अध्याय14 ऊजार् के स्रोतक्षा 9 में हमने यह सीखा था कि किसी भौतिक अथवा रासायनिक प्रक्रम केकसमय वुफल ऊजार् संरक्ष्िात रहती है। तब पिफर हम क्यों ऊजार् संकट के विषय में इतना वुफछ सुनते रहते हैं? ऊजार् को यदि न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न हीवह नष्ट होती है तो हमें कोइर् ¯चता नहीं होनी चाहिए। हमें ऊजार् के साधनों की चिंता किए बिना असीमित ियाकलाप करने में सक्षम होना चाहिए। यदि हम याद करें कि हमने ऊजार् के विषय में इसके अतिरिक्त और क्या - क्यासीखा है तो इस पहेली को हल किया जा सकता है। ऊजार् के विविध् रूप हैं तथा ऊजार् के एक रूप को दूसरे रूप में परिवतिर्त किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, यदि हम किसी प्लेट को किसी ऊँचाइर् से गिराएँ तो प्लेट की स्िथतिज ऊजार् का अध्िकांशभाग पफशर् से टकराते समय ध्वनि ऊजार् में परिवतिर्त हो जाता है। यदि हम किसी मोमबत्ती को जलाते हैं तो प्रक्रम अत्यध्िक ऊष्माक्षेपी होती है और इस प्रकार जलने पर मोम की रासायनिक ऊजार्, ऊष्मीय ऊजार् तथा प्रकाश ऊजार् में परिवतिर्त हो जाती है।मोमबत्ती को जलाने पर, इन ऊजार्ओं के अतिरिक्त और क्या अन्य उत्पाद प्राप्त होते हैैं? किसी भी भौतिक अथवा रासायनिक प्रक्रम में वुफल ऊजार् अपरिवतिर्त रहती है। परंतु यदि हम जलती हुइर् मोमबत्ती पर पुनः विचार करें तो क्या हम किसी भी प्रकार सेअभ्िािया में उत्पन्न ऊष्मा और प्रकाश वफो अन्य उत्पादों के साथ मिलाकर मोम के रूप में रासायनिक ऊजार् को वापस प्राप्त कर सकते हैं? आइए, अब एक अन्य उदाहरण लेते हैं। मान लीजिए हम 100 उस् जल लेते हैं, जिसका ताप 348ज्ञ ;75 वब्द्ध है, और इसे किसी कमरे में रखा रहने देते हैं जिसका ताप 298 ज्ञ ;25 वब्द्ध है। वुफछ समय पश्चात क्या होगा? क्या ऐसा कोइर् उपाय है जिसके द्वारा पयार्वरण में लुप्त हुइर् समस्त ऊष्मा को एकत्रा करके जो जल एक बार ठंडा हो गया है उसे गरम किया जा सके? ऐसे प्रत्येक उदाहरण के बारे में विचार करने पर हम यह पाएँगे कि प्रयोज्य रूप में उपलब्ध ऊजार् चारों ओर के वातावरण में अपेक्षाकृत कम प्रयोज्य रूप में क्षयित होजाती है। अतः कायर् करने के लिए जिस किसी ऊजार् के स्रोत का उपयोग करते हैं वह उपभुक्त हो जाता है और उसका पुनः उपयोग नहीं किया जा सकता। 14.1 ऊजार् का उत्तम स्रोत क्या है? तब पिफर किसे ऊजार् का अच्छा स्रोत माना जाए? दैनिक जीवन में कायर् करने के लिए हम ऊजार् के विविध् स्रोतों का उपयोग करते हैं। रेलगाडि़यों को चलाने में हम डीशल उपयोग करते हैं। सड़कों के लैम्पों को दीप्ितमान बनाने में विद्युत का उपयोग करते हैंै। साइकिल से विद्यालय जाने में पेश्िायों की ऊजार् का उपयोग किया जाता हैं। शारीरिक कायो± को करने के लिए पेशीय ऊजार्, विविध् वैद्युत साध्ित्रों को चलानेके लिए विद्युत ऊजार्, भोजन पकाने अथवा वाहनों को दौड़ाने के लिए रासायनिक ऊजार्,ये सभी ऊजार्एँ किसी न किसी ऊजार् ड्डोत से प्राप्त होती हैं। हमें यह जानना आवश्यकहै कि ऊजार् को उसके प्रयोज्य रूप में प्राप्त करने के लिए आवश्यक स्रोत का चयन किस प्रकार किया जाता है। उपरोक्त दोनों ियाकलापों को करने के पश्चात हमें यह ज्ञात होता है कि वुफछकायो± को करने के लिए किसी विशेष ऊजार् ड्डोत अथवा ईंध्न का चयन अनेक कारकों पर निभर्र करता है। उदाहरण के लिए, किसी ईंध्न का चयन करते समय हमें स्वयं से इन प्रश्नों को पूछना चाहिए - ;पद्ध यह दहन में कितनी ऊष्मा मुक्त करता है? ;पपद्ध क्या यह अत्यध्िक ध्ुआँ उत्पन्न करता है? ;पपपद्ध क्या यह आसानी से उपलब्ध् है? क्या आप ईंध्न के विषय में तीन और प्रासंगिक प्रश्न सोच सकते हैं? जितने भी वगो± के ईंधन आज उपलब्ध् हैं, यदि हमें उनका चयन करना हो तो वे कौन से कारक हंै जो किसी विशेष कायर् जैसे भोजन पकाने के लिए ईंध्न का चयन करते समय, हमारे चयन के विकल्पों को सीमित कर देते हैं? क्या जिस ईंध्न का चयन किया गया है वह किए जाने वाले कायर् पर भी निभर्र करता है? उदाहरण के लिए, क्या हम सदिर्यों में भोजन पकाने के लिए एक ईंध्न तथा कमरे को गरम करने के लिए कोइर् दूसरा ईंध्न चुनेंगे?इस प्रकार अब हम यह कह सकते हैं कि एक उत्तम ऊजार् का ड्डोत वह है, जो - ऽ प्रति एकांक आयतन अथवा प्रति एकांक द्रव्यमान अध्िक कायर् करे। ऽ सरलता से सुलभ हो सके। ऽ भंडारण तथा परिवहन में आसान हो। ऽ कदाचित सबसे अध्िक महत्वपूणर् यह है कि वह सस्ता भी हो। प्रश्न 123 ऊजार् का उत्तम स्रोत किसे कहते हैं?उत्तम ईंध्न किसे कहते हैं?यदि आप अपने भोजन को गरम करने के लिए किसी भी ऊजार् - स्रोत का उपयोग कर सकते हैं तो आप किसका उपयोग करेेंगे और क्यों? घ् 14.2 ऊजार् के पारंपरिक स्रोत 14ण्2ण्1 जीवाश्मी ईंध्न प्राचीन काल में ऊष्मीय ऊजार्र् का सबसे अध्िक सामान्य स्रोत लकड़ी था। वुुफछ सीमितियाकलापों के लिए पवन तथा बहते जल की ऊजार् का भी उपयोग किया जाता था।क्या आप इनमें से वुफछ उपयोग बता सकते हैं? ऊजार् स्रोत के रूप में कोयले के उपयोग ने औद्योगिक क्रांति को संभव बनाया। बढ़ते हुएउद्योगों ने समस्त विश्व में जीवन की गुणवत्ता में वृिकर दी है। इसके कारण समस्त विश्व में ऊजार् कीमाँग में भी आश्चयर्जनक दर से वृि हो रही है। ऊजार् की बढ़ती माँग की अिाकांश पूतिर् जीवाश्मी ईंधन - कोयला तथा पेट्रोलियम से की जाती थी। माँग मेंवृि के साथ - साथ इन ऊजार् स्रोतों का उपयोग करने के लिए प्रौद्योगिकियों में भी विकास किए गए। परंतु ये ईंध्न करोड़ों वषो± मंे बने हैं तथा अब केवल इनके सीमितभंडार ही शेष हैं। जीवाश्मी ईंध्न ऊजार् के अनवीकरणीय स्रोत हैं, अतः इन्हें संरक्ष्िातकरने की आवश्यकता है। यदि हम इन ऊजार् स्रोतों का उपयोग इसी चिंताजनक दर से करते रहेंगे तो हमारे ये भंडार शीघ्र ही रिक्त हो जाएँगे। ऐसी स्िथति को टालने के उद्देश्यसे ऊजार् के वैकल्िपक स्रोतों की खोज की गइर्। परंतु आज भी हम अपनी ऊजार् की कोयलापेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस जल नाभ्िाकीय पवन चित्रा 14.1 भारत में हमारी ऊजार्की आवश्यकताओं के लिए ऊजार् के प्रमुख स्रोतों को दशार्ने वालावृत्तारेख अध्िकांश आवश्यकताओं की पूतिर् के लिए जीवाश्मी ईंधनों पर बहुत वुफछ निभर्रता बनाए हुए हैं ;चित्रा 14.1द्ध जीवाश्मी ईंध्न को जलाने की अन्य हानियाँ भी हैं। हमने कक्षा 9 में कोयले तथा पेट्रोलियम - उत्पादों को जलाने से होने वाले वायु प्रदूषण के बारे में सीखा था। जीवाश्मी ईंध्न के जलने पर मुक्त होने वाले काबर्न, नाइट्रोजन तथा सल्पफर के आॅक्साइड, अम्लीय आॅक्साइड होते हैं। इनसे अम्लीय वषार् होती है जो हमारे जल तथा मृदा के संसाध्नों को प्रभावित करती है। वायु प्रदूषण की समस्या के अतिरिक्त काबर्न डाइआॅक्साइड जैसी गैसों के ग्रीन हाउस ;पौध्घरद्ध प्रभाव को याद कीजिए। इस पर विचार कीजिए! यदि हमें विद्युत आपूतिर् न मिले तो हमारे जीवन में क्या परिवतर्न आ जाएगा।किसी भी देश में प्रत्येक व्यक्ित की विद्युत ऊजार् की उपलब्ध्ता उस देश के विकास के माप का एक प्राचल है। जीवाश्मी ईंध्न के जलाने के कारण उत्पन्न होने वाले प्रदूषण को वुफछ सीमाओं तक दहन प्रक्रम की दक्षता में वृि करके कम किया जा सकता है। इसी के साथ दहन के पफलस्वरूप निकलने वाली हानिकर गैसों तथा राखों के वातावरण में पलायन को कम करने वाली विविध् तकनीकांे द्वारा घटाया जा सकता है। क्या आप यह जानते हैं कि जीवाश्मी ईंधन का गैस स्टोवों ;चूल्होंद्ध तथा वाहनों में प्रत्यक्ष रूप से उपयोग होने के अतिरिक्त विद्युत उत्पन्न करने के लिए भी प्रमुख ईंध्न के रूप में उपयोग होता है। आइए, अब हम एक छोटा - सा संयंत्रा बनाकर इससे वुफछ विद्युत उत्पन्न करें और यहदेखें कि ऊजार् के इस सरल एवं उपयोगी रूप को उत्पन्न करने के लिए क्या - क्या करना होता है। विद्युत उत्पन्न करने के लिए यह हमारा टरबाइन है। सरलतम टरबाइनों का गतिशील भाग रोटर - ब्लेड संयोजन है। गतिशील तरल, ब्लेडों ;पंखुडियोंद्ध पर उन्हें घुमाने के लिएिया करता है और रोटर को ऊजार् प्रदान करता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि मूलरूप से हमें रोटर की पंखुडि़यों को एक गति देनी होती है ताकि वह यांत्रिाक ऊजार् को विद्युत ऊजार् में रूपांतरित करने के लिए डायनेमो के शैफ्रट को घुमा दे। विद्युत ऊजार्,ऊजार् का वह रूप है जो आज के परिदृश्य में एक आवश्यकता बन गइर् है। डायनेमोके शैफ्रट को घुमाने के विविध् ढंग हो सकते हैं, परंतु किस ढंग को अपनाया जाए यह संसाधनों की उपलब्ध्ता पर निभर्र करता है। निम्नलिख्िात अनुभागों में हम यह देखेंगे किटरबाइन को घुमाकर विद्युत उत्पन्न करने के लिए ऊजार् के विविध् स्रोतों का किस प्रकार उपयोग किया जा सकता है। भापनली बल्ब टेबिल टेनिस बाॅल में धतु कीऊष्मा पंखुडि़याँ चित्रा 14.2 ताप विद्युत उत्पादन की प्रिया को निदश्िार्त करने के लिए माॅडल 14ण्2ण्2 तापीय विद्युत संयंत्रा विद्युत संयंत्रों में प्रतिदिन विशाल मात्रा में जीवाश्मी ईंध्न का दहन करके जल उबालकर भाप बनाइर् जाती है जो टरबाइनों को घुमाकर विद्युत उत्पन्न करती है। समान दूरियों तक कोयले तथा पेट्रोलियम के परिवहन की तुलना में विद्युत संचरण अध्िक दक्ष होता है। यही कारण है कि बहुत से तापीय विद्युत संयंत्रा कोयले तथा तेल के क्षेत्रों के निकट स्थापित किए गए हैं। इन संयंत्रों को तापीय विद्युत संयंत्रा कहने का कारण यह है किइन संयंत्रों में ईंधन के दहन द्वारा ऊष्मीय ऊजार् उत्पन्न की जाती है जिसे विद्युत ऊजार् में रूपांतरित किया जाता है। 14ण्2ण्3 जल विद्युत संयंत्रा ऊजार् का एक अन्य पारंपरिक स्रोत बहते जल की गतिज ऊजार् अथवा किसी ऊँचाइर् परस्िथत जल की स्िथतिज ऊजार् है। जल विद्युत संयंत्रों में गिरते जल की स्िथतिज ऊजार् को विद्युत में रूपांतरित किया जाता है। चूँकि ऐसे जल - प्रपातों की संख्या बहुत कम हैजिनका उपयोग स्िथतिज ऊजार् के स्रोत के रूप में किया जा सके, अतः जल विद्युत संयंत्रों को बाँधें से संब( किया गया है। पिछली शताब्दी में सारे विश्व में बहुत बड़ी संख्या में बाँध् बनाए गए हैं जैसा कि हम चित्रा 14.1 में देख सकते हैं। भारत में हमारीऊजार् की माँग के चैथाइर् भाग की पूतिर् जल विद्युत संयंत्रों द्वारा होती है। जल विद्युत उत्पन्न करने के लिए नदियों के बहाव को रोककर बड़े जलाशयों;कृत्रिाम झीलोेंद्ध में जल एकत्रा करने के लिए ऊँचे - ऊँचे बाँध् बनाए जाते हैं। इन जलाशयों में जल संचित होता रहता है जिसके पफलस्वरूपइनमें भरे जल का तल ऊँचा हो जाता है। बाँध् केऊपरी भाग से पाइपों द्वारा जल, बाँध् के आधर के पास स्थापित टरबाइन के ब्लेडों पर मुक्त रूप से गिरता है पफलस्वरूप टरबाइन के ब्लेड घूणर्न गति करते हैं और जनित्रा द्वारा विद्युत उत्पादन होता है ;देख्िाए चित्रा 14.3द्ध। चूँकि हर बार जब भी वषार् होती है, जलाशय पुनःजल से भर जाते हैं, इसीलिए जल विद्युत ऊजार् एकनवीकरणीय ऊजार् स्रोत है। अतः हमंे जीवाश्मी ईंध्न की भाँति, जो किसी न किसी दिन अवश्य समाप्त हो जाएँगे, जल विद्युत स्रोतों के समाप्त होने की कोइर् चिंता नहीं होती। परंतु, बडे़ - बड़े बाँधें के निमार्ण के साथ वुुफछ समस्याएँ भी जुड़ी हैं। बाँधें का केवल वुफछ सीमित क्षेत्रों में ही निमार्ण किया जा सकता है तथा इनके लिए पवर्तीय क्षेत्राअच्छे माने जाते हैं। बाँधें के निमार्ण से बहुत - सी कृष्िायोग्य भूमि तथा मानव आवास डूबने के कारण, नष्ट हो जाते हैं। बाँध् के जल में डूबने के कारण बड़े - बड़े पारिस्िथतिक तंत्रा नष्ट हो जाते हैं। जो पेड़ - पौध्े, वनस्पति आदि जल में डूब जाते हैं वे अवायवीय परिस्िथतियों में सड़ने लगते हैं और विघटित होकर विशाल मात्रा में मेथैन गैस उत्पन्न करते हैं जो कि एक ग्रीन हाउस गैस है। बाँधों के निमार्ण से विस्थापित लोगों के संतोषजनक पुनवार्स व क्षतिपूतिर् की समस्या भी उत्पन्न हो जाती है। गंगा नदी पर टिहरी बाँध् के निमार्ण तथा नमर्दा नदी पर सरदार सरोवर बाँध् के निमार्ण की परियोजनाओं का विरोध् इसी प्रकार की समस्याओं के कारण ही हुआ था। 14ण्2ण्4 ऊजार् के पारंपरिक स्रोतों के उपयोग के लिए प्रौद्योगिकी में सुधार जैव - मात्रा ;बायो - मासद्ध हम यह वणर्न कर ही चुके हैं कि प्राचीन काल से ही लकड़ी का ईंध्न के रूप में उपयोग किया जाता रहा है। यदि हम यह सुनिश्िचत कर लें कि पयार्प्त वृक्ष लगाए जाते रहेंगे तो जलाने की लकड़ी की निरंतर आपूतिर् संभव हो सकती है। ईंध्न के रूप में उपलों के दहन से आप भलीभँाति परिचित हैं। भारत में पशुधन की विशाल संख्या भी हमें ईंधन के स्थायी स्रोत की उपलब्धता के बारे में आश्वस्त कर सकती है। चूँकि ये ईंधन पादप एवं जंतु उत्पाद हैं, अतः इन ईंध्नों के स्रोत को हम जैव - मात्रा कहते हैं।परंतु ये ईंधन अध्िक ऊष्मा उत्पन्न नहीं करते तथा इन्हें जलाने पर अत्यिाक ध्ुआँ निकलता है इसीलिए, इन ईंध्नों की दक्षता में वृि के लिए प्रौद्योगिकी का सहारा आवश्यक है। जब लकड़ी को वायु की सीमित आपूतिर् में जलाते हैं तो उसमें उपस्िथत जल तथा वाष्पशील पदाथर् बाहर निकल जाते हैं तथा अवशेष के रूप में चारकोल रहजाता है। चारकोल बिना ज्वाला के जलता है, इससे अपेक्षाकृत कम ध्ुआँ निकलता हैतथा इसकी ऊष्मा उत्पन्न करने की दक्षता भी अिाक होती है। इसी प्रकार गोबर, पफसलों के कटने के पश्चात बचे अवश्िाष्ट, सब्िशयों के अपश्िाष्ट जैसे विविध् पादप तथा वाहित मल जब आॅक्सीजन की अनुपस्िथति में अपघटित होते हैं तो बायो गैस ;जैव गैसद्ध निकलती है। चूँकि इस गैस को बनाने में उपयोग होने वाला आरंभ्िाक पदाथर् मुख्यतः गोबर है, इसलिए इसका प्रचलित नाम फ्गोबर गैसय् है। जैव गैस को एक संयंत्रा में उत्पन्न किया जाता है जिसे चित्रा 14.4 में दशार्या गया है। इस संयंत्रा में ईंटों से बनी गुबंद जैसी संरचना होती है। जैव गैस बनाने के लिए मिश्रण टंकी में गोबर तथा जल का एक गाढ़ा घोल, जिसे कदर्म ;ेसनततलद्ध कहते हैं, बनाया जाता है जहाँ से इसे संपाचित्रा ;कपहमेजमतद्ध में डाल देते हैं। संपाचित्रा चारों ओर से बंद एक कक्ष होता है जिसमें आॅक्सीजन नहीं होती। अवायवीय सूक्ष्मजीव जिन्हें जीवित रहने के लिए आॅक्सीजन की आवश्यकता नहीं होती, गोबर की स्लरी के जटिल यौगिकों का अपघटन कर देते हैं। अपघटन - प्रक्रम पूरा होने तथा इसके पफलस्वरूप मेथैन, काबर्न डाइआॅक्साइड, हाइड्रोजन तथा हाइड्रोजन सल्पफाइड जैसी गैसंे उत्पन्न होने में वुफछ दिन लगते हैं।जैव गैस को संपाचित्रा के ऊपर बनी गैस टंकी में संचित किया जाता है। जैव गैस को गैस टंकी से उपयोग के लिए पाइपों द्वारा बाहर निकाल लिया जाता है।जैव गैस एक उत्तम ईंध्न है क्योंकि इसमें 75 प्रतिशत तक मेथैन गैस होती है। यह ध्ुआँ उत्पन्न किए बिना जलती है। लकड़ी, चारकोल तथा कोयले के विपरीत जैव गैस के जलने के पश्चात राख जैसा कोइर् अपश्िाष्ट शेष नहीं बचता। इसकी तापन क्षमता उच्च होती है। जैव गैस का उपयोग प्रकाश के स्रोत के रूप में भी किया जाता है। जैवगैस संयंत्रा में शेष बची स्लरी को समय - समय पर संयंत्रा से बाहर निकालते हैं। इस स्लरी में नाइट्रोजन तथा पफाॅस्पफोरस प्रचुर मात्रा में होते हैं,अतः यह एक उत्तम खाद के रूप में काम आती है। इस प्रकार जैव अपश्िाष्टों व वाहित मल के उपयोग द्वारा जैव गैस निमिर्त करने से हमारेकइर् उद्देश्यों की पूतिर् हो जाती है। इससे हमें ऊजार् का सुविधजनक दक्षस्रोत मिलता है, उत्तम खाद मिलती है और साथ ही अपश्िाष्ट पदाथो± केनिपटारे का सुरक्ष्िात उपाय भी मिल जाता है। जैव - मात्रा ऊजार् का नवीकरणीय स्रोत है। क्या आप भी यही सोचते हैं? पवन ऊजार् कक्षा 9 में हमने यह देखा कि किस प्रकार सूयर् के विकिरणों द्वारा भूखंडों तथा जलाशयों के असमान तप्त होने के कारण वायु में गति उत्पन्न होतीहै तथा पवनों का प्रवाह होता है। पवनों की गतिज ऊजार् का उपयोग कायो±को करने में किया जा सकता है। पवन ऊजार् का उपयोग शताब्िदयों से पवन - चक्िकयों द्वारा यांत्रिाक कायो± को करने में होता रहा है। उदाहरण के संपाचित्रा ;डाइजेस्टरद्ध चित्रा 14.4 जैव गैस संयंत्रा का व्यवस्था आरेख लिए, किसी पवन - चक्की द्वारा प्रचालित जलपंप ;पानी को ऊपर उठाने वाले पंपोंद्ध में पवन - चक्की की पंखुडि़यों की घूणीर् गति का उपयोग वुफओं से जल खींचने के लिएहोता है। आजकल पवन ऊजार् का उपयोग विद्युत उत्पन्न करने में भी किया जा रहा है। पवन - चक्की की संरचना वस्तुतः किसी ऐसे विशाल विद्युत पंखे के समान होती है जिसेकिसी दृढ़ आधर पर वुफछ ऊँचाइर् पर खड़ा कर दिया जाता है ;चित्रा 14.5द्ध। पवन - चक्की की घूणीर् गति का उपयोग विद्युत उत्पन्न करने के लिए विद्युत जनित्रा के टरबाइन को घुमाने के लिए किया जाता है। किसी एकल पवन चक्की का निगर्त ;अथार्त उत्पन्न विद्युतद्ध बहुत कम होता है जिसका व्यापारिक उपयोग संभव नहीं होता। अतः किसी विशाल क्षेत्रा में बहुत - सी पवन - चक्िकयाँ लगाइर् जाती हैं तथा इस क्षेत्रा कोपवन ऊजार् पफामर् कहते हैं। व्यापारिक स्तर पर विद्युत प्राप्त करने के लिए किसी ऊजार् पफामर् की सभी पवन - चक्िकयों को परस्पर युग्िमत कर लिया जाता है जिसकेपफलस्वरूप प्राप्त नेट ऊजार् सभी पवन - चक्िकयों द्वारा उत्पन्न विद्युत ऊजार्ओं के योग के बराबर होती है। पवन ऊजार् नवीकरणीय ऊजार् का एक पयार्वरणीय - हितैषी एवं दक्ष स्रोत है। इसके द्वारा विद्युत उत्पादन के लिए बार - बार ध्न खचर् करने की आवश्यकता नहीं होती।परंतु पवन ऊजार् के उपयोग करने की बहुत - सी सीमाएँ हैं। पहली सीमा यह है किपवन ऊजार् पफामर् केवल उन्हीं क्षेत्रों में स्थापित किए जा सकते हैं जहाँ वषर् के अिाकांश दिनों में तीव्र पवन चलती हों। टरबाइन की आवश्यक चाल को बनाए रखने के लिए पवन की चाल भी 15 ाउध्ी से अध्िक होनी चाहिए। इसके साथ हीसंचायक सेलों जैसी कोइर् पूतिर्कर सुविध भी होनी चाहिए जिसका उपयोग ऊजार् की आवश्यकताओं की पूतिर् के लिए उस समय किया जा सके जब पवन नहीं चलतीहों। ऊजार् पफामर् स्थापित करने के लिए एक विशाल भूखंड की आवश्यकता होती है। 1डॅ के जनित्रा के लिए पवन पफामर् को लगभग 2 हेक्टेयर भूमि चाहिए। पवन ऊजार् पफामर् स्थापित करने की आरंभ्िाक लागत अत्यध्िक है। इसके अतिरिक्त पवन - चक्िकयों के दृढ़ आधर तथा पंखुडि़याँ वायुमंडल में खुले होने के कारण अंध्ड़, चक्रवात, धूप,वषार् आदि प्राकृतिक थपेड़ों को सहन करते हैं, अतः उनके लिए उच्च स्तर के रखरखाव की आवश्यकता होती है। प्रश्न 123 जीवाश्मी ईंध्न की क्या हानियाँ हैं?हम ऊजार् के वैकल्िपक स्रोतों की ओर क्यों ध्यान दे रहे हैं?हमारी सुविध के लिए पवनों तथा जल ऊजार् के पारंपरिक उपयोग में किस प्रकार के सुधार किए गए हैं? घ् 14.3 वैकल्िपक अथवा गैर - परंपरागत ऊजार् स्रोत प्रौद्योगिकी में उन्नति के साथ ही हमारी ऊजार् की माँग में दिन प्रतिदिन वृि हो रही है। हमारी जीवन शैली में भी निरंतर परिवतर्न हो रहा है। हम अपने कायो± को करने के लिए अध्िकाध्िक मशीनों का उपयोग करते हैं। जैसे - जैसे औद्योगीकरण से हमारा जीवन स्तर उन्नत हो रहा है हमारी मूल आवश्यकताओं में भी निरंतर वृि हो रही है। जैसे - जैसे हमारी ऊजार् की माँग में वृि होती जाती है, वैसे - वैसे ही हमें अध्िकऊजार् स्रोतों की आवश्यकता होती है। हम उपलब्ध् एवं ज्ञात ऊजार् स्रोतों के अध्िक दक्षउपयोग के लिए प्रौद्योगिकी विकसित करते हैं तथा ऊजार् के नए स्रोतों की खोज करतेहैं। जिस किसी भी ऊजार् के नए स्रोत को हम खोजते हैं उसी के उपयोग को मस्ितष्कमें रखकर विश्िाष्ट युक्ितयाँ विकसित की जाती हैं। अब हम ऊजार् के उन नवीनतम स्रोतों पर जिनका हम उपयोग करना चाहते हैं तथा उस प्रौद्योगिकी की ओर जिसे इनस्रोतों से संचित ऊजार् का दोहन करने के लिए डिशाइन किया गया है, अपनी दृष्िट डालेंगे। क्या आप जानते हैं? 14ण्3ण्1 सौर ऊजार् सूयर् लगभग 5 करोड़ वषर् से निरंतर वतर्मान दर पर विशाल मात्रा में ऊजार् विकरित कररहा है तथा इस दर से भविष्य में भी लगभग 5 करोड़ वषर् तक ऊजार् विकरित करतारहेगा। सौर ऊजार् का केवल एक लघु भाग ही पृथ्वी के वायुमंडल की बाह्य परतों पर पहुँच पाता है। इसका लगभग आध भाग वायुमंडल से गुजरते समय अवशोष्िात हो जाता है तथा शेष भाग पृथ्वी के पृष्ठ पर पहुँचता है। भारत एक भाग्यशााली देश है क्योंकि वषर् के अिाकांश दिनों में हमें सौर ऊजार् प्राप्त होती है। लगाए गए अनुमानों के अनुसार हमारा देश प्रति वषर् 500,000,000 करोड़ किलोवाट घंटा ;अथार्त 5000टिªलियन किलोवाट घंटाद्ध सौर ऊजार् प्राप्त करता है। स्वच्छ आकाश ;बादल रहितद्ध की स्िथति होने परपृथ्वी के किसी क्षेत्रा में प्रतिदिन प्राप्त होने वाली सौर ऊजार् का औसत परिमाण 4 से 7 ाॅीध्उ2 के बीच होता है। पृथ्वी के वायुमंडल की परिरेखा पर सूयर् की किरणों के लंबवत स्िथत खुले क्षेत्रा के प्रतिएकांक क्षेत्रापफल पर प्रति सेकंड पहुँचने वाली सौर ऊजार् को सौर - स्िथरांक कहते हैं, जबकि इस क्षेत्रा को सूयर् से पृथ्वी के बीच की औसत दूरी पर माना गया है। अनुमानतः इसका सन्िनकट मान 1.4 ाश्र प्रति सेकंड प्रति वगर्मीटर अथवा 1.4 ाॅध्उ2 है। ियाकलाप 14.5 ़ऽ दो शंक्वाकर फ्रलास्क लीजिए। इनमें से एक को काला तथा दूसरे को सपेफद पेंट से पोतिए। दोनों में जल भरिए। ऽ इन शंक्वाकार फ्रलास्कों को एक से डेढ़ घंटे तक सीध्े ध्ूप में रख्िाए। ऽ दोनों फ्रलास्कों को स्पशर् कीजिए। इनमें कौन तप्त है? आप इन दोनों फ्रलास्कों के जल के ताप तापमापी द्वारा भी माप सकते हैं। ऽ क्या आप कोइर् ऐसा उपाय सोच सकते हैं जिसके द्वारा इस ज्ञान का उपयोग आप अपने दैनिक जीवन में कर सवेंफ। परावतिर्त होते सवर्सम परिस्िथतियों में परावतर्क पृष्ठ अथवा श्वेत ;सप़ेफदद्धहुए प्रकाश पृष्ठ की तुलना में कृष्ण ;कालाद्ध पृष्ठ अिाक ऊष्माकिरणें अवशोष्िात करता है। सौर वुफकरांे ;चित्रा 14.6द्ध तथा सौर जलदपर्ण तापकों की कायर् विध्ि में इसी गुण का उपयोग किया जाता है। वुफछ सौर वुफकरों में सूयर् की किरणों को पफोकसित करनेकाँच की शीट के लिए दपर्णों का उपयोग किया जाता है जिससे इनका ताप और उच्च हो जाता है। सौर वुफकरों में काँच की शीट का ढक्कन होता है। याद कीजिए पौध्घर प्रभाव के विषय में हमने क्या सीखा था। क्या इससे काँच के ढक्कन को उपयोग चित्रा 14.6 सौर वुफकर करने का कारण स्पष्ट होता है? ऽ किसी सौर वुफकर और/अथवा सौर जल तापक की संरचना तथा कायर् प्रणाली काविशेषकर इस दृष्िट से अध्ययन कीजिए कि उसमें ऊष्मारोध्न वैफसे किया जाता है तथाअध्िकतम ऊष्मा अवशोषण वैफसे सुनिश्िचत करते हैं। ऽ सस्ती सुलभ सामग्री का उपयोग करके किसी सौर वुफकर अथवा सौर जल तापक का डिशाइन बनाकर उसकी संरचना कीजिए और यह जाँच करिए कि आपके इस निकाय में अध्िकतम ताप कितना प्राप्त किया जा सकता है। ऽ सौर वुफकरों अथवा सौर जल तापकों के उपयोग की सीमाओं एवं विशेषताओं पर चचार् कीजिए। यह सरलता से देखा जा सकता है कि ये युक्ितयाँ दिन के वुफछ निश्िचत समयों परही उपयोगी होती हैं। सौर ऊजार् के उपयोग की इस सीमा पर सौर सेलों का उपयोगकरके पार पाया जाता है। सौर सेल सौर ऊजार् को विद्युत ऊजार् में रूपांतरित करते हैं। ध्ूप में रखे जाने पर किसी प्ररूपी सौर सेल से 0.5 - 1.0 ट तक वोल्टता विकसित होती है तथा लगभग 0.7 ॅ विद्युत उत्पन्न कर सकते हैं। जब बहुत अध्िक संख्या में सौर सेलों को संयोजित करते हैं तो यह व्यवस्था सौर पैनल कहलाती है ;चित्रा 14.7द्ध जिनसे व्यावहारिक उपयोग के लिए पयार्प्त विद्युत प्राप्त हो जाती है। सौर सेलों के साथ संब( प्रमुख लाभ यह है कि इनमें कोइर् भी गतिमान पुरजा नहीं होता, इनका रखरखाव सस्ता है तथा ये बिना किसी पफोकसन युक्ित के कापफी संतोषजनक कायर् करते हैं। सौर सेलों के उपयोग करने का एक अन्य लाभ यह है कि इन्हें सुदूर तथा अगम्य स्थानों में स्थापित किया जा सकता है। इन्हें ऐसे छितरे बसे हुए क्षेत्रों में भी स्थापित किया जा सकता है जहाँ शक्ित संचरण के लिए केबल बिछाना अत्यंत खचीर्ला तथा व्यापारिक दृष्िट से व्यावहारिक नहीं होता।सौर सेल बनाने के लिए सिलिकाॅन का उपयोग किया जाता है जो प्रकृति में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं, परंतु सौर सेलों को बनाने में उपयोग होने वाले विश्िाष्ट श्रेणी के सिलिकाॅन की उपलब्ध्ता सीमित है। सौर सेलों के उत्पादन की समस्त प्रिया अभी भी बहुत महँगी है। सौर सेलों को परस्पर संयोजित करके सौर पैनल बनाने में सिल्वर ;चाँदीद्ध का उपयोग होता है जिसके कारण लागत में और वृि हो जाती है। उच्च लागत तथा कम दक्षता होने पर भी सौर सेलों का उपयोग बहुत से वैज्ञानिक तथा प्रौद्योगिक अनुप्रयोगों के लिए किया जाता है। मानव - निमिर्त उपग्रहों तथा अंतरिक्ष अन्वेषक युक्ितयोंजैसे मासर् आॅ£बटरों में सौर सेलों का उपयोग प्रमुख ऊजार् स्रोत के रूप में किया जाता है। रेडियो अथवा बेतार संचार तंत्रों अथवा सुदूर क्षेत्रों के टी.वी. रिले वेंफद्रों में सौर सेल पैनल उपयोग किए जाते हैं। ट्रैपिफक सिग्नलों, परिकलकों तथा बहुत से ख्िालौनों में सौर सेल लगे होते हैं। सौर सेल पैनल विश्िाष्ट रूप से डिशाइन की गइर् आनत छतों परस्थापित किए जाते हैं ताकि इन पर अध्िक से अध्िक सौर ऊजार् आपतित हो। तथापि अत्यध्िक मँहगा होने के कारण सौर सेलों का घरेलू उपयोग अभी तक सीमित है। चित्रा 14.7 सौर पैनल 14ण्3ण्2 समुद्रों से ऊजार् ज्वारीय ऊजार् घूणर्न गति करती पृथ्वी पर मुख्य रूप से चंद्रमा के गुरुत्वीय ख्िांचाव के कारण सागरों में जल का स्तर चढ़ता व गिरता रहता है। यदि आप समुद्र के निकट रहते हैं अथवा कभी समुद्र के निकट किसी स्थान पर जाते हैं तो प्रयास कीजिए कि आप यह प्रेक्षण कर सवेंफ कि समुद्र में जल का स्तर दिन में किस प्रकार परिवतिर्त होता है। इस परिघटना को ज्वार - भाटा कहते हैं। ज्वार - भाटे में जल के स्तर के चढ़ने तथा गिरने सेहमें ज्वारीय ऊजार् प्राप्त होती है। ज्वारीय ऊजार् का दोहन सागर के किसी संकीणर् क्षेत्रा पर बाँध् का निमार्ण करके किया जाता है। बाँध् के द्वार पर स्थापित टरबाइन ज्वारीयऊजार् को विद्युत ऊजार् में रूपांतरित कर देती है। आप स्वयं यह अनुमान लगा सकते हंै कि इस प्रकार के बाँध् निमिर्त किए जा सकने वाले स्थान सीमित हैं। तरंग ऊजार्इसी प्रकार, समुद्र तट के निकट विशाल तरंगों की गतिज ऊजार् को भी विद्युत उत्पन्न करने के लिए इसी ढंग से ट्रेप किया जा सकता है। महासागरों के पृष्ठ पर आर - पारबहने वाली प्रबल पवन तरंगें उत्पन्न करती है। तरंग ऊजार् का वहीं पर व्यावहारिकउपयोग हो सकता है जहाँ तरंगें अत्यंत प्रबल हों। तरंग ऊजार् को ट्रेप करने के लिए विविध् युक्ितयाँ विकसित की गइर् हैं ताकि टरबाइन को घुमाकर विद्युत उत्पन्न करने के लिए इनका उपयोग किया जा सके। महासागरीय तापीय ऊजार् समुद्रों अथवा महासागरों के पृष्ठ का जल सूयर् द्वारा तप्त हो जाता है जबकि इनके गहराइर्वाले भाग का जल अपेक्षाकृत ठंडा होता है। ताप में इस अंतर का उपयोग सागरीयतापीय ऊजार् रूपांतरण विद्युत संयंत्रा ;व्बमंद ज्ीमतउंस म्दमतहल ब्वदअमतेपवद च्संदज या व्ज्म्ब् विद्युत संयंत्राद्ध में ऊजार् प्राप्त करने के लिए किया जाता है। व्ज्म्ब् विद्युत संयंत्रा केवल तभी प्रचालित होते हंै जब महासागर के पृष्ठ पर जल का ताप तथा 2 ाउ तक की गहराइर् पर जल के ताप में 20 वब् का अंतर हो। पृष्ठ के तप्त जल का उपयोग अमोनिया जैसे वाष्पशील द्रवों को उबालने में किया जाता है। इस प्रकार बनी द्रवों की वाष्प पिफर जनित्रा के टरबाइन को घुमाती है। महासागर की गहराइयों से ठंडे जल को पंपों से खींचकर वाष्प को ठंडा करके पिफर से द्रव में संघनित किया जाता है।महासागरों की ऊजार् की क्षमता ;ज्वारीय - ऊजार्, तरंग - ऊजार् तथा महासागरीय - तापीयऊजार्द्ध अति विशाल है परंतु इसके दक्षतापूणर् व्यापारिक दोहन में कठिनाइयाँ हैं। 14ण्3ण्3 भूतापीय ऊजार् भौमिकीय परिवतर्नों के कारण भूपपर्टी में गहराइयों पर तप्त क्षेत्रोें में पिघली चट्टðानें ऊपर ध्केल दी जाती हैं जो वुफछ क्षेत्रों में एकत्रा हो जाती हैं। इन क्षेत्रों को तप्त स्थल कहते हैं। जब भूमिगत जल इन तप्त स्थलों के संपवर्फ में आता है तो भाप उत्पन्न होती है। कभी - कभी इस तप्त जल को पृथ्वी के पृष्ठ से बाहर निकलने के लिए निकास मागर् मिल जाता है। इन निकास मागो± को गरम चश्मा अथवा ऊष्ण स्रोत कहते हैं। कभी - कभी यह भाप चट्टðानों के बीच में पँफस जाती है जहाँ इसका दाब अत्यध्िक हो जाता है। तप्त स्थलों तक पाइप डालकर इस भाप को बाहर निकाल लिया जाता है। उच्च दाब पर निकली यह भाप विद्युत जनित्रा की टरबाइन को घुमाती है जिससे विद्युत उत्पादन करते हैं। इसके द्वारा विद्युत उत्पादन की लागत अध्िक नहीं है परंतु ऐसे बहुतकम क्षेत्रा हैं जहाँ व्यापारिक दृष्िटकोण से इस ऊजार् का दोहन करना व्यावहारिक है।न्यूजीलैंड तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में भूतापीय ऊजार् पर आधरित कइर् विद्युत शक्ित संयंत्रा कायर् कर रहे हैं। 14ण्3ण्4 नाभ्िाकीय ऊजार् नाभ्िाकीय ऊजार् वैफसे उत्पन्न होती है? नाभ्िाकीय विखंडन अभ्िािया एक ऐसी प्रिया है जिसमें किसी भारी परमाणु ;जैसे यूरेनियम, प्लूटोनियम अथवा थोरियमद्ध के नाभ्िाकको निम्न ऊजार् न्यूट्राॅन से बमवारी कराकर हलके नाभ्िाकों में तोड़ा जा सकता है। जबऐसा किया जाता है तो विशाल मात्रा में ऊजार् मुक्त होती है। यह तब होता है जब मूल नाभ्िाक का द्रव्यमान व्यष्िटगत उत्पादों के द्रव्यमानों के योग से वुफछ ही अध्िक होता है।उदाहरण के लिए यूरेनियम, के एक परमाणु के विखंडन में जो ऊजार् मुक्त होती है वहकोयले के किसी काबर्न परमाणु के दहन से उत्पन्न ऊजार् की तुलना में 1 करोड़ गुनी अध्िक होती है। विद्युत उत्पादन के लिए डिशाइन किए जाने वाले नाभ्िाकीय संयंत्रों में इस प्रकार के नाभ्िाकीय ईंधन स्वपोषी विखंडन शृखंला अभ्िािया का एक भाग होतेहैं जिनमें नियंत्रिात दर पर ऊजार् मुक्त होती है। इस मुक्त ऊजार् का उपयोग भाप बनाकर विद्युत उत्पन्न करने में किया जा सकता है। नाभ्िाकीय विद्युत शक्ित संयंत्रों का प्रमुख संकट पूणर्तः उपयोग होने के पश्चात शेष बचे नाभ्िाकीय ईंधन का भंडारण तथा निपटारा करना है क्योंकि शेष बचे ईंधन का यूरेनियम अब भी हानिकारक ;घातकद्ध कणों ;विकिरणोंद्ध में क्षयित होता है। यदि नाभ्िाकीय अपश्िाष्टों का भंडारण तथा निपटारा उचित प्रकार से नहीं होता तो इससे पयार्वरण संदूष्िात हो सकता है। इसके अतिरिक्त नाभ्िाकीय विकिरणों के आकस्िमक रिसाव का खतरा भी बना रहता है। नाभ्िाकीय विद्युत शक्ित संयंत्रों के प्रतिष्ठापन की अत्यध्िक लागत, पयार्वरणीय संदूषण का प्रबल खतरा तथा यूरेनियम की सीमितउपलब्धता बृहत स्तर पर नाभ्िाकीय ऊजार् के उपयोग को निषेध्क बना देते हैं।नाभ्िाकीय विद्युत शक्ित संयंत्रों के निमार्ण से पूवर् नाभ्िाकीय ऊजार् का उपयोग पहले विनाश के लिए किया गया। किसी नाभ्िाकीय हथ्िायार में होने वाली शृंखला विखंडन अभ्िािया का मूल सि(ांत नियंत्रिात नाभ्िाकीय रिएक्टर के सि(ांत के समान है, परंतु दोनों प्रकार की युक्ितयों का निमार्ण एक - दूसरे से पूणर्तः भ्िान्न होता है। प्रश्न 1234 सौर वुफकर के लिए कौन - सा दपर्णदृअवतल, उत्तल अथवा समतलदृसवार्ध्िक उपयुक्त होता है? क्यों? महासागरों से प्राप्त हो सकने वाली ऊजार्ओं की क्या सीमाएँ हैं?भूतापीय ऊजार् क्या होती है?नाभ्िाकीय ऊजार् का क्या महत्व है? घ् 14.4 पयार्वरण विषयक सरोकार पिछले अनुभाग में हमने ऊजार् के विविध् स्रोतों के विषय में अध्ययन किया था। इनमेंसे किसी भी प्रकार की ऊजार् का दोहन पयार्वरण में किसी न किसी रूप में विक्षोभउत्पन्न करता है। किसी भी परिस्िथति में जब हम किसी ऊजार् स्रोत का चयन करते हैं तो वह निम्नलिख्िात कारकों पर निभर्र करता हैदृ दृउस ऊजार् स्रोत से ऊजार् प्राप्त करने में सरलता, दृउस ऊजार् स्रोत से ऊजार् प्राप्त करने में मितव्ययता, दृउस ऊजार् स्रोत से ऊजार् प्राप्त करने की उपलब्ध् प्रौद्योगिकी की दक्षता, तथा दृउस ऊजार् स्रोत को उपयोग करने से पयार्वरण को होने वाली क्षति। यद्यपि हम ब्छळ ;संपीडित प्राकृतिक गैसद्ध जैसे फ्स्वच्छय् ईंध्न के विषय में बात करते हैं, परंतु यह कहना अध्िक सही होता है कि कौन - सा स्रोत किस स्रोत की अपेक्षा अध्िक स्वच्छ है। हम यह पहले ही देख चुके हैं कि जीवाश्मी ईंध्न जलाने से वायु प्रदूष्िात होती है। वुफछ प्रकरणों में जैसे सौर - सेल जैसी वुफछ युक्ितयों का वास्तविक प्रचालन प्रदूषण मुक्त हो सकता है। परंतु यह हो सकता है कि उस युक्ित के संयोजन में पयार्वरणीय क्षति हुइर् हो। इस क्षेत्रा में निरंतर अनुसंधान हो रहे हैं और इस प्रकार की युक्ितयों के निमार्ण के लिए प्रयास किए जा रहे हैं जो अध्िक समय तक कायर् कर सवेंफ तथा अपने समस्त कायर्काल में कम से कम क्षति पहुँचाएँ। प्रश्न 12 क्या कोइर् ऊजार् स्रोत प्रदूषण मुक्त हो सकता है? क्यों अथवा क्यों नहीं? राॅकेट ईंध्न के रूप में हाइड्रोजन का उपयोग किया जाता रहा है? क्या आप इसे ब्छळ की तुलना में अध्िक स्वच्छ ईंध्न मानते हैं? क्यों अथवा क्यों नहीं? घ् 14.5 कोइर् ऊजार् स्रोत हमारे लिए कब तक बना रह सकता है? हमने पहले यह देख लिया है कि हम अध्िक समय तक जीवाश्मी ईंध्न पर निभर्र नहींरह सकते। इस प्रकार के स्रोतों को जो किसी न किसी दिन समाप्त हो जाएँगे, उन्हें ऊजार् के समाप्य स्रोत अथवा अनवीकरणीय स्रोत कहते हैं। इसके विपरीत, यदि हम लकड़ी जलाने में उपयोग होने वाले वृक्षों को प्रतिस्थापित करके जैवमात्रा का प्रबंध्नउचित प्रकार से करें, तो हम किसी निश्िचत दर पर ऊजार् की नियत आपूतिर् सुनिश्िचतकर सकते हैं। इस प्रकार के ऊजार् स्रोत जिनका पुनजर्नन हो सकता है, उन्हें ऊजार् के नवीकरणीय स्रोत कहते हैं।हमारे प्राकृतिक पयार्वरण में नवीकरणीय ऊजार् उपलब्ध् है। यह ऊजार्, ऊजार् की संतत अथवा आवतीर् धराओं के रूप में, अथवा भूमिगत भंडारों में इतनी विशाल मात्रा में संचित है कि इन भंडारों के खाली होने की दर व्यावहारिक दृष्िट से नगण्य है। प्रश्न 12 ऐसे दो ऊजार् स्रोतों के नाम लिख्िाए जिन्हें आप नवीकरणीय मानते हैं। अपने चयन के लिए तवर्फ दीजिए। ऐसे दो ऊजार् स्रोतों के नाम लिख्िाए जिन्हें आप समाप्य मानते हैं। अपने चयन के लिए तवर्फ दीजिए। घ्

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