने मेरे भीतर किन ग्रंथ्िायों को जन्म दे दिया। मैं काली हूँ। बचपन में दुबली और मरियल भी थी। गोरा रंग पिता जी की कमशोरी थी सो बचपन में मुझसे दो साल बड़ी, खूब गोरी, स्वस्थ और हँसमुख बहिन सुशीला से हर बात में तुलना और पिफर उसकी प्रशंसा ने ही, क्या मेरे भीतर ऐसे गहरे हीन - भाव की ग्रंथ्िा पैदा नहीं कर दी कि नाम, सम्मान और प्रतिष्ठा पाने के बावशूद आज तक मैं उससे उबर नहीं पाइर्? आज भी परिचय करवाते समय जब कोइर् वुफछ विशेषता लगाकर मेरी लेखकीय उपलब्िधयों का िाव्रफ करने लगता है तो मैं संकोच से सिमट ही नहीं जाती बल्िक गड़ने - गड़ने को हो आती हूँ। शायद अचेतन की किसी पतर् के नीचे दबी इसी हीन - भावना के चलते मैं अपनी किसी भी उपलब्िध पर भरोसा नहीं कर पाती...सब वुफछ मुझे तुक्का ही लगता है। पिता जी के जिस शक्की स्वभाव पर मैं कभी भन्ना - भन्ना जाती थी, आज एकाएक अपने खंडित विश्वासों की व्यथा के नीचे मुझे उनके शक्की स्वभाव की झलक ही दिखाइर् देती है...बहुत ‘अपनों’ के हाथों विश्वासघात की गहरी व्यथा से उपजा शक। होश सँभालने के बाद से ही जिन पिता जी से किसी - न - किसी बात पर हमेशा मेरी टक्कर ही चलती रही, वे तो न जाने कितने रूपों में मुझमें हैं...कहीं वुंफठाओं के रूप में, कहीं प्रतििया के रूप में तो कहीं प्रतिच्छाया के रूप में। केवल बाहरी भ्िान्नता के आधार पर अपनी परंपरा और पीढि़यों को नकारने वालों को क्या सचमुच इस बात का बिलवुफल अहसास नहीं होता कि उनका आसन्न अतीत किस कदर उनके भीतर जड़ जमाए बैठा रहता है! समय का प्रवाह भले ही हमें दूसरी दिशाओं में बहाकर ले जाए...स्िथतियों का दबाव भले ही हमारा रूप बदल दे, हमें पूरी तरह उससे मुक्त तो नहीं ही कर सकता! पिता के ठीक विपरीत थीं हमारी बेपढ़ी - लिखी माँ। धरती से वुफछ श्यादा ही धैयर् और सहनशक्ित थी शायद उनमें। पिता जी की हर श्यादती को अपना प्राप्य और बच्चों की हर उचित - अनुचित प़़्ाफरमाइश और िाद को अपना पफजर् समझकर बडे़ सहज भाव से स्वीकार करती थीं वे। उन्होंने ¯शदगी भर अपने लिए वुफछ माँगा नहीं, चाहा नहीं...केवल दिया ही दिया। हम भाइर् - बहिनों का सारा लगाव ;शायद सहानुभूति से उपजाद्ध माँ के साथ था लेकिन निहायत असहाय मजबूरी में लिपटा उनका यह त्याग कभी मेरा आदशर् नहीं बन सका...न उनका त्याग, न उनकी सहिष्णुता। खैर, जो भी हो, अब यह पैतृक - पुराण यहीं समाप्त कर अपने पर लौटती हूँ। मन्नू भंडारी पाँच भाइर् - बहिनों में सबसे छोटी मैं। सबसे बड़ी बहिन की शादी के समय मैं शायद सात साल की थी और उसकी एक धुँधली - सी याद ही मेरे मन में है, लेकिन अपने से दो साल बड़ी बहिन सुशीला और मैंने घर के बड़े से आँगन में बचपन के सारे खेल खेलेμसतोलिया, लँगड़ी - टाँग, पकड़म - पकड़ाइर्, काली - टीलो...तो कमरों में गुंे - गुडि़यों के ब्याह भी रचाए, पास - पड़ोस की सहेलियों के साथ। यों खेलने को हमने भाइयों के साथ गिल्ली - डंडा भी खेला और पतंग उड़ाने, काँच पीसकर माँजा सूतने का काम भी किया, लेकिन उनकी गतिवििायों का दायरा घर के बाहर ही अिाक रहता था और हमारी सीमा थी घर। हाँ, इतना शरूर था कि उस शमाने में घर की दीवारें घर तक ही समाप्त नहीं हो जाती थीं बल्िक पूरे मोहल्ले तक पैफली रहती थीं इसलिए मोहल्ले के किसी भी घर में जाने पर कोइर् पाबंदी नहीं थी, बल्िक वुफछ घर तो परिवार का हिस्सा ही थे। आज तो मुझे बड़ी श्िाद्दत के साथ यहमहसूस होता है कि अपनी ¯शदगी खुद जीने के इस आधुनिक दबाव ने महानगरों के फ्ऱलैट में रहने वालों को हमारे इस परंपरागत ‘पड़ोस - कल्चर’ से विच्िछन्न करके हमें कितना संवुफचित, असहाय और असुरक्ष्िात बना दिया है। मेरी कम - से - कम एक दजर्न आरंभ्िाक कहानियों के पात्रा इसी मोहल्ले के हैं जहाँ मंैने अपनी किशोरावस्था गुशार अपनी युवावस्था 95 का आरंभ किया था। एक - दो को छोड़कर उनमें से कोइर् भी पात्रा मेरे परिवार का नहीं हैै। बस इनको देखते - सुनते, इनके बीच ही मैं बड़ी हुइर् थी लेकिन इनकी छाप मेरे मन पर कितनी गहरी थी, इस बात का अहसास तो मुझे कहानियाँ लिखते समय हुआ। इतने वषो± के अंतराल ने भी उनकी भाव - भंगिमा, भाषा, किसी को भी धुँधला नहीं किया था और बिना किसी विशेष प्रयास के बडे़ सहज भाव से वे उतरते चले गए थे। उसी समय के दा साहब अपने व्यक्ितत्व की अभ्िाव्यक्ित के लिए अनुवूफल परिस्िथतियाँ पाते ही ‘महाभोज’ में इतने वषो± बाद वैफसे एकाएक जीवित हो उठे, यह मेरे अपने लिए भी आश्चयर् का विषय था..एक सुखद आश्चयर् का। उस समय तक हमारे परिवार में लड़की के विवाह के लिए अनिवायर् योग्यता थीμउम्र में सोलह वषर् और श्िाक्षा में मैटिªक। सन्् ’44 में सुशीला ने यह योग्यता प्राप्त की और शादी करके कोलकाता चली गइर्। दोनों बड़े भाइर् भी आगे पढ़ाइर् के लिए बाहर चले गए। इन लोगांे की छत्रा - छाया के हटते ही पहली बार मुझे नए सिरे से अपने वशूद का एहसास हुआ। पिता जी का ध्यान भी पहली बार मुझ पर वेंफदि्रत हुआ। लड़कियों को जिस उम्र में स्वूफली श्िाक्षा के साथ - साथ सुघड़ गृहिणी और वुफशल पाक - शास्त्राी बनाने के नुस्खे जुटाए जाते थे, पिता जी का आग्रह रहता था कि मैं रसोइर् से दूर ही रहूँ। रसोइर् को वे भटियारखाना कहते थे और उनके हिसाब से वहाँ रहना अपनी क्षमता और प्रतिभा को भ‘ी में झोंकना था। घर में आए दिन विभ्िान्न राजनैतिक पाटिर्यों के जमावड़े होते थे और जमकर बहसें होती थीं। बहस करना पिता जी का पि्रय शगल था। चाय - पानी या नाश्ता देने जाती तो पिता जी मुझे भी वहीं बैठने को कहते। वे चाहते थे कि मैं भी वहीं बैठूँ, सुनूँं और जानूँ कि देश में चारों ओर क्या वुफछ हो रहा है। देश में हो भी तो कितना वुफछ रहा था। सन् ’42 के आंदोलन के बाद से तो सारा देश जैसे खौल रहा था, लेकिन विभ्िान्न राजनैतिक पाटिर्यों की नीतियाँ, उनके आपसी विरोध या मतभेदों की तो मुझे दूर - दूर तक कोइर् समझ नहीं थी। हाँ, व्रफांतिकारियों और देशभक्त शहीदों के रोमानी आकषर्ण, उनकी वुफबार्नियों से शरूर मन आव्रफांत रहता था। सो दसवीं कक्षा तक आलम यह था कि बिना किसी खास समझ के घर में होने वाली बहसेें सुनती थी और बिना चुनाव किए, बिना लेखक की अहमियत से परिचित हुए किताबें पढ़ती थी। लेकिन सन्् ’45 में जैसे ही दसवीं पास करके मैं ‘पफस्टर् इयर’ में आइर्, ¯हदी की प्राध्यापिका शीला अग्रवाल से परिचय हुआ। सावित्राी गल्सर् हाइर् स्वूफल...जहाँ मंैने ककहरा सीखा, एक साल पहले ही काॅलिज बना था और वे इसी साल नियुक्त हुइर् थीं, उन्होंने बाकायदा साहित्य की दुनिया मंे प्रवेश करवाया। मात्रा पढ़ने को, चुनाव करके पढ़ने में बदला...खुद चुन - चुनकर किताबें दीं...पढ़ी हुइर् किताबों पर बहसें कीं तो दो साल बीतते - न - बीतते साहित्य की दुनिया शरत् - प्रेमचंद से बढ़कर जैनेंद्र, अज्ञेय, यशपाल, भगवतीचरण वमार् तक पैफल गइर् और पिफर तो पैफलती ही चलीगइर्। उस समय जैनेंद्र जी की छोटे - छोटे सरल - सहज वाक्यों वाली शैली ने बहुत आकृष्ट किया था। ‘सुनीता’ ;उपन्यासद्ध बहुत अच्छा लगा था, अज्ञेय जी का उपन्यास ‘शेखर: एक जीवनी’ पढ़ा शरूर पर उस समय वह मेरी समझ के सीमित दायरे में समा नहीं पाया था। वुफछ सालों बाद ‘नदी के द्वीप’ पढ़ा तो उसने मन को इस कदर बाँधा कि उसी झोंक में शेखर को पिफर से पढ़ गइर्...इस बार वुफछ समझ के साथ। यह शायद मूल्यों के मंथन का युग था...पाप - पुण्य,नैतिक - अनैतिक, सही - गलत की बनी - बनाइर् धारणाओं के आगे प्रश्नचिÉ ही नहीं लग रहे थे, उन्हें ध्वस्त भी किया जा रहा था। इसी संदभर् में जैनेंद्र का ‘त्यागपत्रा’, भगवती बाबू का ‘चित्रालेखा’ पढ़ा और शीला अग्रवाल के साथ लंबी - लंबी बहसें करते हुए उस उम्र में जितना समझ सकती थी, समझा। शीला अग्रवाल ने साहित्य का दायरा ही नहीं बढ़ाया था बल्िक घर की चारदीवारी के बीच बैठकर देश की स्िथतियों को जानने - समझने का जो सिलसिला पिता जी ने शुरू किया था, उन्होंने वहाँ से खींचकर उसे भी स्िथतियों की सिय भागीदारी में बदल दिया। सन्् ’46 - 47 के दिन...वे स्िथतियाँ, उसमें वैसे भी घर में बैठे रहना संभव था भला? प्रभात - पेफरियाँ, हड़तालंे, जुलूस, भाषण हर शहर का चरित्रा था और पूरे दमखम और जोश - खरोश के साथ इन सबसे जुड़ना हर युवा का उन्माद। मैं भी युवा थी और शीला अग्रवाल की जोशीली बातों ने रगों में बहते खून को लावे में बदल दिया था। स्िथति यह हुइर् मन्नू भंडारी कि एक बवंडर शहर मंे मचा हुआ था और एक घर मेें। पिता जी की आशादी की सीमा यहीं तक थी कि उनकी उपस्िथति में घर में आए लोगों के बीच उठूँ - बैठूँ, जानूँ - समझूँ। हाथ उठा - उठाकर नारे लगाती, हड़तालें करवाती, लड़कों के साथ शहर की सड़वेंफ नापती लड़की को अपनी सारी आधुनिकता के बावजूद बदार्श्त करना उनके लिए मुश्िकल हो रहा था तो किसी की दी हुइर् आशादी के दायरे में चलना मेरे लिए। जब रगों में लहू की जगह लावा बहता हो तो सारे निषेध, सारी वजर्नाएँ और सारा भय वैफसे ध्वस्त हो जाता है, यह तभी जाना और अपने व्रफोध से सबको थरथरा देने वाले पिता जी से टक्कर लेने का जो सिलसिला तब शुरू हुआ था, राजेंद्र से शादी की, तब तक वह चलता ही रहा। यश - कामना बल्िक कहूँ कि यश - लिप्सा, पिता जी की सबसे बड़ी दुबर्लता थी और उनके जीवन की धुरी था यह सि(ांत कि व्यक्ित को वुफछ विश्िाष्ट बन कर जीना चाहिए...वुफछ ऐसे काम करने चाहिए कि समाज में उसका नाम हो, सम्मान हो, प्रतिष्ठा हो, वचर्स्व हो। इसके चलते ही मैं दो - एक बार उनके कोप से बच गइर् थी। एक बार काॅलिज से ¯प्रसिपल का पत्रा आया कि पिता जी आकर मिलें और बताएँ कि मेरी गतिवििायों के कारण मेरे ख्िालाप़्ाफ अनुशासनात्मक कारर्वाइर् क्यों न की जाए? पत्रा पढ़ते ही पिता जी आग - बबूला। फ्यह लड़की 97 मुझे कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रखेगी...पता नहीं क्या - क्या सुनना पड़ेगा वहाँ जाकर! चार बच्चे पहले भी पढ़े, किसी ने ये दिन नहीं दिखाया।य् गुस्से से भन्नाते हुए ही वे गए थे। लौटकर क्या कहर बरपा होगा, इसका अनुमान था, सो मैं पड़ोस की एक मित्रा के यहाँ जाकर बैठ गइर्। माँ को कह दिया कि लौटकर बहुत वुफछ गुबार निकल जाए, तब बुलाना। लेकिन जब माँ ने आकर कहा कि वे तो खुश ही हैं, चली चल, तो विश्वास नहीं हुआ। गइर् तो सही, लेकिन डरते - डरते। फ्सारे काॅलिज की लड़कियों पर इतना रौब है तेरा...सारा काॅलिज तुम तीन लड़कियों के इशारे पर चल रहा है? ¯प्रसिपल बहुत परेशान थी और बार - बार आग्रह कर रही थी कि मैं तुझे घर बिठा लूँ, क्योंकि वे लोग किसी तरह डरा - धमकाकर, डाँट - डपटकर लड़कियों को क्लासों में भेजते हैं और अगर तुम लोग एक इशारा कर दो कि क्लास छोड़कर बाहर आ जाओ तो सारी लड़कियाँ निकलकर मैदान में जमा होकर नारे लगाने लगती हैं। तुम लोगों के मारे काॅलिज चलाना मुश्िकल हो गया है उन लोेगों के लिए।य् कहाँ तो जाते समय पिता जी मुँह दिखाने से घबरा रहे थे और कहाँ बड़े गवर् से कहकर आए कि यह तो पूरे देश की पुकार है...इस पर कोइर् वैफसे रोक लगा सकता है भला? बेहद गद्गद स्वर में पिता जी यह सब सुनाते रहे और मैं अवाव्फ। मुझे न अपनी आँखों पर विश्वास हो रहा था, न अपने कानों पर। पर यह हकीकत थी। एक घटना और। आशाद ¯हद प़्ाफौज के मुकदमे का सिलसिला था। सभी काॅलिजों, स्वूफलों, दुकानों के लिए हड़ताल का आह्नान था। जो - जो नहीं कर रहे थे, छात्रों का एक बहुत बड़ा समूह वहाँ जा - जाकर हड़ताल करवा रहा था। शाम को अजमेर का पूरा विद्याथीर् - वगर् चैपड़ ;मुख्य बाशार का चैराहाद्ध पर इकऋा हुआ और पिफर हुइर् भाषणबाशी। इस बीच पिता जी के एक निहायत दकियानूसी मित्रा ने घर आकर अच्छी तरह पिता जी की लू उतारी, फ्अरे उस मन्नू की तो मत मारी गइर् है पर भंडारी जी आपको क्या हुआ? ठीक है, आपने लड़कियों को आशादी दी, पर देखते आप, जाने वैफसे - वैफसे उलटे - सीधे लड़कों के साथ हड़तालें करवाती, हुड़दंग मचाती पिफर रही है वह। हमारे - आपके घरों की लड़कियों को शोभा देता है यह सब? कोइर् मान - मयार्दा, इश्शत - आबरू का खयाल भी रह गया है आपको या नहीं?य् वे तो आग लगाकर चले गए और पिता जी सारे दिन भभकते रहे, फ्बस, अब यही रह गया है कि लोग घर आकर थू - थू करके चले जाएँ। बंद करो अब इस मन्नू का घर से बाहर निकलना।य् इस सबसे बेखबर मैं रात होने पर घर लौटी तो पिता जी के एक बेहद अंतरंग और अभ्िान्न मित्रा ही नहीं, अजमेर के सबसे प्रतिष्िठत और सम्मानित डाॅ. अंबालाल जी बैठे थे। मुझे देखते ही उन्होंने बड़ी गमर्जोशी से स्वागत किया, आओ, आओ मन्नू। मैं तो चैपड़ पर तुम्हारा भाषण सुनते ही सीधा भंडारी जी को बधाइर् देने चला आया। ‘आइर् एम रिअली प्राउड आॅपफ यू’...क्या तुम घर में घुसे रहते हो भंडारी जी...घर से निकला भी करो। ‘यू हैव मिस्ड़98 सम¯थग’, और वे धुआँधार तारीप़्ाफ करने लगेμवे बोलते जा रहे थे और पिता जी के चेहरे का संतोष धीरे - धीरे गवर् में बदलता जा रहा था। भीतर जाने पर माँ ने दोपहर के गुस्से वाली बात बताइर् तो मैंने राहत की साँस ली। आज पीछे मुड़कर देखती हूँ तो इतना तो समझ में आता ही है क्या तो उस समय मेरी उम्र थी और क्या मेरा भाषण रहा होगा! यह तो डाॅक्टर साहब का स्नेह था जो उनके मुँह से प्रशंसा बनकर बह रहा था या यह भी हो सकता है कि आज से पचास साल पहले अजमेर जैसे शहर में चारों ओर से उमड़ती भीड़ के बीच एक लड़की का बिना किसी संकोच और झिझक के यों धुआँधार बोलते चले जाना ही इसके मूल में रहा हो। पर पिता जी! कितनी तरह के अंतविर्रोधों के बीच जीते थे वे! एक ओर ‘विश्िाष्ट’ बनने और बनाने की प्रबल लालसा तो दूसरी ओर अपनी सामाजिक छवि के प्रति भी उतनी ही सजगता। पर क्या यह संभव है? क्या पिता जी को इस बात का बिलवुफल भी अहसास नहीं था कि इन दोनों का तो रास्ता ही टकराहट का है? सन्् ’47 के मइर् महीने में शीला अग्रवाल को काॅलिज वालों ने नोटिस थमा दियाμलड़कियों को भड़काने और काॅलिज का अनुशासन बिगाड़ने के आरोप में। इस बात को लेकर हुड़दंग न मचे, इसलिए जुलाइर् में थडर् इयर की क्लासेश बंद करके हम दो - तीन छात्राओं का प्रवेश निष्िा( कर दिया। हुड़दंग तो बाहर रहकर भी इतना मचाया कि काॅलिज वालों को अगस्त में आख्िार थडर् इयर खोलना पड़ा। जीत की खुशी, पर सामने खड़ी बहुत - बहुत बड़ी चिर प्रतीक्ष्िात खुशी के सामने यह खुशी बिला गइर्। शताब्दी की सबसे बड़ी उपलब्िध...15 अगस्त 19471 लेख्िाका के व्यक्ितत्व पर किन - किन व्यक्ितयों का किस रूप में प्रभाव पड़ा? 2 इस आत्मकथ्य में लेख्िाका के पिता ने रसोइर् को ‘भटियारखाना’ कहकर क्यों संबोिात किया है? 3 वह कौन - सी घटना थी जिसके बारे में सुनने पर लेख्िाका को न अपनी आँखों पर विश्वास हो पाया और न अपने कानों पर? 4 लेख्िाका की अपने पिता से वैचारिक टकराहट को अपने शब्दों में लिख्िाए। 5 इस आत्मकथ्य के आधार पर स्वाधीनता आंदोलन के परिदृश्य का चित्राण करते हुए उसमें मन्नू जी की भूमिका को रेखांकित कीजिए। रचना और अभ्िाव्यक्ित 6.लेख्िाका ने बचपन में अपने भाइयों के साथ गिल्ली डंडा तथा पतंग उड़ाने जैसे खेल भी खेले ¯कतु लड़की होने के कारण उनका दायरा घर की चारदीवारी तक सीमित था। क्या आज भी लड़कियों के लिए स्िथतियाँ ऐसी ही हैं या बदल गइर् हंै, अपने परिवेश के आधार पर लिख्िाए। 7.मनुष्य के जीवन में आस - पड़ोस का बहुत महत्त्व होता है। परंतु महानगरों में रहने वाले लोग प्रायः ‘पड़ोस कल्चर’ से वंचित रह जाते हैं। इस बारे में अपने विचार लिख्िाए। 8.लेख्िाका द्वारा पढ़े गए उपन्यासों की सूची बनाइए और उन उपन्यासों को अपने पुस्तकालय में खोजिए। 9.आप भी अपने दैनिक अनुभवों को डायरी में लिख्िाए। मन्नू भंडारी भाषा - अध्ययन 10.इस आत्मकथ्य में मुहावरों का प्रयोग करके लेख्िाका ने रचना को रोचक बनाया है। रेखांकित मुहावरों को ध्यान में रखकर वुफछ और वाक्य बनाएँμ ;कद्ध इस बीच पिता जी के एक निहायत दकियानूसी मित्रा ने घर आकर अच्छी तरह पिता जी की लू उतारी। ;खद्ध वे तो आग लगाकर चले गए और पिता जी सारे दिन भभकते रहे। ;गद्ध बस अब यही रह गया है कि लोग घर आकर थू - थू करके चले जाएँ। ;घद्ध पत्रा पढ़ते ही पिता जी आग - बबूला। पाठेतर सियता ऽ इस आत्मकथ्य से हमें यह जानकारी मिलती है कि वैफसे लेख्िाका का परिचय साहित्य की अच्छी पुस्तकों से हुआ। आप इस जानकारी का लाभ उठाते हुए अच्छी साहित्ियक पुस्तवेंफ पढ़ने का सिलसिला शुरू कर सकते हैं। कौन जानता है कि आप में से ही कोइर् अच्छा पाठक बनने के 101साथ - साथ अच्छा रचनाकार भी बन जाए। ऽ लेख्िाका के बचपन के खेलों में लँगड़ी टाँग, पकड़म - पकड़ाइर् और काली - टीलो आदि शामिल थे। क्या आप भी यह खेल खेलते हैं। आपके परिवेश में इन खेलों के लिए कौन - से शब्द प्रचलन में हैं। इनके अतिरिक्त आप जो खेल खेलते हैं उन पर चचार् कीजिए। ऽ स्वतंत्राता आंदोलन में महिलाओं की भी सिय भागीदारी रही है। उनके बारे में जानकारी प्राप्त कीजिए और उनमें से किसी एक पर प्रोजेक्ट तैयार कीजिए। शब्द - संपदा अहंवादी - घमंडी भग्नावशेष - खंडहर ;टूटे - पूफटे हिस्सेद्ध विस्पफारित - और अिाक पैफलना ;बढ़ानाद्ध आक्रांत - कष्टग्रस्त निष्िा( - जिस पर रोक लगाइर् गइर् हो वचर्स्व - दबदबा राजेंद्र - यहाँ ¯हदी के प्रमुख कथाकार एवं हंस पत्रिाका के संपादक राजेंद्र यादव के बारे में कहा गया है महाभोज - मन्नू भंडारी का चचिर्त उपन्यास है। दा साहब उसके प्रमुख पात्रा हैं नमूने के तौर पर यहाँ 9 वषीर्य श्िावांक की डायरी का एक पन्ना दिया जा रहा हैμ जानिए लँगड़ी की वुफश्ती वैफसे खेली जाती हैμ

RELOAD if chapter isn't visible.