अध्याय10 प्रकाशदृ परावतर्न तथाअपवतर्न हम इस संसार में अपने चारों ओर अनेक प्रकार की वस्तुएँ देखते हैं। तथापि, किसी अँधेरे कमरे में हम वुफछ भी देखने में असमथर् हैं। कमरे को प्रकाश्िात करने पर चीजें दिखलाइर् देने लगती हैं। वह क्या है जो वस्तुओं को दृश्यमान बनाता है। दिन के समय सूयर् का प्रकाश वस्तुओं को देखने में हमारी सहायता करता है। कोइर् वस्तु उस पर पड़ने वाले प्रकाश को परावतिर्त करती है। यह परावतिर्त प्रकाश जब हमारी आँखों द्वारा ग्रहण किया जाता है, तो हमें वस्तुओं को देखने योग्य बनाता है। हम किसी पारदशीर् माध्यम के आर - पार देख सकते हैं क्योंकि प्रकाश इसमें से पार ;जतंदेउपजजमकद्ध हो जाता है। प्रकाश से संब( अनेक सामान्य तथा अद्भुत परिघटनाएँ हैंऋ जैसेμदपर्णों द्वारा प्रतिबिंब का बनना, तारों का टिमटिमाना, इंद्रध्नुष के सुंदर रंग, किसी माध्यम द्वारा प्रकाश को मोड़ना आदि। प्रकाश के गुणों का अध्ययन इनके अन्वेषण में हमारी सहायता करेगा। अपने चारों ओर वुफछ सामान्य प्रकाश्िाक परिघटनाओं को देख कर हम यह निष्कषर् निकाल सकते हैं कि प्रकाश सरल रेखाओं में गमन करता प्रतीत होता है। यह तथ्य कि एक छोटा प्रकाश स्रोत किसी अपारदशीर् वस्तु की तीक्ष्ण छाया बनाता है, प्रकाश के एक सरलरेखीय पथ की ओर इंगित करता है, जिसे प्रायः प्रकाश किरण कहते हैं। इस अध्याय में हम प्रकाश के परावतर्न तथा अपवतर्न की परिघटनाओं का, प्रकाशके सरलरेखीय गमन का उपयोग करके, अध्ययन करेंगे। ये मूल धरणाएँ प्रकृति में घटनेवाली वुफछ प्रकाश्िाक परिघटनाओं के अध्ययन में हमारी सहायता करेंगी। इस अध्याय में हम गोलीय दपर्णों द्वारा प्रकाश के परावतर्न, प्रकाश के अपवतर्न एवं वास्तविक जीवन में उनके अनुप्रयोगों को समझने का प्रयत्न करेंगे। 10.1 प्रकाश का परावतर्न उच्च कोटि की पाॅलिश किया हुआ पृष्ठ, जैसे कि दपर्ण, अपने पर पड़नेवाले अिाकांश प्रकाश को परावतिर्त कर देता है। आप प्रकाश के परावतर्न के नियमों से पहले से ही परिचित हैं। आइए, इन नियमों को स्मरण करेंः ;पद्ध आपतन कोण, परावतर्न कोण के बराबर होता है, तथा ;पपद्ध आपतित किरण, दपर्ण के आपतन बिंदु पर अभ्िालंब तथा परावतिर्त किरण, सभी एक ही तल में होते हैं। परावतर्न के ये नियम गोलीय पृष्ठों सहित सभी प्रकार के परावतर्क पृष्ठों के लिए लागू होते हैं। आप समतल दपर्ण द्वारा प्रतिबिंब के बनने से परिचित हैं। प्रतिबिंब की क्या विशेषताएँ हैं? समतल दपर्ण द्वारा बना प्रतिबिंब सदैव आभासी तथा सीध होता है। प्रतिबिंब का साइश बिंब ;वस्तुद्ध के साइश के बराबर होता है। प्रतिबिंब दपर्ण के पीछे उतनी ही दूरी पर बनता है, जितनी दूरी पर दपर्ण के सामने ¯बब रखा होता है। इसके अतिरिक्त प्रतिबिंब पाश्वर् परिवतिर्त होता है। यदि परावतर्क पृष्ठ वित हों तो प्रतिबिंब वैफसे बनेंगे? आइए देखें। ियाकलाप 10.1 ऽ एक बड़ी चमकदार चम्मच लीजिए। इसके वित पृष्ठ में अपना चेहरा देखने का प्रयत्न कीजिए। ऽ क्या आप प्रतिबिंब देख पाते हैं? यह छोटा है या बड़ा? ऽ चम्मच को ध्ीरे - ध्ीरे अपने चेहरे से दूर ले जाइए। प्रतिबिंब को देखते रहिए। यह वैफसे परिवतिर्त होता है? ऽ चम्मच को उलटा कीजिए ;पलटिएद्ध तथा दूसरे पृष्ठ से ियाकलाप को दोहराइए। अब प्रतिबिंब वैफसा दिखलाइर् देता है? ऽ दोनों पृष्ठों पर प्रतिबिंब के अभ्िालक्षणों की तुलना कीजिए। चमकदार चम्मच का वित पृष्ठ एक वित दपर्ण की भाँति माना जा सकता है। सबसे अध्िक उपयोग में आने वाले सामान्यतः वित दपर्ण का प्रारूप गोलीय दपर्ण है। इस प्रकार के दपर्णों के परावतर्क पृष्ठ किसी गोले के पृष्ठ का एक भाग माना जा सकता है। ऐसे दपर्ण जिनका परावतर्क पृष्ठ गोलीय है, गोलीय दपर्ण कहलाते हैं। अब हम गोलीय दपर्णों के बारे में वुफछ विस्तार से अध्ययन करेंगे। ;ंद्ध;इद्ध अवतल दपर्ण उत्तल दपर्ण चित्रा 10.1 गोलीय दपर्णों का आरेखीय निरूपणऋ छायांकित भाग परावतर्क नहीं है। 10.2 गोलीय दपर्ण गोलीय दपर्ण का परावतर्क पृष्ठ अंदर की ओर या बाहर की ओर वित हो सकता है। गोलीय दपर्ण जिसका परावतर्क पृष्ठ अंदर की ओर अथार्त गोले के वेंफद्र की ओर वित है, वह अवतल दपर्ण कहलाता है। वह गोलीय दपर्ण जिसका परावतर्क पृष्ठ बाहर की ओर वित है, उत्तल दपर्ण कहलाता है। इन दपर्णों का आरेखीय निरूपण चित्रा 10.1 में किया गया है। इन चित्रों में नोट कीजिए कि दपर्णों का पृष्ठभाग छायांकित है। अब आप समझ सकते हैं कि चम्मच का अंदर की ओर वित पृष्ठ लगभगअवतल दपर्ण जैसा है तथा चम्मच का बाहर की ओर उभरा पृष्ठ लगभग उत्तल दपर्ण जैसा है। गोलीय दपर्णों के बारे में और अध्िक ज्ञान प्राप्त करने से पहले आइए हम वुफछ शब्दों अथवा पदों ;जमतउेद्ध को जानें तथा उनका अथर् समझें। ये शब्द गोलीय दपर्णों के बारे में चचार् करते समय सामान्यतः प्रयोग में आते हैं। गोलीय दपर्ण के परावतर्क पृष्ठ के वंेफद्र को दपर्ण का ध्ु्रव कहते हैं। यह दपर्ण के पृष्ठ पर स्िथत होता है। ध््रुव को प्रायः च् अक्षर से निरूपित करते हैं। गोलीय दपर्ण का परावतर्क पृष्ठ एक गोले का भाग है। इस गोले का वंेफद्र गोलीय दपर्ण का वक्रता वेंफद्र कहलाता है। यह अक्षर ब् से निरूपित किया जाता है। कृपया ध्यान दें कि वक्रता वेंफद्र दपर्ण का भाग नहीं है। यह परावतर्क पृष्ठ के बाहर स्िथत है।अवतल दपर्ण का वक्रता वेंफद्र परावतर्क पृष्ठ के सामने स्िथत होता है। तथापि, उत्तल दपर्ण में यह दपर्ण के परावतर्क पृष्ठ के पीछे स्िथत होता है। यह तथ्य आप चित्रा 102 ;ंद्ध तथा 10.2 ;इद्ध में नोट कर सकते हैं। गोलीय दपर्ण का परावतर्क पृष्ठ जिस गोले का भाग है, उसकी त्रिाज्या दपर्ण की वक्रता त्रिाज्या कहलाती है। इसे अक्षर त् से निरूपित किया जाता है। ध्यान दीजिए कि च्ब् दूरी वक्रता त्रिाज्या के बराबर है। गोलीय दपर्ण के ध््रुव तथा वक्रता त्रिाज्या से गुशरने वाली एक सीध्ी रेखा की कल्पना कीजिए। इस रेखा को दपर्ण का मुख्य अक्ष कहते हैं। याद कीजिए कि मुख्य अक्ष दपर्ण के ध्रुव पर अभ्िालंब है। आइए, दपर्ण से संबंध्ित एक महत्वपूणर् शब्द को एक ियाकलाप द्वारा समझें। चेतावनी: सूयर् की ओर या दपर्ण द्वारा परावतिर्त सूयर् के प्रकाश की ओर सीध मत देख्िाए। यह आपकी आँखों को क्षतिग्रस्त कर सकता है। ऽ एक अवतल दपर्ण को अपने हाथ में पकडि़ए तथा इसके परावतर्क पृष्ठ को सूयर् की ओर कीजिए। ऽ दपर्ण द्वारा परावतिर्त प्रकाश को दपर्ण के पास रखी एक कागश की शीट पर डालिए। ऽ कागश की शीट को ध्ीरे - ध्ीरे आगे पीछे कीजिए जब तक कि आपको कागश की शीट पर प्रकाश का एक चमकदार, तीक्ष्ण बिंदु प्राप्त न हो जाए। ऽ दपर्ण तथा कागश को वुफछ मिनट के लिए उसी स्िथति में पकड़े रख्िाए। आप क्या देखते हैं? ऐसा क्यों होता है? सवर्प्रथम कागश सुलगना प्रारंभ करता है और ध्ुआँ उठने लगता है। अंततः यह आग भी पकड़ सकता है। यह क्यों जलता है? सूयर् से आने वाला प्रकाश दपर्ण के द्वारा एक तीक्ष्ण, चमकदार बिंदु के रूप में अभ्िावेंफदि्रत होता है। वास्तव में कागश की शीट पर प्रकाश का यह बिंदु सूयर् का प्रतिबिंब है। यह बिंदु अवतल दपर्ण का पफोकस है। सूयर् के प्रकाश के संवेंफद्रण सेउत्पन्न ऊष्मा के कारण कागश जलता है। दपर्ण की स्िथति से इस प्रतिबिंब की दूरी, दपर्ण की पफोकस दूरी का सन्िनकट मान है। आइए इस प्रेक्षण को एक किरण आरेख से समझने का प्रयत्न करें। चित्रा 10.2 ;ंद्ध को ध्यानपूवर्क देख्िाए। अवतल दपर्ण पर मुख्य अक्ष के समांतर वुफछ किरणें आपतित हो रही हैं। परावतिर्त किरणों का प्रेक्षण कीजिए। वे सभी दपर्ण की मुख्य अक्ष के एक ;ंद्ध ;इद्ध बिंदु पर मिल रही/प्रतिच्छेदी हैं। यह ¯बदु अवतल दपर्ण का चित्रा 10.2 ;ंद्ध अवतल दपर्ण ;इद्ध उत्तल दपर्ण मुख्य पफोकस कहलाता है। इसी प्रकार चित्रा 10.2 ;इद्ध को ध्यानपूवर्क देख्िाए। उत्तल दपर्ण द्वारा मुख्य अक्ष के समांतर किरणें किस प्रकार परावतिर्त होती हैं? परावतिर्त किरणें मुख्य अक्ष पर एक बिंदु से आती हुइर् प्रतीत होती हैं। यह बिंदु उत्तल दपर्ण का मुख्य पफोकस कहलाता है। मुख्य पफोकस को अक्षर थ् द्वारा निरूपित किया जाता है। गोलीय दपर्ण के ध््रुव तथा मुख्य पफोकस के बीच की दूरी पफोकस दूरी कहलाती है। इसे अक्षर िद्वारा निरूपित करते हैं। गोलीय दपर्ण का परावतर्क पृष्ठ अिाकांशतः गोलीय ही होता है। इस पृष्ठ की एकवृत्ताकार सीमा रेखा होती है। गोलीय दपर्ण के परावतर्क पृष्ठ की इस वृत्ताकार सीमारेखा का व्यास, दपर्ण का द्वारक ;ंचमतजनतमद्ध कहलाता है। चित्रा 10.2 में दूरी डछ द्वारक को निरूपित करती है। अपने विवेचन में हम केवल उन्हीं गोलीय दपर्णों पर विचार करेंगे जिनका द्वारक इनकी वक्रता त्रिाज्या से बहुत छोटा है। क्या गोलीय दपर्ण की वक्रता त्रिाज्या त् तथा पफोकस दूरी िके बीच कोइर् संबंध् है? छोटे द्वारक के गोलीय दपर्णों के लिए वक्रता त्रिाज्या पफोकस दूरी से दोगुनी होती है। हम इस संबंध् को त् त्र 2 िद्वारा व्यक्त कर सकते हैं। यह दशार्ता है कि किसी गोलीय दपर्ण का मुख्य पफोकस, उसके ध््रुव तथा वक्रता वेंफद्र को मिलाने वाली रेखा का मध्य बिंदु होता है। 10ण्2ण्1 गोलीय दपर्णों द्वारा प्रतिबिंब बनना आप समतल दपर्णों द्वारा प्रतिबिंब बनने के बारे में अध्ययन कर चुके हैं। आप उनकेद्वारा बनाए गए प्रतिबिंबों की प्रकृति, स्िथति तथा आपेक्ष्िाक साइश के बारे में भी जानते हैं। गोलीय दपर्णों द्वारा बने प्रतिबिंब वैफसे होते हैं? किसी अवतल दपर्ण द्वारा बिंब की विभ्िान्न स्िथतियों के लिए बने प्रतिबिंबों की स्िथति का निधार्रण हम किस प्रकार कर सकते हैं? ये प्रतिबिंब वास्तविक हैं अथवा आभासी? क्या वे आवध्िर्त हैं, छोटे हैं या समान साइश के हैं? हम एक ियाकलाप द्वारा इसका अन्वेषण करेंगे। ऽ आप अवतल दपर्ण की पफोकस दूरी ज्ञात करने की विध्ि पहले ही सीख चुके हैं। ियाकलाप 10.2 में आपने देखा है कि आपको कागश पर मिला प्रकाश का तीक्ष्ण चमकदार बिंदु वास्तव में सूयर् का प्रतिबिंब है। यह अत्यंत छोटा, वास्तविक तथा उलटा है। दपर्ण से इस प्रति¯बब की दूरी माप कर आपने अवतल दपर्ण की लगभग पफोकस दूरी ज्ञात की थी। ऽ एक अवतल दपर्ण लीजिए। ऊपर वण्िार्त विध्ि से इसकी सन्िनकट पफोकस दूरी ज्ञात कीजिए। पफोकस दूरी का मान नोट कीजिए। ;आप किसी दूरस्थ वस्तु का प्रतिबिंब एक कागश की शीट पर प्राप्त करके भी पफोकस दूरी ज्ञात कर सकते हैंद्ध। ऽ मेश पर चाॅक से एक लाइन बनाइए। अवतल दपर्ण को एक स्टैंड पर रख्िाए। स्टैंड को लाइन पर इस प्रकार रख्िाए कि दपर्ण का ध््रुव इस लाइन पर स्िथत हो। ऽ चाॅक से पहली लाइन के समांतर और इसके आगे, दो लाइनें इस प्रकार खींचिए कीकिन्हीं दो उत्तरोत्तर लाइनों के बीच की दूरी दपर्ण की पफोकस दूरी के बराबर हो। ये लाइनें अब क्रमशः बिंदुओं च्ए थ् तथा ब् की स्िथतियों के तदनुरूपी होंगी। याद रख्िाएμ छोटे द्वारक के गोलीय दपर्ण के लिए मुख्य पफोकस थ्, ध््रुव च् तथा वक्रता वेंफद्र ब् को मिलाने वाली रेखा के मध्य बिंदु पर स्िथत होता है। ऽ एक चमकीला बिंब, जैसे एक जलती हुइर् मोमबत्ती ब् से बहुत दूर किसी स्िथति पर रख्िाए। एक कागश का परदा रख्िाए तथा इसको दपर्ण के सामने आगे - पीछे तब तक ख्िासकाइएजब तक कि आपको इस पर मोमबत्ती की लौ का तीक्ष्ण तथा चमकीला प्रतिबिंब प्राप्त न हो जाए। ऽ प्रतिबिंब को ध्यानपूवर्क देख्िाए। इसकी प्रकृति, स्िथति तथा बिंब के साइश के सापेक्ष इसका आपेक्ष्िाक साइश नोट कीजिए। ऽ इस ियाकलाप को मोमबत्ती की निम्न स्िथतियों के लिए दोहराइएμ ;ंद्ध ब् से थोड़ी दूर, ;इद्ध ब् पर, ;बद्ध थ् तथा ब् के बीच, ;कद्ध थ् पर तथा ;मद्ध च् और थ् के बीच। ऽ इनमें से एक स्िथति में आप परदे पर प्रतिबिंब प्राप्त नहीं कर पाएँगे। इस अवस्था में बिंब की स्िथति को अभ्िानिधर्रित कीजिए। तब, इसके आभासी प्रतिबिंब को सीधे दपर्ण में देख्िाए। ऽ अपने प्रेक्षणों को नोट कीजिए तथा सारणीब( कीजिए। उपरोक्त ियाकलाप में आप देखेंगे कि अवतल दपर्ण द्वारा बने प्रतिबिंब कीप्रकृति, स्िथति तथा साइश बिंदु च्ए थ् तथा ब् के सापेक्ष बिंब की स्िथति पर निभर्र करते है। बिंब की वुफछ स्िथतियों के लिए बनने वाला प्रतिबिंब वास्तविक है। बिंब की वुफछ दूसरी स्िथतियों के लिए यह आभासी होता है। बिंब की स्िथति के अनुसार ही प्रतिबिंब आवध्िर्त, छोटा या समान साइश का होता है। इन प्रेक्षणों का संक्ष्िाप्त विवरण, आपके निदेर्शन के लिए सारणी 10.1 में दिया गया है। अत्यध्िक छोटा, वास्तविक एवं उलटा बिंदु साइश ब् से परे अनंत पर पफोकस थ् पर थ् तथा ब् के बीच छाटा ेवास्तविक तथा उलटा ब् पर ब् पर समान साइश वास्तविक तथा उलटा ब् तथा थ् के बीच ब् से परे विवध्िर्त ;बड़ाद्ध वास्तविक तथा उलटा थ् पर अनंत पर अत्यध्िक विवध्िर्त वास्तविक तथा उलटा च् तथा थ् के बीच दपर्ण के पीछे विवध्िर्त ;बड़ाद्ध आभासी तथा सीध 10ण्2ण्2 किरण आरेखों का उपयोग करके गोलीय दपर्णों द्वारा बने प्रतिबिंबों का निरूपण गोलीय दपर्णों द्वारा प्रतिबिंबों के बनने का अध्ययन हम किरण आरेख खींच कर भी कर सकते हैं। गोलीय दपर्ण के सामने रखे एक सीमित साइश के विस्तारित बिंब पर विचार कीजिए। इस बिंब का प्रत्येक छोटा भाग एक बिंदु बिंब की भाँति कायर् करता है। इन बिंदुओं में प्रत्येक से अनंत किरणें उत्पन्न होती हैं। बिंब के प्रतिबिंब का स्थान निधार्रण करने के लिए, किरण आरेख बनाते समय किसी बिंदु से निकलने वाली किरणों की विशाल संख्या में से सुविधानुसार वुफछ को चुना जा सकता है। तथापि, किरण आरेख की स्पष्टता के लिए दो किरणों पर विचार करना अध्िक सुविधाजनक है। ये किरणें ऐसी हों कि दपर्ण से परावतर्न के पश्चात उनकी दिशाओं को जानना आसान हो। कम से कम दो परावतिर्त किरणों के प्रतिच्छेदन से किसी बिंदु बिंब के प्रतिबिंब की स्िथति ज्ञात की जा सकती है। प्रतिबिंब के स्थान निधर्रण के लिए निम्न में से किन्हीं भी दो किरणों पर विचार किया जा सकता है। ;पद्ध दपर्ण के मुख्य अक्ष के समांतर प्रकाश किरण, परावतर्न के पश्चात अवतल दपर्णके मुख्य पफोकस से गुशरेगी अथवा उत्तल दपर्ण के मुख्य पफोकस से अपसरित होती प्रतीत होगी। यह चित्रा 10.3 ;ंद्ध एवं ;इद्ध में दशार्या गया है। ;पपद्ध अवतल दपर्ण के मुख्य पफोकस सेगुजरने वाली किरण अथवा उत्तल दपर्ण के मुख्य पफोकस की ओर निदेर्श्िात किरण परावतर्न के पश्चात मुख्य अक्ष के समांतर निकलेगी। इसे चित्रा 10.4 ;ंद्ध तथा चित्रा 10.4 ;इद्ध में दशार्या गया है। ;पपपद्ध अवतल दपर्ण के वक्रता वेंफद्र से;ंद्ध ;इद्ध गुजरने वाली किरण अथवा उत्तल चित्रा 10.3 दपर्ण के वक्रता वेंफद्र की ओर निदेर्श्िात किरण, परावतर्न के पश्चात उसी पथ के अनुदिश वापस परावतिर्त हो जाती है। इसे चित्रा 10.5 ;ंद्ध तथा 10.5 ;इद्ध में दशार्या गया है। प्रकाश की किरणें उसी पथ से इसलिए वापस आती हैं क्योंकि आपतित किरणें दपर्ण के परावतर्क पृष्ठ पर अभ्िालंब ;ंद्ध ;इद्ध के अनुदिश पड़ती हैं। चित्रा 10.4 ;पअद्ध ;ंद्ध ;इद्धचित्रा 10.5 ;ंद्ध ;ंद्ध ;इद्ध चित्रा 10.6 अवतल दपर्ण चित्रा 10.6 ;ंद्ध अथवा उत्तल दपर्ण चित्रा 10.6 ;इद्ध के बिंदु च् ;दपर्ण का ध््रुवद्ध की ओर मुख्य अक्ष से तियर्वफ दिशा में आपतित किरण, तियर्वफ दिशा में ही परावतिर्त होती है। आपतित तथा परावतिर्त किरणें आपतन बिंदु ;बिंदु च्द्ध पर मुख्य अक्ष से समान कोण बनाते हुए परावतर्न के नियमों का पालन करती हैं। याद रख्िाए कि उपरोक्त सभी स्िथतियों में परावतर्न के नियमों का पालन होता है। आपतन बिंदु पर आपतित किरण इस प्रकार परावतिर्त होती है कि परावतर्न कोण का मान सदैव आपतन कोण के मान के बराबर हो। अवतल दपर्ण द्वारा प्रतिबिंब बनना चित्रा 10.7 ;ंद्ध से ;द्धि में बिंब की विभ्िान्न स्िथतियों के लिए अवतल दपर्ण द्वारा प्रतिबिंब का बनना किरण आरेखों द्वारा दशार्या गया है। ऽ सारणी 10.1 में दशार्यी गइर् बिंब की प्रत्येक स्िथति के लिए स्वच्छ किरण आरेख खींचिए। ऽ प्रतिबिंब का स्थान निधर्रित करने के लिए आप पूवर् अनुच्छेद में वण्िार्त कोइर् दो किरणें ले सकते हैं। ऽ अपने चित्रों की तुलना चित्रा 10.7 में दिए गए चित्रों से कीजिए। ऽ प्रत्येक दशा में बनने वाले प्रतिबिंब की प्रकृति, स्िथति तथा आपेक्ष्िाक साइश का वणर्न कीजिए। ऽ अपने परिणामों को सुविधजनक प्रारूप में सारणीब( कीजिए। चित्रा 10.7 अवतल दपर्ण द्वारा प्रतिबिंब का बनना दशार्ने के लिए किरण आरेख अवतल दपर्णों के उपयोग अवतल दपर्णों का उपयोग सामान्यतः टाॅचर्, सचर्लाइट तथा वाहनों के अग्रदीपों ;ीमंकसपहीजेद्ध में प्रकाश का शक्ितशाली समांतर किरण पुंज प्राप्त करने के लिए किया जाता है। इन्हें प्रायः चेहरे का बड़ा प्रतिबिंब देखने के लिए शेविंग दपर्णों ;ेींअपदह उपततवतेद्ध के रूप में उपयोग करते हैं। दंत विशेषज्ञ अवतल दपर्णों का उपयोग मरीजों के दाँतों का बड़ा प्रतिबिंब देखने के लिए करते हैं। सौर भिðयों में सूयर् के प्रकाश को वेंफदि्रत करने के लिए बड़े अवतल दपर्णों का उपयोग किया जाता है। ;इद्ध उत्तल दपर्ण द्वारा प्रतिबिंब बनना हमने अवतल दपर्ण द्वारा प्रतिबिंब बनने के बारे में अध्ययन किया है। अब हमउत्तल दपर्ण द्वारा प्रतिबिंब बनने के बारे में अध्ययन करेंगे। ऽ पेंसिल को ध्ीरे - ध्ीरे दपर्ण से दूर ले जाइए। क्या प्रतिबिंब छोटा होता जाता है या बड़ा होता जाता है? ऽ ियाकलाप को सावधनीपूवर्क दोहराइए। बताइए कि जब बिंब को दपर्ण से दूर ले जाते हैं तो प्रतिबिंब पफोकस के निकट आता है अथवा उससे और दूर चला जाता है? उत्तल दपर्ण द्वारा बने प्रतिबिंब का अध्ययन करने के लिए हम बिंब की दो स्िथतियों पर विचार करते हैं। पहली स्िथति में बिंब अनंत दूरी पर है तथा दूसरी स्िथति में बिंबदपर्ण से एक निश्िचत दूरी पर है। बिंब की इन दो स्िथतियों के लिए उत्तल दपर्ण द्वारा बनाए गए प्रतिबिंबों के किरण आरेखों को क्रमशः चित्रा 10.8 ;ंद्ध तथा 10.8 ;इद्ध में दशार्या गया है। परिणामों का संक्ष्िाप्त विवरण सारणी 10.2 में दिया गया है। चित्रा 10.8 उत्तल दपर्ण द्वारा प्रतिबिंब बनना सारणी 10.2 उत्तल दपर्ण द्वारा बने प्रतिबिंब की प्रकृति, स्िथति तथा आपेक्ष्िाक साइश अभी तक आपने समतल दपर्ण, अवतल दपर्ण तथा उत्तल दपर्ण द्वारा प्रतिबिंब बनाने के बारे में अध्ययन किया है। इनमें से कौन - सा दपर्ण किसी बड़े बिंब का पूरा प्रतिबिंब बनाएगा? आइए एक ियाकलाप द्वारा इसका अन्वेषण करें। ऽ इस ियाकलाप को अवतल दपर्ण लेकर दोहराइए। क्या यह दपर्ण बिंब की पूरी लंबाइर् का प्रतिबिंब बना पाता है? ऽ अब एक उत्तल दपर्ण लेकर इस प्रयोग को दोहराइए। क्या आपको सपफलता मिली? अपने प्रेक्षणों की कारण सहित व्याख्या कीजिए। आप एक छोटे उत्तल दपर्ण में किसी ऊँचे भवन/पेड़ का पूणर् - लंबाइर् का प्रतिबिंब देख सकते हैं। आगरा किले की एक दीवार में ऐसा ही एक दपर्ण लगा हुआ है। यदिआप कभी आगरा किला देखने जाएँ तो दीवार में लगे इस दपर्ण में किसी दूरस्थ ऊँची इमारत/मकबरे को देखने का प्रयास करें। मकबरे को स्पष्टतः देखने के लिए आपवफो दीवार से सटी हुइर् छत पर उचित स्थान पर खड़ा होना होगा। उत्तल दपर्णों के उपयोगउत्तल दपर्णों का उपयोग सामान्यतः वाहनों के पश्च - दृश्य ;ूपदहद्ध दपर्णों के रूप में किया जाता है। ये दपर्ण वाहन के पाश्वर् ;ेपकमद्ध में लगे होते हैं तथा इनमें ड्राइवर अपनेपीछे के वाहनों को देख सकते हैं जिससे वे सुरक्ष्िात रूप से वाहन चला सवेंफ। उत्तल दपर्णों को इसलिए भी प्राथमिकता देते हैं, क्योंकि ये सदैव सीध प्रतिबिंब बनाते हैं यद्यपि वह छोटा होता है। इनका दृष्िट - क्षेत्रा भी बहुत अध्िक है क्योंकि ये बाहर की ओरवित होते हैं। अतः समतल दपर्ण की तुलना में उत्तल दपर्ण ड्राइवर को अपने पीछे के बहुत बड़े क्षेत्रा को देखने में समथर् बनाते हैं। प्रश्न 1234 अवतल दपर्ण के मुख्य पफोकस की परिभाषा लिख्िाए। एक गोलीय दपर्ण की वक्रता त्रिाज्या 20 बउ है। इसकी पफोकस दूरी क्या होगी? उस दपर्ण का नाम बताइए जो बिंब का सीध तथा आवध्िर्त प्रतिबिंब बना सके। हम वाहनों में उत्तल दपर्ण को पश्च - दृश्य दपर्ण के रूप में वरीयता क्यों देते हैं? घ् 10ण्2ण्3 गोलीय दपर्णों द्वारा परावतर्न के लिए चिÉ परिपाटी गोलीय दपर्णों द्वारा प्रकाश के परावतर्न पर विचार करते समय हम एक निश्िचत चिÉ परिपाटी का पालन करेंगे, जिसे नयी कातीर्य चिÉ परिपाटी कहते हैं। इस परिपाटी में दपर्ण के ध््रुव ;च्द्ध को मूल बिंदु मानते हैं। दपर्ण के मुख्य अक्ष को निदेर्शांक प(ति का ग.अक्ष ;ग्ग्श्द्ध लिया जाता है। यह परिपाटी निम्न प्रकार हैः ;पद्ध बिंब सदैव दपर्ण के बाईं ओर रखा जाता है। इसका अथर् है कि दपर्ण पर बिंब से प्रकाश बाईं ओर से आपतित होता है। ;पपद्ध मुख्य अक्ष के समांतर सभी दूरियाँ दपर्ण के ध््रुव से मापी जाती हैं। ;पपपद्ध मूल बिंदु के दाईं ओर ;़ ग.अक्ष के अनुदिशद्ध मापी गइर् सभी दूरियाँ ध्नात्मक मानी जाती हैं जबकि मूल बिंदु के बाईं ओर ;दृ ग.अक्ष के अनुदिशद्ध मापी गइर्दूरियाँ ट्टणात्मक मानी जाती हैं। ;पअद्ध मुख्य अक्ष के लंबवत तथा ऊपर की ओर ;़ ल.अक्ष के अनुदिशद्ध मापी जाने वाली दूरियाँ धनात्मक मानी जाती हैं। ;अद्ध मुख्य अक्ष के लंबवत तथा नीचे की ओर ;दृ ल.अक्ष के अनुदिशद्ध मापी जाने वालीदूरियाँ ट्टणात्मक मानी जाती हैं।ऊपर वण्िार्त नयी कातीर्य चिÉ परिपाटी आपके संदभर् के लिए चित्रा 10.9 में दशार्यी गइर् है। यहचिÉ परिपाटी दपर्ण का सूत्रा प्राप्त करने तथा संबंध्ित आंकिक प्रश्नों को हल करने के लिए प्रयुक्त की गइर् है। 10ण्2ण्4 दपर्ण सूत्रा तथा आवध्र्न गोलीय दपर्ण में इसके ध््रुव से बिंब की दूरी, बिंब दूरी ;नद्ध कहलाती है। दपर्ण के ध्रुव से प्रतिबिंब की दूरी, प्रतिबिंब दूरी ;अद्ध कहलाती है। आपको पहले ही ज्ञात है कि ध्रुव से मुख्य पफोकस की दूरी, पफोकस दूरी ;द्धि कहलाती है। इन तीनों राश्िायों के बीच एक संबंध् है जिसे दपर्ण सूत्रा द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। इस सूत्रा को निम्न प्रकार व्यक्त करते हैंः 1 1 1़त्र ;10.1द्धअ न ियह संबंध् सभी प्रकार के गोलीय दपर्णों के लिए तथा बिंब की सभी स्िथतियों के लिए मान्य हैं। प्रश्नों को हल करते समय, जब आप दपर्ण सूत्रा में नए अए ितथा त् के मान प्रतिस्थापित करें तो आपको नयी कातीर्य चिÉ परिपाटी का प्रयोग करना चाहिए। आवध्र्न गोलीय दपर्ण द्वारा उत्पन्न आवध्र्न वह आपेक्ष्िाक विस्तार है जिससे ज्ञात होता है किकोइर् प्रतिबिंब बिंब की अपेक्षा कितना गुना आवध्िर्त है। इसे प्रतिबिंब की ऊँचाइर् तथाबिंब की ऊँचाइर् के अनुपात रूप में व्यक्त किया जाता है। यदि ी बिंब की ऊँचाइर् हो तथा ीश् प्रतिबिंब की ऊँचाइर् हो तो गोलीय दपर्ण द्वारा उत्पन्न आवध्र्न ;उद्ध प्राप्त होगा। प्रतिबिब की ऊँचाइर् ीष्ं;द्ध उ त्र बिंब की ऊँचाइर् ी;द्ध ी ′ उ त्र ;10.2द्धी आवध्र्न उ बिंब दूरी ;नद्ध तथा प्रतिबिंब दूरी ;अद्ध से भी संबंध्ित है। इसे व्यक्त किया जाता है। ी ष् अआवध्र्न ;उद्धत्र त्र− ;10.3द्धीन ध्यान दीजिए, बिंब की ऊँचाइर् ध्नात्मक ली जाती है क्योंकि बिंब प्रायः मुख्य अक्ष के ऊपर रखा जाता है। आभासी प्रतिबिंबों के लिए बिंब की ऊँचाइर् ध्नात्मक लेनी चाहिए। तथापि वास्तविक प्रतिबिंबों के लिए इसे ट्टणात्मक लेना चाहिए। आवध्र्न के मान में ट्टणात्मक चिÉ से ज्ञात होता है कि प्रतिबिंब वास्तविक है। आवध्र्न के मान में ध्नात्मक चिÉ बताता है कि प्रतिबिंब आभासी है। उदाहरण 10.1किसी आॅटोमोबाइल में पीछे का दृश्य देखने के लिए उपयोग होने वाले उत्तल दपर्ण की वक्रता त्रिाज्या 3.00 उ है। यदि एक बस इस दपर्ण से 5.00 उ की दूरी पर स्िथत है तो प्रतिबिंब की स्िथति, प्रकृति तथा साइश ज्ञात कीजिए। हल वक्रता त्रिाज्या, त् त्र ़ 3ण्00 उय बिंब - दूरी, न त्र दृ 5ण्00 उय प्रतिबिंब - दूरी, अ त्र घ् प्रतिबिंब की ऊँचाइर्, ीश् त्र घ् 3ण्00 उपफोकस दूरी ित्र त्ध्2 त्र ़ त्र ़ 1ण्50 उ 2 11 1क्योंकि ़त्र अन ि1111 1 11या अ त्र ि−न त्र ़ 1ण्50 दृ ;5ण्00द्ध त्र 1ण्50 ़ 5ण्00 −5ण्00 ़1ण्50 त्र 7ण्50 ़7ण्50 अ त्र त्र ़ 1ण्15 उ6ण्50 प्रतिबिंब दपर्ण के पीछे 1ण्15 उ की दूरी पर है। ी श् अ 1ण्15 उ आवध्र्न, उ त्र त्र− त्र दृ ीन −5ण्00 उत्र ़ 0ण्23 प्रतिबिंब आभासी, सीध तथा साइश में बिंब से छोटा ;0.23 गुनाद्ध है। उदाहरण 10.2 कोइर् 4.0 बउ साइश का बिंब किसी 15.0 बउ पफोकस दूरी के अवतल दपर्ण से 25.0 बउ दूरी पर रखा है। दपर्ण से कितनी दूरी पर किसी परदे को रखा जाए कि स्पष्ट प्रतिबिंब प्राप्त हो? प्रतिबिंब की प्रकृति तथा साइश ज्ञात कीजिए। हल बिंब - साइश, ीत्र ़ 4ण्0 बउय बिंब - दूरी, नत्र दृ 25ण्0 बउय पफोकस दूरी ित्र दृ15ण्0 बउय प्रतिबिंब - दूरी, अत्र घ् प्रतिबिंब - साइश, ी′ त्र घ् समीकरण ;10.1द्ध से 11 1़त्र अन ि1111 1 11या त्र− त्र − त्र−़ अ िन −15ण्0 −25ण्0 15ण्0 25ण्0 −5ण्0 ़ 3ण्0 −2ण्0 या 1 त्रत्र याए अत्र दृ 37ण्5 बउ अ 75ण्0 75ण्0 परदे को दपर्ण से 37.5 बउ दूरी पर रखना चाहिए। प्रतिबिंब वास्तविक है। ीश् अइसी प्रकार, आवध्र्न, उत्र त्र− ीन अी ;37ण्5बउद्ध ; 4ण्0बउद्ध ़या ी′ त्र दृ त्र −− न;25ण्0 बउद्ध − प्रतिबिंब की ऊँचाइर्, ी′ त्र दृ 6ण्0 बउ प्रतिबिंब उलटा तथा आवध्िर्त है। प्रश्न 12 उस उत्तल दपर्ण की पफोकस दूरी ज्ञात कीजिए जिसकी वक्रता - त्रिाज्या 32 बउ है। कोइर् अवतल दपर्ण आपने सामने 10 बउ दूरी पर रखे किसी बिंब का तीन गुणा आविार्त ;बड़ाद्ध वास्तविक प्रतिबिंब बनाता है। प्रतिबिंब दपर्ण से कितनी दूरी पर है। घ् 10.3 प्रकाश का अपवतर्न किसी पारदशीर् माध्यम में प्रकाश सरल रेखा में गमन करता प्रतीत होता है। जब प्रकाश एक पारदशीर् माध्यम से दूसरे में प्रवेश करता है तो क्या होता है? क्या यह अब भी सरल रेखा में चलता है या अपनी दिशा बदलता है? हम अपने दिन - प्रतिदिन के वुफछ अनुभवों को दोहराएँगे। आपने देखा होगा कि पानी से भरे किसी टैंक अथवा ताल या पोखर की तली उठी हुइर् प्रतीत होती है। इसी प्रकार, जब कोइर् मोटा काँच का स्लैब ;सिल्लीद्धकिसी मुदि्रत सामग्री पर रखा जाता है, तो काँच के स्लैब के ऊपर से देखने पर अक्षर उठे हुए प्रतीत होते हैं। ऐसा क्यों होता है? क्या आपने किसी काँच के बतर्न में रखे पानी में किसी पेंसिल को आंश्िाक रूपसे डूबे देखा है? यह वायु तथा पानी के अंतरपृष्ठ पर ;अथार्त पानी की ऊपरी सतह परद्ध टेढ़ी प्रतीत होती है। आपने देखा होगा कि पानी से भरे किसी काँच के बतर्न में रखे नींबू पाश्वर् ;ेपकमद्ध से देखने पर अपने वास्तविक साइश से बड़े प्रतीत होते हैं। इन अनुभवों की व्याख्या आप किस प्रकार करेंगे? आइए पानी में आंश्िाक रूप से डूबी पेंसिल के मुड़े होने की घटना पर विचार करें। पंेसिल के पानी में डूबे भाग से आपके पास पहुँचने वाला प्रकाश, पेंसिल के पानी से बाहर के भाग की तुलना में भ्िान्न दिशा से आता हुआ प्रतीत होता है। इसी कारण पेंसिलमुड़ी हुइर् प्रतीत होती है। इन्ही कारणों से, जब अक्षरों के ऊपर काँच का स्लैब रख कर देखते हैं तो वे उठे हुए प्रतीत होते हैं। यदि पानी के स्थान पर हम कोइर् अन्य द्रव जैसे किरोसिन या तारपीन का तेल प्रयोग करें, क्या तब भी पेंसिल उतनी ही मुड़ी हुइर् दिखेगी? यदि हम काँच के स्लैब कोपारदशीर् प्लास्िटक के स्लैब से प्रतिस्थापित कर दें, क्या तब भी अक्षर उसी ऊँचाइर् तक उठे प्रतीत होंगे? आप देखेंगे कि अलग - अलग माध्यमों के युग्मों के लिए इन प्रभावों का विस्तार अलग - अलग है। ये प्रेक्षण सूचित करते हैं कि प्रकाश सभी माध्यमों में एक ही दिशा में गमन नहीं करता। ऐसा प्रतीत होता है कि जब प्रकाश एक माध्यम से दूसरे माध्यम में तिरछा होकर जाता है तो दूसरे माध्यम में इसके संचरण की दिशा परिवतिर्त हो जाती है। इस परिघटना को विस्तार से वुफछ ियाकलाप करके समझें। कटोरे में पानी डालने पर सिक्का पिफर से दिखलाइर् देने लगता है। प्रकाश के अपवतर्नके कारण सिक्का अपनी वास्तविक स्िथति से थोड़ा - सा ऊपर उठा हुआ प्रतीत होता है। ियाकलाप 10.9 ऽ मेश पर रखे एक सप़ेफद कागश की शीट पर एक मोटी सीध्ी रेखा खींचिए। ऽ इस रेखा के ऊपर एक काच का स्लैब इस प्रकार रख्िाए कि इसकी एक कोर इसँरेखा से कोइर् कोण बनाए। ऽ स्लैब के नीचे आए रेखा के भाग को पाश्वर् ;ेपकमद्ध से देख्िाए। आप क्या देखते हैं? क्या काँच के स्लैब के नीचे की रेखा कोरों ;मकहमेद्ध के पास मुड़ी हुइर् प्रतीत होती है? ऽ अब काँच के स्लैब को इस प्रकार रख्िाए कि यह रेखा के अभ्िालंबवत हो। अब आप क्या देखते हैं? क्या काँच के स्लैब के नीचे रेखा का भाग मुड़ा हुआ प्रतीत होता है? ऽ रेखा को काँच के स्लैब के ऊपर से देख्िाए। क्या स्लैब के नीचे रेखा का भाग उठा हुआ प्रतीत होता है? ऐसा क्यों होता है? 10ण्3ण्1 काँच के आयताकार स्लैब से अपवतर्न काँच के स्लैब से प्रकाश के अपवतर्न की परिघटना को समझने के लिए, आइए एक ियाकलाप करें। ियाकलाप 10.10 ऽ एक ड्राइंग बोडर् पर सप़ेफद कागश की एक शीट, ड्राइंग पिनों की सहायता से लगाइए। ऽ शीट के ऊपर बीच में काँंच का एक आयताकार स्लैब रख्िाए। ऽ पंेसिल से स्लैब की रूपरेखा खींचिए। इस रूपरेखा का नाम ।ठब्क् रखते हैं। ऽ चार एकसमान आॅलपिन लीजिए। ऽ दो पिनें, मान लीजिए म् तथा थ् ऊध्वार्ध्रतः इस प्रकार लगाइए कि पिनों को मिलाने वाली रेखा कोर ।ठ से कोइर् कोण बनाती हुइर् हो। ऽ पिन म् तथा थ् के प्रतिबिंबों को विपरीत पफलक से देख्िाए। दूसरी दो पिनों, माना ळ तथा भ्ए को इस प्रकार लगाइए कि ये पिनें एवं म् तथा थ् के प्रतिबिंब एक सीधी रेखा पर स्िथत हों। ऽ पिनों तथा स्लैब को हटाइए। ऽ पिनों म् तथा थ् की नोकों ;जपचद्ध की स्िथतियों को मिलाइए तथा इस रेखा को ।ठ तक बढ़ाइए। मान लीजिए म्थ्ए ।ठ से बिंदु व् पर मिलती है। इसी प्रकार पिनों ळ तथा भ् की नोकों की स्िथतियों को मिलाइए तथा इस रेखा को कोर ब्क् तक बढ़ाइए। मान लीजिए भ्ळए ब्क् से व्श् पर मिलती है। ऽ व् तथा व्श् को मिलाइए। म्थ् को भी च् तक बढ़ाइए, जैसा कि चित्रा 10.10 में बिंदुकित रेखा द्वारा दशार्या गया है। इस ियाकलाप में आप नोट करेंगे कि प्रकाश किरण ने अपनी दिशा बिंदुओं व् तथा व्श् पर परिवतिर्त की है। नोट कीजिए कि दोनों बिंदु व् तथा व्श् दोनों पारदशीर् माध्यमों को पृथव्फ करने वाले पृष्ठों पर स्िथत हैं। ।ठ के बिंदु व् पर एक अभ्िालंब छछ′ खींचिए तथा दूसरा अभ्िालंब डडश्ए ब्क् के बिंदु व्श् पर खीचिए। बिंदु व् पर प्रकाश किरण विरल माध्यम से सघन माध्यम में अथार्त वायु से काँच में प्रवेश कर रही है। नोट कीजिए कि प्रकाश किरण अभ्िालंब की ओर झुक जाती है। व्श् पर, प्रकाश किरण ने काँंच से वायु में अथार्त सघन माध्यम से विरल माध्यम में प्रवेश किया है। प्रकाश किरण अभ्िालंब से दूर मुड़ जाती है। दोनों अपवतर्क सतहों ।ठ तथा ब्क् पर आपतन कोण तथा अपवतर्न कोण के मानों की तुलना कीजिए। चित्रा 10.10 में म्व् आपतित किरण है, व्व्श् अपवतिर्त किरण है तथा व्श्भ् निगर्त किरण है। आप देख सकते हैं कि निगर्त किरण, आपतित किरण की दिशा के समांतर है। ऐसा क्यों होता है? आयाताकार काँच के स्लैब के विपरीत पफलकों ।ठ ;वायु - काँच अंतरापृष्ठद्ध तथा ब्क् ;काच - वायु अतंरापृष्ठद्ध परँप्रकाश किरण के मुड़ने का परिमाण समान तथा विपरीत है। इसी कारण से निगर्त किरण, आपतित किरण के समांतर निकलती है। तथापि, प्रकाश किरण में थोड़ा सा पाश्िर्वक विस्थापन होता है। यदि प्रकाश किरण दो माध्यमों के अंतरापृष्ठ पर अभ्िालंबवत आपतित हो तब क्या होगा? स्वयं करके ज्ञात कीजिए। अब आप प्रकाश के अपवतर्न से परिचित हैं। अपवतर्न प्रकाश के एक पारदशीर् माध्यम से दूसरे में प्रवेश करने पर प्रकाश की चाल में परिवतर्न के कारण होता है। प्रयोग दशार्ते हैं कि प्रकाश का अपवतर्न निश्िचत नियमों के आधर पर होता है। परावतर्न के नियम निम्नलिख्िात हैंः ;पद्ध आपतित किरण, अपवतिर्त किरण तथा दोनों माध्यमों को पृथव्फ करने वाले पृष्ठ के आपतन बिंदु पर अभ्िालंब सभी एक ही तल में होते हैं। ;पपद्ध प्रकाश के किसी निश्िचत रंग तथा निश्िचत माध्यमों के युग्म के लिए आपतन कोण की ज्या ;ेपदमद्ध तथा अपवतर्न कोण की ज्या ;ेपदमद्ध का अनुपात स्िथर होता है। इस नियम को स्नेल का अपवतर्न का नियम भी कहते हैं। यदि प आपतन कोण हो तथा त अपवतर्न कोण हो तब ेपदप त्र स्िथरांक ;10.4द्धेपदत इस स्िथरांक के मान को दूसरे माध्यम का पहले माध्यम के सापेक्ष अपवतर्नांक ;तमतिंबजपअम पदकमगद्ध कहते हैं। आइए अपवतर्नांक के बारे में वुफछ विस्तार से अध्ययन करें। चित्रा 10.11 10ण्3ण्2 अपवतर्नांक आप पहले ही अध्ययन कर चुके हैं कि जब प्रकाश की किरण तिरछी गमन करती हुइर् एक पारदशीर् माध्यम से दूसरे में प्रवेश करती है तो यह दूसरे माध्यम में अपनी दिशा परिवतिर्त कर लेती है। किन्हीं दिए हुए माध्यमों के युग्म के लिए होने वाले दिशा परिवतर्न के विस्तार को अपवतर्नांक के रूप में व्यक्त किया जाता है, जो समीकरण ;10.4द्ध में दाएँ पक्ष में प्रकट होने वाला स्िथरांक है। अपवतर्नांक को एक महत्वपूणर् भौतिक राश्िा, विभ्िान्न माध्यमों में प्रकाश के संचरण की आपेक्ष्िाक चाल, से संब( किया जा सकता है। यह देखा गया है कि विभ्िान्न माध्यमों में प्रकाश अलग - अलग चालों से संचरित होता है। निवार्त में प्रकाश 3 × 108 उध्े की अध्िकतम चाल से चलता है जो कि प्रकाश की किसी भी माध्यम में हो सकने वाली द्रुततम चाल है। वायु में प्रकाश की चाल निवार्त की अपेक्षा थोड़ी ही कम होती है। काँच या पानी में यह यथेष्ट रूप से घट जाती है। दो माध्यमों के युग्म के लिए अपवतर्नांक का मान दोनों माध्यमों में प्रकाश की चाल पर निभर्र है, जैसा कि नीचे दिया गया है। चित्रा 10.11 में दशार्ए अनुसार एक प्रकाश की किरण पर विचार करें जो माध्यम 1 से माध्यम 2 में प्रवेश कर रही है। मान लीजिए, प्रकाश की चाल माध्यम 1 में अ1 तथा माध्यम 2 में अहै। माध्यम 2 का माध्यम 1 के सापेक्ष अपवतर्नांक, माध्यम 1 में2 प्रकाश की चाल तथा माध्यम 2 में प्रकाश की चाल के अनुपात द्वारा व्यक्त करते हैं। इसे प्रायः संकेत द से निरूपित करते हैंे। इसे समीकरण के रूप में निम्न प्रकार व्यक्त21करते हैंμ माध्यम 1 में प्रअ1काश की चालद त्रत्र 21 ;10ण्5द्धमाध्यम 2 में प्रअ2काश की चाल इसी तवर्फ से, माध्यम 1 का माध्यम 2 के सापेक्ष अपवतर्नांक द से निरूपित करते12हैं। इसे व्यक्त किया जाता हैμ माध्यम 2 मंे प्रकाश की चाल अ द त्रत्र 12 2 ;10ण्6द्धमाध्यम 1 में प्रअ1 काश की चाल यदि माध्यम 1 निवार्त या वायु है, तब माध्यम 2 का अपवतर्नांक निवार्त के सापेक्ष माना जाता है। यह माध्यम का निरपेक्ष अपवतर्नांक कहलाता है। यह केवल द से निरूपित किया जाता है। यदि वायु में2प्रकाश की चाल ब है तथा माध्यम में प्रकाश की चाल अ है तब माध्यम का अपवतर्नांक द होगाउवाÕाु मे्रबं पकाश की चालदत्रत्र उ ;10ण्7द्धमाध्यम में प्रकाश की चाल अ माध्यम का निरपेक्ष अपवतर्नांक केवल अपवतर्नांक कहलाता है। सारणी 10.3 में अनेक माध्यमों के अपवतर्नांक दिए गए हैं। सारणी से आपको ज्ञात होगा कि जल का अपवतर्नांक, द त्र1ण्33 है। इसका अथर् है कि वायु में प्रकाश का वेग तथा जल में प्रकाश ू ँके वेग का अनुपात 1.33 है। इसी प्रकार क्राउन काच का अपवतर्नांक, दहत्र1ण्52 होता है। ऐे ँसआकड़े अनेक स्थानों पर उपयोगी हैं। तथापि आपको इन आँकड़ों को कंठस्थ करने की आवश्यकता नहीं है। सारणी 10.3ः वुफछ द्रव्यात्मक माध्यमों के निरपेक्ष अपवतर्नांक सारणी 10.3 से नोट कीजिए कि यह आवश्यक नहीं कि प्रकाश्िाक सघन माध्यम का द्रव्यमान घनत्व भी अध्िक हो। उदाहरण के लिए, किरोसिन जिसका अपवतर्नांक जल से अध्िक है, जल की अपेक्षा प्रकाश्िाक सघन है, यद्यपि इसका द्रव्यमान घनत्व जल से कम है। प्रश्न 12345 वायु में गमन करती प्रकाश की एक किरण जल में तिरछी प्रवेश करती है। क्या प्रकाश किरण अभ्िालंब की ओर झुकेगी अथवा अभ्िालंब से दूर हटेगी? बताइए क्यों? प्रकाश वायु से 1ण्50 अपवतर्नांक की काँच की प्लेट में प्रवेश करता है। काँच में प्रकाश की चाल कितनी है? निवार्त में प्रकाश की चाल 3 × 108 उध्े है। सारणी 10.3 से अध्िकतम प्रकाश्िाक घनत्व के माध्यम को ज्ञात कीजिए। न्यूनतम प्रकाश्िाक घनत्व के माध्यम को भी ज्ञात कीजिए। आपको किरोसिन, तारपीन का तेल तथा जल दिए गए हैं। इनमें से किसमें प्रकाश सबसे अिाक तीव्र गति से चलता है? सारणी 10ण्3 में दिए गए आँकड़ों का उपयोग कीजिए। हीरे का अपवतर्नांक 2ण्42 है। इस कथन का क्या अभ्िाप्राय है? घ् 10ण्3ण्3 गोलीय लेंसों द्वारा अपवतर्न आपने वुफछ मनुष्यों को पढ़ने के लिए चश्मे प्रयोग करते हुए देखा होगा। घड़ीसाश बहुत छोटे पुरशों को देखने के लिए छोटे आवध्र्क लेंस का उपयोग करते हैं। क्या कभी आपने आवध्र्क लेंस के पृष्ठ को अपने हाथों से छूकर देखा है? क्या इसका पृष्ठ समतल है या वित है? क्या यह बीच से मोटा है या किनारों से? चश्मों में हम लंेसों का ही उपयोग करते हैं। घड़ीसाश के आवध्र्क में भी लेंस लगा होता है। लेंस क्या है? यह प्रकाश किरणों को किस प्रकार मोड़ता है? इस अनुच्छेद में हम इसी विषय में अध्ययन करेंगे। दो पृष्ठों से घ्िारा हुआ कोइर् पारदशीर् माध्यम, जिसका एक या दोनों पृष्ठ गोलीय हैं, लंेस कहलाता है। इसका अथर् यह है कि लेंस का कम से कम एक पृष्ठ गोलीय होता है। ऐसे लेंसों में दूसरा पृष्ठ समतल हो सकता है। किसी लेंस में बाहर की ओर उभरे दो गोलीय पृष्ठ हो सकते हैं। ऐसे लेंस को द्वि - उत्तल लेंस कहते हैं। इसेकेवल उत्तल लेंस भी कहते हैं। यह किनारों की अपेक्षाबीच से मोटा होता है। उत्तल लेंस प्रकाश किरणों को चित्रा 10ण्12 ;ंद्ध में दशार्ए अनुसार अभ्िासरित करता है। इसीलिएउत्तल लेंसों को अभ्िासारी लेंस भी कहते हैं। इसी प्रकार एक द्वि - अवतल लेंस अंदर की ओर वित दो गोलीय पृष्ठों से घ्िारा होता है। यह बीच की अपेक्षा किनारों से मोटा होता है। ऐसे लेंस प्रकाश किरणों को चित्रा 10ण्12 ;इद्ध में दशार्ए अनुसार अपसरित करते हैं। ऐसे लेंसों कोचित्रा: 10.12 ;ंद्ध उत्तल लेंस की अभ्िासारी िया ;इद्ध अवतल लेंस की अपसारी लेंस कहते हैं। द्वि - अवतल लेंस प्रायः अवतल अपसारी िया लेंस भी कहलाता है। किसी लेंस में चाहे वह उत्तल हो अथवा अवतल, दो गोलीय पृष्ठ होते हैं। इनमें से प्रत्येक पृष्ठ एक गोले का भाग होता है। इन गोलों के वेंफद्र लेंस के वक्रता वेंफद्र कहलाते हैं। लेंस का वक्रता वेंफद्र प्रायः अक्षर ब् द्वारा निरूपित किया जाता है। क्योंकि लेंस के दो वक्रता वेंफद्र हैं इसलिए इन्हें ब् तथा ब्द्वारा निरूपित किया जाता है। किसी12 लेंस के दोनों वक्रता वंेफद्रों से गुजरने वाली एक काल्पनिक सीध्ी रेखा लेंस की मुख्य अक्ष कहलाती है। लंेस का वेंफद्रीय बिंदु इसका प्रकाश्िाक वेंफद्र कहलाता है। इसे प्रायः अक्षर व् से निरूपित करते हैं। लंेस के प्रकाश्िाक वेंफद्र से गुजरने वाली प्रकाश किरणबिना किसी विचलन के निगर्त होती है। गोलीय लेंस की वृत्ताकार रूपरेखा का प्रभावी व्यास इसका द्वारक ;ंचमतजनतमद्ध कहलाता है। इस अध्याय में अपने विवेचन में हम केवल उन्हीं लेंसों तक सीमित रहेंगे जिनका द्वारक इनकी वक्रता त्रिाज्या से बहुत छोटा है। ऐसे लेंस छोटे द्वारक के पतले लेंस कहलाते हैं। जब किसी लेंस पर समांतर किरणें आपतित होती हैं तो क्या होता है? इसे समझने के लिए आइए एक ियाकलाप करें। कागश सुलगने लगता है और ध्ुआँ उत्पन्न होता है। वुफछ समय पश्चात यह आग भी पकड़ सकता है। ऐसा क्यों होता है? सूयर् से आने वाली प्रकाश की किरणें समांतर होती हैं। लेंस द्वारा यह किरणें एक तीक्ष्ण चमकदार बिंदु के रूप में कागश पर अभ्िावेंफदि्रत कर दी जाती हैं। वास्तव में, कागश की शीट पर यह चमकदार बिंदु सूयर्का प्रतिबिंब है। एक बिंदु पर सूयर् के प्रकाश का संवेंफद्रण ऊष्मा उत्पन्न करता है। इसके कारण कागश जलने लगता है। अब हम एक लेंस की मुख्य अक्ष के समांतर प्रकाश किरणों पर विचार करते हैं। जब आप प्रकाश की ऐसी किरणों को किसी लेंस से गुशारते हैं तो क्या होता है? एकउत्तल लेंस के लिए इसे चित्रा 10ण्12 ;ंद्ध में तथा अवतल लेंस के लिए चित्रा 10ण्12 ;इद्ध में दशार्या गया है। चित्रा 10ण्12 ;ंद्ध को ध्यानपूवर्क देख्िाए। उत्तल लंेस पर मुख्य अक्ष के समांतर प्रकाश की बहुत सी किरणें आपतित हैं। ये किरणें लेंस से अपवतर्न के पश्चात मुख्य अक्ष पर एक बिंदु पर अभ्िासरित हो जाती हैं। मुख्य अक्ष पर यह बिंदु लेंस का मुख्य पफोकस कहलाता है। आइए अब एक अवतल लेंस का व्यवहार देखें। चित्रा 10ण्12 ;इद्ध को ध्यानपूवर्क देख्िाए। अवतल लेंस पर मुख्य अक्ष के समांतर प्रकाश की अनेक किरणें आपतित हो रही हैं। ये किरणें लेंस से अपवतर्न के पश्चात मुख्य अक्ष के एक बिंदु से अपसरित होती प्रतीत होती हैं। मुख्य अक्ष पर यह बिंदु अवतल लेंस का मुख्य पफोेकस कहलाता है। यदि आप किसी लेंस के विपरीत पृष्ठ से समांतर किरणों को गुजरने दें तो आपको पहले से विपरीत दिशा में दूसरा मुख्य पफोकस प्राप्त होगा। मुख्य पफोकस को निरूपित करने के लिए प्रायः अक्षर थ् का प्रयोग होता है। तथापि, किसी लेंस में दो मुख्य पफोकस होते हैं। इन्हें थ्तथा थ्द्वारा निरूपित किया जाता है। किसी लेंस के मुख्य पफोकस की12 प्रकाश्िाक वेंफद्र से दूरी पफोकस दूरी कहलाती है। पफोकस दूरी को अक्षर श् िश् द्वारानिरूपित किया जाता है। आप किसी उत्तल लेंस की पफोकस दूरी किस प्रकार ज्ञात कर सकते हैं? ियाकलाप 10.11 को स्मरण कीजिए। इस ियाकलाप में लेंस की स्िथति तथा सूयर् के प्रतिबिंब की स्िथति के बीच की दूरी लेंस की सन्िनकट ;लगभगद्ध पफोकस दूरी बताती है। 10.3.4 लेंसों द्वारा प्रतिबिंब बनना लेंस प्रतिबिंब वैफसे बनाते हैं? लेंस प्रकाश के अपवतर्न द्वारा प्रतिबिंब बनाते हैं। उनप्रतिबिंबों की प्रकृति क्या है? आइए, पहले उत्तल लेंस के लिए इसका अध्ययन करें। ियाकलाप 10.12 ऽ एक उत्तल लेंस लीजिए। ियाकलाप 10.11 में वण्िार्त विध्ि द्वारा इसकी सन्िनकट पफोकस दूरी ज्ञात कीजिए। ऽ एक लंबी मेश पर चाॅक का प्रयोग करके पाँच समांतर सीध्ी रेखाएँ इस प्रकार खींचिएकि किन्हीं दो उत्तरोतर रेखाओं के बीच की दूरी लंेस की पफोकस दूरी के बराबर हो। ऽ लेंस को एक लेंस - स्टैंड पर लगाइए। इसे मध्य रेखा पर इस प्रकार रख्िाए कि लेंस का प्रकाश्िाक वंेफद्र इस रेखा पर स्िथत हो। ऽ लेंस के दोनों ओर दो रेखाएँ क्रमशः लेंस के थ् तथा 2थ् के तदनुरूपी होंगी। इन्हें उचित अक्षरांे द्वारा अंकित कीजिए, जैसे क्रमशः 2 थ्ए थ्ए थ्तथा112 2 थ्2 । ऽ एक जलती हुइर् मोमबत्ती को बाईं ओर, 2 थ्से काप़फी दूर रख्िाए। लेंस के विपरीत1 दिशा में रखे एक परदे पर इसका स्पष्ट एवं तीक्ष्ण प्रतिबिंब बनाइए। ऽ प्रतिबिंब की प्रकृति, स्िथति तथा आपेक्ष्िाक साइश नोट कीजिए। ऽ इस ियाकलाप में बिंब को 2 थ् से थोड़ा दूर, थ् तथा 2थ् के बीच, थ् पर तथा1111थ्1 और व् के बीच रख कर दोहराइए। अपने प्रेक्षणों को नोट कीजिए तथा सारणीब( कीजिए। बिंब की विभ्िान्न स्िथतियों के लिए उत्तल लेंस द्वारा बनाए गए प्रतिबिंब की प्रकृति, स्िथति तथा आपेक्ष्िाक साइश का संक्ष्िाप्त विवरण सारणी 10.4 में दिया गया है। उपरोक्त ियाकलाप का संक्ष्िाप्त विवरण सारणी 10.5 में दिया गया है। सारणी 10.5 बिंब की विभ्िान्न स्िथतियों के लिए अवतल लेंस द्वारा बने प्रतिबिंब की प्रकृति, स्िथति तथा आपेक्ष्िाक साइश बिंब की स्िथति प्रतिबिंब की स्िथति प्रतिबिंब का आपेक्ष्िाक साइश प्रतिबिंब की प्रकृति अनंत पर अनंत तथा लेंस केप्रकाश्िाक वेंफद्र व् के बीच पफोकस थ्1 पर पफोकस थ्1 तथा प्रकाश्िाक वेंफद्र व् के बीच अत्यध्िक छोटा, बिंदु आकारछोटा आभासी तथा सीध आभासी तथा सीध इस ियाकलाप से आप क्या निष्कषर् निकालते हैं? अवतल लेंस सदैव एक आभासी, सीध तथा छोटा प्रतिबिंब बनाएगा, चाहे बिंब कहीं भी स्िथत हो। प्रकाशμपरावतर्न तथा अपवतर्न 10ण्3ण्5 किरण आरेखों के उपयोग द्वारा लेंसों से प्रतिबिंब बनना हम किरण आरेखों के उपयोग द्वारा लेंसों से प्रतिबिंबों के बनने को निरूपित कर सकतेहैं। किरण आरेख लेंसों में बने प्रतिबिंबों की प्रकृति, स्िथति तथा आपेक्ष्िाक साइश का अध्ययन करने में भी हमारी सहायता करेंगे। लेंसों में किरण आरेख बनाने के लिए गोलीय दपर्णों की भाँति हम निम्न में से किन्हीं दो किरणों पर विचार कर सकते हैं। ;पद्ध बिंब से, मुख्य अक्ष के समांतर आने वाली कोइर् प्रकाश किरण उत्तल लेंस से अपवतर्न के पश्चात चित्रा 10.13 ;ंद्ध में दशार्ए अनुसार लेंस के दूसरी ओर मुख्य पफोकस से गुशरेगी। अवतल लेंस की स्िथति में प्रकाश किरण चित्रा 10.13 ;इद्ध में दशार्ए अनुसार लेंस के उसी ओर स्िथत मुख्य पफोकस से अपसरित होती प्रतीत होती है।;ंद्ध ;इद्धचित्रा 10.13 ;पपद्ध मुख्य पफोकस से गुशरने वाली प्रकाश किरण, उत्तल लेंस से अपवतर्न के पश्चात मुख्य अक्ष के समांतर निगर्त होगी। इसे चित्रा 10ण्14 ;ंद्ध में दशार्या गया है। अवतल लेंस के मुख्य पफोकस पर मिलती प्रतीत होने वाली प्रकाश किरण, अपवतर्न के पश्चात मुख्य अक्ष के समांतर निगर्त होगी। इसे चित्रा 10ण्14 ;इद्ध में दशार्या गया है। चित्रा 10.14 ;पपपद्ध लेंस के प्रकाश्िाक वेंफद्र से गुशरने वाली प्रकाश किरण अपवतर्न के पश्चात बिना किसी विचलन के निगर्त होती है। इसे चित्रा 10ण्15 ;ंद्ध तथा 10ण्15 ;इद्ध में दशार्या गया है। ;ंद्ध ;इद्ध चित्रा 10.15 चित्रा 10.16 में उत्तल लेंस द्वारा किसी बिंब की वुफछ स्िथतियों में, प्रतिबिंब बनने को किरण आरेखों द्वारा दशार्या गया है। चित्रा 10.17 में अवतल लेंस द्वारा बिंब की विभ्िान्न स्िथतियों में प्रतिबिंब बनने को किरण आरेखों द्वारा दशार्या गया है। ;ंद्ध ;इद्ध ;बद्ध ;कद्ध चित्रा 10.16 उत्तल लेंस द्वारा बिंब की विभ्िान्न स्िथतियों के लिए प्रतिबिंब की स्िथति, साइश एवं प्रकृति ;ंद्ध ;इद्ध चित्रा 10.17 अवतल लेंस द्वारा बने प्रतिबिंब की प्रकृति, स्िथति तथा साइश 10ण्3ण्6 गोलीय लेंसों के लिए चिÉ - परिपाटी लेंसों के लिए, हम गोलीय दपर्णों जैसी ही चिÉ - परिपाटी अपनाएँगे। दूरियों के चिÉों के निधर्रण के लिए हम यहाँ भी उन्हीं नियमों को अपनाएँगे। केवल, जहाँ दपर्णों में सभी दूरियाँ उनके ध््रुवों से नापी जाती हैं वहाँ लेंसों में सभी माप उनके प्रकाश्िाक वेंफद्र सेलिए जाते हैं। परिपाटी के अनुसार उत्तल लेंस की पफोकस दूरी धनात्मक होती हैजबकि अवतल लेंस की पफोकस दूरी ट्टणात्मक होती है। आपको नए अ तथा एि बिंब ऊँचाइर् ी तथा प्रतिबिंब ऊँचाइर् ीश् के मान में उचित चिÉों का चयन करने में सावधनी बरतनी चाहिए। 10.3.7 लेंस सूत्रा तथा आवध्र्न जिस प्रकार हमने गोलीय दपर्णों के लिए सूत्रा ज्ञात किया था उसी प्रकार गोलीय लेंसों के लिए भी लेंस सूत्रा स्थापित किया गया है। यह सूत्रा बिंब दूरी ;नद्ध, प्रतिबिंब दूरी ;अद्ध तथा पफोकस दूरी ;द्धि के बीच संबंध् प्रदान करता है। लेंस सूत्रा व्यक्त किया जाता हैः 11 1−त्र ;10.8द्धअन िउपरोक्त लेंस सूत्रा व्यापक है तथा किसी भी गोलीय लेंस के लिए, सभी स्िथतियों में मान्य है। लेंसों से संबंिात प्रश्नों को हल करने के लिए लेंस सूत्रा में आंकिक मानप्रतिस्थापित करते समय विभ्िान्न राश्िायों के उचित चिÉों का ध्यान रखना चाहिए। आवध्र्न किसी लेंस द्वारा उत्पन्न आवध्र्न, किसी गोलीय दपर्ण द्वारा उत्पन्न आवध्र्न की ही भाँतिप्रतिबिंब की ऊँचाइर् तथा बिंब की ऊँचाइर् के अनुपात के रूप में परिभाष्िात किया जाता है। इसे अक्षर उ द्वारा निरूपित किया जाता है। यदि बिंब की ऊँचाइर् ी हो तथालेंस द्वारा बनाए गए प्रतिबिंब की ऊँचाइर् ीश् हो, तब लेंस द्वारा उत्पन्न आवधर्न प्राप्त होगाः प्रति¯बब की ऊँचाइर् ीष् उ त्रत्र ;10ण्9द्ध¯बब की ऊचाइँर् ी लेंस द्वारा उत्पन्न आवध्र्न, बिंब दूरी न तथा प्रतिबिंब - दूरी अ से भी संबंध्ित है। इस संबंध् को व्यक्त करते हैं, ीष् अआवध्र्न ;उद्ध त्रत्र ;10.10द्धीन उदाहरण 10.3 किसी अवतल लेंस की पफोकस दूरी 15 बउ है। बिंब को लेंस से कितनी दूरी पर रखें कि इसके द्वारा बिंब का लेंस से 10 बउ दूरी पर प्रतिबिंब बने? लेंस द्वारा उत्पन्न आवधर्न भी ज्ञात कीजिए। हल अवतल लेंस द्वारा सदैव ही आभासी, सीधा प्रति¯बब उसी ओर बनता है जिस ओर ¯बब रखा होता है। प्रतिबिंब - दूरी अ त्र दृ10 बउ पफोकस दूरी ित्र दृ15 बउ बिंब - दूरी न त्र घ् 11 1क्योंकि −त्र अन ि111या त्रदृ नअ ि111 11 त्र दृ त्रदृ ़ न दृ10 ;द्ध दृ15 10 15 −़32 1या 1 त्रत्र न 30 −30 या न त्र दृ30 बउ इसी प्रकार बिंब की दूरी 30 बउ है।, अआवध्र्न, उ त्र न −10बउ 1 उ त्र त्रत्ऱ0ण्33 −30बउ 3 यहाँ ध्नात्मक चिÉ यह दशार्ता है कि प्रतिबिंब सीध तथा आभासी है। प्रतिबिंब का साइश बिंब के साइश का एक - तिहाइर् है। उदाहरण 10.4 कोइर् 2ण्0 बउ लंबा बिंब 10 बउ पफोकस दूरी के किसी उत्तल लेंस के मुख्य अक्ष के लंबवत रखा है। बिंब की लेंस से दूरी 15 बउ है। प्रतिबिंब की प्रकृति, स्िथति तथा साइश ज्ञात कीजिए। इसका आवध्र्न भी ज्ञात कीजिए। हल बिंब की ऊँचाइर् ी त्र ़2ण्0 बउ पफोकस दूरी ित्र ़10 बउ बिंब - दूरी न त्र दृ15 बउ प्रतिबिंब - दूरी अ त्र घ् प्रतिबिंब की ऊँचाइर् ीश् त्र घ् 111क्योंकि −त्र अन िया 111 त्ऱ अन ि111 11 त्र ़त्र−़ अ ; 15द्ध − 10 1510 12 1−़3 त्रत्र अ 30 30 या न त्र ़ 30 बउ अ का ध्नात्मक चिÉ यह दशार्ता है कि प्रतिबिंब लेंस के प्रकाश्िाक वेंफद्र के दाईं ओर 30 बउ दूरी पर बनता है। प्रतिबिंब वास्तविक तथा उलटा है। ीश् अआवध्र्न, उ त्र त्र ीन अ⎛⎞ीश् ीअथवा त्र⎜⎟न⎝⎠ ; द्ध⎛ 30 ⎞प्रतिबिंब की ऊँचाइर् ीश् त्र2ण्0 ⎜़ ⎟त्र−4ण्0बउ ⎝−15⎠ ़30बउ आवध्र्न उ त्र त्र−2 −15बउ उ तथा ीश् के ट्टणात्मक चिÉ यह दशार्ते हैं कि उपरोक्त वणर्न के अनुसार प्रतिबिंब उलटा तथा वास्तविक है। यह मुख्य अक्ष के नीचे बनता है। इस प्रकार एक वास्तविक उलटा तथा 4ण्0 बउ लंबा प्रतिबिंब लेंस के दाईं ओर लेंस से 30 बउ दूरी पर बनता है। यह प्रतिबिंब दोगुना विवध्िर्त है। 10ण्3ण्8 लेंस की क्षमता आप जानते हैं कि किसी लेंस की प्रकाश किरणों को अभ्िासरित अथवा अपसरित करने की क्षमता उसकी पफोकस दूरी पर निभर्र करती है। उदाहरण के लिए, कम पफोकस दूरीका एक उत्तल लेंस प्रकाश किरणों को बड़े कोण से मोड़कर उन्हें प्रकाश्िाक वेंफद्र के निकट पफोकसित कर देता है। इसी प्रकार, कम पफोकस दूरी का एक अवतल लेंस अिाक पफोकस दूरी के लेंस की अपेक्षा प्रकाश किरणों को अध्िक अपसरित करता है। किसी लेंस द्वारा प्रकाश किरणों को अभ्िासरण या अपसरण करने की मात्रा ;कमहतममद्ध को उसकी क्षमता के रूप में व्यक्त किया जाता है। इसे अक्षर च् द्वारा निरूपित करते हैं। किसी िपफोकस दूरी के लेंस की क्षमता, 1 च् त्र ;10.11द्धिलेंस की क्षमता का ैप् मात्राक ‘डाइआॅप्टर’ ;क्पवचजतमद्ध है। इसे अक्षर क् द्वारा दशार्या जाता है। यदि िको मीटर में व्यक्त करें तो क्षमता को डाइआॅप्टर में व्यक्त किया जाता है। इस प्रकार, 1 डाइआॅप्टर उस लेंस की क्षमता है जिसकी पफोकस दूरी 1 मीटर हो। 1क् त्र 1उदृ1 । आप नोट कर सकते हैं कि उत्तल लेंस की क्षमता ध्नात्मक तथा अवतल लेंस की क्षमता )णात्मक होती है। चश्मा बनाने वाले जब संशोध्ी लेंस निधार्रित करते हैं तो उनकी क्षमता का उल्लेख करते हैं। मान लीजिए निधर्रित लेंस की क्षमता ़ 2ण्0 क् है। इसका अथर् है कि निधार्रितलेंस उत्तल है और उसकी पफोकस दूरी ़ 0ण्50 उ है। इसी प्रकार, दृ2ण्5 क् क्षमता के लेंस की पफोकस दूरी दृ0ण्40 उ होती है। यह लेंस अवतल होता है। प्रश्न 123 किसी लेंस की 1 डाइआॅप्टर क्षमता को परिभाष्िात कीजिए।कोइर् उत्तल लंेस किसी सुइर् का वास्तविक तथा उलटा प्रतिबिंब उस लेंस से 50 बउ दूरबनाता है। यह सुइर्, उत्तल लेंस के सामने कहाँ रखी है, यदि इसका प्रतिबिंब उसी साइश का बन रहा है जिस साइश का बिंब है। लेंस की क्षमता भी ज्ञात कीजिए। 2 उ पफोकस दूरी वाले किसी अवतल लेंस की क्षमता ज्ञात कीजिए। घ्

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