अध्याय 16 प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन क्षा 9 में हमने प्राकृतिक संसाधनों जैसे कि मृदा, वायु एवं जल के बारे में पढ़ा तथाकयह भी जाना कि विभ्िान्न संघटकों का प्रकृति में बार - बार चक्रण किस प्रकार होता है? पिछले अध्याय में हमने यह भी पढ़ा कि हमारे ियाकलापों से इन संसाधनों का प्रदूषण हो रहा है। इस अध्याय में हम कुछ संसाधनों के बारे में जानेंगे तथा यह भी जानेंगे कि हम किस प्रकार उनका उपयोग कर रहे हैं? हो सकता है हम यह भी सोचें कि हमें अपने संसाधनों का उपयोग इस प्रकार करना चाहिए जिससे संसाधनों का संपोषण हो सके और हम अपने पयार्वरण का संरक्षण भी कर सकें। हम वन, वन्य जीवन, जल, कोयला तथापेट्रोलियम जैसे प्राकृतिक संसाधनों की चचार् करेंगे तथा उन समस्याओं पर भी विचार करेंगे कि संपोष्िात विकास हेतु इन संसाधनों का प्रबंधन किस प्रकार किया जाए? हम अक्सर ही पयार्वरणीय समस्याओं के बारे में सुनते या पढ़ते हैं। यह अिाकतर वैश्िवक समस्याएँ हैं तथा इनके समाधान अथवा परिवतर्न में हम अपने आपको असहाय पाते हैं। इनके लिए अनेेक अंतरार्ष्ट्रीय कानून एवं विनियमन हैं तथा हमारे देश में भी पयार्वरण संरक्षण हेतु अनेक कानून हैं। अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरार्ष्ट्रीय संगठन भी पयार्वरण संरक्षण हेतु कायर् कर रहे हैं। ियाकलाप 16.1 ऽ काबर्न डाइआॅक्साइड के उत्सजर्न के विनियमन के लिए अंतरार्ष्ट्रीय मानक का पता लगाइए। ऽ इस विषय पर कक्षा में चचार् कीजिए कि हम इन मानकों को प्राप्त करने हेतु किस प्रकार सहयोग कर सकते हैं? ियाकलाप 16.2 ऽ ऐसे अनेक संगठन हैं जो पयार्वरण के प्रति जागरूकता पैफलाने में लगे हैं। वे ऐसेियाकलापों का भी प्रोत्साहन करते हैं जिससे हमारे पयार्वरण एवं प्राकृतिक संरक्षण को बढ़ावा मिलता है। अपने आसपास के क्षेत्रा/शहर/कस्बे/गाँव में कायर् करने वाले संगठनों के बारे में जानकारी प्राप्त कीजिए। ऽ पता लगाइए कि इस उद्देश्य की प्राप्ित के लिए आप क्या योगदान दे सकते हैं। संसाधनों के अविवेकपूणर् दोहन ;निःशेषणद्ध से उत्पन्न समस्याओं के विषय मेंजागरूकता हमारे समाज में अपेक्षावृफत एक नया आयाम है। जब यह जागरूकता बढ़ती है तो कुछ न कुछ कदम भी उठाए जाते हैं। आपने गंगा सप़फाइर् योजना के विषय में अवश्य ही सुना होगा। कइर् करोड़ की यह योजना करीब 1985 में इसलिए प्रारंभ कीगइर् क्योंकि गंगा के जल की गुणवत्ता बहुत कम हो गइर् थी ;चित्रा 16.1द्ध। कोलिपफामर्जीवाणु का एक वगर् है जो मानव की आंत्रा में पाया जाता है, जल में इसकी उपस्िथति,इस रोगजन्य सूक्ष्म जीवाणु द्वारा जल का संदूष्िात होना दशार्ता है।अिाकतम/ वाष्िार्क औसत न्यूनतम वांछित स्तरन्यूनतम डच्छ ;उवेज चतवइंइसम दनउइमतद्धरू सावर्प्रायिक संख्याऋ नध्े ;नचेजतमंउद्धरू ऊध्वर्प्रवाहऋ उस् ;उपससपसपजतमद्धरू मिलिलिटरऋ कध्े ;कवूदेजतमंउद्धरू अधेप्रवाह चित्रा 16.1 गंगा जल में कोलिपफाॅमर् का संपूणर् गणना स्तर ;1993 - 1994द्ध स्रोत: एनाॅन 1996 - जल गुणवत्ता - स्टेटस एवं स्टेटिसटिक्स ;1993 - 1994द्ध, वेंफद्रीय प्रदूषण नियंत्राण बोडर्, दिल्ली, पृ. 11 जैसा कि आप देख सकते हैं कि मापन योग्य कुछ कारकों का प्रयोग करके प्रयुक्तजल की गुणवत्ता का निधार्रण अथवा प्रदूषण मापन किया जाता है। कुछ प्रदूषक अत्यल्पमात्रा में होते हुए भी हानिकारक हो सकते हैं। इनके मापन के लिए हमें अत्यंत परिष्कृत उपस्करों की आवश्यकता होती है। परंतु अध्याय 2 में हम यह भी पढ़ चुके हैं कि जल का चभ् सरलता से सावर् सूचक की सहायता से मापा जा सकता है। परन्तु हमें समस्या के विशाल रूप वफो देखकर हताश होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि ऐसे अनेक कायर् हैं जिनके द्वारा हम स्िथति में अंतर ला सकते हैं। आपने पयार्वरण को बचाने के लिए तीन प्रकार के श्त्श् के विषय में तो अवश्य सुना होगा। त्मकनबम ;कम उपयोगद्ध, त्मबलबसम ;पुनः चक्रणद्ध और त्मनेम ;पुनः उपयोगद्ध। ये क्या बताते हैं? कम उपयोग रू इसका अथर् है कि आपको कम से कम वस्तुओं का उपयोग करना चाहिए। आप बिजली के पंखे एवं बल्ब का स्िवच बंद करके बिजली बचा सकते हैं। आप टपकने वाले नल की मरम्मत करके जल की बचत कर सकते हैं। आपको आहार व्यथर् नहीं करना चाहिए। क्या आप कुछ अन्य वस्तुओं के विषय में सोच सकते हैं, जिनका उपयोग कम किया जा सकता है? पुनः चक्रण: इसका अथर् है कि आपको प्लास्िटक, कागश, काँच, धातु की वस्तुएँ तथा ऐसे ही पदाथो± का पुनःचक्रण करके उपयोगी वस्तुएँ बनानी चाहिए। जब तक अति आवश्यक न हो इनका नया उत्पादन/संश्लेषण विवेकपूणर् नहीं है। इनके पुनः चक्रण के लिए पहले हमें अपद्रव्यों को अलग करना होगा जिससे कि पुनःचक्रण योग्य वस्तुएँ दूसरे कचरे के साथ भराव क्षेत्रा में न पेंफक दी जाएँ। क्या आपके गाँव, कस्बे अथवा नगर में ऐसा कोइर् प्रबंध है जिससे इन पदाथो± का पुनःचक्रण किया जा सके? पुनः उपयोग: यह पुनःचक्रण से भी अच्छा तरीका है क्योंकि पुनःचक्रण में कुछ ऊजार् व्यय होती है। पुनः उपयोग के तरीके में आप किसी वस्तु का बार - बार उपयोग करते हैं। लिपफापफों के पेंफकने की अपेक्षा आप पिफर से उपयोग में ला सकते हैं। विभ्िान्न खाद्य पदाथो± के साथ आइर् प्लास्िटक की बोतलें, डिब्बे इत्यादि का उपयोग में रसोइर्घर में वस्तुओं को रखने के लिए किया जा सकता हैं। अन्य कौन - सी वस्तुएँ हैं जिन्हें हम पुनः उपयोग में ला सकते हैं? यही नहीं अपनी दैनिक आवश्यकताओं और ियाकलापों पर निणर्य लेते समय भी हम पयार्वरण संबंधी निणर्य ले सकते हैं। इसके लिए, हमें यह जानने की आवश्यकता है कि हमारे चयन से पयार्वरण पर क्या प्रभाव पड़ सकता है, ये प्रभाव तात्कालिक, दीघर्कालिक अथवा व्यापक हो सकते हैं। संपोष्िात विकास की संकल्पना मनुष्य की वतर्मान आधारभूत आवश्यकताओं की पूतिर् एवं विकास को प्रोत्साहित तो करती ही है साथ ही साथ भावी संतति के लिए संसाधनों का संरक्षण भी करती है। आथ्िार्क विकास पयार्वरण संरक्षण से संबंिात है। अतः संपोष्िात विकास से जीवन के सभी आयाम मेंपरिवतर्न निहित है। यह लोगों के ऊपर निभर्र है कि वे अपने चारों ओर के आथ्िार्क - सामाजिक एवं पयार्वरणीय स्िथतियों के प्रति अपने दृष्िटकोण में परिवतर्न लाएँ तथाप्रत्येक व्यक्ित को प्रकृति के संसाधनों के वतर्मान उपयोग में परिवतर्न के लिए तैयार रहना होगा। 16.1 हमें संसाधनों के प्रबंधन की क्यों आवश्यकता है? केवल सड़वेंफ एवं इमारतें ही नहीं परंतु वे सारी वस्तुएँ जिनका हम उपयोग करते हैंऋ जैसेμभोजन, कपड़े, पुस्तवेंफ, ख्िालौने, पफनीर्चर, औशार तथा वाहन इत्यादि सभी हमेंपृथ्वी पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों से प्राप्त होती हैं। हमें केवल एक ही वस्तु पृथ्वीके बाहर से प्राप्त होती है, वह है ऊजार् जो हमें सूयर् से प्राप्त होती है। परंतु यह ऊजार् भी हमें पृथ्वी पर उपस्िथत जीवों के द्वारा प्रक्रमों से, तथा विभ्िान्न भौतिक एवं रासायनिक प्रक्रमों द्वारा ही प्राप्त होती है। हमें अपने संसाधनों की सावधानीपूवर्क ;विवेकपूणर् ढंग सेद्ध उपयोग की क्यों आवश्यकता है? क्योंकि यह संसाधन असीमित नहीं हैं। स्वास्थ्य - सेवाओं में सुधार के कारण हमारी जनसंख्या मंे तीव्र गति से वृि हो रही है। जनसंख्या में वृि के कारण सभीसंसाधनों की माँग भी कइर् गुना तेजी से बढ़ी है। प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन करते समय दीघर्कालिक दृष्िटकोण को ध्यान में रखना होगा कि ये अगली कइर् पीढि़यों तक उपलब्ध हो सवेंफ। संसाधनों का अथर् उनका दोहन अथवा शोषण नहीं है। इस प्रबंधन में इस बात को भी सुनिश्िचत करने की आवश्यकता है कि इनका वितरण सभी वगो± में समान रूप से हो, न कि मात्रा मुट्ठी भर अमीर और शक्ितशाली लोगों को इनका लाभ मिले। एक बात पर और ध्यान देने की आवश्यकता है कि जब हम इन संसाधनों का दोहन करते हैं तो हम पयार्वरण को क्षति पहुँचाते हैं। उदाहरण के लिए, खनन से प्रदूषण होता है क्योंकि धातु के निष्कषर्ण के साथ - साथ बड़ी मात्रा में धातुमल भी निकलता है। अतःसंपोष्िात प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन में अपश्िाष्टों के सुरक्ष्िात निपटान की भी व्यवस्था होनी चाहिए। प्रश्न 1234 पयार्वरण - मित्रा बनने के लिए आप अपनी आदतों में कौन - से परिवतर्न ला सकते हैं? संसाधनों के दोहन के लिए कम अविा के उद्देश्य के परियोजना के क्या लाभ हो सकते हैं? यह लाभ, लंबी अविा को ध्यान में रखकर बनाइर् गइर् परियोजनाओं के लाभ से किस प्रकार भ्िान्न हैं। क्या आपके विचार में संसाधनों का समान वितरण होना चाहिए? संसाधनों के समान वितरण के विरु( कौन - कौन सी ताकतें कायर् कर सकती हैं? घ् 16.2 वन एवं वन्य जीवन वन ‘जैव विविधता के विश्िाष्ट ;भ्वजेचवजेद्ध स्थल’ हैं। जैव विविधता का एक आधार उस क्षेत्रा में पाइर् जाने वाली विभ्िान्न स्पीशीश की संख्या है। परंतु, जीवों के विभ्िान्न स्वरूप ;जीवाणु, कवक, पफनर्, पुष्पी पादप, सूत्रावृफमि, कीट, पक्षी, सरीसृप इत्यादिद्ध भीमहत्वपूणर् हैं। वंशागत जैव विविधता को संरक्ष्िात करने का प्रयास प्राकृतिक संरक्षण के मुख्य उद्देश्यों में से एक है। प्रयोगों और वस्तुस्िथति के अध्ययन से हमें पता चलता है कि विविधता के नष्ट होने से पारिस्िथतिक स्थायित्व भी नष्ट हो सकता है। 16ण्2ण्1 स्टेकहोल्डर ;दावेदारद्ध हम सभी विभ्िान्न वन उत्पादों का उपयोग करते हैं। परंतु वन संसाधनों पर हमारी निभर्रता में अंतर है। हममें से वुफछ लोगों के पास वुफछ विकल्प हैं, परंतु वुफछ के पास नहीं। जब हम वन संरक्षण की बात सोचते हंै तो हमें यह भी सोचना होगा कि इसके दावेदार कौन हैं - ;पद्ध वन के अंदर एवं इसके निकट रहने वाले लोग अपनी अनेक आवश्यकताओं के लिए वन पर निभर्र रहते हैं। ;पपद्ध सरकार का वन विभाग जिनके पास वनों का स्वामित्व है तथा वे वनों से प्राप्त संसाधनों का नियंत्राण करते हैं। ;पपपद्ध उद्योगपति जो तेंदु पत्ती का उपयोग बीड़ी बनाने से लेकर कागश मिल तक विभ्िान्न वन उत्पादों का उपयोग करते हैं, परंतु वे वनों के किसी भी एक क्षेत्रा पर निभर्र नहीं करते। ;पअद्ध वन्य जीवन एवं प्रकृति प्रेमी जो प्रकृति का संरक्षण इसकी आद्य अवस्था में करना चाहते हैं। आइए, देखें कि प्रत्येक समूह की वन आवश्यकताएँ क्या हैं अथवा वन से उन्हें क्या प्राप्त होता है। स्थानीय लोगों को ईंधन के लिए जलाउफ ;लकड़ीद्ध छोटी लकडि़याँ एवं छाजन की कापफी मात्रा में आवश्यकता होती है। बाँस का उपयोग झोपड़ी बनाने, भोजन एकत्रा करने एवं भंडारण के लिए होता है। खेती के औशार, मछली पकड़ने एवं श्िाकार के औशार मुख्यतः लकड़ी के बने होते हैं इसके अतिरिक्त वन, मछली पकड़ने एवं श्िाकार - स्थल भी होते हैं। विभ्िान्न व्यक्ित पफल, नट्स तथा औषिा एकत्रा करने के साथ - साथ अपने पशुओं को वन में चराते हैं अथवा उनका चारा वनों से एकत्रा करते हैं। क्या आप सोचते हैं कि वन संपदा का इस प्रकार उपयोग करने से इन संसाधनों का ”ास हो जाएगा? यह मत भूलिए कि अंग्रेजों के भारत आने से पहले लोग इन्हीं वनों में शताब्िदयों से रह रहे थे। अंगे्रजों ने वनों का नियंत्राण अपने हाथ में ले लिया। उनसे पहले यहाँ के मूल निवासियों ने ऐसी वििायों का विकास किया जिससे संपोषण भी होता रहे। अंग्रेजों ने न केवल वनों पर आिापत्य जमाया वरन् अपने स्वाथर् के लिए उनका निमर्मता से दोहन भी किया। यहाँ के मूलनिवासियों को एक सीमित क्षेत्रा में रहने के लिए मजबूर किया गया तथा वन संसाधनों का किसी सीमा तक अत्यिाक दोहन भी प्रारंभ हो गया। स्वतंत्राता के बाद वन विभाग ने अंग्रेजों से वनों का नियंत्राण तो अपने हाथ में ले लिया, परंतु प्रबंधन व्यवहार में स्थानीय लोगों की आवश्यकताओं एवं ज्ञान की उपेक्षा होती रही। अतः वनों के बहुत बड़े क्षेत्रा एक ही प्रकार के वृक्षों जैसे कि पाइन ;चीड़द्ध, टीक अथवा यूक्िलप्टस के वनों में परिवतिर्त हो गए। इन वृक्षों को उगाने के लिए सवर्प्रथम सारे क्षेत्रा से अन्य सभी पौधों वफो हटा दिया गया जिससे क्षेत्रा की जैव विविधता बड़े स्तर पर नष्ट हो गइर्। यही नहीं स्थानीय लोगों की विभ्िान्न आवश्यकताओं जैसे कि पशुओं के लिए चारा, औषिा हेतु वनस्पति, पफल एवं नट इत्यादि की आपूतिर् भी नहीं हो सकी। इस प्रकार के रोपण से उद्योगों को लाभ मिला जो वन विभाग के लिए भी राजस्व का मुख्य स्रोत बन गया। क्या आप जानते हंै कि कितने उद्योग वन उत्पादों पर निभर्र करते हंै? टिम्बर ;इमारती लकड़ीद्ध, कागश, लाख तथा खेल के समान इसके वुफछ उदाहरण हैं। उद्योेग इन वनों को अपनी पैफक्टरी के लिए कच्चे माल का स्रोत मात्रा ही मानते हैं। निहित स्वाथर् से लोगों का एक बड़ा वगर् सरकार से उद्योगों के लिए कच्चे माल को बहुत कम मूल्य पर प्राप्त करने में लगा रहता है। क्योंकि स्थानीय निवासियों की अपेक्षा इन व्यक्ितयों की पहुँच सरकार में काप़फी ऊपर तक होती है, अतः उन्हें उस क्षेत्रा के संपोष्िात विकास में कोइर् रुचि नहीं होती। उदाहरण के लिए, किसी वन के टीक के सभी वृक्षों को काटने के बाद, वे दूरस्थ वनों से टीक प्राप्त करने लगेंगे। उन्हें इस बात से कोइर् मतलब नहीं है कि वे इनका इष्टतम उपयोग सुनिश्िचत करें जिससे कि वह आगे आने वाली पीढि़यों को भी उपलब्ध हो सके। आपके विचार में लोगों को इस प्रकार व्यवहार करने से वैफसे रोका जा सकता है?अंत में हम चचार् करते हैं प्रकृति एवं वन्य - जीवन प्रेमियों की जो वन पर निभर्रतो नहीं हैं, परंतु वनों के प्रबंधन में उनकी बात को बहुत महत्त्व दिया जाता है। संरक्षण का प्रारंभ बड़े जंतुओं जैसे कि शेर, चीता, हाथी एवं गैंडा से हुआ था अब उन्होंने संपूणर्जैव विविधता को पूणर् रूप से संरक्ष्िात रखने के महत्त्व को समझ लिया है। परंतु क्याहमें ऐसे व्यक्ितयों को पयार्प्त महत्त्व नहीं देना चाहिए जो वन तंत्रा का भाग बन गए हैं इस बात के पयार्प्त प्रमाण हैं कि स्थानीय निवासी परंपरानुसार वनों के संरक्षण का प्रयास कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, राजस्थान के विश्नोइर् समुदाय के लिए वन एवं वन्य प्राण्िा संरक्षण उनके धामिर्क अनुष्ठान का भाग बन गया है। भारत सरकार ने पिछले दिनों जीव संरक्षण हेतु अमृता देवी विश्नोइर् राष्ट्रीय पुरस्कार की व्यवस्था की है। यह पुरस्कार अमृता देवी विश्नोइर् की स्मृति में दिया जाता है जिन्होंने 1731 में राजस्थान के जोधपुर के पास खेजराली गाँव में ‘खेशरी वृक्षों’ को बचाने हेतु 363 लोगों के साथ अपने आपको बलिदान कर दिया था। अध्ययनों ने इस बात को स्थापित कर दिया है कि वनों के परंपरागत उपयोग के तरीकों के विरु( पूवार्ग्रह का कोइर् ठोस आधार नहीं है। उदाहरणतः, विशाल हिमालय राष्ट्रीय उद्यान के सुरक्ष्िात क्षेत्रा में एल्पाइन के वन हैं जो भेड़ों के चरागाह थे। घुमंतु ;खानाबदोशद्ध चरवाहे प्रत्येक वषर् ग्रीष्मकाल में अपनी भेडें़ घाटी से इस क्षेत्रा में चराने के लिए ले जाते थे। परंतु इस राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना के बाद इस परंपरा को रोक दिया गया। अब यह देखा गया है कि पहले तो यह घास बहुत लंबी हो जाती है, पिफर लंबाइर् के कारण जमीन पर गिर जाती है जिससे नयी घास की वृि रुक जाती है। संरक्ष्िात क्षेत्रों में स्थानीय निवासियों को बलपूवर्क रोकने की प्रबंधन नीति संभवतः लंबे समय तक सप़फल नहीं हो पाइर्। किसी भी प्रकार से वनों को होने वाली क्षति के लिएकेवल स्थानीय निवासियों को ही उत्तरदायी ठहराना ठीक नहीं है। हम औद्योगिक आवश्यकताओं एवं विकास परियोजनाओं जैसे कि सड़क एवं बाँध निमार्ण से वनों के विनाश अथवा इसको होने वाली क्षति से आँखें नहीं मूँद सकते। इन संरक्ष्िात क्षेत्रों में पयर्टकों के द्वारा अथवा उनकी सुविधा के लिए की गइर् व्यवस्था से होने वाली क्षति के बारे में भी विचार करना होगा। हमें मानना होगा कि वनों की प्राकृतिक छवि में मनुष्य का हस्तक्षेप बहुत अिाकहै। हमें इस हस्तक्षेप की प्रकृति एवं सीमा को नियंत्रिात करना होगा। वन संसाधनों का उपयोग इस प्रकार करना होगा जो पयार्वरण एवं विकास दोनों के हित में हो। दूसरे शब्दों में, जब पयार्वरण अथवा वन संरक्ष्िात किए जाएँ, उसके सुनियोजित उपयोग का लाभ स्थानीय निवासियों को मिलना चाहिए। यह विवेंफद्रीकरण की एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें आथ्िार्क विकास एवं पारिस्िथतिक संरक्षण दोनों साथ - साथ चल सकते हैं। जिस प्रकार का आथ्िार्क एवं सामाजिक विकास हम चाहते हैं, उससे ही अंततः यह निणर्य होगा कि उससे पयार्वरण का संरक्षण हो रहा है अथवा इसका और विनाश हो रहा है। पयार्वरण को पौधों और जंतुओं का सजावटी संग्रह मात्रा नहीं माना जा सकता। यह एक जटिलव्यवस्था है जिससे हमें उपयोग हेतु अनेक प्रकार के प्राकृतिक संसाधन प्राप्त होते हैं। हमें अपने आथ्िार्क एवं सामाजिक विकास की आपूतिर् हेतु इन संसाधनों का सावधानीपूवर्क उपयोग करना होगा। 16ण्2ण्2 संपोष्िात प्रबंधन हमें इस पर विचार करना होगा कि क्या उपरोक्त सभी दावेदारों के लक्ष्य वन प्रबंधन के संदभर् में समान हैं। उद्योगों को वन संपदा अिाकतर बाशार के मूल्य से बहुत कम मूल्य पर उपलब्ध कराइर् जाती है, जबकि स्थानीय निवासियों को उनसे वंचित रखा जाता है। ‘चिपको आंदोलन’ स्थानीय निवासियों को वनों से अलग करने की नीति का हीपरिणाम है। यह आंदोलन हिमालय की ऊँची पवर्त शृंखला में गढ़वाल के ‘रेनी’ नामक गाँव में एक घटना से 1970 के प्रारंभ्िाक दशक में हुआ था। यह विवाद लकड़ी के ठेकेदार एवं स्थानीय लोगों के बीच प्रारंभ हुआ क्यांेकि गाँव के समीप के वृक्ष काटने का अिाकार उसे दे दिया गया था। एक निश्िचत दिन ठेकेदार के आदमी वृक्ष काटने के लिए आए जबकि वहाँ के निवासी पुरुष वहाँ नहीं थे। बिना किसी डर के वहाँ की महिलाएँ पफौरन वहाँ पहुँच गईं तथा उन्होंने पेड़ों वफो अपनी बाँहों में भर कर ;चिपक करद्ध ठेकेदार के आदमियों को वृक्ष काटने से रोका। अंततः ठेकेदार को अपना काम बंद करना पड़ा।प्राकृतिक संसाधनों के नियंत्राण की इस प्रतियोगिता में पुनः पूतिर् होने वाले इन संसाधनों का संरक्षण अंतनिर्हित है। इसी उद्देश्य से उनके उपयोग के तरीके पर प्रश्न उठाए गए। लकड़ी के ठेकेदार ने उस क्षेत्रा के सारे वृक्षों को काट कर गिरा दिया होताऔर क्षेत्रा सदा के लिए वृक्षहीन हो जाता। स्थानीय समुदाय, वृक्षों के ऊपर चढ़कर वुफछशाखाएँ एवं पिायाँ ही काटता है जिससे समय के साथ - साथ उनका पुनः पूरण भी होता रहता है। ‘चिपको आंदोलन’ बहुत तेशी से बहुत से समुदायों में पैफल गया एवं जन संचार ने भी इसमें योगदान दिया तथा सरकार को यह सोचने पर मशबूर कर दिया कि वन किसके हैं तथा वन संसाधनों के समुचित उपयोग के लिए प्राथमिकता तय करने के लिए पुनविर्चार पर मशबूर कर दिया। अनुभव ने लोगों को सिखा दिया है कि वनों केविनाश से केवल वन की उपलब्धता ही प्रभावित नहीं होती वरन् मिट्टी की गुणवत्ता एवं जल स्रोत भी प्रभावित होते हैं। स्थानीय लोगों की भागीदारी से निश्िचत रूप से वनों के प्रबंधन की दक्षता बढ़ेगी। वन प्रबंधन में लोगों की भागीदारी का एक उदाहरण 1972 में पश्िचम बंगाल वन विभाग को प्रदेश के दक्ष्िाण पश्िचम जिलों में नष्ट हुए साल के वनों को पुनःपूरण करने की अपनी योजना के असपफल होने के कारणों का पता लगा। सतवर्फता की परंपरागत वििायों और पुलिस की कारर्वाइर् से स्थानीय लोग और प्रशासन में बहुत दूरी हो गइर् जिसके पफलस्वरूप वन कमर्चारियों और ग्रामवासियों में अक्सर झड़पें होने लगीं। इन झगड़ों ने नक्सली जैसे हिंसक आंदोलनों को और भी हवा दी। अतः वन विभाग ने अपनी नीति में बदलाव कर दिया तथा मिदनापुर के अराबाड़ी वन क्षेत्रा में एक योजना प्रारंभ की। यहाँ वन विभाग के एक दूरदशीर् अिाकारी ए.केबनजीर् ने ग्रामीणों को अपनी योजना में शामिल किया तथा उनके सहयोग से बुरी तरह से क्षतिग्रस्त साल के वन की 1272 हेक्टेयर क्षेत्रा का संरक्षण किया। इसके बदले में निवासियों को क्षेत्रा की देखभाल की िाम्मेदारी के लिए रोशगार मिला साथ ही उन्हें वहाँ से उपज की 25 प्रतिशत के उपयोग का अिाकार भी मिला और बहुत कम मूल्य पर इर्±धन के लिए लकड़ी और पशुओं को चराने की अनुमति भी दी गइर्। स्थानीय समुदाय की सहमति एवं सिय भागीदारी से 1983 तक अराबाड़ी का सालवन समृ( हो गया तथा पहले बेकार कहे जाने वाले वन का मूल्य 12.5 करोड़ आँका गया। प्रश्न 12 हमें वन एवं वन्य जीवन का संरक्षण क्यों करना चाहिए? संरक्षण के लिए वुफछ उपाय सुझाइए। घ् 16.3 सभी के लिए जल धरती पर रहने वाले सभी जीवों की मूल आवश्यकता जल है। हम कक्षा 9 में एक संसाधन के रूप में जल के महत्त्व तथा जल के चक्र के बारे में पढ़ चुके हैं। मनुष्यने किस प्रकार जल स्रोतों को प्रदूष्िात किया है साथ ही मनुष्य की प्रकृति में दखल से अनेक क्षेत्रों में जल की उपलब्धता भी प्रभावित हुइर् है। ऽ एक एटलस की सहायता से भारत में वषार् के पैटनर् का अध्ययन कीजिए। ऽ ऐसे क्षेत्रों की पहचान कीजिए जहाँ पर जल की प्रचुरता है तथा ऐसे क्षेत्रों की जहाँ इसकी बहुत कमी है। उपरोक्त ियाकलाप के बाद आपको जानकर आश्चयर् होगा कि जल की कमी वालेे क्षेत्रों एवं अत्यिाक निधर्नता वाले क्षेत्रों में घनिष्ट संबंध है। वषार् के प्रतिरूप के अध्ययन से भारत के विभ्िान्न क्षेत्रों में जल उपलब्धता का पूणर् सत्य सामने नहीं आता। भारत में वषार् मुख्यतः मानसून पर निभर्र करती है। इसका अथर्है कि वषार् की अविा वषर् के वुुफछ महीनों तक ही सीमित रहती है। प्रकृति में मानसून के अभ्िादान के बाद भी क्षेत्रों के वनस्पति आच्छादन कम होने के कारण भूजल स्तर की उपलब्धता में काप़फी कमी आइर् हैऋ पफसलों के लिए जल की अिाक मात्रा की माँग, उद्योेगों से प्रवाहित प्रदूषक एवं नगरों के वूफड़ा - कचरे ने जल को प्रदूष्िात कर उसकी उपलब्धता की समस्या को और अिाक जटिल बना दिया है। बाँध, जलाशय एवं नहरों का उपयोग भारत के विभ्िान्न क्षेत्रों में सिंचाइर् के लिए प्राचीन समय से किया जाता रहा है। पहले इन तकनीकों का प्रयोग स्थानीय लोगों द्वारा की गइर् दखल थी तथा स्थानीयनिवासी उसका प्रबंधन कृष्िा एवं दैनिक आवश्यकताओं की पूतिर् के लिए करते थे जिससे जल पूरे वषर् उपलब्ध रह सके। इस भंडारित जल का नियंत्राण भली प्रकार से किया जाता था तथा जल की उपलब्धता और दशकों एवं सदियों के अनुभव के आधार पर इष्टतम पफसल प्रतिरूप अपनाए जाते थे। सिंचाइर् के इन संसाधनों का प्रबंधन भी स्थानीय लोगों द्वारा किया जाता था। अंग्रेजों ने भारत आकर अन्य बातों के साथ - साथ इस प(ति को भी बदल दिया। बड़ी परियोजनाओं जैसे कि विशाल बाँध तथा दूर तक जाने वाली बड़ी - बड़ी नहरों की सवर्प्रथम संकल्पना कर उन्हें ियान्िवत करने का कायर् भी अंग्रेशों द्वारा ही किया गया जिसे हमारे स्वतंत्रा होने पर हमारी सरकार ने भी पूरे जोश के साथ अपनाया। इन विशाल परियोजनाओं से सिंचाइर् के स्थानीय तरीके उपेक्ष्िात होते गए तथा सरकार धीरे - धीरे इनका प्रबंधन एवं प्रशासन अपने हाथ में लेती चली गइर् जिससे जल के स्थानीय स्रोतों पर स्थानीय निवासियों का नियंत्राण समाप्त हो गया। 16ण्3ण्1 बाँध हम बाँध क्यांे बनाना चाहते हैं? बड़े बाँध में जल संग्रहण पयार्प्त मात्रा में किया जा सकता है जिसका उपयोग केवल सिंचाइर् के लिए ही नहीं वरन् विद्युत उत्पादन के लिए भी किया जाता है जिसके विषय में आप पिछले अध्याय में पढ़ चुके हैं। इनसे निकलने वाली नहरें जल की बड़ी मात्रा को दूरस्थ स्थानों तक ले जाती हैं। उदाहरणतः, इंदिरा गांधी नहर से राजस्थान के काप़फी बड़े क्षेत्रा में हरियाली आ गइर् है। परंतु जल के खराब प्रबंधन के कारण मात्रा वुफछ व्यक्ितयों द्वारा लाभ उठाने के कारण जल प्रबंधन के लाभ से बहुत से लोग वंचित रह गए हैं। जल का समान वितरण नहीं है, अतः जल स्रोत के निकट रहने वाले व्यक्ित गन्ना एवं धान जैसी अिाक जल - खपत वाली पफसल उगा लेते हैं जबकि दूर के लोगों को जल मिल ही नहीं पाता। उन व्यक्ितयों की व्यथा और भी बढ़ जाती है तथा असंतोष होता है जबकि उन व्यक्ितयों को जिन्हें बाँध एवं नहर बनाते समय विस्थापित किया गया और उस समय किए गए वायदे भी पूरे नहीं किए गए। बड़े बाँधों के बनाने के विरोध में उठ रहे उन कारणों की चचार् हम पिछले अध्याय में कर चुके हैं। गंगा नदी पर बना टिहरी बाँध इसका एक उदाहरण है। आपने ‘नमर्दा बचाओ आंदोलन’ के विषय में भी अवश्य ही पढ़ा होगा जिसमें नमर्दा नदी पर बनने वाले बाँध की ऊँचाइर् बढ़ाने का विरोध हो रहा है। बड़े बाँध के विरोध में मुख्यतः तीन समस्याओं की चचार् विशेष रूप से होती है - ;पद्ध सामाजिक समस्याएँ, क्योंकि इससे बड़ी संख्या में किसान और आदिवासी विस्थापित होते हैं और इन्हें मुआवजा भी नहीं मिलता। ;पपद्ध आथ्िार्क समस्याएँ, क्योंकि इनमें जनता का बहुत अिाक धन लगता है और उस अनुपात में लाभ अपेक्ष्िात नहीं है। ;पअद्ध पयार्वरणीय समस्याएँ, क्यांेकि उससे बड़े स्तर पर वनों का विनाश होता है तथा जैव विविधता की क्षति होती है। विकास की विभ्िान्न परियोजनाओं में विस्थापित होने वाले अिाकतर व्यक्ित गरीब आदिवासी होते हैं जिन्हें इन परियोजनाओं से कोइर् लाभ नहीं होता तथा उन्हें अपनी भूमि एवं जंगलों से भी हाथ धोना पड़ता है जिसकी क्षतिपूतिर् भी समुचित नहीं होती। 1970 में बने तावा बाँध के विस्थापितों को अभी भी वह लाभ नहीं मिल सके जिनका उनसे वायदा किया गया था। 16ण्3ण्2 जल संग्रहण जल संभर प्रबंधन में मिट्टी एवं जल संरक्षण पर जोर दिया जाता है जिससे कि ‘जैव - मात्रा’ उत्पादन में वृि हो सके। इसका प्रमुख उद्देश्य भूमि एवं जल के प्राथमिक स्रोतों का विकास, द्वितीयक संसाधन पौधों एवं जंतुओं का उत्पादन इस प्रकार करना जिससे पारिस्िथतिक अंसतुलन पैदा न हो। जल संभर प्रबंधन न केवल जल संभर समुदाय का उत्पादन एवं आय बढ़ता है वरन् सूखे एवं बाढ़ को भी शांत करता है तथा निचले बाँध एवं जलाशयों का सेवा काल भी बढ़ाता है। अनेक संगठन प्राचीनकालीन जल संरक्षण प्रणालियों को पुनजीर्वित करने में लगे हैं जो बाँध जैसी बड़ी परियोजनाओं का विकल्प बन सकते हैं। इन समुदायों ने जल संरक्षण के ऐसे सैकड़ों तरीके विकसित किए हैं जिनके द्वारा धरती पर पड़ने वाली प्रत्येक बूँद का संरक्षण किया जा सके। यथा छोटे - छोटे गड्ढे खोदना, झीलों का निमार्ण, साधारण जल संभर व्यवस्था की स्थापना, मिट्टी के छोटे बाँध बनाना, रेत तथा चूने के पत्थर के संग्रहक बनाना तथा घर की छतों से जल एकत्रा करना। इससे भूजल स्तर बढ़ जाता है तथा नदी भी पुनः जीवित हो जाती है। चित्रा 16.3 जल संग्रहण की पारंपरिक व्यवस्था - खादिन प(ति का आदशर् व्यवस्थापन जल संग्रहण ;ूंजमत ींतअमेजपदहद्ध भारत में बहुत पुरानी संकल्पना है। राजस्थान में खादिन, बड़े पात्रा एवं नाड़ी, महाराष्ट्र के बंधारस एवं ताल, मध्यप्रदेश एवं उत्तर प्रदेश में बंिास, बिहार में अहार तथा पाइन, हिमाचल प्रदेश में वुुफल्ह, जम्मू के काँदी क्षेत्रा में तालाब तथा तमिलनाडु में एरिस ;ज्ंदाद्ध केरल में सुरंगम, कनार्टक में कट्टा इत्यादि प्राचीन जल संग्रहण तथा जल परिवहन संरचनाएँ आज भी उपयोग में हैं। ;उदाहरण के लिए चित्रा 16.3 देख्िाएद्ध। जल संग्रहण तकनीक, स्थानीय होती हैं तथा इसका लाभ भी स्थानीय/सीमित क्षेत्रा को होता है। स्थानीय निवासियों को जल - संरक्षण का नियंत्राण देने से इन संसाधनों के अवुफशल प्रबंधन एवं अतिदोहन कम होते हैं अथवा पूणर्तः समाप्त हो सकते हैं। बड़े समतल भूभाग में जल संग्रहण स्थल मुख्यतः अधर्चंद्राकार मिट्टी के गड्ढेअथवा निचले स्थान, वषार् ट्टतु में पूरी तरह भर जाने वाली नालियाँ/प्राकृतिक जल मागर् पर बनाए गए ‘चेक डैम’ जो वंफक्रीट अथवा छोटे कंकड़ पत्थरों द्वारा बनाए जाते हैं। इन छोटे बाँधों के अवरोध के कारण इनके पीछे मानसून का जल तालाबों में भर जाता है। केवल बड़े जलाशयों में जल पूरे वषर् रहता है। परंतु छोटे जलाशयों में यह जल 6 महीने या उससे भी कम समय तक रहता है उसके बाद यह सूख जाते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य जल संग्रहण नहीं है परंतु जल - भौम स्तर में सुधार करना है। जल के भौम जल के रूप में संरक्षण के कइर् लाभ हैं। भौम जल से अनेक लाभ हैं। यह वाष्प बन कर उड़ता नहीं, परंतु यह आस - पास में पैफल जाता है, बड़े क्षेत्रा में वनस्पति को नमी प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त इससे मच्छरों के जनन की समस्या भी नहीं होती। भौम जल मानव एवं जंतुओं के अपश्िाष्ट से झीलों तालाबों में ठहरे पानी के विपरीत संदूष्िात होने सेअपेक्षाकृत सुरक्ष्िात रहता है। प्रश्न 123 अपने निवास क्षेत्रा के आस - पास जल संग्रहण वफी परंपरागत प(ति का पता लगाइए। इस प(ति की पेय जल व्यवस्था ;पवर्तीय क्षेत्रों में, मैदानी क्षेत्रा अथवा पठार क्षेत्राद्ध से तुलना कीजिए। अपने क्षेत्रा में जल के स्रोत का पता लगाइए। क्या इस स्रोत से प्राप्त जल उस क्षेत्रा के सभी निवासियों को उपलब्ध है। घ् 16.4 कोयला एवं पेट्रोलियम हमने वुुफछ स्रोत जैसे कि वन, वन्य जीवन तथा जल के संरक्षण एवं संपोषण से संबंिात अनेक समस्याओं की चचार् की है। यदि हम इनके संपोषण के उपाय अपनाएँ तो इससे हमारी आवश्यकता की पूतिर् भी होती रहेगी। अब हम एक और महत्वपूणर् संसाधनजीवाश्म ईंधन अथार्त कोयला एवं पेट्रोलियम पर चचार् करेंगे जो ऊजार् के प्रमुख स्रोत हैं।औद्योगिक क्रांति के समय से हम उत्तरोत्तर अिाक ऊजार् की खपत कर रहे हैं। इस ऊजार्का प्रयोग हम दैनिक ऊजार् आवश्यकता की पूतिर् तथा जीवनोपयोगी पदाथो± के उत्पादनहेतु कर रहे हैं। ऊजार् संबंधी यह आवश्यकता हमें कोयला तथा पेट्रोलियम से प्राप्त होती है।इन ऊजार् स्रोतों का प्रबंधन अन्य संसाधनों की अपेक्षा वुफछ भ्िान्न तरीके से किया जाता है। पेट्रोलियम एवं कोयला लाखों वषर् पूवर् जीवों की जैव - मात्रा के अपघटन से प्राप्त होते हैं। अतः चाहे हम जितनी भी सावधानी से इनका उपयोग करें पिफर भी यहस्रोत भविष्य में समाप्त हो जाएँगे। अतः तब हमें ऊजार् के विकल्पी स्रोतों की खोज करने की आवश्यकता होगी। यह संसाधन यदि वतर्मान दर से प्रयोग में आते रहे तो ये कितने समय तक उपलब्ध रहेंगे, इस बारे में विभ्िान्न आकलनों के आधार पर हम कह सकते हंै कि हमारे पेट्रोलियम के संसाधन लगभग अगले 40 वषो± में तथा कोयला अगले 200 वषो± तक उपलब्ध रह सकते हैं।परंतु जब हम कोयले एवं पेट्रोलियम की खपत के बारे में विचार करते हैं तो ऊजार् के अन्य स्रोतों के विषय में विचार का एकमात्रा आधार नहीं है। क्योंकि कोयला एवं पेट्रोलियम जैव - मात्रा से बनते हैं जिनमें काबर्न के अतिरिक्त हाइड्रोजन, नाइट्रोजन एवं सल्पफर ;गंधकद्ध भी होते हैं। जब इन्हें जलाया ;दहन कियाद्ध जाता है तो काबर्न डाइआॅक्साइड, जल, नाइट्रोजन के आॅक्साइड तथा सल्पफर के आॅक्साइड बनते हैं। अपयार्प्त वायु ;आॅक्सीजनद्ध में जलाने पर काबर्न डाइआॅक्साइड के स्थान पर काबर्न मोनोआॅक्साइड बनाती है। इन उत्पादों में से नाइट्रोजन एवं सल्पफर के आॅक्साइड तथा काबर्न मोनोआॅक्साइड विषैली गैसें हैं तथा काबर्न डाइआॅक्साइड एक ग्रीन हाउस गैस है। कोयला एवं पेट्रोलियम पर विचार करने का एक अन्य दृष्िटकोण यह भी है कि ये काबर्न के विशाल भंडार हैं, यदि इनकी संपूणर् मात्रा का काबर्न जलाने पर काबर्न डाइआॅक्साइड में परिवतिर्त हो गया तो वायुमंडल में काबर्न डाइआॅक्साइड की मात्राअत्यिाक हो जाएगी जिससे तीव्र वैश्िवक ऊष्मण होने की संभावना है। अतः इन संसाधनों के विवेकपूणर् उपयोग की आवश्यकता है। वुफछ सरल विकल्पों से हमारे ऊजार् की खपत में अंतर पड़ सकता है। आनुपातिक लाभ - हानि एवं पयार्नुवूफलन पर विचार कीजिएः ;पद्ध बस में यात्रा, अपना वाहन प्रयोग में लाना अथवा पैदल/साइकिल से चलना। ;पपद्ध अपने घरों में बल्ब, फ्रलोरोसेंट ट्यूब का प्रयोग करना। ;पपपद्ध लिफ्रट का प्रयोग करना अथवा सीढि़यों का उपयोग करना। ;पअद्ध सदीर् में एक अतिरिक्त स्वेटर पहनना अथवा हीटर या सिगड़ी का प्रयोग करना। कोयला एवं पेट्रोलियम का उपयोग हमारी मशीनों की दक्षता पर भी निभर्र करता हैं। यातायात के साधनों में मुख्यतः आंतरिक दहन - इंजन का उपयोग होता है। आजकल अनुसंधान इस विषय पर वेंफदि्रत है कि इनमें ईंधन का पूणर् दहन किस प्रकार सुनिश्िचत किया जा सकता है जिससे कि इनकी दक्षता भी बढ़े तथा वायु प्रदूषण को भी कम किया जा सके। ऽ आपने वाहनांे से निकलने वाली गैसों के यूरो - 1 एवं यूरो - प्प् मानक के विषय में तो अवश्य ही सुना होगा। पता लगाइए कि ये मानक वायु प्रदूषण कम करने में किस प्रकार सहायक हंै? 16.5 प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन का दृश्यावलोकन प्राकृतिक संसाधनों का संपोष्िात प्रबंधन एक कठिन कायर् है। इस पर विचार करने के लिए हमें खुले दिमाग से सभी पक्षों की आवश्यकताओं का ध्यान रखना होगा। हमें यह तो मानना ही होगा कि लोग अपने हित को प्राथमिकता देने का भरपूर प्रयास करेंगे। परंतु इस वास्तविकता को लोग धीरे - धीरे स्वीकार करने लगे हैं कि वुफछ व्यक्ितयों के निहित स्वाथर् बहुसंख्यकों के दुख का कारण बन सकते हैं तथा हमारे पयार्वरण का पूणर् विनाश भी संभव है। कानून, नियम एवं विनियमन से आगे हमें अपनी व्यक्ितगत और सामूहिक आवश्यकताओं को सीमित करना होगा जिससे कि विकास का लाभ सभी को एवं सभी भावी पीढि़यों को उपलब्ध हो सके।

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