अध्याय 8 जीव जनन वैफसे करते हैं वों के जनन की िया - वििा पर चचार् करने से पूवर् आइए, हम एक मूलभूतजीप्रश्न करेंμजीव जनन क्यों करते हैं? वास्तव में पोषण, श्वसन अथवा उत्सजर्न जैसे आवश्यक जैव - प्रक्रमों की तुलना में किसी व्यष्िट ;जीवद्ध को जीवित रहने के लिए जनन आवश्यक नहीं है। दूसरी ओर, जीव को संतति उत्पन्न करने के लिए अत्यिाकऊजार् व्यय करनी पड़ती है। पिफर जीव उस प्रक्रम में अपनी ऊजार् व्यथर् क्यों करे, जोउसके जीवित रहने के लिए आवश्यक नहीं है? कक्षा में इस प्रश्न के संभावित उत्तर खोजना अत्यंत रोचक होगा।इस प्रश्न का जो भी उत्तर हो, परंतु यह स्पष्ट है कि हमें विभ्िान्न जीव इसीलिए दृष्िटगोचर होते हैं, क्योंकि वे जनन करते हैं। यदि वह जीव एकल होता तथा कोइर् भी जनन द्वारा अपने सदृश व्यष्िट उत्पन्न नहीं करता, तो संभव है कि हमें उनके अस्ितत्व का पता भी नहीं चलता। किसी स्पीशीश में पाए जाने वाले जीवों की विशाल संख्या ही हमें उसके अस्ितत्व का ज्ञान कराती है। हमें वैफसे पता चलता है कि दो व्यष्िट एक ही स्पीशीश के सदस्य हैं? सामान्यतः हम ऐसा इसलिए कहते हैं क्योंकि वे एकसमान दिखाइर् देते हैं। अतः जनन करने वाले जीव संतति का सृजन करते हैं जो बहुत सीमा तक उनके समान दिखते हैं। 8ण्1 क्या जीव पूणर्तः अपनी प्रतिकृति का सृजन करते हैं? विभ्िान्न जीवों की अभ्िाकल्प, आकार एवं आकृति समान होने के कारण ही वे सदृश प्रतीत होते हैं। शरीर का अभ्िाकल्प समान होने के लिए उनका ब्लू¯प्रट भी समान होना चाहिए अतः अपने आधारभूत स्तर पर जनन जीव के अभ्िाकल्प का ब्लू¯प्रट तैयार करता है। कक्षा 9 में आप पढ़ चुके हैं कि कोश्िाका के वेंफद्रक में पाए जाने वाले गुणसूत्रों के डी.एन.ए.दृक्छ। ;डि. आक्सीराइबोन्यूक्लीक अम्लद्ध के अणुओं में आनुवंश्िाक गुणों का संदेश होता है जो जनक से संतति पीढ़ी में जाता है। कोश्िाका के वेंफद्रक के डी.एन.ए.में प्रोटीन संश्लेषण हेतु सूचना निहित होती है। इस संदेश के भ्िान्न होने की अवस्था में बनने वाली प्रोटीन भी भ्िान्न होगी। विभ्िान्न प्रोटीन के कारण अंततः शारीरिक अभ्िाकल्प में भी विविधता होगी। अतः जनन की मूल घटना डी.एन.ए.;क्छ।द्ध की प्रतिकृति बनाना है। डी.एन.एकी प्रतिकृति बनाने के लिए कोश्िाकाएँ विभ्िान्न रासायनिक ियाओं का उपयोग करतीहैं। जनन कोश्िाका में इस प्रकार डी.एन.ए.की दो प्रतिकृतियाँ बनती हैं तथा उनका एक - दूसरे से अलग होना आवश्यक है। परंतु डी.एन.ए.की एक प्रतिकृति को मूलकोश्िाका में रखकर दूसरी प्रतिकृति को उससे बाहर निकाल देने से काम नहीं चलेगाक्योंकि दूसरी प्रतिकृति के पास जैव - प्रक्रमों के अनुरक्षण हेतु संगठित कोश्िाकीय संरचनातो नहीं होगी। इसलिए डी.एन.ए.की प्रतिकृति बनने के साथ - साथ दूसरी कोश्िाकीय संरचनाओं का सृजन भी होता रहता है, इसके बाद डी.एन.ए.की प्रतिकृतियाँ विलग हो जाती हैं। परिणामतः एक कोश्िाका विभाजित होकर दो कोश्िाकाएँ बनाती है। यह दोनों कोश्िाकाएँ यद्यपि एकसमान हंै, परंतु क्या वे पूणर्रूपेण समरूप हैं? इसप्रश्न का उत्तर इस बात पर निभर्र करता है कि प्रतिकृति की प्रियाएँ कितनी यथाथर्ता से संपादित होती हैं। कोइर् भी जैव - रासायनिक प्रिया पूणर्रूपेण विश्वसनीय नहीं होती।अतः यह अपेक्ष्िात है कि डी.एन.ए. प्रतिकृति की प्रिया में वुफछ विभ्िान्नता आएगी। परिणामतः, बनने वाली डी.एन.ए.प्रतिकृतियाँ एकसमान तो होंगी, परंतु मौलिक डी.एन.ए. का समरूप नहीं होंगी। हो सकता है कि वुफछ विभ्िान्नताएँ इतनी उग्र हों कि डी.एन.ए.की नयी प्रतिकृति अपने कोश्िाकीय संगठन के साथ समायोजित नहीं हो पाए। इस प्रकार की संतति कोश्िाका मर जाती है। दूसरी ओर डी.एन.ए.प्रतिकृति की अनेवफ विभ्िान्नताएँ इतनी उग्र नहीं होतीं। अतः संतति कोश्िाकाएँ समान होते हुए भी किसी न किसी रूप में एक दूसरे से भ्िान्न होती हैं। जनन में होने वाली यह विभ्िान्नताएँ जैव - विकास का आधार हैं, जिसकी चचार् हम अगले अध्याय में करेंगे। 8ण्1ण्1 विभ्िान्नता का महत्व अपनी जनन क्षमता का उपयोग कर जीवों की समष्िट पारितंत्रा में स्थान अथवा निकेत ग्रहणकरते हैं। जनन के दौरान डी.एन.ए.प्रतिकृति का अविरोध जीव की शारीरिक संरचना एवं डिशाइन के लिए अत्यंत महत्वपूणर् है जो उसे विश्िाष्ट निकेत के योग्य बनाती है। अतः किसी प्रजाति ;स्पीशीशद्ध की समष्िट के स्थायित्व का संबंध जनन से है। परंतु, निकेत में अनेक परिवतर्न आ सकते हंै जो जीवों के नियंत्राण से बाहर हैं। पृथ्वी का ताप कम या अिाक हो सकता है, जल स्तर में परिवतर्न अथवा किसी उल्का ¯पड का टकराना इसके वुफछ उदाहरण हैं। यदि एक समष्िट अपने निकेत के अनुवूफल है तथा निकेत में वुफछ उग्र परिवर्तन आते हैं तो ऐसी अवस्था में समष्िट का समूल विनाश भी संभव है। परंतु, यदि समष्िट के जीवों में वुफछ विभ्िान्नता होगी तो उनके जीवित रहने की वुफछ संभावना हैै। अतः यदि शीेतोष्ण जल में पाए जाने वाले जीवाणुओंकी कोइर् समष्िट है तथा वैश्िवक ऊष्मीकरण ;हसवइंस ूंतउपदहद्ध के कारण जल का ताप बढ़ जाता है तो अिाकतर जीवाणु व्यष्िट मर जाएँगे, परंतु उष्ण प्रतिरोधी क्षमता वाले वुफछ परिवतर् ही जीवित रहते हैं तथा वृि करते हैं। अतः विभ्िान्नताएँ स्पीशीज कीउत्तरजीविता बनाए रखने में उपयोगी हैं। प्रश्न 12 डी.एन.ए. प्रतिकृति का प्रजनन में क्या महत्त्व है? जीवों में विभ्िान्नता स्पीशीश के लिए तो लाभदायक है परंतु व्यष्िट के लिए आवश्यक नहीं है, क्यों? घ् 8ण्2 एकल जीवों में प्रजनन की वििा ियाकलाप 8.1 ऽ 100 उस् जल में लगभग 10 ह चीनी को घोलिए। ऽ एक परखनली में इस विलयन का 20 उस् लेकर उसमें एक चुटकी यीस्ट पाउडर डालिए। ऽ परखनली के मुख को रूइर् से ढक कर किसी गमर् स्थान पर रख्िाए। ऽ 1 या 2 घंटे पश्चात, परखनली से यीस्ट - संवधर् की एक बूँद स्लाइड पर लेकर उस पर कवर - स्िलप रख्िाए। ऽ सूक्ष्मदशीर् की सहायता से स्लाइड का प्रेक्षण कीजिए। यीस्ट की वृि एवं दूसरी ियाकलाप में कवक की वृि के तरीके की तुलना कीजिए तथा ज्ञात कीजिए कि इनमें क्या अंतर है। इस चचार् के बाद कि जनन किस प्रकार कायर् करता है, आइए, हम जानें कि विभ्िान्न जीव वास्तव में किस प्रकार जनन करते हैं। विभ्िान्न जीवों के जनन की वििा उनके शारीरिक अभ्िाकल्प पर निभर्र करती है। 8ण्2ण्1 विखंडन एककोश्िाक जीवों में कोश्िाका विभाजन अथवा विखंडन द्वारा नए जीवों की उत्पिा होती है। विखंडन के अनेक तरीके प्रेक्ष्िात किए गए। अनेक जीवाणु तथा प्रोटोजोआ की कोश्िाका विभाजन द्वारा सामान्यतः दो बराबर भागों में विभक्त हो जाती है। अमीबा जैसे जीवों में कोश्िाका विभाजन किसी भी तल से हो सकता है। ियाकलाप 8.3 ऽ अमीबा की स्थायी स्लाइड का सूक्ष्मदशीर् की सहायता से प्रेक्षण कीजिए। ऽ इसी प्रकार अमीबा के द्विखंडन की स्थायी स्लाइड का प्रेक्षण कीजिए। ऽ अब दोनों स्लाइडांे की तुलना कीजिए। चित्रा 8.1 अमीबा में द्विखंडन परंतु, वुफछ एककोश्िाक जीवों में शारीरिक संरचना अिाक संगठित होती है। उदाहरणतः कालाशार के रोगाणु, लेस्मानिया में कोश्िाका के एक सिरे पर कोड़े के समान सूक्ष्म संरचना होती है। ऐसे जीवों में द्विखंडन एक निधार्रित तल से होता है। मलेरिया परजीवी, प्लैज्मोडियम जैसे अन्य एककोश्िाक जीव एक साथ अनेक संतति कोश्िाकाओं में विभाजित हो जाते हैं, जिसे बहुखंडन कहते हैं। दूसरी ओर यीस्ट कोश्िाका से छोटे मुवुफल उभर कर कोश्िाका से अलग हो जाते हैं तथा स्वतंत्रा रूप से वृि करते हैं जैसा कि हम ियाकलाप 8.1 में देख चुके हैं। 8ण्2ण्2 खंडन ियाकलाप 8.4 ऽ किसी झील अथवा तालाब जिसका जल गहरा हरा दिखाइर् देता हो और जिसमें तंतु के समान संरचनाएँ हों, उससे वुफछ जल एकत्रा कीजिए। ऽ एक स्लाइड पर एक अथवा दो तंतु रख्िाए। ऽ इन तंतुओं पर ग्िलसरीन की एक बूँद डाल कर कवर - स्िलप से ढक दीजिए। ऽ सूक्ष्मदशीर् के नीचे स्लाइड का प्रेक्षण कीजिए। ऽ क्या आप स्पाइरोगाइरा तंतुओें में विभ्िान्न ऊतक पहचान सकते हैं? सरल संरचना वाले बहुकोश्िाक जीवों में जनन की सरल वििा कायर् करती है। उदाहरणतः स्पाइरोगाइरा सामान्यतः विकसित होकर छोटे - छोटे टुकड़ों में खंडित हो जाता है। यह टुकड़े अथवा खंड वृि कर नए जीव ;व्यष्िटद्ध में विकसित हो जाते हैं। ियाकलाप 8.4 के प्रेक्षण के आधार पर क्या हम इसका कारण खोज सकते हैं? परंतु यह सभी बहुकोश्िाक जीवों के लिए सत्य नहीं है। वे सरल रूप से कोश्िाका - दर - कोश्िाका विभाजित नहीं होते। ऐसा क्यों है? इसका कारण है कि अिाकतर बहुकोश्िाक जीव विभ्िान्न कोश्िाकाओं का समूह मात्रा ही नहीं हैं। विशेष कायर् हेतुविश्िाष्ट कोश्िाकाएँ संगठित होकर ऊतक का निमार्ण करती हैं तथा ऊतक संगठित होकर अंग बनाते हैं, शरीर में इनकी स्िथति भी निश्िचत होती है। ऐसी सजग व्यवस्िथत परिस्िथति में कोश्िाका - दर - कोश्िाका विभाजन अव्यावहारिक है। अतः बहुकोश्िाक जीवों को जनन के लिए अपेक्षाकृत अिाक जटिल वििा की आवश्यकता होती है। चित्रा 8.2 प्लैश्मोडियम में बहुखंडन बहुकोश्िाक जीवों द्वारा प्रयुक्त एक सामान्य युक्ित यह है कि विभ्िान्न प्रकार की कोश्िाकाएँ विश्िाष्ट कायर् के लिए दक्ष होती हैं। इस सामान्य व्यवस्था का परिपालन करते हुए इस प्रकार के जीवों में जनन के लिए विश्िाष्ट प्रकार की कोश्िाकाएँ होती हैं। क्याजीव अनेक प्रकार की कोश्िाकाओं का बना होता है? इसका उत्तर है कि जीव में वुफछ ऐसी कोश्िाकाएँ होनी चाहिए जिनमें वृि, क्रम, प्रसरण तथा उचित परिस्िथति में विशेष प्रकार की कोश्िाका बनाने की क्षमता हो। 8ण्2ण्3 पुनरुद्भवन ;पुनजर्ननद्ध पूणर्रूपेण विभेदित जीवों में अपने कायिक भाग से नए जीव के निमार्ण की क्षमता होती है। अथार्त यदि किसी कारणवश जीव क्षत - विक्षत हो जाता है अथवा वुफछ टुकड़ों में टूट जाता है तो इसके अनेवफ टुकड़े वृि कर नए जीव में विकसित हो जाते हैं। उदाहरणतः हाइड्रा तथा प्लेनेरिया जैसे सरल प्राण्िायों को यदि कइर् टुकड़ों में काट दिया जाए तो प्रत्येक टुकड़ा विकसित होकर पूणर्जीव का निमार्ण कर देता है। यह पुनरुद्भवन कहलाता है ;चित्रा 8.3द्ध। पुनरुद्भवन ;पुनजर्ननद्ध विश्िाष्ट कोश्िाकाओं द्वारा संपादित होता है। इन कोश्िाकाओं के क्रमप्रसरण से अनेक कोश्िाकाएँ बन जाती हैं। कोश्िाकाओं के इस समूह से परिवतर्नके दौरान विभ्िान्न प्रकार की कोश्िाकाएँ एवं ऊतक बनते हैं। यह परिवतर्न बहुत व्यवस्िथत रूप एवं क्रम से होता है जिसे परिवधर्न कहते हैं। परंतु पुनरुद्भवन जनन के समान नहीं है इसका मुख्य कारण यह चित्रा 8.3 प्लेनेरिया में पुनरुद्भवन है कि प्रत्येक जीव के किसी भी भाग को काट कर सामान्यतः नया जीव उत्पन्न नहीं होता। 8ण्2ण्4 मुवुफलन हाइड्रा जैसे वुफछ प्राणी पुनजर्नन की क्षमता वाली कोश्िाकाओं का उपयोग मुवुफलन के लिए करते हैं। हाइड्रा में कोश्िाकाओं के नियमित विभाजन के कारण एक स्थान पर उभार विकसित हो जाता है। यह उभार ;मुकुलद्ध वृि करता हुआ नन्हे जीव में बदल जाता है तथा पूणर् विकसित होकर जनक से अलग होकर स्वतंत्रा जीव बन जाता है। स्पशर्क मुवुफल चित्रा 8.4हाइड्रा में मुवुफलन 8ण्2ण्5 कायिक प्रवधर्न ऐसे बहुत से पौधे हैं जिनमें वुफछ भाग जैसे जड़, तना तथा पिायाँ उपयुक्त परिस्िथतियों में विकसित होकर नया पौधा उत्पन्न करते हैं। अिाकतर जंतुओं के विपरीत, एकल पौधे इस क्षमता का उपयोग जनन की वििा के रूप में करते हैं। परतन, कलम अथवा रोपण जैसी कायिक प्रवधर्न की तकनीक का उपयोग कृष्िा में भी किया जाता है। गन्ना, गुलाब अथवा अंगूर इसके वुफछ उदाहरण हंै। कायिक प्रवधर्न द्वारा उगाए गए पौधों में बीज द्वारा उगाए पौधों की अपेक्षा पुष्प एवं पफल कम समय में लगने लगते हैं। यह प(ति केला, संतरा, गुलाब एवं चमेली जैसे उन पौधों को उगाने के लिए उपयोगी है जो बीज उत्पन्न करने की क्षमता खो चुके हैं। कायिक प्रवधर्न का दूसरा लाभ यह भी है कि इस प्रकार उत्पन्न सभी पौधे आनुवांश्िाक रूप से जनक पौधे के समान होते हैं। चित्रा 8.5 कलिकाओं के साथइसी प्रकार ब्रायोपिफलम की पिायों की कोर पर वुफछ कलिकाएँ विकसित होकर ब्रायोपिफलम की पत्तीमृदा में गिर जाती हैं तथा नए पौधे में विकसित हो जाती हैं ;चित्रा 8.5द्ध। 8ण्2ण्6 बीजाणु समासंघ अनेक सरल बहुकोश्िाक जीवों में भी विश्िाष्ट जनन संरचनाएँ पाइर् जाती हैं।बीजाणु ियाकलाप 8.2 में ब्रेड पर धागे के समान वुफछ संरचनाएँ विकसित हुइर् थीं। यह राइजोपस का कवक जाल है। ये जनन के भाग नहीं हैं। परंतु ऊध्वर् तंतुओं पर सूक्ष्म गुच्छ ;गोलद्ध संरचनाएँ जनन में भाग लेती हैं। ये गुच्छ बीजाणुधानी हैं जिनमें विशेष कोश्िाकाएँ अथवा बीजाणु पाए जाते ;चित्रा 8.6द्ध हैं। यह बीजाणु वृि करके राइजोपस के नए जीव उत्पन्न करते हैं। बीजाणु के चारों ओर एक मोटीभ्िािा होती है जो प्रतिवूफल परिस्िथतियों में उसकी रक्षा करती है, नम सतह के संपवर्फ में आने पर वह वृि करने लगते हैं। चित्रा 8.6 अब तक जनन की जिन वििायों की हमने चचार् की उन सभी में नयी पीढ़ी का राइजोपस में बीजाणु समासंघ सृजन केवल एकल जीव द्वारा होता है। इसे अलैंगिक जनन कहते हैं। प्रश्न 12345 द्विखंडन बहुखंडन से किस प्रकार भ्िान्न है? बीजाणु द्वारा जनन से जीव किस प्रकार लाभान्िवत होता है? क्या आप वुफछ कारण सोच सकते हंै जिससे पता चलता हो कि जटिल संरचना वाले जीव पुनरुद्भवन द्वारा नयी संतति उत्पन्न नहीं कर सकते? वुफछ पौधों को उगाने के लिए कायिक प्रवधर्न का उपयोग क्यों किया जाता है? डी.एन.ए. की प्रतिकृति बनाना जनन के लिए आवश्यक क्यों है? घ् 8ण्3 लैंगिक जनन हम जनन की उस वििा से भी परिचित हैं जिसमें नयी संतति उत्पन्न करने हेतु दो व्यष्िट ;एकल जीवोंद्ध की भागीदारी होती है। न तो एकल बैल संतति बछड़ा पैदा कर सकता है, और न ही एकल मुगीर् से नए चूजे उत्पन्न हो सकते हैं। ऐसे जीवों में नवीन संतति उत्पन्न करने हेतु नर एवं मादा दोनों ¯लगों की आवश्यकता होती है। इस लैंगिक जनन की साथर्कता क्या है? क्या अलैंगिक जनन की वुफछ सीमाएँ हैं, जिनकी चचार् हमऊपर कर चुके हैं? 8ण्3ण्1 लैंगिक जनन प्रणाली क्यों? एकल ;पैत्राकद्ध कोश्िाका से दो संतति कोश्िाकाओं के बनने में डी.एन.ए. की प्रतिकृति बनना एवं कोश्िाकीय संगठन दोनों ही आवश्यक हैं। जैसा कि हम जान चुके हैं किडी.एन.ए. प्रतिकृति की तकनीक पूणर्तः यथाथर् नहीं है, परिणामी त्राुटियाँ जीव की समष्िट में विभ्िान्नता का स्रोेत हंै। जीव की प्रत्येक व्यष्िट विभ्िान्नताओं द्वारा संरक्ष्िात नहीं हो सकती, परंतु स्पीशीश की समष्िट में पाइर् जाने वाली विभ्िान्नता उस स्पीशीश के अस्ितत्व को बनाए रखने में सहायक है। अतः जीवों में जनन की कोइर् ऐसी वििा अिाक साथर्क होगी जिसमें अिाक विभ्िान्नता उत्पन्न हो सके।यद्यपि डी.एन.ए. प्रतिकृति की प्रणाली पूणर्रूपेण यथाथर् नहीं है वह इतनी परिशु(अवश्य है जिसमें विभ्िान्नता अत्यंत धीमी गति से उत्पन्न होती है। यदि डी.एन.ए. प्रतिकृतिकी ियावििा कम परिशु( होती, तो बनने वाली डी.एन.ए. प्रतिकृतियाँ कोश्िाकीय संरचना के साथ सामंजस्य नहीं रख पातीं। परिणामतः कोश्िाका की मृत्यु हो जाती। अतः परिवतर्उत्पन्न करने के प्रक्रम को किस प्रकार गति दी जा सकती है? प्रत्येक डी.एन.ए. प्रतिकृति में नयी विभ्िान्नता के साथ - साथ पूवर् पीढि़यों की विभ्िान्नताएँ भी संग्रहित होती रहती हैं। अतः समष्िट के दो जीवों में संग्रहित विभ्िान्नताओं के पैटनर् भी कापफी भ्िान्न होंगे। क्योंकि यह सभी विभ्िान्नताएँ जीवित व्यष्िट में पाइर् जा रही हंै, अतः यह सुनिश्िचत ही है कि यह विभ्िान्नताएँ हानिकारक नहीं हैं। दो अथवा अध्िक एकल जीवों की विभ्िान्नताओं के संयोजन से विभ्िान्नताओं के नए संयोजन उत्पन्न होंगे। क्योंकि इस प्रक्रम में दो विभ्िान्न जीव भाग लेते हैं अतः प्रत्येक संयोजन अपने आप में अनोखा होगा। लैंगिक जनन में दो भ्िान्न जीवों से प्राप्त डी.एन.ए. को समाहित किया जाता है। परंतु इससे एक और समस्या पैदा हो सकती है। यदि संतति पीढ़ी में जनक जीवों के डी.एन.ए. का युग्मन होता रहे, तो प्रत्येक पीढ़ी में डी.एन.ए. की मात्रा पूवर् पीढ़ी की अपेक्षा दोगुनी होती जाएगी। इससे डी.एन.ए. द्वारा कोश्िाकी संगठन पर नियंत्राण टूटने की अत्यिाक संभावना है। इसके अतिरिक्त, यदि प्रत्येक पीढ़ी में डी.एन.ए. की मात्रा दोगुनी होती गइर् तो वुफछ समय बाद इस ध्रती पर केवल डी.एन.ए. ही मिलेगा तथा किसी अन्य वस्तु के लिए कोइर् स्थान ही नहीं बचेगा। इस समस्या के समाधन के लिए हम कितने तरीके सोच सकते हैं? हम पहले ही जान चुके हैं कि जैसे - जैसे जीवों की जटिलता बढ़ती जाती हैवैसे - वैसे ऊतकों की विश्िाष्टता बढ़ती जाती है। उपरोक्त समस्या का समाधन जीवों ने इस प्रकार खोजा जिसमें विश्िाष्ट अंगों में वुफछ विशेष प्रकार की कोश्िाकाओं की परत होती है जिनमें जीव की कायिक कोश्िाकाओं की अपेक्षा गुणसूत्रों की संख्या आधी होती है तथा डी.एन.ए. की मात्रा भी आध्ी होती है। अतः दो भ्िान्न जीवों की यह युग्मक कोश्िाकाएँ लैंगिक जनन में युग्मन द्वारा युग्मनज ;जायगोटद्ध बनाती हैं तो संतति में गुणसूत्रों की संख्या एवं डी.एन.ए. की मात्रा पुनस्थार्पित हो जाती है। यदि युग्मनज वृि एवं परिवध्र्न द्वारा नए जीव में विकसित होता है तो इसमें ऊजार् का भंडार भी पयार्प्त होना चाहिए। अति सरल संरचना वाले जीवों में प्रायः दो जननकोश्िाकाओं ;युग्मकोंद्ध की आकृति एवं आकार में विशेष अंतर नहीं होता अथवा वेसमाकृति भी हो सकते हैं। परंतु जैसे ही शारीरिक डिज़ाइन अध्िक जटिल होता है, जननकोश्िाकाएँ भी विश्िाष्ट हो जाती हैं। एक जनन - कोश्िाका अपेक्षाकृत बड़ी होती है एवंउसमें भोजन का पयार्प्त भंडार भी होता है जबकि दूसरी अपेक्षाकृत छोटी एवं अिाक गतिशील होती है। गतिशील जनन - कोश्िाका को नर युग्मक तथा जिस जनन कोश्िाका में भोजन का भंडार संचित होता है, उसे मादा युग्मक कहते हैं। अगले वुफछ अनुभागों में हम देखेंगे कि इन दो प्रकार के युग्मकों के सृजन की आवश्यकता ने नर एवं मादा व्यष्िटयों ;जनकोंद्ध में विभेद उत्पन्न किए हैं तथा वुफछ जीवों में नर एवं मादा में शारीरिक अंतर भी स्पष्ट दृष्िटगोचर होते हंै। 8ण्3ण्2 पुष्पी पौधें में लैंगिक जनन आवृतबीजी ;एंजियोस्पमर्द्ध के जननांग पुष्प में अवस्िथत होते हैं। आप पुष्प के विभ्िान्न भागों के विषय में पहले ही पढ़ चुके हैंμबाह्यदल, दल ;पंखुड़ीद्ध, पुंकेसर एवं स्त्राीकेसर। पुंकेसर एवं स्त्राीकेसर पुष्प के जनन भाग हैं जिनमें जनन - कोश्िाकाएँ होती हैं। पंखुड़ी एवं बाह्यदल के क्या कायर् हो सकते हैं? जब पुष्प में पुंकेसर अथवा स्त्राीकेसर में से कोइर् एक जननांग उपस्िथत होता है तो पुष्प एकलिंगी कहलाते हैं ;पपीता, तरबूजद्ध। जब पुष्प व िर्तकाग्र पुंकेसरतंतु परागकोश व£तका में पुंकेसर एवं स्त्राीकेसर दोनों उपस्िथत होते हैं, ;गुड़हल, सरसोंद्ध तो उन्हें उभयलिंगी पुष्प कहते हैं। पुंकेसर नर जननांग है जो परागकण बनाते हैं। परागकण सामान्यतः पीले हो सकते हैं। आपने देखा होगा कि जब आप किसी पुष्प के पुंकेसर को छूते हैं तब हाथ में एक पीला पाउडर लग जाता है। स्त्राीकेसर पुष्प के वेंफद्र में अवस्िथत होता दल ;पंखुड़ीद्ध अंडाशय बाह्य दल स्त्राीकेसर चित्रा 8.7 है तथा यह पुष्प का मादा जननांग है। यह तीन भागों से बना होता है। आधर परपुष्प की अनुदैघ्यर् काट उभरा - पूफला भाग अंडाशय है, मध्य में लंबा भाग वतिर्का है तथा शीषर् भाग वतिर्काग्र है जो प्रायः चिपचिपा होता है। अंडाशय में बीजांड होते हैं तथा प्रत्येक बीजांड में एक अंड - कोश्िाका होती है। परागकण द्वारा उत्पादित नर युग्मक अंडाशय की अंडकोश्िाका ;मादा युग्मकद्ध से संलयित हो जाता है। जनन कोश्िाकाओं के इस युग्मन अथवा निषेचन से युग्मनज बनता है जिसमें नए पौध्े में विकसित होने की क्षमता होती है। अतः परागकणों को पुंकेसर से वतिर्काग्र तक स्थानांतरण की आवश्यकता होती है। यदि परागकणों का यह स्थानांतरण उसी पुष्प के वतिर्काग्र पर होता है तो यह स्वपरागण कहलाता है। परंतु एक पुष्प के परागकण दूसरे पुष्प पर स्थानांतरित होते हैं, तो उसे परपरागण कहते हैं। एक पुष्प से दूसरे पुष्प तक परागकणों का यह स्थानांतरण वायु, जल अथवा प्राणी जैसे वाहक द्वारा संपन्न होता है। परागकणों के उपयुक्त, वतिर्काग्र पर पहुँचने के पश्चात नर युग्मक को अंडाशय में स्िथत मादा - युग्मक तक पहुँचना होता है। इसके लिए परागकण से एक नलिका विकसित होती है तथा वतिर्का से होती हुइर् बीजांड तक पहुँचती है। निषेचन के पश्चात, युग्मनज में अनेक विभाजन होते हैं तथा बीजांड में भ्रूण विकसित होता है। बीजांड से एक कठोर आवरण विकसित होता है तथा यह बीज में परिवतिर्त हो जाता है। अंडाशय तीव्रता से वृि करता है तथा परिपक्व होकर पफल बनाता है। इस अंतराल में बाह्यदल, पंखुड़ी, पंुकेसर, वतिर्का एवं वतिर्काग्र प्रायः मुरझाकर गिर जाते हैं। क्या आपने कभी पुष्प के किसी भाग को पफल के साथ स्थायी रूप से जुड़े हुए देखा है? सोचिए, बीजों के बनने से पौध्े को क्या लाभ है। बीज में भावी पौधा अथवा भ्रूण होता है जो उपयुक्त परिस्िथतियों में नवोद्भ्िाद में विकसित हो जाता है। इस प्रक्रम को अंवुफरण कहते हैं। अब तक हम विभ्िान्न स्पीशीश में जनन की विभ्िान्न प्रणालियों की चचार् करते रहे हैं। आइए, अब हम उस स्पीशीश के विषय में जानें जिसमें हमारी सवार्ध्िक रुचि है, वह है मनुष्य। मानव में लैंगिक जनन होता है। यह प्रक्रम किस प्रकार कायर् करता है? आइए, अब स्थूल रूप से एक असंब( ¯बदु से प्रारंभ करते हैं। हम सभी जानते हैं कि आयु के साथ - साथ हमारे शरीर में वुफछ परिवतर्न आते हैं। कक्षा 2 से 10 तक पहुँचते - पहुँचते हमारी लंबाइर् एवं भार बढ़ जाता है। हमारे दाँत जो गिर जाते हैं, दूध के दाँत कहलाते हैं तथा नए दाँत निकल आते हैं। इन सभी परिवतर्नों को एक सामान्य प्रक्रम वृि में समूहब( कर सकते हैं जिसमें शारीरिक वृि होती है। परंतु किशोरावस्था के प्रारंभ्िाक वषो± में, वुफछ ऐसे परिवतर्न होते हैं जिन्हें मात्रा शारीरिक वृि नहीं कहा जा सकता। जबकि, शारीरिक सौष्ठव ही बदल जाता है। शारीरिक अनुपात बदलता है, नए लक्षण आते हैं तथा संवेदना में भी परिवतर्न आते हैं। इनमें से वुफछ परिवतर्न तो लड़के एवं लड़कियों में एकसमान होते हैं। हम देखते हैं कि शरीर के वुफछ नए भागों जैसे कि काँख एवं जाँघों के मध्य जननांगी क्षेत्रा में बाल - गुच्छ निकल आते हैं तथा उनका रंग भी गहरा हो जाता है। पैर, हाथ एवं चेहरे पर भी महीन रोम आ जाते हैं। त्वचा अक्सर तैलीय हो जाती है तथा कभी - कभी मुँहासे भी निकल आते हैं। हम अपने और दूसरों के प्रति अध्िक सजग हो जाते हैं। प्रांवुफर;भावीप्ररोहद्ध मूलांवुफर;भावी जड़द्ध चित्रा 8.9 अंवुफरण दूसरी ओर, वुफछ ऐसे भी परिवतर्न हैं जो लड़कों एवं लड़कियों में भ्िान्न होते हैं। लड़कियों में स्तन के आकार में वृि होने लगती है तथा स्तनाग्र की त्वचा का रंग भी गहरा होने लगता है। इस समय लड़कियों में रजोधमर् होने लगता है। लड़कों के चेहरे पर दाढ़ी - मँूछ निकल आती है तथा उनकी आवाज़ पफटने लगती है। साथ ही दिवास्वप्नअथवा रात्रिा में श्िाश्न भी अक्सर विवध्र्न के कारण ऊध्वर् हो जाता है। ये सभी परिवतर्न महीनों एवं वषो± की अवध्ि में मंद गति से होते हैं। ये परिवतर्न सभी व्यक्ितयों में एक ही समय अथवा एक निश्िचत आयु में नहीं होते। वुफछ व्यक्ितयों में ये परिवतर्न कम आयु में एवं तीव्रता से होते हैं जबकि अन्य में अत्यंत मंद गति से होते हैं। प्रत्येक परिवतर्न तीव्रता से पूणर् भी नहीं होता। उदाहरणतः लड़कों के चेहरे पर पहले छितराए हुए से वुफछ मोटे बाल परिलक्ष्िात होते हैं, तथा ध्ीरे - ध्ीरे यह वृि एक जैसी हो जाती है। पिफर भी इन सभी परिवतर्नों में विभ्िान्न व्यक्ितयों के बीच विविधता परिलक्ष्िात होती है। जैसे कि हमारे नाक - नक्श अलग - अलग हैं उसी प्रकार इन बालोंकी वृि का पैटनर्, स्तन अथवा श्िाश्न की आकृति एवं आकार भी भ्िान्न होते हैं। यह सभी परिवतर्न शरीर की लैंगिक परिपक्वता के पहलू हैं। इस आयु में शरीर में लैंगिक परिपक्वता क्यों परिलक्ष्िात होती है? हम बहुकोश्िाक जीवों में विश्िाष्ट कायो± के संपादन हेतु विश्िाष्ट प्रकार की कोश्िाकाओं की आवश्यकता की बात कर चुके हैं। लैंगिक जनन में भाग लेने के लिए जनन कोश्िाकाओं का उत्पादन इसी प्रकार का एक विश्िाष्ट कायर् है तथा हम देख चुके हैं कि पौधें में भी इस हेतुविशेष प्रकार की कोश्िाकाएँ एवं ऊतक विकसित होते हैं। प्राण्िायों, जैसे कि मानव भीइस कायर् हेतु विश्िाष्ट ऊतक विकसित करता है यद्यपि किसी व्यक्ित के शरीर में युवावस्था के आकार हेतु वृि होती है, परंतु शरीर के संसाध्न मुख्यतः इस वृि कीप्राप्ित की ओर लगे रहते हैं। इस प्रक्रम के चलते जनन ऊतक की परिपक्वता मुख्य प्राथमिकता नहीं होती अतः जैसे - जैसे शरीर की सामान्य वृि दर ध्ीमी होनी शुरू होतीहै, जनन - ऊतक परिपक्व होना प्रारंभ करते हैं। किशोरावस्था की इस अवध्ि को यौवनारंभ ;चनइमतजलद्ध कहा जाता है। अतः वे सभी परिवतर्न जिनकी हमने चचार् की जनन - प्रक्रम से किस प्रकार संब( हैं? हमें याद रखना चाहिए कि लैंगिक जनन प्रणाली का अथर् है, कि दो भ्िान्न व्यक्ितयों की जनन कोश्िाकाओं का परस्पर संलयन। यह जनन कोश्िाकाओं के बाह्य - मोचन द्वारा हो सकता है जैसे कि पुष्पी पौधें में होता है। अथवा दो जीवों के परस्पर संबंध् द्वारा जनन कोश्िाकाओं के आंतरिक स्थानांतरण द्वारा भी हो सकता है, जैसे कि अनेक प्राण्िायों में होता है। यदि जंतुओं को संगम के इस प्रक्रम में भाग लेना हो, तो यह आवश्यक है कि दूसरे जीव उनकी लैंगिक परिपक्वता की पहचान कर सवेंफ। यौवनारंभ की अवध्ि में अनेक परिवतर्न जैसे कि बालों का नवीन पैटनर् इस बात का संकेत है कि लैंगिक परिपक्वता आ रही है। दूसरी ओर, दो व्यक्ितयों के बीच जनन कोश्िाकाओं के वास्तविक स्थानांतरण हेतुविश्िाष्ट अंग/संरचना की आवश्यकता होती हैऋ उदाहरण के लिए श्िाश्न के ऊध्वर् होने की क्षमता। स्तनधरियों जैसे कि मानव में श्िाशु माँ के शरीर में लंबी अवध्ि तक गभर्स्थ रहता है तथा जन्मोपरांत स्तनपान करता है। इन सभी स्िथतियों के लिए मादा के जननांगों एवं स्तन का परिपक्व होना आवश्यक है। आइए, जनन तंत्रा के विषय में जानें। 8ण्3ण्3 ;ंद्ध नर जनन तंत्रा जनन कोश्िाका उत्पादित करने वाले अंग एवं जनन शुक्राशय कोश्िाकाओं को निषेचन के स्थान तक पहुँचाने वाले मूत्रा नलिका अंग, संयुक्त रूप से, नर जनन तंत्रा ;चित्रा 8.10द्ध बनाते हैं। नर जनन - कोश्िाका अथवा शुक्राणु का निमार्ण वृषण में होता है। यह उदर गुहा के बाहर वृषण कोष में स्िथत होते हैं। इसका कारण यह है कि शुक्राणु उत्पादन के लिए आवश्यक ताप शरीर के ताप से कम होता है। टेस्टोस्टेराॅन हामोर्न के उत्पादन एवं शुक्रवाहिनी स्रवण में वृषण की भूमिका की चचार् हम पिछले अध्याय में कर चुके हैं। शुक्राणु उत्पादन के नियंत्राण के अतिरिक्त टेस्टोस्टेराॅन लड़कों में यौवनावस्था के वृषण कोश लक्षणों का भी नियंत्राण करता है। उत्पादित शुक्राणुओं का मोचन शुक्रवाहिकाओं द्वारा होता है। ये शुक्रवाहिकाएँ मूत्राशय से आने वाली नली से जुड़ कर एक संयुक्त नली बनाती है। अतः मूत्रामागर् ;नतमजीतंद्ध शुक्राणुओं एवं मूत्रा दोनों के प्रवाह के उभय मागर् है। प्रोस्ट्रेट तथा शुक्राशय अपने स्राव शुक्रवाहिका में डालते हैं जिससे शुक्राणु एक तरल माध्यम में आ जाते हैं। इसके कारण इनका स्थानांतरण सरलता से होता है साथ ही यह स्राव उन्हें पोषण भी प्रदान करता है। शुक्राणु सूक्ष्म सरंचनाएँ हैं जिसमें मुख्यतः आनुवंश्िाक पदाथर् होते हैं तथा एक लंबी पूँछ होती है जो उन्हें मादा जनन - कोश्िाका की ओर तैरने में सहायता करती है।8ण्3ण्3 ;इद्ध मादा जनन तंत्रा मादा जनन - कोश्िाकाओं अथवा अंड - कोश्िाका का निमार्ण अंडाशय में होता है। वे वुफछ हामोर्न भी उत्पादित करती हंै। चित्रा 8.11 को ध्यानपूवर्क अंडवाहिकादेख्िाए तथा मादा जनन तंत्रा के विभ्िान्न अंगों को पहचानिए। ;पेफलोपियन ट्यूबद्धलड़की के जन्म के समय ही अंडाशय में हज़ारों अंडाशय अपरिपक्व अंड होते हैं। यौवनारंभ में इनमें से वुफछ परिपक्व होने लगते हैं। दो में से एक अंडाशय द्वारा प्रत्येक माह एक अंड परिपक्व होता है। महीन अंडवाहिका अथवा पेफलोपियन ट्यूब द्वारा यह अंडकोश्िाका गभार्शय तक ले जाए जाते हैं। दोनों अंडवाहिकाएँ संयुक्त होकर एक लचीली थैलेनुमा संरचना का निमार्ण करती हैं जिसे गभार्शय कहते हैं। गभार्शय ग्रीवा द्वारा योनि में खुलता है। मूत्राशय प्रोस्ट्रेट गं्रथ्िा श्िाश्न मूत्रामागर् वृषण चित्रा 8.10 मानव का नर जनन तंत्रा मैथुन के समय शुक्राणु योनि मागर् में स्थापित होते हैं जहाँ से ऊपर की ओर यात्रा करके वे अंडवाहिका तक पहुँच जाते हैं, जहाँ अंडकोश्िाका से मिल सकते हैं। निषेचन के पश्चात निषेचित अंड अथवा युग्मनज गभार्शय में स्थापित हो जाता है तथा विभाजित होने लगता है। हम पहले पढ़ चुके हैं कि माँ का शरीर गभर्धरण एवं उसके विकास के लिए विशेष रूप से अनुवूफलित होता है। अतः गभार्शय प्रत्येक माह भ्रूण को ग्रहण करने एवं उसके पोषण हेतु तैयारी करता है। इसकी आंतरिक पतर् मोटी होती जाती है तथा भ्रूण के पोषण हेतु रुध्िर प्रवाह भी बढ़ जाता है। भ्रूण को माँ के रुध्िर से ही पोषण मिलता है, इसके लिए एक विशेष संरचना होतीहै जिसे प्लैसेंटा कहते हैं। यह एक तश्तरीनुमा संरचना है जो गभार्शय की भ्िािा में धँसीहोती है। इसमें भ्रूण की ओर के ऊतक में प्रवध्र् होते हैं। माँ के ऊतकों में रक्तस्थान होते हैं जो प्रवध्र् को आच्छादित करते हैं। यह माँ से भ्रूण को ग्लूकोज, आॅक्सीजन एवं अन्य पदाथो± के स्थानांतरण हेतु एक बृहद क्षेत्रा प्रदान करते हैं। विकासशील भ्रूण द्वारा अपश्िाष्ट पदाथर् उत्पन्न होते हैं जिनका निपटान उन्हें प्लैसेंटा के माध्यम से माँ के रुिार में स्थानांतरण द्वारा होता है। माँ के शरीर में गभर् को विकसित होने में लगभग 9 मास का समय लगता है। गभार्शय के पेश्िायों के लयब( संवुफचन से श्िाशु का जन्म होता है। 8ण्3ण्3 ;बद्ध क्या होता है जब अंड का निषेचन नहीं होता? यदि अंडकोश्िाका का निषेचन नहीं हो तो यह लगभग एक दिन तक जीवित रहती है। क्योंकि अंडाशय प्रत्येक माह एक अंड का मोचन करता है, अतः निषेचित अंड वफीप्राप्ित हेतु गभार्शय भी प्रति माह तैयारी करता है। अतः इसकी अंतःभ्िािा मांसल एवं स्पोंजी हो जाती है। यह अंड के निषेचन होने की अवस्था में उसके पोषण के लिए आवश्यक है। परंतु निषेचन न होने की अवस्था में इस पतर् की भी आवश्यकता नहीं रहती। अतः यह पतर् ध्ीरे - ध्ीरे टूट कर योनि मागर् से रुिार एवं म्यूकस के रूप में निष्कासित होती है। इस चक्र में लगभग एक मास का समय लगता है तथा इसे )तुस्राव अथवा रजोध्मर् कहते हैं। इसकी अवध्ि लगभग 2 से 8 दिनों की होती है। 8ण्3ण्3 ;कद्ध जनन स्वास्थ्य जैसा कि हम देख चुके हैं, लैंगिक परिपक्वता एक क्रमिक प्रक्रम है तथा यह उस समय होता है जब शारीरिक वृि भी होती रहती है। अतः किसी सीमा ;आंश्िाक रूप सेद्ध तक लैंगिक परिपक्वता का अथर् यह नहीं है कि शरीर अथवा मस्ितष्क जनन िया अथवा गभर्धरण योग्य हो गए हैं। हम यह निणर्य किस प्रकार ले सकते हैं कि शरीरएवं मस्ितष्क इस मुख्य उत्तरदायित्व के योग्य हो गया है? इस विषय पर हम सभी पर किसी न किसी प्रकार का दबाव है। इस िया के लिए हमारे मित्रों का दबाव भी होसकता है, भले ही हम चाहें या न चाहें। विवाह एवं संतानोत्पिा के लिए पारिवारिकदबाव भी हो सकता है। संतानोत्पिा से बचकर रहने का, सरकारी तंत्रा की ओर से भी दबाव हो सकता है। ऐसी अवस्था में कोइर् निणर्य लेना काप़फी मुश्िकल हो सकता है। यौन ियाओं के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव के विषय में भी हमें सोचना चाहिए। हम कक्षा 9 में पढ़ चुके हैं कि एक व्यक्ित से दूसरे व्यक्ित को रोगों का संचरण अनेक प्रकार से हो सकता है क्योंकि यौनिया में प्रगाढ़ शारीरिक संबंध् स्थापित होते हैं, अतः इसमें आश्चयर् की कोइर् बात नहीं है कि अनेवफ रोगों का लैंगिक संचरण भी हो सकता है। इसमें जीवाणु जनित जैसे गोनेरिया तथा सिपफलिस एवं वाइरस संक्रमण जैसे कि मस्सा ;ॅंतजद्ध तथा भ्प्ट.।प्क्ै शामिल हैं। लैंगिक ियाओं के दौरान क्या इन रोगों के संचरण का निरोध् संभव है? श्िाश्न के लिए आवरण अथवा वंफडोम के प्रयोग से इनमें से अनेक रोगों के संचरण का वुफछ सीमा तक निरोध् संभव है। यौन ;लैंगिकद्ध िया द्वारा गभर्धरण की संभावना सदा ही बनी रहती है। गभर्धारण की अवस्था में स्त्राी के शरीर एवं भावनाओं की माँग एवं आपूतिर् बढ़ जाती है एवं यदि वह इसके लिए तैयार नहीं है तो इसका उसके स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। अतः गभर्धरण रोकने के अनेवफ तरीके खोजे गए हैं। यह गभर्रोध्ी तरीके अनेक प्रकार के हो सकते हैं। एक तरीका यांत्रिाक अवरोध् का है जिससे शुक्राणु अंडकोश्िाका तक न पहुँच सके। श्िाश्न को ढकने वाले वंफडोम अथवा योनि में रखने वाली अनेक युक्ितयों का उपयोग किया जा सकता है। दूसरा तरीका शरीर में हामोर्न संतुलन के परिवतर्न का है, जिससे अंड का मोचन ही नहीं होता अतः निषेचन नहीं हो सकता। ये दवाएँ सामान्यतः गोली के रूप में ली जाती हैं। परंतु ये हामोर्न संतुलन को परिवतिर्त करती हैं अतः उनके वुफछ विपरीत प्रभाव भी हो सकते हैं। गभर्धरण रोवफने के लिए वुफछ अन्य युक्ितयाँ जैसे कि लूप अथवा काॅपर - टी ;ब्वचचमत.ज्द्ध को गभार्शय में स्थापित करके भी किया जाता है। परंतु गभार्शय के उत्तेजन से भी वुफछ विपरीत प्रभाव हो सकते हैं। यदि पुरुष की शुक्रवाहिकाओं को अवरु( कर दिया जाए तो शुक्राणुओं का स्थानांतरण रुक जाएगा। यदि स्त्राी की अंडवाहिनी अथवा पेफलोपियन नलिका को अवरु( कर दिया जाए तो अंड ;¯डबद्ध गभार्शय तक नहीं पहुँच सकेगा। दोनों ही अवस्थाओं में निषेचन नहीं हो पाएगा। शल्यिया तकनीक द्वारा इस प्रकार के अवरोध् उत्पन्न किए जा सकते हैं। यद्यपि शल्य तकनीक भविष्य के लिए पूणर्तः सुरक्ष्िात है, परंतु असावध् ानीपूवर्क की गइर् शल्यिया से संक्रमण अथवा दूसरी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हंै। शल्यिया द्वारा अनचाहे गभर् को हटाया भी जा सकता है। इस तकनीक का दुरुपयोग उन लोगों द्वारा किया जा सकता है जो किसी विशेष लिंग का बच्चा नहीं चाहते, ऐसा गैरकानूनी कायर् अध्िकतर मादा गभर् के चयनात्मक गभर्पात हेतु किया जा रहा है। एक स्वस्थ समाज के लिए, मादा - नर लिंग अनुपात बनाए रखना आवश्यक है। यद्यपि हमारे देश में भ्रूण लिंग निधर्रण एक कानूनी अपराध् है। हमारे समाज की वुफछ इकाइयों में मादा भ्रूण की निमर्म हत्या के कारण हमारे देश में श्िाशु लिंग अनुपात तीव्रता से घट रहा है जो चिंता का विषय है। हमने पहले देखा कि जनन एक ऐसा प्रक्रम है जिसके द्वारा जीव अपनी समष्िट की वृि करते हैं। एक समष्िट में जन्मदर एवं मृत्युदर उसके आकार का निधर्रण करते हैं। जनसंख्या का विशाल आकार बहुत लोगों के लिए चिंता का विषय है। इसका मुख्य कारण यह है कि बढ़ती हुइर् जनसंख्या के कारण प्रत्येक व्यक्ित के जीवन स्तर में सुधर लाना दुष्कर कायर् है। यदि सामाजिक असमानता हमारे समाज के निम्न जीवन स्तर के लिएउत्तरदायी है तो जनसंख्या के आकार का महत्व इसके लिए अपेक्षाकृत कम हो जाता है।यदि हम अपने आसपास देखें तो क्या आप जीवन के निम्न स्तर के लिए उत्तरदायी सबसे महत्वपूणर् कारण की पहचान कर सकते हैं? प्रश्न 1.परागण िया निषेचन से किस प्रकार भ्िान्न है? 2.शुक्राशय एवं प्रोस्टेट ग्रंथ्िा की क्या भूमिका है? 3.यौवनारंभ के समय लड़कियों में कौन से परिवतर्न दिखाइर् देते हैं? 4.माँ के शरीर में गभर्स्थ भ्रूण को पोषण किस प्रकार प्राप्त होता है? 5.यदि कोइर् महिला काॅपर - टी का प्रयोग कर रही है तो क्या यह उसकी यौन - संचरित रोगों से रक्षा करेगा? घ्

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