अध्याय 6 जैव प्रक्रम म जैव ;सजीवद्ध तथा अजैव ;निजीर्वद्ध में वैफसे अंतर स्पष्ट करते हैं? यदि हम वुफत्तेहको दौड़ते देखते हैं या गाय को जुगाली अथवा गली में एक इन्सान को शोर से चीखते हुए देखते हैं तो हम समझ जाते हैं कि ये सजीव हैं। यदि वुफत्ता, गाय या इन्सान सो रहे हैं तो क्या तब भी हम यही सोचेंगे कि ये सजीव हैं, लेकिन हम यह वैफसे जानेंगे? हम उन्हें साँस लेतेंदेखते हैं और जान लेते हैं कि वे सजीव है। पौधें के बारे में हम वैफसे जानेंगे कि वे सजीव हैं? हममें से वुफछ कहेंगे कि वे हरे दिखते हैं। लेकिन उन पौधें के बारे में क्या कहेंगे जिनकी पिायाँ हरी न होकर अन्य रंग की होती है? वे समय के साथ वृि करते हैं,ंअतः हम कह सकते हैं कि वे सजीव हैं। दूसरे शब्दों में, हम सजीव के सामान्य प्रमाण के तौर पर वुफछ गतियों पर विचार करते हैं, ये वृि संबंध्ी या अन्य गतियाँ हो सकती हैं। लेकिन वह पौधा भी सजीव है जिसमें वृि परिलक्ष्िात नहीं होती। वुफछ जंतु साँस तो लेते हैं परंतु जिनमें गति स्पष्ट रूप से नहीं दिखाइर् देती है वे भी सजीव हैं। अतः दिखाइर् देने वाली गति जीवन के परिभाष्िात लक्षण के लिए पयार्प्त नहीं है। अति सूक्ष्म स्केल पर होने वाली गतियाँ आँखों से दिखाइर् नहीं देती हैं, उदाहरण के लिए अणुओं की गतियाँ। क्या यह अदृश्य आणविक गति जीवन के लिए आवश्यक है? यदि हम यह प्रश्न किसी व्यवसायी जीवविज्ञानी से करें तो उसका उत्तर सकारात्मक होगा। वास्तव में विषाणु के अंदर आणविक गति नहीं होती है ;जब तक वे किसी कोश्िाका को संक्रमित नहीं करते हैंद्ध। अतः इसी कारण यह विवाद बना हुआ है कि वे वास्तव में सजीव हैं या नहीं। जीवन के लिए आणविक गतियाँ क्यों आवश्यक हैं? पूवर् कक्षाओं में हम यह देख चुके हैं कि सजीव की संरचना सुसंगठित होती हैऋ उनमें ऊतक हो सकते हैं, ऊतकों में कोश्िाकाएँ होती हैं, कोश्िाकाओं में छोटे घटक होते हैं। सजीव की यह संगठित एवं सुव्यवस्िथत संरचना समय के साथ - साथ पयार्वरण के प्रभाव के कारण विघटित होने लगती है। यदि यह व्यवस्था टूटती है तो जीव और अध्िक समय तक जीवित नहीं रह पाएगा। अतः जीवों के शरीर को मरम्मत तथा अनुरक्षण की आवश्यकता होती है। क्योंकि ये सभी संरचनाएँ अणुओं से बनी होती हैं अतः उन्हें अणुओं को लगातार गतिशील बनाए रखना चाहिए। सजीवों में अनुरक्षण प्रक्रम कौन से हैं? आइए खोजते हैं। 6ण्2ण्1स्वपोषी पोषण स्वपोषी जीव की काबर्न तथा ऊजार् की आवश्यकताएँ प्रकाश संश्लेषण द्वारा पूरी होती हैं। यह वह प्रक्रम है जिसमें स्वपोषी बाहर से लिए पदाथो± को ऊजार् संचित रूप में परिवतिर्त कर देता है। ये पदाथर् काबर्न डाइआॅक्साइड तथा जल के रूप में लिए जाते हैं जो सूयर् के प्रकाश तथा क्लोरोपिफल की उपस्िथति में काबोर्हाइड्रेट में परिवतिर्त करमध्यश्िारा पणर् पटल दिए जाते हैं। काबोर्हाइड्रेट पौधें को ऊजार् प्रदान करने मेंश्िारा प्रयुक्त होते हैं। अगले अनुभाग में हम अध्ययन करेंगे कि यह वैफसे होता है। जो काबोर्हाइड्रेट तुरंत प्रयुक्त नहीं होते हैं मोमीपफलोएम जाइलम उन्हें मंड के रूप में संचित कर लिया जाता है। यह रक्ष्िातक्यूटिकलसंवहन बंडल आंतरिक ऊजार् की तरह कायर् करेगा तथा पौध्े द्वारा उफपरी बाह्य आवश्यकतानुसार प्रयुक्त कर लिया जाता है। वुफछ इसी तरह त्वचा की स्िथति हमारे अंदर भी देखी जाती है, हमारे द्वारा खाएहरित लवक गए भोजन से व्युत्पन्न ऊजार् का वुफछ भाग हमारे शरीर में ग्लाइकोजन के रूप में संचित हो जाता है।वायु कोश द्वार कोश्िाका निचली बाह्य त्वचा चित्रा 6.1 अब हम देखते हैं कि प्रकाश संश्लेषण प्रक्रम में वास्तव मेंएक पत्ती की अनुप्रस्थ काट क्या होता है। इस प्रक्रम के दौरान निम्नलिख्िात घटनाएँ होती हैं - ;पद्ध क्लोरोपिफल द्वारा प्रकाश ऊजार् को अवशोष्िात करना। ;पपद्ध प्रकाश ऊजार् को रासायनिक ऊजार् में रूपांतरित करना तथा जल अणुओं का हाइड्रोजन तथा आॅक्सीजन में अपघटन। ;पपपद्ध काबर्न डाइआॅक्साइड का काबोर्हाइड्रेट में अपचयन। यह आवश्यक नहीं है कि ये चरण तत्काल एक के बाद दूसरा हो। उदाहरण के लिए, मरुद्भ्िाद पौध्े रात्रिा में काबर्न डाइआॅक्साइड लेते हैं और एक मध्यस्थ उत्पाद बनाते हैं। दिन में क्लोरोपिफल ऊजार् अवशोष्िात करके अंतिम उत्पाद बनाता है। आइए, हम देखें कि उपरोक्त अभ्िािया का प्रत्येक घटक प्रकाश संश्लेषण के लिए किस प्रकार आवश्यक है। यदि आप ध्यानपूवर्क एक पत्ती की अनुप्रस्थ काट का सूक्ष्मदशीर् द्वारा अवलोकन करेंगे ;चित्रा 6.1द्ध तो आप नोट करेंगे कि वुफछ कोश्िाकाओं में हरे रंग के ¯बदु दिखाइर् देते हैं। ये हरे ¯बदु कोश्िाकांग हैं जिन्हें क्लोरोप्लास्ट कहते हैं इनमें क्लोरोपिफल होता है। आइए, हम एक ियाकलाप करते हैं जो दशार्ता है कि प्रकाश संश्लेषण के लिए क्लोरोपिफल आवश्यक है। विज्ञान ियाकलाप 6.1 ऽ गमले में लगा एक शबलित पत्ती वाला पौध लीजिए ;उदाहरण वेेफ लिए मनीप्लांट या क्रोटन का पौधद्ध। ऽ पौध्े को तीन दिन अँध्ेरे कमरे में रख्िाए ताकि उसका संपूणर् मंड प्रयुक्त हो जाए। ऽ अब पौध्े को लगभग छः घंटे के लिए सूयर् के प्रकाश में रख्िाए। ऽ पौध्े से एक पत्ती तोड़ लीजिए। इसमें हरे भाग को अंकित करिए तथा उन्हें एक कागज पर ट्रेस कर लीजिए। ऽ वुफछ मिनट के लिए इस पत्ती को उबलते पानी में डाल दीजिए। ऽ इसके बाद इसे ऐल्कोहाॅल से भरे बीकर में डुबा दीजिए। ऽ इस बीकर को सावधनी से जल ऊष्मक में रखकर तब तक गमर् करिए जब तक ;ंद्ध ;इद्ध ऐल्कोहाॅल उबलने न लगे। चित्रा 6.2 ऽ पत्ती के रंग का क्या होता है? विलयन का रंग वैफसा हो जाता है? शबलित पत्ती ;ंद्ध मंड परीक्षण से पहले ;इद्ध मंड परीक्षण केऽ अब वुफछ मिनट के लिए इस पत्ती को आयोडीन के तनु विलयन में डाल दीजिए। ऽ पत्ती को बाहर निकालकर उसके आयोडीन को धे डालिए। बाद ऽ पत्ती के रंग का अवलोकन कीजिए और प्रारंभ में पत्ती का जो ट्रेस किया था उससे इसकी तुलना कीजिए ;चित्रा 6.2द्ध। ऽ पत्ती के विभ्िान्न भागों में मंड की उपस्िथति के बारे में आप क्या निष्कषर् निकालते हैं? द्वार कोश्िाकाएँ अब हम अध्ययन करते हैं कि पौध्े रंध््र छिद्र काबर्न डाइआॅक्साइड वैफसे प्राप्त करते हैं। कक्षा 9 में हमने रंध््र की चचार् की थी ;चित्रा 6.3द्ध जो पत्ती की सतह पर सूक्ष्म छिद्र होते हरित लवक हैं। प्रकाशसंश्लेषण के लिए गैसों का अिाकांश आदान - प्रदान इन्हीं छिद्रों के द्वारा होता है। लेकिन यहाँ यह जानना भी आवश्यक है कि ;इद्धगैसों का आदान - प्रदान तने, जड़ और पिायों ;ंद्ध चित्रा 6.3 ;ंद्ध खुला तथा ;इद्ध बंद रंध्र की सतह से भी होता है। इन रंध्रों से पयार्प्त मात्रा में जल की भी हानि होती है अतः जब प्रकाशसंश्लेषण के लिए काबर्न डाइआॅक्साइड की आवश्यकता नहीं होती तब पौध इन छिद्रों को बंद कर लेता है। छिद्रों का खुलना बेलजार और बंद होना द्वार कोश्िाकाओं का एक पोटैश्िायमकायर् है। द्वार कोश्िाकाओं में जब जल अंदर हाइड्रोक्साइडजाता है तो वे पूफल जाती हैं और रंध््र का वाच ग्लास में छिद्र खुल जाता है। इसी तरह जब द्वार ;ंद्ध ;इद्ध कोश्िाकाएँ सिवुुफड़ती हैं तो छिद्र बंद हो चित्रा 6.4 प्रायोगिक व्यवस्था ;ंद्ध पोटैश्िायम हाइड्रोक्साइड के साथ जाता है। ;इद्ध पोटैश्िायम हाइड्रोक्साइड के बिना जैव प्रक्रम 107 6ण्3 श्वसन पिचकारी रबर नलिकानलिका परखनली में चूने का पानी चूने का पानी चित्रा 6.7 ;ंद्धचूने के पानी में निःश्वास द्वारा वायु प्रवाहित हो रही है ;इद्ध चूने के पानी में वायु पिचकारी/सि¯रज द्वारा प्रवाहित की जा रही है। ियाकलाप 6.5 ियाकलाप 6.4 ऽ एक परखनली में ताज़ा तैयार किया हुआ चूने का पानी लीजिए। ऽ इस चूने के पानी में निःश्वास द्वारा निकली वायु प्रवाहित कीजिए ख्चित्रा 6ण्7 ;ंद्ध,। ऽ नोट कीजिए कि चूने के पानी को दूध्िया होने में कितना समय लगता है। ऽ एक सि¯रज या पिचकारी द्वारा दूसरी परखनली में ताज़ा चूने का पानी लेकर वायु प्रवाहित करते हैं ख्चित्रा 6ण्7 ;इद्ध,। ऽ नोट कीजिए कि इस बार चूने के पानी को दूिाया होने में कितना समय लगता है। ऽ निःश्वास द्वारा निकली वायु में काबर्न डाइआॅक्साइड की मात्रा के बारे में यह हमें क्या दशार्ता है? ऽ किसी पफल का रस या चीनी का घोल लेकर उसमें वुफछ यीस्ट डालिए। एक छिद्र वाली काॅकर् लगी परखनली में इस मिश्रण को ले जाइए। ऽ काॅकर् में मुड़ी हुइर् काँच की नली लगाइए। काँच की नली के स्वतंत्रा सिरे को ताज़ा तैयार चूने के पानी वाली परखनली में ले जाइए। ऽ चूने के पानी में होने वाले परिवतर्न को तथा इस परिवतर्न में लगने वाले समय के अवलोकन को नोट कीजिए। ऽ किण्वन के उत्पाद के बारे में यह हमें क्या दशार्ता है? पिछले अनुभाग में हम जीवों में पोषण पर चचार् कर चुके हैं। जिन खाद्य पदाथो± का अंतग्रर्हण पोषण प्रक्रम में लिए होता है कोश्िाकाएँ उनका उपयोग विभ्िान्न जैव प्रक्रम के लिए ऊजार् प्रदान करने के लिए करती हैं। विविध् जीव इसे भ्िान्न विध्ियों द्वारा करते हैं - वुफछ जीव आॅक्सीजन का उपभोग, ग्लूकोज़ को पूणर्तः काबर्न डाइआॅक्साइड तथा जल में, विख्ंाडित करने के लिए करते हैं जबकि वुफछ अन्य जीव दूसरे पथ का उपयोग करते हैं जिसमें आॅक्सीजन प्रयुक्त नहीं होती है ;चित्रा 6.8द्ध। इन सभी अवस्थाओं में पहला चरण ग्लूकोज़, एक छः काबर्न वाले अणु का तीन काबर्न वाले अणु पायरुवेट में विख्ंाडन है। यह प्रक्रम कोश्िाकाद्रव्य में होता है। इसके पश्चात पायरुवेट इथेनाॅल तथा काबर्न डाइआॅक्साइड में परिवतिर्त हो सकता है। यह प्रक्रम किण्वन के समय यीस्ट में होता है। क्योंकि यह प्रक्रम वायु ;आॅक्सीजनद्ध की अनुपस्िथति में होता है, इसे अवायवीय श्वसन कहते हैं। पायरुवेट का विखंडन आॅक्सीजन का उपयोग करके माइटोकाॅन्िड्रया में होता है। यह प्रक्रम तीन काबर्न वाले पायरुवेट के अणु को विखंडित विज्ञान कोइर् रास्ता होना चाहिए। इसके अतिरिक्त जहाँ आॅक्सीजन अवशोष्िात होती है, उस क्षेत्रा में वायु अंदर और बाहर होने के लिए एक ियाविध्ि होती है। मनुष्य में ;चित्रा 6.9द्ध, वायु शरीर के अंदर नासाद्वार द्वारा जाती है। नासाद्वार द्वारा जाने वाली वायु मागर् में उपस्िथत महीन बालों द्वारा निस्पंदित हो जाती है जिससे शरीर में जाने वाली वायु ध्ूल तथा दूसरी अशुियाँ रहित होती है। इस मागर् में श्लेष्मा की परत होती है जो इस प्रक्रम में सहायक होती है। यहाँ से वायु कंठ द्वारा पुफफ्रपुफस में प्रवाहित होती है। कंठ में उपास्िथ के वलय उपस्िथत होते हैं। यह सुनिश्िचत करता है कि वायु मागर् निपतित न हो। नासाद्वार मुखगुहा श्वासनलीग्रसनी कंठ उपास्िथ वलय वूफपिका श्वसन श्वसनिकाएँ पुफफ्रपुफस श्वसनी पसलियाँ श्वसनिका डायाप्रफामवूफपिका कोश चित्रा 6.9 मानव श्वसन तंत्रा पुफफ्रपुफस के अंदर मागर् छोटी और छोटी नलिकाओं में विभाजित हो जाता है जो अंत में गुब्बारे जैसी रचना में अंतकृत हो जाता है जिसे वूफपिका कहते हैं। वूफपिका एक सतह उपलब्ध् कराती है जिससे गैसों का विनिमय हो सकता है। कूपिकाओं की भ्िािा में रुिार वाहिकाओं का विस्तीणर् जाल होता है। जैसा हम प्रारंभ्िाक वषो± में देख चुके हैं, जब हम श्वास अंदर लेते हैं, हमारी पसलियाँ ऊपर उठती हैं और हमारा डायाÚाम चपटा हो जाता है, इसके परिणामस्वरूप वक्षगुहिका बड़ी हो जाती है। इस कारण वायु पुफफ्रपुफस के अंदर चूस ली जाती है और विस्तृत कूपिकाओं को भर लेती है। रुध्िर शेष शरीर से काबर्न डाइआॅक्साइड कूपिकाओं में छोड़ने के लिए लाता है। कूपिका रुध्िर वाहिका का रुिार कूपिका वायु से आॅक्सीजन लेकर शरीर की सभी कोश्िाकाओं तक पहुँचाता है। श्वास चक्र के समय जब वायु अंदर और बाहर होती है, पुफफ्रपुफस सदैव वायु का अवश्िाष्ट आयतन रखते हैं जिससे आॅक्सीजन के अवशोषण तथा काबर्न डाइआॅक्साइड के मोचन के लिए पयार्प्त समय मिल जाता है। जैव प्रक्रम 115 ऽ क्या यह मात्रा बछड़ों मंे, नर तथा मादा जंतुआंे मंे समान है? ऽ नर तथा मादा मानव मंे व जंतुआंे मंे दिखाइर् देने वाले अंतर की तुलना कीजिए। ऽ यदि कोइर् अंतर है तो उसे वैफसे समझाओगे? पिछले अनुभाग में हम देख चुके हैं कि रुिार भोजन, आॅक्सीजन तथा वज्यर् पदाथो± का हमारे शरीर मंे वहन करता है। कक्षा 9 मंे हमने सीखा था कि रुध्िर एक तरल संयोजी उफतक है। रुध्िर मंे एक तरल माध्यम होता है जिसे प्लैज्मा कहते हैं, इसमंे कोश्िाकाएँ निलंबित होती हैं। प्लैज्मा भोजन, काबर्न डाइआॅक्साइड तथा नाइट्रोजनी वज्यर् पदाथर् का विलीन रूप मंे वहन करता है। आॅक्सीजन को लाल रुध्िर कोश्िाकाएँ ले जाती हैं। बहुत से अन्य पदाथर् जैसे लवण का वहन भी रुध्िर के द्वारा होता है। अतः हमें एक पंपनयंत्रा की आवश्यकता है जो रुध्िर को अंगों के आसपास ध्केल सके, नलियों के एक परिपथ की आवश्यकता है जो रुध्िर को सभी ऊतकों तक भेज सके तथा एक तंत्रा की जो यह सुनिश्िचत करे कि इस परिपथ में यदि कभी टूट - पूफट होती है तो उसकी मरम्मत हो सके। हमारा पंप - हृदय हृदय एक पेशीय अंग है जो हमारी मुट्टòी के आकार का होता है ;चित्रा 6.10द्ध। क्योंकि रुिार को आॅक्सीजन व काबर्न डाइआॅक्साइड दोनों का ही वहन करना होता है अतः आॅक्सीजन प्रचुर रुिार को काबर्न डाइआॅक्साइड युक्त रुध्िर से मिलने को रोकने के लिए हृदय कइर् कोष्ठों में बँटा होता है। काबर्न डाइआॅक्साइड प्रचुर रुध्िर को काबर्न डाइआॅक्साइड छोड़ने के लिए पुफफ्रपुफस में जाना होता है तथा पुफफ्रपुफस से वापस आॅक्सीजनित रुध्िर को हृदय में लाना होता है। यह आॅक्सीजन प्रचुर रुिार तब शरीर के शेष हिस्सों में पंप किया जाता है। हम इस प्रक्रम को विभ्िान्न चरणों में समझ सकते हैं ;चित्रा 6.11द्ध। आॅक्सीजन प्रचुर रुध्िर महाध्मनी शरीर के उफपरी भाग से महाश्िारा दायाँ अ¯लद शरीर के निचले भाग से महाश्िारा दायाँ निलय विभाजिका पुफफ्रपुफस ध्मनियाँ पुफफ्रपुफस श्िाराएँ बायाँ अ¯लद बायाँ निलय चित्रा 6.10 मानव हृदय का व्यवस्थात्मक काट दृश्य पुफफ्रपुफस से हृदय में बाईं ओर स्िथत कोष्ठ - बायाँ अलिंद, में आता है। इस रुध्िर को एकत्रिात करते समय बायाँ अ¯लद श्िाथ्िाल रहता है। जब अगला कोष्ठ, बायाँ निलय, पैफलता है तब यह संवुफचित होता है जिससे रुध्िर इसमें स्थानांतरित होता है। अपनी बारी पर जब पेशीय बायाँ निलय संवुफचित होता है, तब रुिार शरीर में पंपित हो जाता है। ऊपर वाला दायाँ कोष्ठ, दायाँ अ¯लद जब पैफलता है तो शरीर से विआॅक्सीजनित रुिार इसमें आ जाता है। जैसे ही दायाँ अ¯लद संवुफचित होता है, नीचे वाला संगत कोष्ठ, दायाँ निलय पैफल जाता है। यह रुध्िर को दाएँ निलय में स्थानांतरित कर देता है जो रुध्िर को आॅक्सीजनीकरण हेतु अपनी बारी पर पुफफ्रपुफस में पंप कर देता है। अ¯लद की अपेक्षा निलय की पेशीय भ्िािा मोटी होती है क्योंकि निलय को पूरे शरीर में रुध्िर भेजना होता है। जब अ¯लद या निलय संवुफचित होते हैं तो वाल्व उलटी दिशा में रुिार प्रवाह को रोकना सुनिश्िचत करते हैं। जैव प्रक्रम 117 पुफफ्रपुफस में आॅक्सीजन रुध्िर में प्रवेश करती है। हृदय का दायाँ व बायाँ बँटवारा आॅक्सीजनित तथा विआॅक्सीजनित रुध्िर को मिलने से रोकने में लाभदायक होता है। इस तरह का बँटवारा शरीर को उच्च दक्षतापूणर् आॅक्सीजन की पूतिर् कराता है। पक्षी और स्तनधरी सरीखे जंतुओं को जिन्हें उच्च ऊजार् की आवश्यकता है, यह बहुत लाभदायक है क्योंकि इन्हें अपने शरीर का तापक्रम बनाए रखने के पुफफ्रपुफस के लिए पुफफ्रपुफस पुफफ्रपुफस से पुफफ्रपुफसीय लिए निरंतर ऊजार् की आवश्यकता होती है। उन जंतुओंपुफफ्रपुफसीय ध्मनी केश्िाकाएँ श्िारा में जिन्हें इस कायर् के लिए ऊजार् का उपयोग नहीं करना होता है, शरीर का तापक्रम पयार्वरण के तापक्रम पर निभर्र होता है। जल स्थल चर या बहुत से सरीसृप जैसे जंतुओं में तीन कोष्ठीय हृदय होता है और ये आॅक्सीजनितशरीर को महाध्मनीशरीर से तथा विआॅक्सीजनित रुध्िर धरा को वुफछ सीमा तकमहाश्िारा पुफफ्रपुफस के अलावा मिलना भी सहन कर लेते हैं। दूसरी ओर मछली के हृदय शरीर के अंगों में में केवल दो कोष्ठ होते हैं। यहाँ से रुिार क्लोम में भेजाकेश्िाकाएँ जाता है जहाँ यह आॅक्सीजनित होता है और सीधा शरीर में भेज दिया जाता है। इस तरह मछलियों के शरीर में चित्रा 6.11 एक चक्र में केवल एक बार ही रुध्िर हृदय में जाता है। आॅक्सीजन तथा काबर्न डाइआॅक्साइड के परिवहन दूसरी ओर अन्य कशेरुकी में प्रत्येक चक्र में यह दो बार तथा विनिमय का व्यवस्थात्मक निरूपण हृदय में जाता है। इसे दोहरा परिसंचरण कहते हैं। यह भी जानिए! रक्तदाब रुध्िर वाहिकाओं की भ्िािा के विरु( जो दाब लगता है उसे रक्तदाब कहते हैं। यह दाब श्िाराओं की अपेक्षा ध्मनियों में बहुत अध्िक होता है। ध्मनी के अंदर रुध्िर का दाब निलय प्रंवुफचन ;संवुफचनद्ध के दौरान प्रवंुफचन दाब तथा निलय अनुश्िाथ्िालन ;श्िाथ्िालनद्ध के दौरान ध्मनी के अंदर का दाब अनुश्िाथ्िालन दाब कहलाता है। सामान्य प्रवुंफचन दाब लभगग 120 उउ ;पाराद्ध तथा अनुश्िाथ्िालन दाब लगभग 80 उउ ;पाराद्ध होता है। रक्तदाब 120/80 ;120 प्रवंुफचन, 80 अनुश्िाथ्िालद्ध ;मापा जाता हैद्ध कपफ में दाब 120 से ऊपर कपफ में दाब 120 से नीचे कपफ में दाब 80 से नीचे रबर कपफ वायु से पूफल गया है ध्मनी बंद है ध्वनि सुनाइर् स्टेथाॅस्कोप से नहीं देती ध्वनि सुनी ध्मनी जाती है विज्ञान ऽ दोनों गमलों को, एक को पौध्े के साथ तथा दूसरे को छड़ी के साथ, प्लास्िटक शीट से ढक दीजिए। ऽ क्या आप दोनों में कोइर् अंतर देखते हैं? यह मानकर कि पादप को पयार्प्त जलापूतिर् है, जिस जल की रंध््र के द्वारा हानि हुइर् है उसका प्रतिस्थापन पिायों में जाइलम वाहिकाओं द्वारा हो जाता है। वास्तव में कोश्िाका से जल के अणुओं का वाष्पन एक चूषण उत्पन्न करता है जो जल को जड़ों में उपस्िथत जाइलम कोश्िाकाओं द्वारा खींचता है। पादप के वायवीय भागों द्वारा वाष्प के रूप में जल की हानि वाष्पोत्सजर्न कहलाती है। अतः वाष्पोत्सजर्न, जल के अवशोषण एवं जड़ से जलपिायों तक जल तथा उसमें विलेय खनिज लवणों के वाष्प उपरिमुखी गति में सहायक है। यह ताप के नियमन में भी सहायक है। जल के वहन में मूल दाब रात्रिा के समय विशेष रूप से प्रभावी है। दिन में जब रंध््र खुले हैं वाष्पोत्सजर्न कषर्ण, जाइलम में जल की गति के लिए, मुख्य प्रेरक बल होता है। भोजन तथा दूसरे पदाथो± का स्थानांतरण अब तक हम पादप में जल और खनिज लवणों की चचार् चित्रा 6.12 कर चुके हैं। अब हम चचार् करते हैं कि उपापचयी एक वृक्ष मंे वाष्पोत्सजर्न के समय जल की गति ियाओं के उत्पाद, विशेष रूप से प्रकाशसंश्लेषण, जो पिायों में होता है तथा पादप के अन्य भागों में वैफसे भेजे जाते हैं। प्रकाशसंश्लेषण के विलेय उत्पादों का वहन स्थानांतरण कहलाता है और यह संवहन ऊतक के फ्रलोएम नामक भाग द्वारा होता है। प्रकाशसंश्लेषण के उत्पादों के अलावा फ्रलोएम अमीनो अम्ल तथा अन्य पदाथो± का परिवहन भी करता है। ये पदाथर् विशेष रूप से जड़ के भंडारण अंगों, पफलों, बीजों तथा वृि वाले अंगों में ले जाए जाते हैं। भोजन तथा अन्य पदाथो± का स्थानांतरण संलग्न साथी कोश्िाका की सहायता से चालनी नलिका में उपरिमुखी तथा अधेमुखी दोनों दिशाओं में होता है। जाइलम द्वारा परिवहन जिसे सामान्य भौतिक बलों द्वारा समझाया जा सकता है, से विपरीत फ्रलोएम द्वारा स्थानांतरण है जो ऊजार् के उपयोग से पूरा होता है। सुक्रोज सरीखे पदाथर् फ्रलोएम ऊतक में ए.टी.पी. से प्राप्त ऊजार् से ही स्थानांतरित होते हैं। यह ऊतक का परासरण दाब बढ़ा देता है जिससे जल इसमें प्रवेश कर जाता है। यह दाब पदाथो± को फ्रलोएम से उस ऊतक तक ले जाता है जहाँ दाब कम होता है। यह फ्रलोएम को पादप की आवश्यकता के अनुसार पदाथो± का स्थानांतरण कराता है। उदाहरण के लिए, बसंत में जड़ व तने के ऊतकों मंे भंडारित शकर्रा का स्थानांतरण कलिकाओं में होता है जिसे वृि के लिए ऊजार् की आवश्यकता होती है। जैव प्रक्रम 121 प्रश्न 1.मानव में वहन तंत्रा के घटक कौन से हैं? इन घटकों के क्या कायर् हैं? 2.स्तनधरी तथा पक्ष्िायों में आॅक्सीजनित तथा विआॅक्सीजनित रुध्िर को अलग करना क्यों आवश्यक है? 3.उच्च संगठित पादप में वहन तंत्रा के घटक क्या हैं? 4.पादप में जल और खनिज लवण का वहन वैफसे होता है? घ् 5.पादप में भोजन का स्थानांतरण वैफसे होता है? 6ण्5 उत्सजर्न हम चचार् कर चुके हैं कि जीव प्रकाशसंश्लेषण तथा श्वसन में जनित वज्यर् गैसों से वैफसे छुटकारा पाते हैं। अन्य उपापचयी ियाओं में जनित नाइट्रोजन युक्त पदाथो± का निकलना आवश्यक है। वह जैव प्रक्रम जिसमें इन हानिकारक उपापचयी वज्यर् पदाथो± का निष्कासन होता है, उत्सजर्न कहलाता है। विभ्िान्न जंतु इसके लिए विविध् युक्ितयाँ करते हैं। बहुत से एककोश्िाक जीव इन अपश्िाष्टों को शरीर की सतह से जल मंे विसरित कर देते हैं। जैसा हम अन्य प्रक्रम मंे देख चुके हैं, जटिल बहुकोश्िाकीय जीव इस कायर् को पूरा करने के लिए विश्िाष्ट अंगांे का उपयोग करते हैं। 6ण्5ण्1 मानव मंे उत्सजर्न बाईं वृक्क ध्मनी मानव के उत्सजर्न तंत्रा ;चित्रा 6.13द्ध मंे एक जोड़ा वृक्क, एक मूत्रावाहिनी, एक मूत्राशय तथा एक मूत्रामागर् होता है। वृक्क उदरबायाँ वृक्क मंे रीढ़ की हड्डी के दोनांे ओर स्िथत होते हैं। वृक्क मंे मूत्रा बाईं वृक्क श्िारा बनने के बाद मूत्रावाहिनी मंे होता हुआ मूत्राशय मंे आ जाता हैमहाध्मनी बाईं तथा यहाँ तब तक एकत्रा रहता है जब तक मूत्रामागर् से यह मूत्रावाहिनी निकल नहीं जाता है।महाश्िारा मूत्रा किस प्रकार तैयार होता है? मूत्रा बनने का उद्देश्य रुिार मूत्राशय मंे से वज्यर् पदाथो± को छानकर बाहर करना है। पुफफ्रपुफस मंेमूत्रामागर् ;श्िाश्न मेंद्ध ब्व् रुिार से अलग हो जाती है जबकि नाइट्रोजनी वज्यर्2पदाथर् जैसे यूरिया या यूरिक अम्ल वृक्क मंे रुध्िर से अलग कर लिए जाते हैं। यह कोइर् आश्चयर् की बात नहीं कि वृक्क चित्रा 6.13 में आधरी निस्यंदन एकक, पुफफ्रपुफस की तरह ही, बहुत पतली मानव उत्सजर्न तंत्रा भ्िािा वाली रुध्िर केश्िाकाआंे का गुच्छ होता है। वृक्क मंे प्रत्येक केश्िाका गुच्छ, एक नलिका के कप के आकार के सिरे के अंदर होता है। यह नलिका छने हुए मूत्रा को एकत्रा करती है ;चित्रा 6.14द्ध। प्रत्येक वृक्क मंे ऐसे अनेक निस्यंदन एकक होते हैं जिन्हें वृक्काणु ;नेप्रफाॅनद्ध कहते हैं विज्ञान जो आपस मंे निकटता से पैक रहते हैं। प्रारंभ्िाक निस्यंद मंे वुफछ कोश्िाका गुच्छ ;ग्लामेरुलसद्ध वृक्काणु का नलिकाकारपदाथर्, जैसे ग्लूकोश, अमीनो अम्ल, लवण और प्रचुर मात्रा मंे वृक्क बोमन संपुट भाग जल रह जाते हैं। जैसे - जैसे मूत्रा इस नलिका मंे प्रवाहित होता है ध्मनी की शाखाइन पदाथो± का चयनित पुनरवशोषण हो जाता है। जल की मात्रा पुनरवशोषण शरीर मंे उपलब्ध् अतिरिक्त जल की मात्रा पर, तथा वृक्क श्िारा कितना विलेय वज्यर् उत्सजिर्त करना है, पर निभर्र करता है। की शाखा वृक्क धमनीप्रत्येक वृक्क मंे बनने वाला मूत्रा एक लंबी नलिका, मूत्रावाहिनी में प्रवेश करता है जो वृक्क को मूत्राशय से जोड़ती है। मूत्राशय मंे संग्राहक वाहिनीमूत्रा भंडारित रहता है जब तक कि पैफले हुए मूत्राशय का दाब मूत्रामागर् द्वारा उसे बाहर न कर दे। मूत्राशय पेशीय होता है अतः यह तंत्रिाका नियंत्राण मंे है, इसकी चचार् हम कर चुके हैं। परिणामस्वरूप हम प्रायः मूत्रा निकासी को नियंत्रिात कर लेते हैं। चित्रा 6.14 एक वृक्काणु की रचना वृफत्रिाम वृक्क ;अपोहनद्ध उत्तरजीविता के लिए वृक्क जैव अंग हैं। कइर् ध्मनी से पंपकारक जैसे संक्रमण, आघात या वृक्क मंे सीमित चयनित पारगम्यका मागर् झिल्ली की बनीरुध्िर प्रवाह, वृक्क की ियाशीलता को कम कर नलिका देते हैं। यह शरीर मंे विषैले अपश्िाष्ट को संचित कराता है, जिससे मृत्यु भी हो सकती है। वृक्क के अपिय होने की अवस्था मंे वृफत्रिाम वृक्क का उपयोग किया जा सकता है। एक वृफत्रिाम वृक्क नाइट्रोजनी अपश्िाष्ट उत्पादांे को रुध्िर से अपोहनउपकरण सेअपोहन ;कपंसलेपेद्ध द्वारा निकालने की एक विलयनश्िारा कायुक्ित है। मागर् वृफत्रिाम वृक्क बहुत सी अध्र्पारगम्य आस्तर वाली अपोहन के अपोहन के बाद कानलिकाआंे से युक्त होती है। ये नलिकाएँ© अपोहन लिए ताज़ा विलयन ;यूरिया तथाद्रव से भरी टंकी मंे लगी होती हैं। इस द्रव का विलयन अतिरिक्त लवणद्ध परासरण दाब रुध्िर जैसा ही होता है लेकिन इसमंे नाइट्रोजनी अपश्िाष्ट नहीं होते हैं। रोगी के रुध्िर को इन नलिकाआंे से प्रवाहित कराते हैं। इस मागर् मंे रुध्िर से अपश्िाष्ट उत्पाद विसरण द्वारा अपोहन द्रव मंे आ जाते हैं। शुिकृत रुध्िर वापस रोगी के शरीर में पंपित कर दिया जाता है। यह वृक्क के कायर् के समान है लेकिन एक अंतर है कि इसमें कोइर् पुनरवशोषण नहीं है। प्रायः एक स्वस्थ वयस्क मंे प्रतिदिन 180 लिटर आरंभ्िाक निस्यंद वृक्क मंे होता है। यद्यपि एक दिन में उत्सजिर्र्त मूत्रा का आयतन वास्तव मंे एक या दो लिटर है क्यांेकि शेष निस्यंद वृक्क नलिकाआंे मंे पुनरवशोष्िात हो जाता है। यह भी जानिए! जैव प्रक्रम 123

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