एकक प्प् सजीव जगत 23 उद्देश्य रंध््रों का निरीक्षण तथा द्विबीजपत्राी और एकबीजपत्राी रंध््रों के मध्य के भेदों का अध्ययन करने के लिए पत्ती की छीलन का अस्थायी आरोप्य ;माउंटद्ध तैयार करना। सि(ांत पादपों में, शरीर ियात्मक प्रियाओं जैसे श्वसन तथा प्रकाश संश्लेषण द्वारा पादप ऊतकों तथा बाह्य वातावरण के मध्य गैसों का विनिमय होता है। यह विनिमय पत्ती में उपस्िथत सूक्ष्मदशीर्य सूक्ष्म छिद्र जिन्हें रंध््र ;स्टोमेटाद्ध कहते हैं, के द्वारा सम्पन्न होता है। रंध््र एक प्रकार का दीघर्वृत्तीय छिद्र होता है जिसके दोनों तरपफ वृक्काकार द्वार - कोश्िाकायें होती हैं। द्वार कोश्िाकाओं में बाहर की ओर पतली तथा भीतर की ओर मोटी भ्िािायाँ होती हैं। जब द्वार कोश्िाकायें स्पफीत होती हैं तब रंध््र खुल जाता है और जब यह ढीले होते हैं तब रंध््र बंद हो जाता है। अलग - अलग पादपों में रंध््रों की संख्या, वितरण तथा इनकी किस्में अलग - अलग होती हैं। एक ही पादप की पत्ती की ऊपरी तथा निचली सतहों पर इन रंध््रों की संख्या तथा वितरण भी अलग - अलग हो सकता है यद्यपि रंध््रों की किस्में किसी विशेष पादप स्पीशीज में एक सी होती हैं। निमग्न जलीय पादपों में रंध््र या तो अनुपस्िथत अथवा अियात्मक होते हैं। इस प्रयोग में हम द्विबीजपत्राी तथा एकबीजपत्राी पादपों की पत्ती की छीलन का अस्थायी माउंट तैयार करेंगे ताकि उनके रंध््रों का निरीक्षण कर सवेंफ। आवश्यक सामग्री द्विबीजपत्राी पादप जैसे पिटूनिया, डाइर्ऐन्थस, सोलेनम तथा एकबीजपत्राी पादप जैसे लिली, मक्का, घास आदि की ताजी तोड़ी गइर् पिायाँ, संयुक्त सूक्ष्मदशीर्, स्लाइड, कवर स्िलप, नीडिल, ब्रश, ब्लाॅ¯टग पेपर का टुकड़ा, तथा एक रेज़्ार ब्लेड। कायर्विध्ि 1ण् द्विबीजपत्राी ;कपबवजद्ध पादप की पत्ती की निचली सतह से छीलन निकालें। यह िया बहुत ही आसानीसे की जा सकती है। पहले पत्ती को मोड़ लें अथवा चीर लें और चिरे हुए स्थान से पतली झिल्लीनुमा पारदशीर्छीलन को निकालें। छीलन रेजर ब्लेड की सहायता से पत्ती की सतह को सावधनीपूवर्क खुरचने से भी प्राप्तकी जा सकती है। 2ण् छीलन को स्लाइड पर एक बूँद जल में रख कर कवर स्िलप से ढक कर आरोप्य ;माउंटद्ध तैयार करें।माउंट को वायु के बुलबुले से बचायें। माउंट के इध्र - उध्र से निकलने वाले अतिरिक्त जल कोब्लाॅ¯टग पेपर से सोख लें। 3ण् संयुक्त सूक्ष्मदशीर् के निम्न आवध्र्न क्षमता वाले लेंस में छीलन को पफोकस करें तथा रंध््रों, द्वारकोश्िाकाओं तथा बाह्य त्वचीय कोश्िाकाओं का निरीक्षण करें। 4ण् बिना स्लाइड को हिलाये डुलाये सूक्ष्मदशीर् के क्षेत्रा में रंध््रों की तथा बाह्य त्वचीय कोश्िाकाओं की संख्याकी गणना करें। 5ण् सूक्ष्मदशीर् के उच्च आवध्र्न क्षमता वाले लेंस की सहायता से द्वार कोश्िाकाओं की अंतवर्स्तुओं कानिरीक्षण एवं पहचान करें। 6ण् स्लाइड को अपने स्थान से हिलायंे डुलायें तथा पिफर से रंध््रों तथा बाह्य त्वचीय कोश्िाकाओं की संख्याकी गणना करें। अपने निरीक्षणों को लिखें। 7ण् सूक्ष्मदशीर् के क्षेत्रा में उपस्िथत रंध््रों तथा बाह्य त्वचीय कोश्िाकाओं की औसतन संख्या का परिकलनकरें। 8ण् रंध््र का आरेख बनाएं तथा इसके भागों के नाम लिखें। 9ण् इसी प्रिया को एकबीजपत्राी पादप से प्राप्त पत्ती की छीलन पर दोहरायें। अपने प्रेक्षणों को लिखें। 10ण् इसी प्रिया का अनुसरण करते हुए अन्य द्विबीजपत्राी तथा एकबीजपत्राी ;उवदवबवजद्ध पादपों के रंध््रों का अध्ययन करें। प्रेक्षण क्रम संनिरीक्षण द्विबीजपत्राी एकबीजपत्राी 1ण् सूक्ष्मदशीर्य क्षेत्रा में रंध््रों की संख्या 2ण् सूक्ष्मदशीर्य क्षेत्रा में बाह्य त्वचीय कोश्िाकाओं की संख्या 3ण् द्वार कोश्िाकाओं का आकार ;सेम के बीज के आकार के अथवा डम्बेल के आकार केद्ध 4ण् प्रत्येक द्वारकोश्िाका में हरितलवकांे की संख्या द्वार - कोश्िाकाएं छिद्र हरित लवक ;ंद्ध ;इद्ध चित्रा 23ण्1रू ;ंद्ध खुला द्विबीजपत्राी रंध््र, ;इद्ध बंद द्विबीजपत्राी रंध््रद्वार कोश्िाकाएं रंध््र परिणाम एवं परिचचार् अपने निरीक्षण के आधर पर द्विबीजपत्राी तथा एकबीजपत्राी रंध््रों के अभ्िालक्षणों की तुलना करें और अपना 24 उद्देश्य प्रकाश संश्लेषण के लिए प्रकाश की आवश्यकता को प्रद£शत करना। सि(ांत प्रकाश संश्लेषण एक ऐसी प्रिया है जिसके द्वारा हरित पादप, काबर्न डाइआॅक्साइड ;ब्व्2द्धए जल, प्रकाशतथा पणर्हरित ;क्लोरोपिफलद्ध जो पिायों में पाया जाता है, का प्रयोग करके काबोर्हाइड्रेट संश्लेष्िात करते हैं। प्रकाश संश्लेषण के लिए ‘प्रकाश’ आवश्यक आवश्यकताओं में से एक है। प्रकाश संश्लेषण के दौरान सौरविकिरण में अंत£वष्ट ऊजार् प्रकाश संश्लेष्िाक वणर्कों द्वारा अवशोष्िात होती है और वह उपयोग करने योग्यरासायनिक ऊजार् में परिव£तत हो जाती है। आवश्यक सामग्री गमले में लगा स्टाचर् रहित पौध ;बालसम, ऐमेरैन्थस, टिकोना अथवा किसी भी प्रकार का पौध जिसमें पतलीशाकीय चैड़ी - चपटी पिायाँ होंद्ध, मोटे काले कागज की स्िट्रप, पेपर क्िलप, ऐल्कोहल, आयोडीन विलयन, एक बीकर ;250 उसद्ध, एक बनर्र ;अथवा स्िप्रट लैम्पद्ध, एक तिपाइर् स्टैण्ड, तार की जाली, एक क्वथन नली, चिमटी, तथा पेट्रीडिश। कायर्विध्ि 1ण् एक स्टाचर् रहित पौध ;उपयुर्क्त सूची सेद्ध लें। मोटे काले कागज का प्रयोग करते हुए तथा कागजक्िलपों की सहायता से पौध्े की अक्षत पत्ती के भाग को चित्रा 24.1 के समान ढक दें। काली स्िट्रपोंतथा क्िलपों की सहायता से उसी पौध्े की कइर् पिायों को आप ढक सकते हैं। 2ण् तैयार किये गये प्रयोग को सूयर् के तेज प्रकाश में लगभग दिन भर रखें। 3ण् एक बीकर में लगभग 150 उस् जल लें और उसे उबालें। 4ण् जिन पिायों पर प्रयोग किया जा रहा है उन पिायों को गमले में लगे पौध्े से तोड़लें और उससे काले कागज की स्िट्रप हटा लें। इन पिायों को वुफछ समय तक उबलते पानी में रखें ताकि वह मुलायम पड़ जायंे। अब पानी को गमर् करना बंद कर दें और बीकर को तिपाइर् स्टैण्ड से उतार लें और पानी को लगभग 60 °ब् तक ठंडा होने दें। 5ण् पिायों को क्वथन नली जिसमें ऐल्कोहल हो स्थानांतरित करें। 6ण् क्वथन नली को ;जिसमें प्रयोगात्मक पिायाँ ऐल्कोहल में होंद्ध ऐसे बीकर में रखंे जिसमें लगभग 60 °ब् पर गमर् पानी हो। इस क्वथन नली को बीकर में तब तकरखंे जब तक पिायाँ रंगहीन न हो जायें। 7ण् एक पैट्रीडिश में वुफछ आयोडीन का विलयन लें। ;ंद्ध 8ण् पिायों को पानी से धेयें और इन्हें एक पैट्रीडिश जिसमें आयोडीन का विलयन हो नीला - काला उसमें डुबोयें। 9ण् लगभग पाँच मिनट के बाद आयोडीन विलयन से पिायाँ बाहर निकाल लें, उन्हेंरंगहीनपानी से धे लें तथा पत्ती के बिना ढके भाग एवं ढके ;काले कागज से ढके भागद्ध भागों के रंगों का निरीक्षण करें ख्चित्रा 24.1;इद्ध,। ;इद्धप्रेक्षण आयोडीन उपचार के पश्चात् पत्ती का ढके भाग का रंग ऋऋऋऋऋऋऋऋ य तथा पत्ती के बिना चित्रा 24ण्1रू ;ंद्ध काले कागज कीढके भाग का रंग ऋऋऋऋऋऋऋऋ हो जाता है। पिðयों से दोनों ओर ढकी पत्ती वाला एक गमले में लगा स्टाचर् - रहित पौधऋ ;इद्ध आयोडीन से उपचार के पश्चात्एक प्रायोगिक पत्ती।परिणाम एवं परिचचार् प्राप्त परिणामों के आधर पर पत्ती के बिना ढके भागों का रंग नीला पड़ जाना तथा काले कागज द्वारा पत्ती के ढके भागों पर नीले रंग का न होना, के कारण बतायंे। सावधनियाँ ऽ ऐल्कोहाॅल अत्यंत ही ज्वलनशील है अतः इसे सीध्े लौ पर गमर् नहीं करना चाहिए। ऽ जब तक पौध पूणर्तः स्टाचर् रहित नहीं होगा संतोषजनक परिणाम प्राप्त नहीं होंगे। ही देना चाहिए। ऽ ऐल्कोहाॅल का क्वथनांक 78 °ब् होता है, परखनली जिसमें ऐल्कोहाॅल और उसमें पिायाँ पड़ी हैंयदि उन्हें सीध्े गमर् किया जाय अथवा उबलते पानी में डुबो दिया जाय तो पिायों के सीध्े संपवर्फ में आये बिना ऐल्कोहाॅल शीघ्रतापूवर्क वाष्िपत हो जायेगा। अतः परखनली जिसमें ऐल्कोहाॅल तथापिायाँ पड़ी हैं उसे जल ऊष्मक ;ूंजमत इंजीद्ध ;एक बीकर जिसमें लगभग 60 °ब् गमर् पानी होद्ध में रखकर गमर् करना अत्यंत ही महत्वपूणर् है। ऽ पत्ती का बिना ढका भाग ;सूयर् के प्रकाश में उद्भासितद्ध आयोडीन से उपचारित करने के पश्चात् नीला पड़ जाता है और ढके भाग में कोइर् परिवतर्न नहीं होता। स्टाचर् का मानक परीक्षण इसका आयोडीन के साथ उपचार है। नीला काला रंग का उभर कर आना स्टाचर् की उपस्िथति की पुष्िट करता है। 25 उद्देश्य प्रकाश संश्लेषण के लिए काबर्न डाइआॅक्साइड आवश्यक है, को प्रद£शत करना। सि(ांत पादप स्वपोषी ;वनजवजतंचीद्ध होते हैं क्योंकि यह प्रकाश संश्लेषण की प्रिया द्वारा अपना भोजन ;काबोर्हाइड्रेटद्ध स्वयं संश्लेष्िात कर लेते हैं। प्रकाश तथा जल के अतिरिक्त इस प्रिया के लिए काबर्न डाइआॅक्साइड ;ब्व्2द्ध भी आवश्यक है। पौध्े वायुमंडल से पिायों में उपस्िथत रंध््रों द्वारा काबर्न डाइआॅक्साइड ग्रहण करते हैं और प्रकाश संश्लेषण के दौरान काबर्न डाइआॅक्साइड अपचित होकर काबोर्हाइड्रेट ;ग्लूकोजद्ध में परिव£तत हो जाती है। यदि इनमें से कोइर् एक भी उपलबध् नहीं है तो प्रकाश संश्लेषण की िया सम्पन्न नहीं होगी। आवश्यक सामग्री एकवषीर्य शाकीय प्रवृफति का स्टाचर्रहित गमले में लगा ऐसा पौध लंे जिसकी पिायाँ लंबी हों ;जैसे टिकोमा, बालसम, ऐमेरैन्थस अथवा साल्िवयाद्ध। दो क्वथन नलियाँ, एक विभक्त कावर्फ, ज्ञव्भ् विलयन ;काॅस्िटक पोटाशद्ध, ऐल्कोहाॅल, आयोडीन विलयन, पेट्रोलियम जैली, बीकर, पेट्रीडिश, चिमटी, एक बनर्र ;अथवा स्िप्रट लैम्पद्ध, एक तिपाइर् स्टैण्ड, तार की जाली, तथा क्लैम्प युक्त प्रयोगशाला स्टैण्ड। कायर्विध्ि 1ण् उपयुर्क्त सूची में दिए गये पादपों में से कोइर् एक स्टाचर्रहित पौध लंे। 2ण् क्वथन नली को ज्ञव्भ् विलयन से उसके पाँचवें भाग तक भर लें। 3ण् क्वथन नली में विभक्त काॅवर्फ द्वारा, जैसा कि चित्रा 25.1 में दिखाया गया है, स्टाचर्रहित पौध्े की एक अक्षत पत्ती का आध भाग प्रविष्ट करें तथा सुनिश्िचत कर लें किपत्ती कहीं से भी विलयन को नहीं स्पशर् करे। 4ण् क्लैम्प की सहायता से नली को स्टैण्ड पर पिफट कर पेट्रोलियम जैली की पतली पतर् के प्रयोग से क्वथन नली को वायुरोिात बनायें। 5ण् प्रयोग को लगभग डेढ़ घंटे तक सूयर् के तेज प्रकाश में रखें। 6ण् लगभग 150 उस् जल को बीकर में लंे और उसे उबाल लंे। 7ण् गमले में लगे जनक पादप से प्रायोगिक पत्ती को अलग कर लें और वुफछ समय तक इसे बीकर के पानी में उबाल लें। अब पानी को उबालना बंद करें और बीकर को तिपाइर् स्टैण्ड से उतार कर पानी को लगभग 60 °ब् तक ठंडा होने के लिए रख दें। 8ण् अन्य क्वथन नली जिसमें ऐल्कोहाॅल हो पत्ती को स्थानांतरित करें। 9ण् क्वथन नली ;जिसमें ऐल्कोहाॅल में डूबी प्रायोगिक पत्ती हैद्ध कोऐसे बीकर में रखें जिसमें गमर् पानी हो। पत्ती भी गमर् हो जायेगी। क्वथन नली को बीकर में तब तक रखंे जब तक वह रंगहीन न हो जाये। 10ण् पैट्रीडिश में वुफछ आयोडीन का विलयन लें। 11ण् पत्ती को पानी से अच्छी तरह धे लें और उसे पैट्रीडिश में रखे आयोडीन विलयन में डुबो दें। 12ण् लगभग 5 मिनट के पश्चात् आयोडीन विलयन से पत्ती को बाहर निकाल लें, उसे पानी से धे लें तथा उसका निरीक्षण करें ख्चित्रा 25.1;इद्ध,। हैऋ तथा पत्ती का वह भाग जो वायु के संपवर्फ में था उस भाग का रंग ऋऋऋऋऋऋऋऋ ऽ प्रयोगात्मक उपकरण वायु रोध्ी होना चाहिए। ऽ ऐल्कोहाॅल अत्यंत ज्वलनशील होता है इस कारण इसे सीध्े लौ पर गमर् नहीं करना चाहिए। ऽ पत्ती का कोइर् भी भाग ज्ञव्भ् विलयन के सम्पवर्फ में नहीं रहना चाहिये। ऽ यदि पादप पूणर्तः स्टाचर् रहित नहीं है तब तक संतोषजनक परिणाम प्राप्त नहीं होंगे। उद्देश्य वायु श्वसन के दौरान काबर्न डाइआॅक्साइड गैस के विमुक्त होने का अध्ययन। सि(ांत श्वसन एक प्रकार की अपचयित प्रिया है जिसमें भोजन का अपचयन होने पर ऊजार् विमुक्त होती है जो विभ्िान्न जीवन संबंध्ी प्रियाओं को सम्पन्न करने में काम आती है। श्वसन दो प्रकार का होता है ;पद्ध वायु श्वसन, जो आॅक्सीजन की उपस्िथति में तथा ;पपद्ध अवायु श्वसन जो आॅक्सीजन की अनुपस्िथति में सम्पन्न होता है। वायु श्वसन में भोजन ;ग्लूकोजद्ध का भंजन होता है परिणामस्वरूप काबर्न डाइआॅक्साइड गैस, जल तथाऊजार्, ऐडेनोसिन ट्राइर्पफाॅस्पेफट ;।ज्च्द्ध के रूप में विमुक्त होती है। अध्िकांश जीव जो हमारे आस - पास रहते हैं वायु श्वसन करते हैं। यीस्ट तथा वुफछ सूक्ष्मजीव और हमारे शरीर की वंफकाल पेश्िायाँ अवायु श्वसन करती हैं। इस प्रयोग में हम दो विध्ियों द्वारा वायु श्वसन के दौरान काबर्न डाइआॅक्साइड के विमुक्त होने का अध्ययन करेंगे। टिप्पणी - काबर्न डाइआॅक्साइड गैस के विमुक्त होने के अध्ययन में दो विध्ियां समझाइर् गइर् हैं। स्वूफल की प्रयोगशाला में उपलब्ध् सुविधओं पर यह निभर्र करता है कि श्िाक्षक विद्या£थयों को इनमें से कौन सी वििा के बारे में बताते हैं। विध्ि 1 आवश्यक सामग्री अंवुफरित चने के लगभग 40 बीज,पोटैश्िायम हाइड्राक्साइड विलयन, पेट्रोलियम जेली, एक शंक्वाकार फ्रलास्क ;10 उस्द्धए एक बीकर ;250 उस्द्ध, एक - छिद्रवाला काॅवर्फ, एक सापफ सुथरी निकास ;झुकी हुइर्द्ध नली, एक छोटी परखनली, धागे का टुकड़ा, तथा एक मापक पैमाना।कायर्विध्ि 1ण् एक शंक्वाकार फ्रलास्क में लगभग 40 अंवुफरित बीज लंे। 2ण् एक परखनली जिसमें पोटैश्िायम हाइड्राक्साइड का विलयन हो उसे धगे की सहायता से शंक्वाकारफ्रलास्क में लटका कर फ्रलास्क के मुँह को काॅवर्फ से बंद कर दंे ;जैसा चित्रा 26.1 में दिखाया गया हैद्ध। 3ण् शंक्वाकार फ्रलास्क के काॅवर्फ में से गुजार कर स्वच्छ निकास नली के एक सिरे को प्रवेश करा दें। निकास नली के दूसरे सिरे को बीकर जिसमें जल भरा हो डुबो दंे ;चित्रा 26.1द्ध। केश्िाका िया ;बंचपससंतल ंबजपवदद्ध के कारण निकास नली का सिरा जो जल में डूबा है उसमें जल का स्तरऊपर उठ जाएगा। नली में जल के स्तर की स्िथति पर निशान लगाएं। यह निकास नली में जल के स्तर की प्राथमिक री¯डग ;ीद्ध है। स्केच पेन की सहायता से निकास नली जल की प्राथमिक स्िथति1पर निशान लगायें। 4ण् पेट्रोलियम जेली की पतली परत लगाते हुए शंक्वाकार फ्रलास्क को वायुरोध्ी बनाएं ताकि अंवुफरित बीजों में से श्वसन के दौरान निकलने वाली गैस रिस - रिस कर बाहर न निकल जाए। 5ण् बिना हिलाए - डुलाए इस उपकरण को तेज सूयर् के प्रकाश में लगभग 45 मिनट तक रख्िाए। 6ण् 45 मिनटों के पश्चात् निकास नली के भीतर जल के स्तर में क्या आप किसी प्रकार का परिवतर्न देखते हैं? क्या यह बढ़ता है? निकास नली में अंतिम जल के स्तर ;ीद्ध को लिखंे ;स्केच पेन की2सहायता से निकास नली पर जल के अंतिम स्तर पर निशान लगाएंद्ध। 7ण् निकास नली पर क्या आपने रेखाएं खींची हैं ताकि उसमें जल के प्रारंभ्िाक और अंतिम स्तरों को नोट किया जा सके। श्िाष्टाचार के नाते, उपयोग में लायी गयी निकास नली को सापफ कर दें। निकास नली ज्ञव्भ् विलयन जलअंवुफरित बीज चित्रा 26ण्1रू शंक्वाकार फ्रलास्क में श्वसन के दौरान काबर्न डाइआॅक्साइड गैस का उत्पादन। प्रेक्षण ऽ प्रयोग के आरंभ तथा अंत में निकास नली के भीतर जल के स्तर की स्िथति को देखंे ;प्रयोग की अविा प्रयोगात्मक उपकरण को सूयर् के प्रकाश में रखने के समय के बराबर हैद्ध। ऽ निकास नली में जल के स्तर में परिवतर्न को नोट करें। परिणाम एवं परिचचार् प्रयोगात्मक परिणामों का विश्लेषण करंे तथा जो परिणाम प्राप्त होते हैं उनके कारण बताइए। सावधनियाँ ऽ सुनिश्िचत कर लें कि प्रयोगात्मक उपकरण वायुरोध्ी होना चाहिए। ऽ पोटैश्िायम हाइड्राक्साइड संक्षारक है अतः इसका प्रयोग सावधनीपूवर्क करना चाहिए। ऽ ऽ विध्ि 2 आवश्यक सामग्री अंवुफरित चने के लगभग 20 बीज, पफीनाॅल रैड सूचक, पेट्रोलियम जेली, थ्िासेल कीप, निकास नली, रबड़ की नली, क्वथन नली, एक परखनली, दो छिद्र वाला रबड़ का काॅवर्फ, एक ¯पच काॅवर्फ तथा क्लैप युक्त प्रयोगशाला स्टैण्ड। कायर्विध्ि 1ण् एक क्वथन नली, जिसमें वुफछ पानी है, में लगभग 20 अंवुफरित बीज डालें। 2ण् इस क्वथन नली के मुख पर दो छिद्र वाला रबड़ का काॅवर्फ पिफट करें। अब पेट्रोलियम जेली की पतली परत का प्रयोग करते हुए संपूणर् प्रयोगात्मक उपकरण को वायुरोध्ी बनाएं ताकि अंवुफरित बीजों द्वारा श्वसन प्रिया के दौरान निकलने वाली गैस रिस कर बाहर न निकल जाए। 3ण् काॅवर्फ पर एक छिद्र में थ्िासेल कीप को पिफट करें ;चित्रा 26.2द्ध। थ्िासेल कीप का निचला सिरा जल में डूबा रहना चाहिए। निकास नली बुलबुले चित्रा 26ण्2रू श्वसन के दौरान काबर्न डाइआॅक्साइड गैस का उत्पन्न होना। 4ण् काॅवर्फ के दूसरे छिद्र में से निकास नली को गुजारें। निकास नली से एक रबड़ की नली को जोड़ दंे, इसे पीछे की ओर मोड़ंे और उसमें ¯पच काॅवफ पिफट कर दंे। क्लैम्प की सहायता से प्रायोगिक स्टैण्ड से क्वथन नली को जोड़ दें जैसा कि चित्रा 26.2 में दिखाया गया है। 5ण् लगभग एक घंटे तक इस प्रायोगिक उपकरण को सूयर् के तेज प्रकाश में रख्िाए। 6ण् परखनली में लगभग 1 उस् जल लें ;1 बूँद जल का आयतन लगभग 0ण्1 उस् होता हैद्ध। इसमें पफीनाॅल रैड सूचक की दो बूँदें मिलाकर हिलाएं और इसका रंग नोट करें। 7ण् रबड़ की नलिका के मुक्त सिरे को परखनली पफीनाॅल रैड सूचक विलयन वाली परखनली में डुबोएं और ¯पच काॅवफ को निकाल दें। 8ण् थ्िासेल कीप से वुफछ उस् जल, क्वथन नली जिसमें अंवुफरित चने के बीज हैं, में डालें। 9ण् पफीनाॅल रैड सूचक विलयन में डूबी हुइर् रबड़ नलिका से निकलने वाले गैस बुलबुलों का निरीक्षण करंे। परखनली को जोर से हिलाएं और सूचक के रंग में होने वाले परिवतर्न को नोट करें। प्रेक्षण प्रयोग के आरंभ में तनु पफीनाॅल रैड सूचक का रंग ऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋ था। लगभग एक घंटे तक क्वथन नली को सूयर् के तेज प्रकाश में रखने के बाद इससे निकलने वाली गैस को सूचक से गुजारने के बाद पफीनाॅल रैड सूचक का रंग बदल कर ऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋ हो जाता है। परिणाम एवं परिचचार् काबर्न डाइआॅक्साइड गैस तथा पफीनाॅल रैड सूचक की परस्पर अभ्िािया के आधर पर परिणाम की गणना करें। सावधनियाँ ऽ अंवुफरित बीजों की पयार्प्त संख्या लंे। ऽ प्रयोगात्मक उपकरण को सूयर् के तेज प्रकाश में रखें। ऽ उपकरण वायुरोध्ी अवश्य होना चाहिए। सभी संध्ियों का निरीक्षण करंे और उन पर पेट्रोलियम जैली लगाएं ताकि उत्पन्न गैस क्वथन नली से बाहर निकल न पाए। 27 उद्देश्य किण्वन के दौरान काबर्न डाइआॅक्साइड के विमुक्त होने का अध्ययन करना। सि(ांत जीवित जीव, कोश्िाकीय श्वसन की प्रिया द्वारा खाद्य पदाथर् से अपनी ऊजार् प्राप्त करते हैं। अध्िकतर जीव वायु श्वसन करते हैं जिसमें आॅक्सीजन की उपस्िथति में ग्लूकोज का काबर्न डाइआॅक्साइड एवं जल में पूणर्तःभंजन हो जाता है और साथ - साथ इस िया में ऊजार् विमुक्त होती है। वुफछ जीव जैसे यीस्ट तथा वुफछ विशेष जीवाणु आॅक्सीजन की अनुपस्िथति में श्वसन कर सकते हैं। यह प्रिया अवायु श्वसन कहलाती है। इस प्रियाके दौरान ग्लूकोज, एथेनाॅल तथा काबर्न डाइआॅक्साइड में परिव£तत हो जाता है और ऊजार् विमुक्त होती है। अवायु श्वसन की यही िया जब वुफछ सूक्ष्मजीवों में होती है तो किण्वन ;मितउमदजंजपवदद्ध कहलाती है। इस प्रयोग में हम किण्वन तथा काबर्न डाइआॅक्साइड गैस के विमुक्त होने की प्रिया का अध्ययन करेंगे। आवश्यक सामग्री किसी पफल का रस ;अथवा शवर्फरा विलयनद्ध, बेकरयीस्ट के दानों का चूणर्, ताजा तैयार किया गया चूने का पानी, पेट्रोलियम जैली, दो परखनलियाँ, एक छिद्र वाला कावर्फ, एक निकास नली, एक ड्रापर, एक बीकर ;250 उस् क्षमता वालाद्ध एवं क्लैम्प युक्त प्रयोगशाला स्टैण्ड। कायर्विध्ि 1ण् एक परखनली को पफल के रस ;अथवा शवर्फरा विलयनद्ध से पूणर्तः भर लें। 2ण् एक अन्य परखनली में बेकरयीस्ट के चूणर् को पानी में घोल लंे। ड्रापर की सहायता से यीस्ट के निलम्बन की लगभग 20 बूँदें ;2 उस्द्ध पफल के रस वाली परखनली में डालें। तरल मिश्रण को सूँघंे और गंध् को नोट करंे। 3ण् पूरी तरह से भरी परखनली के मुख पर काॅवर्फ पिफट करें। काॅवर्फ पिफट करते समय वुफछ पफल का रस उछलकर बाहर आ सकता है। पेट्रोलियम जैली की महीन परत के प्रयोग से परखनली को वायुरोध्ी बनाएं। 4ण् पफल रस से भरी इस परखनली में एक छिद्र वाले काॅवर्फ में से निकास नली को डालंे ;चित्रा 27.1द्ध। 5ण् क्लैम्प की सहायता से परखनली को स्टैण्ड पर पिफट करंे। 6ण् निकास नली के दूसरे सिरे को ताजा तैयार किए चूने के पानी में डुबो दंे जैसा कि चित्रा 27.1 में दिखाया गया है। 7ण् बिना हिलाए डुलाए इस प्रयोग को लगभग 60 मिनटों तक तेज सूयर् के प्रकाश में रखें। 8ण् चूने के पानी में से होकर क्या आप किसी प्रकार के गैस के बुलबुले देखते हैं? क्या चूने का पानी दूध्िया हो जाता है? अपने प्रेक्षणों को लिखें। 9ण् परखनली में पफल के रस के मिश्रण को सूँघंे तथा गंध् को नोट करें। प्रेक्षण प्रयोग के आरंभ में पफल के रस के मिश्रण की गंध् ऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋ है। जबकि प्रयोग की समाप्ित पर ;प्रयोग उपकरण को लगभग 60 मिनटों तक सूयर् के तेज प्रकाश में रखने के बादद्ध यह गंध्ऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋ हो जाती है। प्रयोग के दौरान चूने के पानी में गैस के बुलबुले दिखाइर् पड़ते हैं और चूने का पानी ऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋ हो जाता है। परिणाम एवं परिचचार् सूयर् के तेज प्रकाश में पफल के रस के मिश्रण के गंध् में जो परिवतर्न होता है उसका निरीक्षण करंे। इससे क्या प्रद£शत होता है? प्रयोग के परिणामों का विश्लेषण तथा अवायु श्वसन, एथेनाॅल और काबर्न डाइआॅक्साइड के निमार्ण से संबंध्ित इस प्रयोग पर अपनी टिप्पणी प्रस्तुत करें। सावधनियाँ ऽ अवायु श्वसन की स्िथतियाँ विकसित करने के लिए उपकरण वायुरोध्ी होना चाहिए। ऽ ताजा तैयार किया गया चूने के पानी का ही प्रयोग करें। अनुप्रयोग ऽ किण्वन ;वितउमदजंजपवदद्ध का उद्योग जगत में अत्यध्िक उपयोग होता है। मद्य, डबलरोटी, केक तथा औषध्ि उद्योगों में इस प्रिया का बड़े पैमाने पर प्रयोग होता है। 28 उद्देश्य स्टाचर् घोल पर एमिलेस की िया का अध्ययन करना। सि(ांत मानव पाचन - तंत्रा में आहार नाल और इससे संबंध्ित ग्रंथ्िायाँ शामिल हैं जैसे कि लार - ग्रंथ्िायाँ, जठर - ग्रंथ्िायाँए यवृफतए अग्नाशय और आंत्रा ग्रंथ्िायाँ। ये ग्रंथ्िायाँ विभ्िान्न पाचक एंजाइम स्रावित करती हैं जो भोजन के जटिल अणुओंको सरल अणुओं में जलापघटितकरती हैं। ये सरल अणु रक्त में अवशोष्िातहो जाते हैं। मुख - गुहिका में उपस्िथत लार ग्रंथ्िायों से लार नामक पाचक - रस निकलता है। इसमें लार एमिलेस ;टाइलिन - चजलंसपदद्ध होता जो स्टाचर् पर िया करके इसे सरल शवर्फराओं में बदल देता है। आवश्यक सामग्री 1ः स्टाचर् घोल, 1ः आयोडीन घोल, लार, आसुत जल ;कपेजपससमक ूंजमतद्धए तीन परखनलियाँए परखनली स्टैण्ड, मापक सि¯लडर ;10 उस्द्धए एक ड्रापर, काँच की छड़ए काचित टाइल ;या दो पेट्रीडिशद्ध, एक स्पैचुला ;या चम्मचद्ध और स£जकल रूइर्। कायर्विध्ि 1ण् अपने मुँह को ताजा पानी से प्रक्षालित करें। स्पैचुला या चम्मच लेकर मुख - गुहासे वुफछ लार एकत्रा करें। लार को रूइर् के पफाहेसे छान लें और 1 उस् लार परखनली में लें। इसमें 10 उस् आसुत जल डालें। इस परखनली पर लार - घोल का लेबल लगा दें। इसे परखनली स्टैण्ड में रख दीजिए। 2ण् दो परखनलियों में 2 उस् स्टाचर् घोल ;1ःद्ध लें। परखनलियों पर । और ठ चिित करें। दोनों परखनलियों को परखनली स्टैण्ड में रखें। 3ण् ठ वाली परखनली में 1 उस् तनु लार डालें और अच्छी तरह हिलाएं। । वाली परखनली में कोइर् भी चीज न डालें। 4ण् लगभग पाँच मिनट बाद एक ड्रापर द्वारा । वाली परखनली से पाँच बूँदंे काचित टाइल ;या पेट्रीडिशद्ध पर डालें और दो बूँद 1ः आयोडीन घोल डालें। दोनों को काँच की छड़ से मिलाएं। मिश्रण का रंग देखें और अपने प्रेक्षण नोट करें। मिलाने के बाद काँच की छड़ को धेएं। 5ण् जिस जगह ऊपर वाला मिश्रण ;चरण 4द्ध काचित टाइल ;या अलग पेट्रीडिश मेंद्ध पर रखा है वहाँ से वुफछ दूर, ठ वाली परखनली से पाँच बूँदें लेकर रखें। इस पर 1ः आयोडीन घोल की दो बूँदें डालें। दोनों को काँच की छड़ से मिलाकर इस मिश्रण का रंग देखें और अपने प्रेक्षण को नोट करें। मिलाने के बाद काँच की छड़ को धे लें। 6ण् चरण 4 और 5 को पाँच, दस, पन्द्रह और बीस मिनट बाद दोहराएं। प्रेक्षण परिणाम एवं परिचचार् प्रेक्षणों के आधर पर परखनली । और परखनली ठ घोलों से प्राप्त नतीजों का कारण जानने का प्रयास करें। सावधनियाँ ऽ लार एकत्रिात करने से पहले अपने मुँह का प्रक्षालन करें। ऽ काम में लेने से पहले लार को रूइर् के पफाहे द्वारा छानें। ऽ काम में लाने के बाद हर बार काँच की छड़ को धेएं। 29 उद्देश्य किशमिशों द्वारा अंतःशोष्िात जल की द्रव्यमान प्रतिशतता निकालना। सि(ांत अंतःशोषण ;पउइपइपजपवदद्ध एक विशेष प्रकार का विसरण;कपनििेपवदद्ध है जिसमें अध्िशोषक ;ंकेवतइंदजद्ध और अंतःशोषक ;पउइपइंदजद्ध के बीच जल अणु सांद्रता मंे अंतर के कारण पानी का गमन होता है। अंतःशोषण होने के लिए अध्िशोषक की जरूरत होती है। उदाहरण के लिए, सूखे पौध्े या सूखे बीजों ;अध्िशोषकद्ध को जब पानी में रखा जाता है तब उनका आयतन बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। अंतःशोषण के लिए अध्िशोषक और अंतःशोष्िात द्रव के बीच जल अणु सांद्रता में भ्िान्नता अनिवायर् है। इसके अतिरिक्त किसी भी अध्िशोषक के लिए किसी भी द्रव को अंतःशोष्िात करने के लिए अध्िशोषक और अंतःशोषक के बीच बंध्ुता आवश्यक है। उदाहरण के लिए सूखी लकड़ी के सेलुलोस पदाथर् ;अध्िशोषकद्ध को पानी ;अंतःशोषकद्ध के प्रति कापफी बंध्ुता है। यही कारण है कि जब लकड़ी को पानी में रखा जाता है तो वह पूफल जाती है। अंतःशोषण की दर तापमान में परिवतर्न के साथ बदलती रहती है। इस प्रयोग में हम सूखी किशमिशों पर अंतःशोषण की परिघटना का अध्ययन करेंगे। जल के अणु सूखी किशमिशों में घुस जाने के पफलस्वरूप वे पूफल जाती हैं। किशमिशों ने पानी की जितनी मात्रा अवशोष्िात की है उसका पता सूखी किशमिशों और पूफली हुइर् किशमिशों के द्रव्यमान में अंतर से चल जाता है। जब इसे प्रतिशतता के संदभर् में अभ्िाव्यक्त किया जाता है तो इसको किशमिशों द्वारा अंतःशोष्िात द्रव्यमान प्रतिशतता कहते हैं। अंतःशोि षत जल का दव््रयमान : किशमिशों द्वारा अवशोिषत जल का दव््रयमान किशमिशों का प्रारंि भक द्रव्यमान 100 आवश्यक सामग्री मुट्ठी भर किशमिश, एक बीकर ;50 उस्द्धए तापमापीए बाट पेटी सहित भौतिक तुलाए एक जोड़ी चिमटी ;वितबमचेद्ध और सोख - पत्रा का टुकड़ा। कायर्विध्ि 1ण् लगभग एकसमान साइज की 20 सूखी सापफ किशमिशें छाँटें। 2ण् भौतिक तुला से तौलकर उनका द्रव्यमान ;उद्ध नोट करें।3ण् एक बीकर में पयार्प्त पानी लेकर उसमें किशमिशों को लगभग एक घंटे तक डाले रखें। 4ण् बीकर में पानी का तापमान नोट करें ;फ द्ध। 5ण् एक चिमटी लेकर, पूफली हुइर् किशमिशों को बीकर में से निकालकर उनकी सतह पर चिपके हुए पानी को दूर करने के लिए उन्हें सोख पत्रा पर आराम से लुढ़काएं। 6ण् पूफली हुइर् किशमिशों का अंतिम द्रव्यमान ;उ2द्ध जानने के लिए उन्हें तौलें। 1पे्रक्षण और परिकलन पानी का तापमान, फ त्र ऋऋऋऋऋऋ °ब् त्र ऋऋऋऋऋऋ ज्ञ बीस सूखी किशमिशों का प्रारंभ्िाक द्रव्यमान, उत्र ऋऋऋऋऋऋ ह1 पूफली हुइर् किशमिशों का अंतिम द्रव्यमान, उ2 त्र ऋऋऋऋऋऋ ह किशमिशों द्वारा अवशोष्िात जल का द्रव्यमान ;उ . उ1द्ध त्र ऋऋऋऋऋऋ हण्2अथवाकिशमिशांे द्वारा अवशोि षत जल का दव््रयमान अंतःशोि षत जल का दव््रयमान: 100 किशमिशों का प्रारंि भक द्रव्यमानउ 2 दृ उ1अतं:शोष्िात जल का द्रव्यमान: 100 उ1त्र ऋऋऋऋऋ ण् परिणाम एवं परिचचार् तापमान ऋऋऋऋ ज्ञ पर किशमिशों द्वारा अवशोष्िात जल का द्रव्यमान प्रतिशत ऋऋऋऋ: है। किशमिशों में जल के अंतःशोष्िात होने के कारणों का विश्लेषण करें। सावधनियाँ ऽ इस बात की तसल्ली कर लें कि किशमिशें पानी में पूरी तरह से डूबी रहें। ऽ बीकर में से किशमिशों को केवल तब ही निकालें जब यह तसल्ली हो जाए कि वे पूरी तरह पूफल गइर् हैं। बीकर में चिमटी द्वारा किशमिशें सावधनीपूवर्क निकालें। ध्यान रहे कि चिमटी किशमिशों में न घुस जाए। ऽ किशमिशों को तौलने से पहले उन्हें सोख - पत्रा की सहायता से अच्छी तरह सुखा लें। ऽ ऽ ऽ 30 उद्देश्य पादपों में प्रकाशानुवतर्न एवं गुरुत्वानुवतर्न की परिघटनाओं का अध्ययन करना। सि(ांत पादप और इसके अंग विभ्िान्न पयार्वरणीय उद्दीपनों जैसे प्रकाश, जल, गुरुत्वीय बल, दिन - रात परिवतर्न, वुफछ रसायन आदि के प्रति अनुिया दशार्ते हैं। ये सभी अनुियाएं सामूहिक रूप से पादप - संचलन कहलाती हैं। दो सबसे आम अनुियाएं प्रकाशानुवतर्न ;चीवजवजतवचपेउद्ध और गुरुत्वानुवतर्न ;हमवजतवचपेउद्ध हैं। प्रकाशानुवतर्न का अथर् है ध्ूप के प्रति पादप की अनुिया और गुरुत्वानुवतर्न का अथर् है पादपों की गुरुत्वीय बल के प्रति अनुिया। पादप के तने और वायवीय भाग आमतौर से प्रकाश के स्रोत की ओर बढ़ते हैंऋ इसलिए इन्हें ध्नात्मक ;़अमद्ध प्रकाशानुवतीर् कहा जाता है। इसके उलट जड़ें प्रकाश से दूर ¹)णात्मक ;दृअमद्ध प्रकाशानुवतर्नह् और गुरुत्वीय बल की ओर बढ़ती हैं अतः वे ध्नात्मक;़अमद्ध गुरुत्वानुवतर्न दशार्ती हैं। आवश्यक सामग्री जड़ और पिायों वाले दो कोमल पौध्े जो क्षतिग्रस्त न हों और शाखारहित हों ;जैसे कि मंूग की पौध्द्ध, दो क्वथन नलियाँ, दो क्लैम्प वाले प्रयोगशाला स्टैण्ड, रूइर् और आसंजक टेप। कायर्विध्ि 1ण् दो परखनलियों में दो - तिहाइर् पानी लें। इन नलियों पर । और ठ लेबल लगा दें। 2ण् प्रत्येक परखनली में एक - एक पौध डालें और रूइर् का पफाहा परखनली के मुँह पर इस तरह लगाएंकि जड़ें पानी में डूबी रहें और पिायों सहित तना परखनली से बाहर निकला रहे। 3ण् अलग से और रूइर् तथा आसंजक टेप लेकर दोनों परखनलियों का मुँह इस तरह बंद कर दें कि जब इन्हें उलटा किया जाए तब भी इनका पानी बाहर नहीं टपके। 4ण् नली । को प्रयोगशाला स्टैण्ड में सीध खड़ा करके स्िथर कर दें जैसा कि चित्रा 30ण्1;ंद्ध में दिखाया गया है। दूसरी परखनली ठ को दूसरे प्रयोगशाला स्टैण्ड में उलटा करके स्िथर कर दें जैसा कि चित्रा 30ण्1;इद्ध में दिखाया गया है। यह सुनिश्िचत कर लें कि दूसरी नली से पानी न टपके। 5ण् दोनों स्टैण्डों को ख्िाड़की के पास इस तरह रखें कि दोनों पादपों पर सीध्ी ध्ूप पड़े। सूयर् का सूयर् काप्रकाश प्रकाश चित्रा 30ण्1रू प्रयोग के शुरू के पहले दिन दोनों पौध्े 6ण् दूसरे, तीसरे और चैथे दिन प्रत्येक नली में पौधें का प्रेक्षण करें। अपने प्रेक्षणों को लिख लें। तने और प्राथमिक मूल के बढ़ने की दिशा लिख लें। ध्न ;या )णद्ध प्रकाशानुवतर्न और धन ;या )णद्ध गुरुत्वानुवतर्न लक्षणों को बताएं। सूयर् का प्रकाश चित्रा 30ण्2रू प्रयोग समाप्त होने पर चैथे दिन दोनों पौध्े। प्रेक्षण पहले दिन दूसरे दिन तीसरे दिन चैथे दिन । परखनली में पौधः तना जड़ ठ परखनली में पौध: तना जड़ परिणाम और परिचचार् ऽ प्रयोग द्वारा । और ठ परखनलियों में पौधें के प्रेक्षणों के आधर पर तने और जड़ की अनुियायों का कारण खोजें। सावधनियाँ ऽ कोमल, शाखारहित शाकीय पौध्े चुनें। ऽ यह सुनिश्िचत कर लें कि पौधें की जड़ें पानी में डूबी रहें। उद्देश्य अमीबा या पैरामीश्िायम में द्विविभाजन का और खमीर या हाइड्रा में मुवुफलन का अध्ययन करना। सि(ांत जीवाणु, एककोश्िाक प्रोटोजोआ प्राणी जैसे निम्न जीवों और वुफछ अन्य प्राण्िायों में द्विविभाजन ;इपदंतल पिेेपवदद्ध और मुवुफलन ;इनककपदहद्धअलैंगिक जनन के प्रकार हैं। द्विविभाजन में जनक कोश्िाका असूत्राी विभाजन से दो संतति कोश्िाकाओं में विभाजित हो जाती है और प्रत्येक संतति कोश्िाका बढ़कर प्रौढ़ हो जाती है। वेंफद्रक का विभाजन असूत्राीविभाजन कहलाता है क्योंकि इन कोश्िाकाओं में प्ररूपी सूत्राीविभाजन की अवस्थाएं दिखाइर् नहीं देतीं। मुवुफलन आमतौर पर खमीर और हाइड्रा में होता है। हाइड्रा छोटा - सा अलवणजलीय जीव है जो अपने पाश्वर् भाग से संतान पैदा करता है। खमीर एक - कोश्िाक जीव है जो जनक कोश्िाका से जुड़ी हुइर् कोश्िाकाओं की शृंखला उत्पन्न करता है। आवश्यक सामग्री एक संयुक्त सूक्ष्मदशीर्, अमीबा या पैरामीश्िायम में द्विविभाजन और खमीर या हाइड्रा में मुवुफलन की स्थायी स्लाइडें, तथा द्विविभाजन और मुवुफलन के चाटर्। कायर्विध्ि 1ण् संयुक्त सूक्ष्मदशीर् की उच्च शक्ित के नीचे स्लाइड पफोकस करें। 2ण् द्विविभाजन और मुवुफलन की अवस्थाओं का प्रेक्षण करें ;चित्रा 31.1 और 31.2द्ध। 3ण् द्विविभाजन और मुवुफलन के आरेख बनाएं। संतति कोश्िाकाएं वेंफद्रक जनक कोश्िाका चित्रा 31ण्1रू अमीबा में द्विविभाजन मुवुफल वेंफद्रक चित्रा 31ण्2रूखमीर में मुवुफलन श्िाक्षक के लिए ऽ द्विविभाजन और मुवुफलन की विभ्िान्न अवस्थाओं के बारे में अध्िक ज्ञानवध्र्न के लिए चाटो± को काम में लाएं। ।ण् अमीबा या पैरामीश्िायम में द्विविभाजन पण् अमीबा की रूपरेखा अनियमित होती है और इसमें एक वेंफद्रक होता है। पपण् पैरामीश्िायम भी एककोश्िाक जीव है लेकिन इसका आकार स्लीपर जैसा होता है। पपपण् स्थायी स्लाइड को उच्च शक्ित के नीचे देखते समय द्विविभाजन की विभ्िान्न अवस्थाओं के स्थान निधर्रित करें और निदशर्न करें। ठण्खमीर या हाइड्रा में मुवुफलन पण् खमीर कोश्िाकाएं गोलाकार या अंडाकार होती हैं। पपण् स्थायी स्लाइडों को उच्चशक्ित के नीचे देखते समय मुवुफलन और मुवुफल की शृंखला का स्थान निधर्रित करें। पपपण् हाइड्रा में मुवुफलें जनक जीव के पाश्वर् में दिखाइर् देती हैं। 32 उद्देश्य आलू, पत्थरचट्टðा तथा जलीय पादप में कायिक प्रवध्र्न का अध्ययन करना। सि(ांत यद्यपि अध्िकांश पुष्पीय पादप, पुष्पों के उत्पादन द्वारा लैंगिक प्रजनन करते हैं परंतु वुफछ आवृतबीजी अलैंगिकविध्ियों द्वारा भी प्रजनन करते हैं। ऐसे पादप अपने कायिक भागों जैसे जड़ प्रकन्द, तना तथा पत्ती से अपनी संतति उत्पन्न करते हैं। प्रजनन की यह विध्ि कायिक प्रवध्र्न ;टमहपजंजअपम चतवचंहंजपवदद्ध कहलाती है। पादप जो कायिक प्रवध्र्न प्रद£शत करते हैं उनके सामान्य उदाहरण आलू, पत्थरचट्टðा ;ठतलवचीलससनउद्ध, गुलदाउदी ;ब्ीतलेंदजीमउनउद्ध आदि तथा जलीय पादप जैसे हाइडिªला, इकाॅरनिया, पिस्िचया आदि हैं उद्यान विज्ञानी इस विध्ि का प्रयोग वुफछ विशेष शोभाकारी पादपों जैसे गुड़हल, गुलाब, गुलदाउदी, चमेली आदि के वृफत्रिाम प्रवध्र्न के लिए करते हैं। आवश्यक सामग्री आलू के बड़े साइज के वुफछ पुराने कन्द, पत्थरचट्टðा की वुफछ परिपक्व पिायाँ जिनमें तरुण अपस्थानिक कलिकायें हों, जलीय पादप, इकाॅरनिया अथवा पिस्िचया, उद्यान की मिट्टðी, गोबर की खाद का चूणर् या कम्पोस्ट, मिट्टðी के वुफछ गमले, कांच का एक आयताकार जार, हैंडलेंस ;आवध्र्क लेंसद्ध, चावूफ और एक छोटी खुरपी। कायर्विध्ि 1ण् आलू के कन्द का ध्यानपूवर्क निरीक्षण करंे ¹चित्रा 32.1;ंद्धह्। कन्द की सतह पर कइर् स्थानों पर आप छोटी - छोटी गतर् अथवा आँखें देखेंगे। वास्तव में यह गतर् अथवा आँखें तने की पवर्सन्िध्याँ ही हैं। 2ण् हैंडलेंस की सहायता से इन आँखों का अवलोकन करें। प्रत्येक आँख में आपको एक छोटी अपस्थानिक कलिका ;ंकअमदजपजपवने इनकद्ध दिखाइर् पड़ेगी। 3ण् कन्द की सतह से प्ररोह की उत्पिा का निरीक्षण करें। आलू का एक कन्द जिसमें प्ररोह नहीं है तथा दूसरा कन्द जिसमें प्ररोह है इन दोनों कन्दों का आरेख बनाएं। 4ण् पत्थरचट्टðे की पत्ती के पफलक का विशेषकर पत्ती के किनारों का अवलोकन करें ¹चित्रा 32.1;इद्धह्। 5ण् किनारों के वुफछ खाँचों से छोटे - छोटे पौध्े निकलते दिखाइर् पड़ेंगे। 6ण् पत्थरचट्टðे की पत्ती जिसके किनारों पर छोटे पौध्े लगे हैं उसका आरेख खींचंे। 7ण् ध्यानपूवर्क जलीय पादप का भी अवलोकन करें ¹चित्रा 32.1;बद्धह्। 8ण् नये पादप के निमार्ण तथा दोनों पादपों के जोड़ के स्थान को नोट करंे। जलीय पादप जो तरुण पादपकी उत्पिा का सही चित्राण कर रहा हो उसका आरेख बनाएं। अपस्थानिक कलिकाआँख अंवुफरणशील नेत्रा कलिका ;ंद्ध ;इद्ध जनक पादप नया पादप ;बद्ध चित्रा 32ण्1रू ;ंद्ध आलूऋ ;इद्ध पत्थरचट्टðा तथा ;बद्ध एक जलीय पौध्े में कायिक प्रवध्र्न 33 उद्देश्य पुष्प के भागों तथा लैंगिक प्रजनन में इनकी भूमिका का अध्ययन करना। सि(ांत पुष्प आवृतबीजियों का लैंगिक जनन भाग है। एक प्ररूपी पुष्प के चार भाग होते हैं: बाह्य - दल ;ेमचंसेद्ध, दल ;चमजंसेद्ध, पुंकेसर ;ेजंउमदेद्ध तथा स्त्राीकेसर ;बंतचमसेद्ध। सम्िमलित रूप से बाह्य - दल तथा दल क्रमशः बाह्य दलपुंज ;बंसलगद्ध तथा दलपुंज ;बवतवससंद्ध का निमार्ण करते हैं इसी प्रकार पंुकेसर तथा स्त्राीकेसर या अंडप क्रमशः पुमंग ;ंदकतवमबपनउद्ध तथा जायांग ;हलदवमबपनउद्ध का निमार्ण करते हैं।व£तकाग्र परागकोश बाह्य - दल पुंज तथा दलपुंज पुष्प के सहायक भाग हैं। जबकि पुमंग तथा जायांग जनन भाग कहलाते हैं। पुंकेसर नर जननांग हैं पराग - कण इन्हीं पर बनते हैं तथा स्त्राीकेसर मादा जननांग है जिसके भीतर बीजाण्ड ;वअनसमद्ध रहता है। समस्त पुष्पीय भाग, पुष्पासन जो पुष्प के वृन्त ;चमकपबमसद्ध की चपटी अथवा घुंडी - नुमा संरचना है, उसमें ध्ँसे रहते हैं। पुष्पीय भाग आनुक्रमिक चव्रफ में रहते हैं। बाह्य - दल सबसे बाहरी च्रक रूप में तथा इसके बाद दल, पंुकेसर तथा स्त्राीकेसर चक्र रूप में रहते हैं। पुष्पों में आकार, आवृफति, रंग तथा उनमें उपस्िथत बाह्य दलों की संख्या, दल पंुकेसर और स्त्राीकेशर की संख्या के कारण बहुत अिाक विविध्तता देखी गइर् है।चित्रा 33ण्1रू एक पुष्प की अनुदैध्यर् काट विभ्िान्न प्रकार की वैज्ञानिक शब्दावली पुष्पों की संरचनाओं के वणर्न करने में प्रयोग की जाती है। यहाँ एक लघुसूची के रूप में शब्दावली दी गइर् है। पुष्प का वणर्न करने से पूवर् विद्या£थयों को इन शब्दों की परिभाषाओं को भली प्रकार से समझ लेना चाहिए। आवश्यक सामग्री गुड़हल, ध्तूरा, सरसों, पिटयूनिया अथवा डाइऐन्थस के पुष्प, परागकोश तथा अंडाशय के अनुप्रस्थ काट के चाटर्, स्थायी स्लाइड, विच्छेदन सूक्ष्मदशीर्, बीकर, चिमटी, सूइर्, स्लाइडें, रेजर ब्लेड तथा कवर स्िलप। कायर्विध्ि 1ण् पुष्पों को सूखने से बचाने के लिए, टहनियों को जलयुक्त बीकर में रख्िाए। 2ण् टहनी पर लगे पुष्पों की स्िथति का निरीक्षण करिए। पता लगाइए कि क्या यह कक्षीय अंतस्थ हैऋ एकल अथवा पुष्पविन्यास ;पदसिवतमेबमदबमद्ध है? 3ण् पुष्प के निम्नलिख्िात लक्षणों का अध्ययन करिए और इन लक्षणों को लिख्िाए - ’ पुष्प सवृंतीय ;वृतयुक्तद्ध अथवा अवंृतीय ;बिना वृत केद्ध ’ पूणर्: पुष्प जिसमें बाह्य - दल, दल, पुंकेसर तथा स्त्राीकेसर हों। अपूणर्: पुष्प जिसमें एक अथवा अध्िक पुष्प चक्करों का अभाव हो। ’ एक - ¯लगी: पुष्प जिसमें केवल पंुकेसर अथवा स्त्राीकेसर है। द्वि¯लगी: पुष्प जिसमें पुंकेसर तथा स्त्राीकेसर दोनों उपस्िथत रहें। ’ बाह्यदल ;बाह्यदलपुंजद्ध चित्रा 33ण्2;ंद्ध: यह पुष्प के बाहरी चक्कर का निमार्ण करते हैं। यहआकार में छोटे तथा इनकी पत्ती जैसे हरे रंग की संरचना होती है। वुफछ पुष्पों में बाह्यदल रंगीन होते हैं। बाह्य - दलों की संख्या की गणना करिए, इनके रंग का अवलोकन करिए, यह भी पता लगाइए कि यह बाह्य - दल मुक्त ;बहुबाह्यदलीद्ध अथवा जुड़े हुए ;संयुक्त बाह्यदलीद्ध हैं। ’ दल ;दलपंुजद्ध चित्रा 33ण्2;इद्ध: दलों की संख्या की गणना करिए। उनके रंगों तथा आकार का अवलोकन करिएऋ पता लगाइए कि दल मुक्त ;बहुदलीद्ध अथवा जुड़े हुए ;संयुक्तदलीद्ध हैं। ’ पुंकेसर ;पुमंगद्ध चित्रा 33ण्3;बद्ध: एक पुंकेसर को माउंट करके विच्छेदन सूक्ष्मदशीर् की सहायता से इसके विभ्िान्न भागों जैसे - वृत ;छोटा अथवा लम्बाद्ध जिसे तंतु कहते हैं और सिरे के द्विपालि युक्त परागकोश का अवलोकन करें। ’ स्त्राीकेसर ;जायांगद्ध चित्रा 33ण्3;कद्ध: विच्छेदन सूक्ष्मदशीर् पर स्त्राीकेसर को माउंट करके विच्छेदन सूक्ष्मदशीर् की सहायता से इसके विभ्िान्न भागों जैसे आधर का पूफला भाग ;अंडाश्यद्ध,व£तका तथा ऊपरी चपटा सिरा व£तकाग्र का निरीक्षण करिए। अंडाशय के भीतर चपटी, कोश्िाकीय गद्दी जैसी रचना होती है जिसे बीजांडासन ;चसंबमदजंद्ध कहते हैं। उस पर एक अथवा एक से अध्िक बीजांड ;वअनसमद्ध जुड़े रहते हैं। 4ण् परागकोष की अनुप्रस्थ काट को लंे। सेक्शन को स्लाइड पर रखे पानी की बूँद में माउंट करें। विच्छेदन सूक्ष्मदशीर् की मदद से इसका निरीक्षण करें। स्लाइड पर रखे माउंट में परागकणों का पता लगाएं तथा परागकोष में गुहा जिसे परागपट कहते हैं का अवलोकन करें। 5ण् अंडाश्य की अनुप्रस्थ काट लें। स्लाइड पर रखे पानी की बूँद में इस काट को माउंट करंे विच्छेदन सूक्ष्मदशीर् की सहायता से इसका निरीक्षण करंे। अंडाश्य के कक्षों ;कोष्ठकों/ सवबनसमेद्ध तथा बीजाण्डों का पता लगाएं। 6ण् बाह्यदल, दल, पंुकेसर तथा स्त्राीकेसर दशार्ते हुए एक पुष्प का आरेख बनाएं। ;ंद्ध ;इद्ध ;बद्ध ;कद्ध चित्रा 33ण्2रू ;ंद्ध बाह्य दल ;बाह्यदलपुंजद्धऋ ;इद्ध दल ;दलपुंजद्धऋ ;बद्ध पंुकेसर ;पुमंगद्ध तथा ;कद्ध स्त्राीकेसर ;जायांगद्ध। 7ण् पुंकेसर तथा अंडाश्य के अनुप्रस्थ काटांे की स्थायी स्लाइडों का निरीक्षण करंे। जो चाटर् आपको दिया गया है उसकी सहायता से विभ्िान्न भागों की पहचान करंे और अपनी नोट बुक में इनके आरेखों को बनाएं। प्रेक्षण सारणी 1 पुष्प एकल अथवा पुष्प विन्यास कक्षीय अथवा अंतस्थ सवृंतीय अथवा अवृंतीय पूणर् अथवा अपूणर् निरीक्षण एक¯लगी अथवा द्वि¯लगी सारणी 2 बाह्यदल दल पुंकेसर स्त्राीकेसर संख्या रंग मुक्त/संयुक्त ऽ ऽ ऽ ऽ

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